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हर खुशी तुमसे पिता //गजल// कल्पना रामानी

घर-चमन में झिलमिलाती, रोशनी तुमसे पिता

ज़िंदगी में हमने पाई, हर खुशी तुमसे पिता

 

छत्र-छाया में तुम्हारी, हम पले, खेले, बढ़े

इस अँगन में प्रेम की, गंगा बही तुमसे पिता

 

गर्व से चलना सिखाया, तुमने उँगली थामकर 

ज़िंदगी पल-पल पुलक से, है भरी तुमसे पिता

 

 याद हैं बचपन की बातें, जागती रातें मृदुल

ज्ञान की हर बात जब, हमने सुनी तुमसे पिता

 

प्रेरणा भयमुक्त जीवन की, सदा हमको मिली

नित नया उत्साह भरती, हर घड़ी…

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Added by कल्पना रामानी on September 15, 2014 at 9:30pm — 10 Comments

मनोकामना....(लघुकथा )

" भाई! रामौतार.. यह साल तो खेती के हिसाब से बहुत ही बढ़िया रहा. काश! ऐसा हर साल ही होता  रहे "     दिनेश ने अपनी हथेली पर तंबाकू मे चूना लगाकर , रगड़ते हुए कहा

" हाँ भाई! दिनेश.. सच इस बार, हर साल की तुलना मे अतिवृष्टि से थोड़ी कम फसल ज़रूर हुई लेकिन लोक-सभा और विधान- सभा चुनाव के रहते सरकारों ने खूब मुआवज़ा भी दिया और फसल बीमा को भी मंज़ूरी  दिलवाई , तो देखो न! दोगुने से भी ज्यादा बचत हो गई " रामौतार ने दिनेश की हथेली पर से मली हुई तंबाकू अपने मुंह में दबाते हुए…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on September 15, 2014 at 8:30pm — 12 Comments

गज़ल - मेरा पिता

है जहाँ में सदा तन के चलता पिता।

हँस दूँ इक बार में घोड़ा बनता पिता।

वो जगत का पिता ये है मेरा पिता।

नाम इससे लिया उसने लगता पिता।



दिन मिरे थे कभी बेफिकर वो सभी

मौज करता रहा कर्ज भरता पिता



इम्तहानों का जब भी पड़ा दौर है

नींद सोया कभी, रात जगता पिता



ठोकरें जब कभी भी लगीं हैं मुझे

दर्द मुझको हुआ आह भरता पिता



कब मेरे नाम से उसकी पहचान हो

ख्वाहिशें हैं सदा रब से करता पिता



देखता है पिता बढ़ रहा कद मिरा…

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Added by seemahari sharma on September 15, 2014 at 7:00pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल --आदमी खुद को बनाता आदमी है आदतन ( गिरिराज भंडारी )

आदमी खुद को बनाता आदमी है आदतन

****************************************

२१२२     २१२२     २१२२     २१२

आदमी  में   जानवर    भी    जी  रहा  है  फ़ित्रतन

आदमी   में  आदमी  को   देखना   है  इक  चलन 

साजिशें  रचतीं   रहीं हैं   चुपके   चुपके   बदलियाँ

सूर्य को ढकना कभी मुमकिन हुआ क्या दफअतन ?

 

पर   ज़रा तो   खोलने   का वक़्त  दे, ऐ  वक़्त  तू  

फिर   मेरी   परवाज़   होगी   और ये   नीला गगन

 

बाज,   चुहिया   खा  …

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Added by गिरिराज भंडारी on September 15, 2014 at 4:30pm — 28 Comments

धनवान बनाम विद्वान् (चार दोहे)

धन प्रभुता ना मिले विद्वान् जो ना हो साथ |

कर्म यज्ञ में दे आहुति विद्वान् ही का हाथ ||

 

विद्वता का उपयोग कर धनवान धन कमाए|

विद्वान् इस राह चले तो धनी निर्धन बन जाए||

 

धनवान को वाहन मिले संग्रह करके धन |

विद्वान वाहन में घूमे निग्रह करके मन ||

 

धन की करे चौकीदारी हर रात धनवान |

ज्ञान का सृजन करे हर रात विद्वान् ||

 

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on September 15, 2014 at 11:30am — 5 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
नदी, जिसका पानी लाल है (कविता) // --सौरभ

संताप और क्षोभ

इनके मध्य नैराश्य की नदी बहती है, जिसका पानी लाल है.



जगत-व्यवहार उग आये द्वीपों-सा अपनी उपस्थिति जताते हैं

यही तो इस नदी की हताशा है

कि, वह बहुत गहरी नहीं बही अभी

या, नहीं हो पायी…

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Added by Saurabh Pandey on September 15, 2014 at 3:00am — 41 Comments

हाइकु

1-        

संस्‍कार होंगे

राम राज्‍य के स्‍वप्‍न

साकार होंगे !

2-        

बेच ज़मीर

बनता है तब ही

कोई अमीर !

3-        

स्‍वतंत्र हुए

बगल के नासूर

हैं पाले हुए !

