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एक नज़्म ,मनोज अहसास

आज जब तय है मुहब्बत से रिहा हो जाना

सोचता हूँ के ज़रा तेरी गली से गुज़रू

फिर तेरी याद के मखमल के दरीचे को ज़रा

खुद से लिपटाऊ,तमन्नाओं को छू लूँ,जी लूँ



जबकि ज़ाहिर है मेरे पास तेरे गम का समा

सिर्फ कुछ रोज़ इनायत की रवानी में रहा

फिर भी ये मानने को दिल कहाँ राजी है सनम

मेरा किरदार कम क्यों तेरी कहानी में रहा



हर तरफ एक सी उलझन का असर लगता है

भूख के,दर्द के,एहसास के,शोलो की हवा

रूठ जाती है इशारों की जुबां जब मुझसे

तब बहुत झूठ सी लगती है… Continue

Added by मनोज अहसास on December 25, 2016 at 1:13pm — 12 Comments

नंगे लोग (लघुकथा)

फ़रीद भाई स्वयं अपने व अपने घर के छोटे-छोटे ज़रूरी काम ख़ुद कर लेते हैं लेकिन पता नहीं ऊपर वाले ने उनमें कौन सी दिमाग़ी कमी या बीमारी पैदा कर दी कि विक्षिप्त व्यक्ति जैसा जीवन जी रहे हैं। थोड़ी देर पहले ही किशन ने देखा था कि फ़रीद भाई ख़ुशी से झूमते हुए अपने व्यवसायी भाई के घर की ओर जा रहे थे। किसी भले नाई ने इस बार भी उनकी हेअर कटिंग और सेविंग मुफ़्त में कर दी थी। बड़े ही साफ़-सुथरे लग रहे थे। लेकिन अब यह क्या ! ये क्यूँ यहाँ अपनी हाफ़-पैंट की बेल्ट पकड़े हुए आधे नंगे से दौड़ रहे हैं? किशन… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 25, 2016 at 8:54am — No Comments

आज तिरंगे को देखा तो जख़्म पुराने याद आये

आज तिरंगे को देखा तो जख़्म पुराने याद आये

जलियाँ वाला याद आया तोपों के निशाने याद आये

हर और तबाही बरपा थी जुल्म ढहाया जाता था

हुस्न के हाथों आशिक के ख़्वाब मिटाने याद आये

अपने  पीछे दौड़ रहे उस बालक को जब देखा तो 

तुम याद आये और तुम्हारे साथ ज़माने याद आये

फूटी कौड़ी भी ना दूँगा जब भी कोई कहता है

कौरव-पांडव वाले तब ही सब अफ़साने याद आये…

Continue

Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on December 25, 2016 at 12:00am — 3 Comments

50 अशआर के साथ मेरी जिंदगी की सबसे लम्बी ग़ज़ल ।

2122 2122 212



तू न मेरा हो सका तो क्या हुआ ।

हो गया है फिर जुदा तो क्या हुआ ।।



हम सफ़र था जिंदगी का वो मिरे ।

बस यहीं तक चल सका तो क्या हुआ।।



मैकदों की वो फ़िजा भी खो गई ।

वक्त पर वो चल दिया तो क्या हुआ ।।



फिर यकीं का खून कर के वह गयी ।

दर्द दिल का कह लिया तो क्या हुआ।।



सुर्ख लब पे रात भर जो हुस्न था ।

तिश्नगी में बह गया तो क्या हुआ ।।



डर गया इंसान अपनी मौत से ।

खो गया वो हौसला तो क्या हुआ ।।…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on December 24, 2016 at 10:30pm — 6 Comments

सोचने के लिये बाध्य

 गाँव में था

एक भवानी का चौतरा

कच्ची माटी का बना   

जिसके पार्श्व में लहराता था ताल

जिसके किनारे था एक देवी विग्रह

छोटा सा

 

