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आवारा ( लघु-कथा )

पापा आवारा किसे कहते हैं  ? चार साल के बिट्टू के इस प्रश्न पर मैं थोडा चौंका , फिर गोद में लेकर प्यार से उसके सर पर हाथ फेर कर बोला, बेटा आवारा उसे कहते हैं जिसका कोई नहीं होता, जो व्यर्थ गली-गली घूमता है ! ...तो ..पापा  क्या दादा जी का कोई नहीं है... ? जो मम्मी रोज कहती है ....इस उम्र में भी भटकता रहता है आवारा जैसा ....शाम को भोजन के वक्त घर याद आता है ..............  

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

राजू आहूजा 

Added by rajkumarahuja on April 16, 2015 at 12:30am — 10 Comments

पाप --

आज फिर से बादल , मौसम को ई का हो गया है , रामदीन सोच में डूब गया | आधे से ज्यादी फसल तो पहले ही चौपट हो गयी है , ऊपर से अगर घाम न हुआ तो पकेगी कैसे बची खुची फसल | कुछ समझ नहीं आ रहा था उसको | थोड़ी देर बाद वो उठा और कुम्हार टोला की ओर निकल गया | वहां रघू भी अपने सर पर हाँथ रख कर बैठा था , उसे देखते ही बोला " अरे ई मौसम को का हो गवा है , एकदम समझ नहीं आवत है एकर मिज़ाज़ | बर्तन तो तैयार ही नहीं हो पावत हैं , कइसे दो जून की रोटी का इंतज़ाम होई "|

कोई जवाब नहीं था उसके पास , चुपचाप उठा और…

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Added by विनय कुमार on April 15, 2015 at 11:21pm — 10 Comments

ग़ज़ल- बदलने को बदल जाना,मगर तहजीब जिंदा रख।

बदलने को बदल जाना, मगर तहजीब जिंदा रख

हवा के साथ ढल जाना, मगर तहजीब जिंदा रख

यहाँ रंगीन होती रोशनी है कौंधने वाली

खुशी के साथ जल जाना, मगर तहजीब जिंदा रख

हमारे आम पर यह कूकती कोयल बताती है

नये मौसम मचल जाना, मगर तहजीब जिंदा रख

हमारे नौजवानों की नई पीढी, नये रिश्ते

नशे में खुद को छल जाना मगर तहजीब जिंदा रख

महब्बत के लिये तो लाख पापड बेलने होंगे

महब्बत में उछल जाना मगर तहजीब जिंदा रख

बदलना भी जमाने का बडा हैरान करता है

बहुत आगे निकल जाना…

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Added by सूबे सिंह सुजान on April 15, 2015 at 10:30pm — 10 Comments

सौदा : लघु कथा : हरि प्रकाश दुबे

“आपकी लड़की हमको बहुत पसंद है !”

“ बहुत –बहुत शुक्रिया आप दोनों का !”

“ बस बहन जी, थोडा लेन- देन की बात भी...!”

“हाँ-हाँ  क्यों नहीं, भाई-साहब, बहन जी  बताइये- बताइये ?”

“ अरे आप तो जानती हीं हैं आजकल का चलन, और फिर मेरा लड़का अच्छा खासा सरकारी इंजीनीयर है , कम से कम ४० लाख नकद और एक गाडी तो बनती ही है !”  …

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Added by Hari Prakash Dubey on April 15, 2015 at 9:43pm — 10 Comments

किसान के हालात पर - एक कोशिश

खुशी जो हमने बांटी गम कम तो हुआ

हुए बीमार भार तन का  कम तो हुआ

माँगी जो हमने कीमत मिली हमें दुआ

उनके बजट का भार कुछ कम तो हुआ

मरहूम हो गए दुःख सहे नही गए

उनके सितम का भार कुछ कम तो हुआ

माना कि मेरे मौला है नाराज इस वकत

फक्र जिनपे था भरोसा  कम तो हुआ

मालूम था उन्हें हमसे हैं वो मगर

उनकी नजर में एक ‘मत’ कम तो हुआ

अन्नदाता बार बार कहते है जनाब

भूमि का भागीदार एक कम तो हुआ 

(मौलिक व अप्रकाशित)

