For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,173)

हर कली अब कमल हो रही है

212  212  212  2

 

जिन्दगी अब सरल हो रही है

बात हर इक गजल हो रही है 

 

दलदली हो चुकी है जमीं पर,

हर कली अब कमल हो रही है

 

तितलियाँ भर रहीं हैं उड़ानें

नीति बेशक सफल हो रही है

 

आ रहा है कहीं से उजाला

रौशनी आजकल हो रही है

 

मखमली हो रही हैं हवाएं

मेंढकी भी विकल हो रही है

 

है दरोगा बड़ा लालची वो

धारणा अब अटल हो रही है

 

मौलिक/अप्रकाशित.

Added by Ashok Kumar Raktale on July 28, 2016 at 11:00pm — 15 Comments

"उम्मीद की चादर"

क्या हूँ मैं, कौन हूँ मैं,

कहाँ जा रहा हूँ,



खुद को टटोला तो पाया,



अनजान मंजिल है, अँधेरी राह है ।

और मैं एक अनजान राही हूँ ।।



भटकने का खौफ़ है ।

तो मंजिल की उम्मीद भी ।।



उम्मीद कम है-खौफ़ ज़्यादा ।

फिर भी उम्मीद की चादर में खौफ़ को बाँधे चले जा रहा हूँ ।।



ढांढस बंधाते हिम्मत जुटाते चला जा रहा हूँ ।

मंज़िल मिलेगी यही सोच कर बढे जा रहा हूँ ।।



चले जा रहा हूँ , बस चले जा रहा हूँ ।



बदन कहता है रुक जा,…

Continue

Added by Ashutosh Kumar Gupta on July 28, 2016 at 11:00pm — 8 Comments

दिल के निहाँ ख़ाने में ....

दिल के निहाँ ख़ाने में ....

लगता है शायद

उसके घर की कोई खिड़की

खुली रह गयी

आज बादे सबा अपने साथ

एक नमी का अहसास लेकर आयी है

इसमें शब् का मिलन और

सहर की जुदाई है

इक तड़प है, इक तन्हाई है

ऐ खुदा

तूने मुहब्बत भी क्या शै बनाई है

मिलते हैं तो

जहां की खबर नहीं रहती

और होते हैं ज़ुदा

तो खुद की खबर नहीं रहती

छुपाते हैं सबसे

पर कुछ छुप नहीं पाता

लाख कोशिशों के बावज़ूद

आँख में एक कतरा रुक…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 28, 2016 at 2:00pm — 15 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) 36

कल से आगे ..................

रावण की दुनियाँ जैसे वेदवती के ही चारों ओर केन्द्रित होकर रह गयी थी। अपनी सारी संकल्पशक्ति समेट कर वह अपने चिंतन को दूसरी ओर मोड़ने का प्रयास करता पर चिंतन था कि घूम-फिर कर वहीं आकर अटक जाता। वेदवती की छवि उसकी आँखों में रह-रह कर कौंध जाती थी। मन छटपटाने लगता था। बड़े प्रयास से वह कई दिन तक अपने को रोके रहा पर फिर एक दिन वह दिमाग को भटकाने की नीयत से जंगल में निकल गया। पता नहीं कब तक घूमता रहा।



‘‘अरे वैश्रवण ! इतने दिन तक दर्शन ही नहीं…

Continue

Added by Sulabh Agnihotri on July 28, 2016 at 8:48am — No Comments

कूटनी

पहले के जमाने में कुटनी औरते आती थीं और आपका सारा भेद लेकर चली जाती थी। आज भी यह परम्परा बरकरार है। कुछ औरतों का काम है कि अन्य घरों का समाचार लेकर अपने इच्छित स्थानों पर पहुंचाती हैं।और उसके द्वारा संबंधित व्यक्ति का मनमाना नुकसान करती हैं। क्या आज के समाज में ऐसे लोगों का बहिष्कार संभव नहीं है? यदि आप ऐसों से बच जाते हैं तो आगे आप का भला ही भला है।ी

एक ऐसी ही कहानी है कुटनी की जो हमारे गांव की है और आये दिन किसी न किसी के घर में हंगामा बरपा कर ही चैन लेती है। नाम है उसका रेशमी काकी।…

Continue

Added by indravidyavachaspatitiwari on July 27, 2016 at 6:30pm — No Comments

सावन में (ग़ज़ल)

धूप सर पर चढ़ी है सावन में

तिश्नगी हर घड़ी है सावन में



आँखें भीगीं हैं और लब सूखे

आंसुओं की झड़ी है सावन में



जेठ की सोने-चाँदी सी धरती,

हीरे-मोती जड़ी है सावन में



तुझको देखूँ कि इन बहारों को

सामने तू खड़ी है सावन में



बादलों! अब न भाग पाओगे

हाँ, सुरक्षा कड़ी है सावन में



सूख जाएं न फिर ये अश्क़ मेरे

इसलिए हड़बड़ी है सावन में



दो किनारों को फिर मिलाने "जय",

इक नदी चल पड़ी है सावन में



(मौलिक व… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on July 27, 2016 at 5:38pm — 10 Comments

ज़िंदगी तेरी उदासी का कोई राज भी है

२१२२   ११२२  ११२२  २२/ ११२

ज़िंदगी तेरी उदासी का कोई राज भी है

तेरी आँखों में छुपा ख्वाब कोई आज भी है 

 

पतझड़ों जैसा बिखरता है ये जीवन अपना 

कोपलो जैसे नए सुख का ये आगाज भी है

 

गुनगुना लीजे कोई गीत अगर हों तन्हा 

दिल की धड़कन भी है साँसों का हसीं साज भी है

 

