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ग़ज़ल -- कश्तियाँ बरसात में

2122-2122-2122-212

.

मुस्कुरा कर कह रही कुछ झुर्रियाँ बरसात में

देखीं थीं हमने कभी रंगीनियाँ बरसात में

.

आज का बचपन न जाने कौन सी चिन्ता में गुम

अब नहीं कागज़ की दिखतीं कश्तियाँ बरसात में

.

ज़ेह्न में रच बस गया है अब तो उनका ज़ायका

माँ खिलाती थी हमें जो पूरियाँ बरसात में

.

आज घर में शाम को चूल्हा जलेगा किस तरह

कह रही मजदूर की मजबूरियाँ बरसात में

.

मेरे घर की छत गिरी थी या गिरा था आसमाँ

जो हुईं उस रात थीं दुश्वारियाँ बरसात…

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Added by दिनेश कुमार on June 17, 2015 at 8:34am — 14 Comments

गजल //// इश्क में हूँ जांबलब

2122  2122 2122 2  

फाईलातुन  फाईलातुन  फाईलातुन फा  

हम किसी से मिलने उसके घर नहीं जाते

आप भी  है जिद  में मेरे दर नहीं आते

 

बेबसी  महबूब  की किस भाँति  समझाऊँ  

आज भी  उनको   मेरे  चश्मेतर नहीं भाते

 

जिन्दगी  बीती  है उनकी  सूफियाना सी   

मस्त तो है  रहते   साजो पर नहीं गाते

 

इश्क  में हूँ  जांबलब  मेरा  भरोसा क्या

फ़िक्र उनको  कब है  चारागर  नहीं लाते

 

एक साया उसका   बांटी  जिन्दगी…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 16, 2015 at 9:30pm — 34 Comments

गजल-सुख की भी दोस्त गम सी तासीर बन गयी है।

221 2122 221 2122



नाकामयाबी मेरी तकदीर बन गयी है।

अब जिन्दगी ये गम की तस्वीर बन गयी है।।



मरहम समय का भी कुछ आराम दे न पाया।

ये चोट अब जिगर की जागीर बन गयी है।।



उलझी पडी है उल्फत की बेडियों में साँसें।

यादों से मिल के धडकन भी तीर बन गयी है।।



सुनती है गर कहीं तू इक बार आ के मिल ले।

रो रो के मेरी हालत गम्भीर बन गयी है।।



हँसता हुँ तब भी चहरा छोडें नहीं उदासी।

सुख की भी दोस्त गम सी तासीर बन गयी है।।



आँखों ने… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on June 16, 2015 at 7:30pm — 26 Comments

मेरी बेटी( तीसरी कविता)___मनोज कुमार अहसास

आज दोपहरी जब कमरे पर

पहुँचा थका थकाया सा

सबसे पहले पहुँच गया था

वहाँ कोई भी अभी नहीं था

चला के पँखा लेट रहा था

चीं चीं की आवाज़ सुनी तो

बाहर जाकर देखा मैंने

दो चिड़ियाएँ फुदक रही है

चीं चीं चीं चीं

पास गया तो उड़ जाती थी

फुदक फुदक फिर आ जाती थी

पहले कभी नहीं देखा था

आज यें पहली बार मिली है

याद तुम्हारी दिला रहीं है

मेरी बिटिया

चिड़िया सी बिटिया

तेरी बोली इन चिड़ियों में मिल सी गयी है

घुल सी गयी है

इनके आजाने पर… Continue

Added by मनोज अहसास on June 16, 2015 at 5:48pm — 20 Comments

बारिश की पहली बूँदें (मुक्त कविता)

बारिश की पहली पहली फुहार

और सिग्नल का ये इंतज़ार

नजरें बरबस विंड स्क्रीन पर अटक गयीं

बारिश की बूँदें ढल रही थीं

एक एक कर बड़ी कठिनाई से बूँद सरकती

धीरे से दूसरी बूँद से जा मिलती

फिर थोड़ी सी रफ़्तार बढती

दोनों मिलकर तीसरी बूँद से मिलती

और फिर तेज़ रफ़्तार से ढुलक जाती

 

सोचें सरकने लगीं यूँ ही

कारवां भी ऐसे ही बनता है

किसी नए इंसान से मिलना

काफी कठिन लगता है पहली बार

दो मिलकर तीसरे से मिलने…

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Added by Nidhi Agrawal on June 16, 2015 at 12:30pm — 11 Comments

''खुशबू ओढ़ कर निकलता है''

२१२   १२१२   २२

 

खुशबू ओढ़ कर निकलता है

फूल जैसे कोई चलता है

..