मैंने गजल…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on April 15, 2015 at 8:00pm — 15 Comments

चयन (एक लघुकथा)

इतनी मुश्किल से तो बेठने की जगह मिली, ऊपर से गाड़ी लेट ! उस पर साथ मे पहले से बेठा आवारा सा लड़का जो लगातार उसे घूरता ही जा रहा है ! और वो गुस्से मे अनदेखा करके थोड़ा पीछे हटकर मुह घुमाकर बेठ गयी I अचानक पड़ा लिखा सुदर्शन युवा बीच  के थोड़ी से स्थान मे फस कर बेठ  गया, और लड़की अचानक आवारा लड़के से बोल पड़ी,

"भैया गाड़ी लेट क्यूँ हो गयी ?"!

 मोलिक अपकाशित 

Added by aman kumar on April 15, 2015 at 5:00pm — 15 Comments

सम्मान : लघुकथा

"कुछ सिखाओं अपनी माँ को | शहर में रहते पच्चीसों साल हो गये पर रही गंवार की गंवार |"
" बड़े साहब कितनी बार कहें बैठ जाओ पर ये बैठी नहीं |"
"कइसे बैठती जी, वो 'पैताने' बैठने को कहत रहा | "...सविता मिश्रा

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by savitamishra on April 15, 2015 at 4:30pm — 29 Comments

मिलन की आश (अन्त्यानुप्रास)

सरगम भरता, कल-कल करता, 

झर-झर  झरता  निर्झर  सस्वर I

तम को छलता, पग-पग चलता,

धक्-धक् जलता सूरज सत्वर  II

 

सन-सन बहता, गुम-सुम रहता, 

क्या-कुछ  कहता रह-रह मारुत  I…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 15, 2015 at 4:30pm — 20 Comments


प्रधान संपादक
दो लघुकथाएँ - (अम्बेदकर जयंती पर)

(१). बदरंग संवेदनाएँ



"घोषणा करवा दो कि कल हम पूरा दिन अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे।"    

"क्यों नेता जी ? कल तो कोई व्रत उपवास भी नहीं है।"

"अरे कल अम्बेदकर जयंती है न, पता नहीं किस किस बस्ती में जाना पड़ जाए ।"  

------------------------------------------------------------------------------

(२). सफ़ेद साँप



"आज तो स्पेशल जश्न होना चाहिए।"

"तो भेजें किसी को दारू सिक्का लाने ?"

"दारू सिक्के के साथ साथ मेरे लिए नत्थू की लौंडिया पकड़ कर…

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Added by योगराज प्रभाकर on April 15, 2015 at 4:00pm — 17 Comments

नसरी नज़्म :- "शहीद"

उस शहीद का तसव्वुर

ज़ह्न से नहीं निकलता

शर्म से सर झुका हुवा है

दर्द दिल में छुपा हुवा है

इस तसव्वुर ने मेरे रोज़-ओ- शब

मेरे अपने नहीं रहने दिये

मैं उसी का होकर रह गया हूँ

कहीं खो गया हूँ

उसका रुत्बा मुझे झंझोड़ता है

सूखे ज़ख़्मों को फिर उधेड़ता है

मेरे अंदर सदा लगाता है

मेरे अहसास को जगाता है

मुझ से कोई सवाल है उसका

इश्क़ भी ला ज़वाल है उसका

मुझसे इतना ही चाहता है वो

उसकी क़ुर्बानी को मैं आम करूँ

और जिहालत का क़त्ल-ए-आम… Continue

Added by Samar kabeer on April 15, 2015 at 11:28am — 13 Comments

शोषण....(लघुकथा)

जवानी की दहलीज़ पार कर चुकी  विनीता ने फिर से लड़के वालों के आने की खबर सुनते ही अपने घर जाने के अरमानों को संजों लिया. अपनी माँ के खटिया पकड़ने के बाद, उसे अपने पिता समान बड़े भाई और माँ के दर्जे वाली भाभी से ही आशायें बंधी हुई है. आज फिर एक कुलीन परिवार का लड़का, अपनी सहमती जताकर लौट गया. मेहमानों के लौटते ही भाभी ने विनीता से कहा..