चबूतरे को फोड़कर बीच से

निकला था कभी एक वट वृक्ष  

जो विशाल था अब इतना

कि आच्छादित करता था

पूरे चबूतरे को

साथ ही देवी विग्रह को भी

अपने प्रशस्त पत्तों की

घनीभूत छाया से

और लटकते थे

इसकी शाखाओं से अरुणिम फल

 

फूटते थे

शत-शत प्राप-जड़…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 24, 2016 at 10:00pm — 7 Comments

फूल और माली (कविता)

एक दिन माली रूठ गया

फूल यह जान दुःखी हुआ

सूरज की तपिश भी तेज थी

बिन पानी के फूल सूख गया

ज़मीन पर गिर मिट्टी पर पड़ा

जोत रहा था बाट माली की

सोच रहा था क्या हो गया

मेरा माली क्यों रूठ गया ।

इतने में कोई पास आया

देख उसको मुरझाया फूल हरकाया

बोला माली से बाबा क्या ऐसी बात हुई

आपकी राह देखते देखते देखो

कई कलियाँ भी मुर्झा गयीं ।

माली ने प्यार से उसे उठाया

गिरे हुए फूल को फिर सहलाया

फूल और माली की प्रीत निराली

सूरज बोला मैं… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 24, 2016 at 8:30pm — 5 Comments

कौवे(लघु कथा)

ताला भुइयां की बेटी आज घर वापस आ गयी है।विधायक लालू भुइयां अपने घर के छोटे-मोटे कामों के लिए उसे सात साल पहले दिल्ली ले गया था।उसके माँ-बाप को बोला था कि उधर रहेगी,सेवा-टहल करेगी।चार पैसे भी मिल जायेंगे।कुछ पढ़-लिख भी जायेगी।ताला ने पत्नी की तरफ देखा था।उसने मौन सहमति दी थी और दस साल की झुनिया दिल्ली चली गयी थी।हाँ,लालू भुइयां पैसे समय से भिजवाता रहा,पर धीरे-धीरे झुनिया की खबर का आना बंद ही हो गया था।पहले झुनिया के माँ-बाप की गाँव के पांडे बाबा के बेटे से लिखवायी चिट्ठी उसे मिला करती थी,वह उसे… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 24, 2016 at 2:47pm — 8 Comments

चाहतें - क्षणिकाएं -- डॉo विजय शंकर

ज़िन्दगी बोझ थी नहीं
अपनी ही चाहतों से
एक बोझ बना लिया
हमने ..............1.

सच में ,
चाहना तुझको था ,
तुझसे ही चाहते
रह गए .............2.


ज़िन्दगी भर
ज़िन्दगी को
ढूंढते रहे ,
वो मिली भी नहीं
और हम ज़िंदा भी रहे .....3.


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on December 24, 2016 at 6:47am — 15 Comments

ग़ज़ल -जो तुम खामोशियाँ पढ़ लो नियामत और हो जाए

1222 1222 1222 1222

****

निगाहों से बुला लीजे शरारत और हो जाए ।

जो धड़कन में बसा लीजे इनायत और हो जाए।।

.

कलाई की अदा देखी कई पैगाम  देती है ।

जरा कंगन बजा दीजे कयामत और हो जाए।।

.

ये परवानों की महफ़िल है गिरा दीजे ज़रा चिलमन।

कहीं ऐसा न हो हमदम अदावत और हो जाए।।

.

दिलों को चैन हम देंगे जफ़ा से तौबा करने दो।

वफ़ा की राह में चाहे बगावत और हो जाए।।

.

मेरे ख़त में तड़पती…

Continue

Added by अलका 'कृष्णांशी' on December 22, 2016 at 9:30pm — 8 Comments

अक्षय गीत ....

अक्षय गीत ....