 

रास्ते महकते हैं सारे

जिस भी सिम्त वो टहलता  है

..

 

हुस्न आफ़रीं कि क्या कहने 

जो भी देखे हाथ मलता  है

..

 

गो धनुक है पैरहन उसका       (धनुक=इन्द्रधनुष)

सात रंग में वो ढलता है

..

 

रंगा मुझको जाफ़रानी यूँ         (जाफ़रानी=केसरिया)

रात-दिन चराग़ जलता है

..

 

इश्क मुझको भी है…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 16, 2015 at 10:00am — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - फिल बदीह -- फिर किसी सलमान को ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122    2122     212

***************************************

दें सहारा, लड़खड़ाते आ रहे नादान को

पूछ तो लें बोझ कितना है, भले इंसान को

 

तू समन्दर पास आँखें खोल के रखना नहीं

ठेस लग जाये न तेरे ज्ञान के अभिमान को  

 

ओ मेरे फुटपाथ पे सोये हुये मित्रों,  जगो !

क्यों बुलावा दे रहे हो फिर किसी सलमान को

 

कोशिशें तो खूब की आँसू गिरे, महफिल ने…

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Added by गिरिराज भंडारी on June 16, 2015 at 8:00am — 16 Comments

किराए का घर--

किराए का घर--

शरीर,

लोभी और भोगी

सदैव आकर्षक, चकमक

किराए का घर

हवस की दीवारों पर टिकी

अहं - विकार की छत

बिखरी श्वेत चॉदनी पर चढा़ता

चाटुकारिता का रंग

टाड़-अलमारियों से झॉंकते

छल और कपट

सब मौन है।

ताख का टिमटिमाता दिया

किराएदार

आत्मा का वर्चस्व, संयमी-उद्यमी

र्निलिप्त कर्मो का प्रदाता

सॅवारता है सभी प्रकोष्ठ, सभ्य आचरण भी

बन्द खिड़कियो से चिपका

विवेक का वातानुकूलित सयंत्र

अनुरक्षण के दायित्व से…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 15, 2015 at 10:51pm — 6 Comments

सौदा ( लघुकथा )

"वाह बनर्जी साहब ! आपके बाग़ की खूबसूरती देख़ कर हृदय गदगद हो जाता है ।और हो भी क्यों न ? आपने जो अपने बच्चों की तरह इन्हें सजाने-सँवारने में जीवन लगा दिया ।"



"हाँ लालाजी ।जवानी में यही सोच के रोपे थे कि इनकी छाँव में अपनी जीवन संध्या गुजारूँगा ।सो बस वही कर रहा हूँ ।"



" पर मैंने सुना है , आप सारे पेड़ों के फल पड़ौसियों और रिश्तेदारों में मुफ़्त ही बाँट देते हैं।भला ये क्या मूर्खता हुई , जबकि आपको इन उन्नत किस्मों के बाज़ार में मुँह-माँगे दाम मिल सकते हैं।"



" लालाजी !… Continue

Added by shashi bansal goyal on June 15, 2015 at 9:30pm — 16 Comments

कोई बावफा कैसे दिखे

कोई हमनफस कैसे दिखे 

कोई हमनवा कैसे रहे 

बतलाए मुझको कोई तो

कोई बावफा कैसे दिखे...

तुम बदलते रूप इतने 

और बदलकर बोलियाँ 

खोजते रहते हो हममें 

वतनपरस्ती के निशाँ..