“बिन्नो!! मैं ऑफिस के लिए बहुत लेट हो गई हूँ. तुम बच्चों को तैयार कर स्कूल भिजवा देना, माँ जी का कमरा और कपडे देख लेना और सुनो.. मैं तुम्हारे लिए आज…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on April 15, 2015 at 10:30am — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़लों को भी गीला होते देखा है (मिथिलेश वामनकर)

22-22-22-22-22-2

जो रह-रहकर इस सीने में उठता है

तेरा मेरा दर्द पुराना किस्सा है

 

उनकी आँखों से उतरे हर आँसू से

ग़ज़लों को भी गीला होते देखा है…

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Added by मिथिलेश वामनकर on April 15, 2015 at 10:30am — 17 Comments

हादसे --- डॉo विजय शंकर

हादसे होते रहते हैं ,

कवरेज होते रहते हैं,

लोग देखते रहते हैं ,

चि ची ची करते रहते हैं ,

बयान होते रहते हैं ,

बहस के शो होते रहते हैं,

संवेदनाओं के लिए

दौरे होते रहते हैं ,

आंसू पोछे जाते हैं ,

आंसू बहाये जाते हैं ,

आंकड़े दिखाए जाते हैं ,

कितने कम हो रहे हैं ,

बताये , गिनाये जाते हैं ,

कितने गुहार नहीं होते ,

वो , नहीं गिनाये जाते हैं ,

अदालतों में पड़े , बढ़ते केस

कभी नहीं बताये जाते हैं ,

फैसले भी कब होते… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on April 15, 2015 at 10:24am — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - मुर्दों जैसा नया सवेरा है सोया ( गिरिराज भंडारी )

22    22    22    22    2

शहर ज़रा सा मुझमें भी तो आया है

यही सोच के गाँव गाँव शर्माया है

 

मुर्दों जैसा नया सवेरा है सोया

किस अँधियारे ने इसको भरमाया है

 

याराना कुह्रों से है क्या मौसम का

आसमान तक देखो कैसे छाया है

 

चौखट चौखट लाशें हैं अरमानों की

किस क़ातिल को गाँव हमारा भाया है

 

सूखी डाली करे शिकायत तो किस को

सूरज आँखें लाल किये फिर आया है

 

छप्पर चुह ते झोपड़ियों का क्या…

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Added by गिरिराज भंडारी on April 15, 2015 at 8:30am — 27 Comments

अंदर का बनिया

हमारे अंदर का बनिया

सब कुच्छ बेचता है,

राम भी, कृष्ण भी,

धर्म और ईमान भी,

तीर और कमान भी.

अब उसके दुकान में

नये- नये समान हैं,

झूठाई, सपनों की मिठाई,

दंभ के साथ बढ़ती ढिठाई

ईन्हे वो रोज नई नई

जगहों पे सजाता है

ज़ोर से आवाज़ लगाता है

हिंदू हो या मुसलमान,

सिख हो या ख्रिस्तान,

उसके लिए सभी बराबर हैं.

वो बड़ी ईमानदारी से

बेईमानी बेचता हैं

दरअसल जो बिकता है

वही टिकता है.