मैं हार कहूँ या जीत कहूँ ,या टूटे मन की प्रीत कहूँ

तुम ही बताओ कैसे प्रिय ,मैं कोई अक्षय गीत कहूँ

मैं पग पग  आगे  बढ़ता  हूँ

कुछ भी कहने से डरता  हूँ

पीर हृदय की कह  न  सकूं

बन दीप शलभ मैं जलता हूँ

शशांक का विरह गीत कहूँ,या रैन की निर्दयी रीत कहूँ

तुम ही बताओ  कैसे  प्रिय , मैं  कोई  अक्षय  गीत कहूँ

अतृप्त तृषा  है. घूंघट  में

अधरों की हाला प्यासी है

स्वप्न नीड़  पर  नयनों  के…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 22, 2016 at 6:00pm — 19 Comments

एक जलज-वीराने में

एक जलज - वीराने में

चहकता हुआ

महकता हुआ

दाग नहीं लगने दिया कभी

आब के छींटे का भी

चक्रवातों में घिरा रहा था

जिन्दगी भर।



लौट चले वो झख मारकर

धक्के खाकर थक हारकर

नाखून घिसाकर दाँत किटकिटाकर

आँधी तूफान भँवर

और

चक्रवात भी।



फिर भी लहलहाता रहा

वह वारिज

कोशिश में

अंबर को नापने की।



चुभने लगी

खुद की ही कलियाँ

शूल बनकर

सताने लगे स्व-सद्कर्म

भूल बनकर।



समझ में आया

क्या… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 22, 2016 at 2:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल- हरम में घुंघरुओं से कुछ कुछ तराने छूट जाते हैं ।

1222 1222 1222 1222

अदा के साथ ऐ ज़ालिम, ज़माने छूट जाते हैं ।

मुहब्बत क्यों ख़ज़ानो से ख़ज़ाने छूट जाते हैं ।।



तजुर्बा है बहुत हर उम्र की उन दास्तानों में ।

तेरीे ज़द्दो ज़ेहद में कुछ फ़साने छूट जाते हैं ।।



बहुत चुनचुन के रंज़ोगम को जो लिखता रहाअपना।

सनम से इंतक़ामों में निशाने छूट जाते हैं ।।



रक़ीबों से मुसीबत का कहर बरपा हुआ तब से ।

हरम में घुंघरुओं से कुछ तराने छूट जाते हैं ।।



वो कुर्बानी है बेटी की जरा ज़ज़्बात से पूछो…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on December 22, 2016 at 10:30am — 1 Comment

सौदा ( कविता)

आज एक सौदा ही कर लें

बोली बॉस एक दिन

सुनकर यह चकित हुई मैं

देखती रही उनको एकटक

देख मुझको भांप गयी वो

मुझे लगा कांप गयी वो

पर नहीं , नहीं हुआ कोई असर

बोलीं न छोडूंगी कोई कसर

अब मैं हुई और परेशान

शैतान आया था बनकर मेहमान

रुकी कुछ पल फिर हंस कर बोलीं

अपने ईमान की पोल खोली

सुनो मेरा तुम करो एक काम

न करना इस बात को आम

मेरे पास काला धन पड़ा है

मोदी जी ने सर पर हथौड़ा मारा है

औरतो के खाते में ढाई लाख़ फ्री है

यह रकम…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 22, 2016 at 8:30am — 6 Comments

बंधन-- लघुकथा

"आखिर क्यों नहीं कर लेती उससे शादी, जब साथ साथ रहती हो तो दिक्कत क्या है", उसने घर से निकलते हुए बेटी को टोका| बेटी ने एक बार उसकी तरफ देखा और फिर आगे जाने लगी|

"अभी तुमको नहीं समझ में आ रहा है, कुछ साल बाद समझोगी| आखिर कुछ तो सोचो भविष्य के लिए", उसने फिर से समझाने की कोशिश की|

अबकी बार बेटी पलटी और वापस कमरे में आ गयी| उसके पास आकर उसने माँ का हाथ अपने हाथ में लिया और प्यार से बोली "तुम्हें क्या दिक्कत है माँ, हम लोग खुश हैं और जब तक सब ठीक है, साथ रहेंगे"|

"लेकिन कोई बंधन तो…

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Added by विनय कुमार on December 21, 2016 at 9:33pm — 14 Comments

ग़ज़ल : दिल ये करता है के अब साँप ही पाला जाए

बह्र : 2122 1122 1122 22

 