हम प्यार करने वाले हैं 

हम जख्म खाने वाले हैं 

हम गम उठाने वाले हैं 

हम साथ देने वाले हैं 

अकीदे का हर इम्तेहां 

हम पास करते आये हैं

किसी न किसी बहाने 

तुम टांग देना चाहते हो 

जबकि हमारे काँधे पे 

देखो…

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Added by anwar suhail on June 15, 2015 at 8:07pm — 2 Comments

जिजीविषा

सड़क के बीचो –बीच नन्ही सी कोपल को पैर तले आते देख मनीष सिहर गया था .क्या करने जा रहा था .तपती धरा ,गर्म हवा ,पथरीली जमीन पर पसरा पिघला डामर,अंगुल बराबर हैसियत पर टक्कर इनसब से.सीना ताने उस हरीतिमा की जिजीविषा ने उसे हिम्मत से लबरेज कर दिया कि वह मजबूती से घर में सबसे बोल सके कि गर्भ में बेटी है तो क्या वह उसे पोषित करेगा .जिबह के लिए जाती बकरी सम उसकी पत्नी खिल गयी और कभी जुबान नहीं खोलने वाले बेटे के जुर्रत पर माता पिता थम गए .नेपथ्य में नन्हा अंकुर एक बड़े से फलदार पादप में…

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Added by Rita Gupta on June 15, 2015 at 5:55pm — 21 Comments

उमस(सोमेश कुमार)

उमस(सोमेश कुमार )

“ आज तो चलना है ना, “सरोजनी नगर मार्किट ” पल्लवी ने थोड़ा नाराजगी भरे लहजे में कहा

”हाँ-हाँ बाबा,पक्का, कसम से ” आयाम बोला

“कब ?”

“काम निपटा लो, फिर चलते हैं ११-१२ बजे तक”

१०.३० बजे नाश्ता करने के बाद बिस्तर पर उंघते हुए- “पल्लवी , कैंसिल करते हैं याsर, सोने का मन कर रहा है| उमस भी है|सारा बदन –चिपचिप-चिपचिप हो रहा है | “

“हाँs , ना तो ये उमस कम होगी और ना ही तुम्हारे मन की उमस जाएगी |अब भी तो वही है तुम्हारे ख्यालो में- - - - तुम्हें शीतल करती,… Continue

Added by somesh kumar on June 15, 2015 at 2:16pm — 13 Comments

सोशल-सिक्योरिटी -- डॉo विजय शंकर

  

  बच्चा करीब छह महीने का हुआ था ,लेटे - लेटे इधर उधर देखता और रोने लगता।  माँ - बाप उसे बहलाने की कोशिश करते पर वह चुप नहीं होता।  परेशान माँ - बाप उसे डॉक्टर के पास ले गए।  डॉक्टर ने उसे देखा और कहा, बच्चा बिलकुल ठीक है , इसे स्वास्थ्य सम्बन्धी कोई समस्या नहीं है।  पर बच्चा था कि शांत ही नहीं होता , जो खिलौना दिया जाता उसे फेंक देता, गुस्सा दिखाता और रोने रोने को हो जाता। 



   परेशान माँ - बाप उसे मनोवैज्ञानिक के पास ले गये. उसने परीक्षण किया, कहा बच्चा बिलकुल…

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Added by Dr. Vijai Shanker on June 15, 2015 at 1:41pm — 22 Comments

स्याह धब्बा

स्याह धब्बा

ढलते सूरज-से रिश्ते की बुझती लालिमा

सिकुड़ती सिमटती जा रही

अनकही बातों के अरमानों की

अप्राकृतिक अकुलाहट

अपने ही कानों में भयानक

दुर्घटना-सी…

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Added by vijay nikore on June 15, 2015 at 8:41am — 24 Comments

अंतर्द्वंद ( लघुकथा )


" दिमाग ख़राब हो गया है इस लड़की का ", मम्मी बुरी तरह परेशान थीं । इतना अच्छा घर और वर था फिर भी मना कर दिया । अपने आप को कोस रही थीं कि क्यों सब बता दिया उसको ।
" आपको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता , इतने अस्पृह कैसे रह सकते हैं आप लोग "।
" अरे , घर में कौन काम करता है , इसमें तुम्हे क्या दिक़्क़त है "।
" माँ , जो इंसान अपने घर में एक बच्चे के काम करने पर इतना संवेदनहीन हो सकता है , वो मेरे प्रति संवेदनशील रह पायेगा "?
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on June 15, 2015 at 2:39am — 18 Comments

गज़ल,,,,,

                       

एक गज़ल,,,,

===========================

वज़्न = २१२२   २१२२  २१२२ २१२

फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलुन

===========================



सूख जातॆ फ़ूल पत्तॆ शाख़ भी हिलती नहीं !!