4-        

है नारी वो क्‍या

न सिर पे पल्‍लू न

आँखों में हया !

5-        

क्‍या नाजायज

सत्‍ता, युद्ध, प्रेम में

सब जायज !

*मौलिक एवं अप्रकाशित*

 

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on September 14, 2014 at 10:51pm — 4 Comments

ग़ज़ल: कांटे जो मेरी राह में (भुवन निस्तेज)

कांटे जो मेरी राह में बोये बहार ने

छूकर बना दिया है उन्हें फूल यार ने

 

यारी है तबस्सुम से करी अश्क-बार ने

कुछ तो असर किया है खिजाँ की फुहार ने…

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Added by भुवन निस्तेज on September 14, 2014 at 10:00pm — 18 Comments

पत्थरों को राह के हरदम खला है

२१२२         २१२२       २1२२  

जब भी सागर बनने इक दरिया चला है 

पत्थरों को राह के हरदम खला है 

जूझते दरिया पे जो कसते थे ताने 

आज जलवे देख हाथों को मला है 

यूं नहीं बढ़ता है कोई जिन्दगी में

बढ़ने वाला रात दिन हरदम चला  है

अपने ही हाथों से रोका था हवा को  

तब कहीं ये दीप आंधी में जला है

दोस्तों जिस को गले हमने लगाया 

बस रहा अफ़सोस उसने ही छला है 

मौलिक व…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on September 14, 2014 at 4:00pm — 14 Comments

कुण्डलिया छंद - लक्ष्मण लडीवाला

कुण्डलिया छंद (हिंदी दिवस पर विशेष)

हिंदी निज व्यवहार में, भरती मधुर सुगंध,

देवनागरी में मिले, संस्कृति की चिरगंध |

संस्कृति की नवगंध, और सुगन्ध सी वाणी

सीखे नैतिक मूल्य, पढ़े जो हिंदी प्राणी ||

लक्ष्मण कर सम्मान, सजे माथे जो बिंदी

करती रहे प्रकाश, सरस यह भाषा हिंदी ||

(2)

आता है हिन्दी दिवस, जाने को तत्काल

अपनी भाषा का सदा उन्नत रखना भाल |

उन्नत रखना भाल,करे विकास तब भाषा

हिंदी में हो बात, रहे क्यों भाव…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 14, 2014 at 3:55pm — 5 Comments

चलो मयकदे मेँ

चलो मयकदे मेँ जमाने मेँ क्या हैँ ।

अगर लुत्फ है तो उठाने मेँ क्या है ।



न पाया जमाने मेँ कुछ भी रहकर ,

अब मयकदा आजमाने मेँ क्या है ।



भर जायेगी जब पैमानोँ मेँ मय ,

फिर उसको पीने पिलाने मेँ क्या है ।



खुदा का तसव्वुर जब हर जगह है ,

फिर सर यहाँ भी झुकाने मेँ क्या है ।



जब राज दिल के सब खुल गये होँ ,

परदा नजर का गिराने मे क्या है ।



न इन्सान समझे जब दिल की कीमत ,

दिल मयकशी से लगाने मेँ क्या है ।



सिवा तेरे तू… Continue

Added by Neeraj Nishchal on September 14, 2014 at 1:42am — 17 Comments

नवगीत. आओ यह संकल्प उठाएं

आओ यह संकल्प उठाएं*



आओ यह संकल्प उठाएं

सब मिल पर्यावरण बचाएं



जंगल सूने सूने लगते

साँसों में जो जीवनभरते

पेड़ काट घर रोज

सजाते,

पेड़ कहीं तो एक उगाएं

आओ यह संकल्प उठाएं



धरती को यूं बंजर न करें

प्रकृति के कोप से सभी डरें

सुन लें पुकार हम

धरनी की,

अब विष की ना बेल बिछाएं

आओ यह संकल्प उठाएं



और निकट संसृति के जाएं

हम पेड़ों को मित्र बनाएं

स्वस्थ सुगन्धित वायु

के तले,

पढ़ें लिखें औ… Continue

Added by seemahari sharma on September 14, 2014 at 1:35am — 2 Comments

नफ़रतों का जवाब मैं रक्खूं

नफ़रतों का जवाब मैं रक्खूं

ख़ार तू रख गुलाब मैं रक्खूं

 

बीत जाये इसी में उम्र तमाम

ज़ख्मों का गर हिसाब मैं रक्खूं

 

मै ग़मों की रवाँ है रग रग में

होश कैसे जनाब मैं रक्खूं

 

सामने तेरे बेहिजाब हुआ

क्या बुतों से हिजाब मैं रक्खूं

 

दर्दे-उल्फ़त पलेगा क्या मुझसे

क्यूं कफ़स में उक़ाब मैं रक्खूं

 

शमा सी वो पिघलती है हर शब

कब सिरहाने किताब मैं रक्खूं

 

पेट में भूख का शरारा …

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Added by khursheed khairadi on September 13, 2014 at 10:00pm — 5 Comments

हिन्दी की जय !