दिल के जख्मों को चलो ऐसे सम्हाला जाए

इसकी आहों से कोई शे’र निकाला जाए

 

अब तो ये बात भी संसद ही बताएगी हमें

कौन मस्जिद को चले कौन शिवाला जाए

 

आजकल हाल बुजुर्गों का हुआ है ऐसा

दिल ये करता है के अब साँप ही पाला जाए

 

दिल दिवाना है दिवाने की हर इक बात का फिर

क्यूँ जरूरी है कोई अर्थ निकाला जाए

 

दाल पॉलिश की मिली है तो पकाने के लिए

यही लाजिम है इसे और उबाला…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 21, 2016 at 9:17pm — 2 Comments

लड़ाई (कविता)

एक दिन कुछ अलग हुआ

समुन्दर और आकाश के बीच

आकाश को देख समुन्दर चिल्लाया

मेरी जगह तुम आ जाओ

यह बात सुनकर आकाश मुस्काया

बोला ठीक है करलो ये प्रयास

सारी मछलियां गभरायीं

अब पंख कहाँ से लायें

चिड़िया उनको देख मुस्काईं

जैसे हम जल में तैरेंगे

तुम सब हवा में उड़ जाना

यह सब देख धरा मुस्काई

दोनों की कैसे खत्म करूँ लड़ाई

पूछा उसने समुन्दर से

दादा बोलो मैं कहाँ जाऊँ

वन , जंगल कहाँ ले जाऊँ?

आकाश से भी पूछा उसने

दिन और रात का… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 21, 2016 at 7:33pm — 7 Comments

गजल(काफियों की...)

2122 2122 2122 2

काफियों का बढ़ गया बाजार देखा है

इश्क को होते हुए लाचार देखा है।1



डूबती कश्ती नहीं मँझधार है तो क्या?

हर बखत सहमी नजर में प्यार देखा है।2



लड़ रहा कोई धनुर्धर रोशनी खातिर

व्यूह का निर्माण तो बेकार देखा है।3



सच पराजित हो रहा हर मोड़ पर दिखता

झूठ की गर्दन सजाया हार देखा है।4



माँगते दाता यहाँ पर भीख में हक भी

रहजनों को तो बने सरकार देखा है।5



दे सकेंगे क्या फ़रिश्ते देश को कुछ भी

लूट का हर शख्स है… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 21, 2016 at 7:30pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बदले-बदले लोग - मिथिलेश वामनकर

बदले-बदले लोग

============

 

बहुत दिन हो गए,

हमने नहीं की फिल्म की बातें।

न गपशप की मसालेदार,

कुछ हीरो-हिरोइन की।

न चर्चा,

किस सिनेमा में लगी है कौन सी पिक्चर?

 

पड़ोसी ने नया क्या-क्या खरीदा?

ये खबर भी चुप।

सुनाई अब न देती साड़ियों के शेड की चर्चा।

कहाँ है सेल, कितनी छूट?

ये बातें नहीं होती।

 

क्रिकेटी भूत वाले यार ना स्कोर पूछे हैं।

न कोई जश्न जीते का,

न कोई…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on December 21, 2016 at 3:00pm — 18 Comments

कोई सूरज भी ढल रहा होगा।

2122/1212/22

चाँद जब भी निकल रहा होगा।
कोई सूरज भी ढल रहा होगा।

ज़िन्दगी भर न वो रहेगा यूँ,
उस का दिल भी पिघल रहा होगा।

मर्ज़-ए-दिल हम को ही नहीं केवल,
उसका भी दम निकल रहा होगा।

चोट खाने के बाद हम सा ही,
आज वो भी सँभल रहा होगा।

हम को इतना यक़ीं तो है 'रोहित',
हिज़्र में वो भी जल रहा होगा।

रोहिताश्व मिश्रा
फ़र्रुखाबाद
(मौलिक एवम् अप्रकाशित)

Added by रोहिताश्व मिश्रा on December 21, 2016 at 11:21am — 14 Comments

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