क्यूँ ग़रीबी कॆ बगीचॆ मॆं कली खिलती नहीं !!(१)



बॆटियॊं का बाप हूँ दिल जानता है सच सुनों,

आज कॆ इस दौर मॆं बॆटी सहज पलती नहीं !!(२)



बात करतॆ हॊ यहाँ अच्छॆ दिनॊं की खूब तुम,

तीरग़ी सॆ है भरी यॆ रात क्यूँ ढलती नहीं !!(३)



दॆख लॊ मुझकॊ…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on June 15, 2015 at 12:16am — 12 Comments

गजल //// खुदा से जो भी डरता है

हजज  मुरब्बा सालिम     

1222            1222

 

खुदा से जो भी डरता है

खुदा को  याद करता है

 

समय  है  जानवर ऐसा

जरा  धीरे से  चरता है

 

कृषक की छातियाँ देखो

पसीना  नित्य  झरता है

 

बिछे  जब राह  में काँटे

पथिक पग सोंच धरत़ा है

 

भला है  जानवर  उससे

उदर  जो आप  भरता…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 14, 2015 at 9:00pm — 20 Comments

एक प्रयास ( ग़ज़ल )

वो पत्थर था , बहुत थे फेंकने वाले
बन गए हीरे पर , उसे तराशने वाले


कब समझा है कोई वक़्त का इशारा
बन गए हैं ख़ुदा , उसे समझने वाले


ख्वाहिशें तो रखते है ज़माने में सब
और ही होते हैं ,उन्हें पूरा करने वाले


ग़ुम है बदगुमानी में ,ये सारी दुनिया
मिलते हैं कहाँ ,अब सच लिखने वाले


तलाश थी सिर्फ , एक फूल की विनय
हज़ार मिले राह में, कांटे रखने वाले !!

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on June 14, 2015 at 4:00pm — 16 Comments

उम्र(लघु कथा, मनन कु॰ सिंह)

उम्र

‘आप मुझे जानते हैं ?’

‘आप ही बता दें’।

‘फ्रेंड– रेकुएस्ट तो आपका था न?’

‘हाँ, एक दोस्त के साथ आपका नाम था’।

‘दोस्त का नाम बताइये’।

‘था कुछ नाम जी’।

‘अच्छा चलिये, अपने ही बारे  में बता दीजिये’। उधर से महिला ने संदेश भेजा ।

‘ मेरे बारे में तो मेरे प्रोफ़ाइल में है सब कुछ’।

‘कहाँ रहते हैं?’

‘आप बताइये’।

‘मैं तो जट मारवाड़ से हूँ, आप ?’

‘कोल्हापुर से जी’।

‘पर, आप बावन के हैं , मैं तो बस…

Continue

Added by Manan Kumar singh on June 14, 2015 at 12:30pm — 1 Comment

ग़ज़ल :- आज जिस रंग में ढालोगे मैं ढल जाऊँगा

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन/फ़इलुन



आज जिस रंग में ढालोगे मैं ढल जाऊँगा

दैर कर दोगे तो हाथों से निकल जाऊँगा



एक हालत में यहाँ कौन रहा है,मैं भी

जैसे हर चीज़ बदलती है,बदल जाऊँगा



ऐसे ही बनते हैं,दुनिया में मिसाली किरदार

मैं भी फूलों की तरह काँटों में पल जाऊँगा



मोम या बर्फ़ के जैसा नहीं,पर जानता हूँ

मैं तिरे जिस्म की गर्मी से पिघल जाऊँगा



मैं तो इक ख़ाक का पुतला हूँ,तू मिस्ल-ए-ख़ुर्शीद

पास आऊँगा अगर तेरे तो जल… Continue

Added by Samar kabeer on June 14, 2015 at 10:57am — 32 Comments

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