मौलिक वा…

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Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on April 15, 2015 at 8:00am — 12 Comments

मनहरण घनाक्षरी

मनहरण घनाक्षरी -

इस छन्द का विन्यास 8, 8, 8, 7  वर्णो की आवृति पर अथवा 16-15 वर्णों की यति पर कुल 31 वर्ण से किया जाता हैं।  इसके चरणान्त में ।s लघु गुरू या s।s गुरू लघु गुरू रखने पर लय-गति में निरन्तरता बनी रहती है।

1

अम्ब, अम्ब सत्य ज्ञान, ताल छन्द के विधान,

रास रंग संग में उमंग के प्रमान हैं।

दिव्य शुभ्र शारदे बिसार के कलंक काल,

सूर्य-चन्द्र ज्योति से सजा रही वितान है।।

अखण्ड ब्रह्म तेज में, धरा-व्योम प्रेम करें

सृ-िष्ट रूप में अनादि…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 14, 2015 at 10:00pm — 5 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : मुक्ति (गणेश जी बागी)

मुख पर स्थाई भाव

न राग न द्वेष

शांत और निच्छल

पूर्णता को प्राप्त



जिन्दगी की भाग-दौड़

बहू की भुन-भुन

बेटे की झिड़की 

पत्नि की देखभाल



और ....



महंगी दवाइयों से

मिल गयी मुक्ति

 



चल पड़ा वो

सब कुछ त्याग

महा-यात्रा…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 14, 2015 at 3:47pm — 23 Comments

बारिश - लघुकथा

कौन हो ? रो क्यों रही हो? - गाँव के बाहर बैठी उस स्त्री से बाल्या ने पूछा 

"शहर शहर घूम आई ..धुवें से काली काली हो गयी..  मैं बरसना चाहती हूँ लेकिन सब ने बहाना कर के भगा दिया ..कहाँ जाऊं" उसने रोते रोते कहा

अरे माई . कितना इंतज़ार करवाया .. पिछले दो साल से तुम नहीं आयीं.. उस साल बापू ने रो रो कर इसी पेड़ से लटक कर जान दे दी .. पिछले साल माँ ने कर्ज लेकर बीज बोये और फिर भूखी ही मर गयी... तू यहाँ बरस खेतों पे... अबकी फसल मैं दोनों का श्राद्ध करूँगा…

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Added by Nidhi Agrawal on April 14, 2015 at 3:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल - जिंदगी में तुम्हारी लहर मैं पिया

212 212 212 212

 

छोड़ दूँ अब कुंवारा नगर मैं पिया

काट लूँ सँग तुम्हारे सफर मैं पिया

 

मन न माने मगर क्या बताऊँ तुम्हें

साथ दोगे चलूंगी सहर मैं पिया

 

पंखुड़ी खिल गयी राग पाकर कहीं

बेज़ुबां अब न खोलूं अधर मैं पिया

 

मौत का गम नहीं साथ तुम हो मेरे   

मुस्करा के पिउंगी जहर मैं पिया

 

अब तुम्हारे सिवा कुछ न चाहूंगी मैं

दिल मिलाओ मिलाऊं नज़र मैं पिया

 

दूर से देखकर आज रुकना…

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Added by Nidhi Agrawal on April 14, 2015 at 2:49pm — 8 Comments

गजल- आत्मा भरपूर सी ....

गजल-  आत्मा भरपूर सी...

बह्र - 2122, 2122, 2122, 212

फिर मुझे वह हूर सी लगने लगी।

दुश्मनी भी नूर सी लगने लगी।

गंग जन - मन को सदा पावन करे,

वास्तव में सूर सी लगने लगी।

तट, नदी का मध्य भी उकता गया,

रेत - पन्नी घूर सी लगने लगी।

आस्था की डुबकियॉं नित स्वर्ग हित,

बेवजह मगरूर सी लगने लगी।

आदमी सर-झील-नदियॉं पाट कर,

हस्तियॉं मशहूर सी लगने लगी।

आपदाएं नित्य घर-मन दाहतीं,…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 14, 2015 at 12:30pm — 10 Comments

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