हिन्दी दिवस पर विशेष

           

माँ तुझको  याद  नहीं करते  तू तो धमनी  में है बहती I

तू ह्रदय नही इस काया की  रोमावली  प्रति में  है रहती I

अपने  ही पुत्रो से  सुनकर  भाषा  विदेश  की  है सहती I

पर माते ! धन्य नहीं मुख से कोई भी अपने दुःख कहती I

 

होते कुपुत्र  भी इस जग में  पर माता उन्हें  क्षमा करती I

सुंदरता  और  असुंदर  को  जैसे  धारण  करती  धरती I

जो सेवा-रत अथवा …

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 13, 2014 at 8:44pm — 6 Comments

माँ के माथे की बिन्दी

माँ के माथे की बिन्दी

गोल बड़ी सी बिन्दी

माथे पर कान्ति बन

खिलती है बिन्दी

माँ के माथे की बिन्दी

सजाती सवाँरती

पहचान बनाती बिन्दी

मान सम्मान

आस्था है बिन्दी

शीतल सहज सरल

कुछ कहती सी बिन्दी

माँ के माथे की बिन्दी

थकान मिटा,उर्जा बन

 मुस्काती बिन्दी

पावन पवित्र सतित्व की

 साक्षी है बिन्दी

परंपरा संस्कारों का

आधार है बिन्दी

माँ के माथे की बिन्दी

अपनी हिन्दी भी…

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Added by Maheshwari Kaneri on September 12, 2014 at 6:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल,,,,,,,,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२ २१२ २१२ २१२

हो रहा है मुझे ये वहम देखिये

आज क़ातिल की भी आँख नम देखिये

आधुनिकता के ऐसे नशे में हैं गुम

नौजवानों के बहके क़दम देखिये

पसरा है नूर सा कमरे में हर तरफ

आये हैं घर पे मेरे सनम देखिये

शहर लगता है शमशान सा इन दिनों

आस्तीनों में किसके है बम देखिये

नाम तेरा लिखा था मैंने इक ही बार

महके उस रोज से ही क़लम देखिये

मौलिक व अप्रकाशित

Added by gumnaam pithoragarhi on September 12, 2014 at 8:27am — 11 Comments

क़दमों को आज भी याद है

आज फिर लड़खड़ाते कदमों से

गिरने की कोशिश की

यह लालच संजोये हुए कि

आप आ जाओगे

फिर से मुझे चलना सिखाने को

मेरी अंगुली पकड़ के

मुझे गिरने नहीं दोगे...

काश आपकी पदचाप फिर सुन पाता,

या काश, मेरे क़दमों को गिरते हुए

आपकी आदत ना होती..

 

साथ थे आप तो पैर अल्हड़ थे

घिसटते कदम थे चाल बेताल थी..

विश्वास था फिर भी ना गिरने का 

 

आज आपकी याद है...

पैर तने हैं, कदम सधे हैं

चाल भी सीधी…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on September 11, 2014 at 9:00pm — 6 Comments

अब भी चेतो मानव मन तू!

कल कल कल कल नदियाँ बहती, झरने गीत सुनाते हैं,

तरु शाखाओं पर छिपकर खग, पंचम सुर में गाते हैं.

गिरि, नद, जंगल, अवनि, पशु सब, सृष्टि के अनमोल रतन,

मानव सबसे बुद्धि शील बन, अपनी राह बनाते हैं.

नदियों की धारा को रोकी, शिखरों को भी ध्वस्त किया,

काटके जंगल, भवन बनाते, अब क्यों वे पछताते हैं.

सीख नहीं कुछ लेते मानव, प्रकृति सब कुछ देख रही,

कभी केदार, कभी कश्मीर में, मानव ही दुःख पाते हैं.  

सेना सीमा की रक्षक है, आपद में करती…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on September 11, 2014 at 5:27pm — 10 Comments

काशी की दुनिया.........

काशी की दुनिया हो

या काबा की बस्ती हो

यूँ ही न उजड़े चाहे

फ़कीर बाबा की बस्ती हो।।

साहिल से बिछड़ी हुई

मुक़ाम-ए-पास हो जाए

लहरों में फँसती चाहे

केवट की कश्ती हो।।

शोहरत की मस्ती हो

या माले की हस्ती हो

यूँ ही न टूटे कोई चाहे

मुफ़लिसी में घरबां गिरस्ती हो।।

मातहतों की मस्ती…

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Added by anand murthy on September 11, 2014 at 4:00pm — 8 Comments

व्यवस्था (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

कौआ एक बार फिर प्यासा था। बहुत ढूंढने पर उसे फिर एक घड़े में थोड़ा सा पानी दिखाई दिया। एक बार फिर उसने पास पड़े कंकड़-पत्थर उठा उसमें डाले और जैसे ही पानी उसकी पहुँच तक आया तभी कुछ ताकतवर कौऐ एक झुंड में उस पर टूट पड़े और उसे वहां से खदेड़ कर उस पानी पर कब्जा कर लिया। बेचारा प्यासा कौआ एक बार फिर से पानी की तलाश में जुट गया।

.


(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on September 11, 2014 at 12:00pm — 8 Comments

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