वो खुदा अपने लिखे को ही बदलने के लिए

सबको देता है हुनर अलहदा अंदाज भी है

 

काम करना ही हमारा है इबादत रब की

इस इबादत में छिपा  ज़िंदगी का…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on July 27, 2016 at 2:30pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बाला छंद ,वर्ण वृत्त (मुक्तक )

२१२ २१२ २१२ २

आदमी आदमी का सहारा

एक साथी बिना क्या गुजारा

गीत को साज भी है जरूरी

नाव भी ढूँढती है किनारा  

 

धूप है तो यहाँ छाँव भी है

राह के बीच में ठाँव भी है

सोचता क्या चला आ बटेऊ

खेत है पास में गाँव भी है

 

शान्ति के मार्ग जाऊँ कहाँ से

ज्ञान का दीप लाऊँ कहाँ से

लोभ ने मोह ने राह रोकी

मोक्ष मैं  आज पाऊँ कहाँ से

 

देश में बीज क्या बो रहे हैं

क्यूँ बुरे हादसे हो रहे…

Continue

Added by rajesh kumari on July 27, 2016 at 11:38am — 8 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) 35

कल से आगे .................

कैकेयी के प्रासाद में तीनों महारानियाँ उपस्थित थीं। दासियों को बाहर भेज दिया गया था अतः पूर्ण एकान्त था।

‘‘जीजी ! नारद मुनि ने तो पलट कर दर्शन ही नहीं दिये।’’ कैकेयी बोली।

‘‘हाँ बहन ! उत्कंठा तो मुझे भी हो रही है। आगे की क्या योजना है जाने !’’

‘‘अरे आप लोग व्यर्थ चिंतित हैं। कुमारों को बड़ा तो होने दीजिये। अभी चार बरस की वय में ही क्या रावण से युद्ध करने भेज देना चाहती हैं ?’’ यह सुमित्रा थी, सबसे छोटी महारानी।



सुमित्रा को…

Continue

Added by Sulabh Agnihotri on July 27, 2016 at 8:40am — No Comments

बहुत दिनों के बाद मैंने यह डायरी खोली है ........

नव गीत

बहुत दिनों के बाद

मैंने यह डायरी खोली है।

आज नहीं है तू ओ! सजनी

मैं हूं सागर के बिन तरणी

पंछी बन कैदी हूं घर में

खड़ी हुई ज्यों रेल सफर में

बहुत दिनों के बाद

तेरी यह डायरी खोली है।

पढ़ लेता मैं डायरी पहले

कह देता जो चाहे कहले

घुट घुट के न रोने देता

कहा हुआ सब तेरा करता

बहुत दिनों के बाद

मर्म यह डायरी खोली है|

पता चला है आज ही मुझको

कितनी बेचैनी  थी तुझको

तभी तो तूने कदम…

Continue

Added by Abha saxena Doonwi on July 27, 2016 at 7:30am — 3 Comments

दोहे !

अन्तर कितना हो गया, कौमें नहीं करीब

पहला छोर अमीर तो, अन्तिम छोर गरीब |६|

  

शुद्ध भाव से सीखते, कपटीपन का पाठ

बिना भ्रष्ट आचार के.नहीं राजसी ठाठ   |७|

जनता हित के नाम से, नेता करते काम

पेटी भरते स्वयं की, ले भारत का नाम |८|

  

काला धन सोने  नहीं, देता सुख  की नींद 

कर भरकर ईमान से, हँसो मनाओ ईद |९|

   

रख कर 'काली' सम्पदा, किया भ्रष्ट ईमान

सब जनता मानते  उन्हें,,कलियुग का भगवान्…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on July 27, 2016 at 6:00am — 5 Comments

कीमत ए बेपरवाही (लघुकथा)/सतविन्द्र कुमार

कीमत ए बेपरवाही

-----------------------

हंसी ख़ुशी जीवन बीत रहा था।वे दोनों और उनका पांच साल का बच्चा,जो उनकी ख़ुशी का सबसे बड़ा कारण था और ज़रिया भी।

आज जब वह कपड़े धोने के बाद कमरे में गई तो बच्चे को फर्श पर अचेत हाल में देखते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।उसे तो उसने टीवी पर कार्टून देखते हुए छोड़ा था।

पर क्या हुआ? न कोई आवाज ,न कोई हलचल।मुँह में झाग और शरीर नीला।शायद कोई दौरा था।

शंकित मन से पति को फोन मिलाया,"सुनिए....चीनू को पता नहीं ...क्या हुआ है?वो....कुछ… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on July 26, 2016 at 11:29pm — 11 Comments

अधूरे सपने धोती रहीं.....

अधूरे सपने धोती रहीं .....

मैं तो जागी सारी रात

तूने मानी न मेरी बात

कैसी दी है ये सौगात

कि अखियाँ रुक रुक रोती रहीं

अधूरे सपने धोती रहीं

झूमा सावन में ये मन

हिया में प्यासी रही अग्न

जलता विरह में मधुवन

कि अखियाँ रुक रुक रोती रहीं

अधूरे सपने धोती रहीं.....



नैना कर बैठे इकरार

कैसे अधर करें इंकार

बैरी कर बैठा तकरार

कि अखियाँ रुक रुक रोती रहीं

अधूरे सपने धोती रहीं



मन के उड़ते रहे विहग…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 26, 2016 at 9:30pm — 5 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) 34

कल से आगे ..............................

रावण उल्लसित भी था और व्यथित भी। उसे शिव जैसे शक्तिशाली व्यक्ति की अनुकंपा प्राप्त हो गयी थी पर वह अपनी मूेर्खता को कैसे भूल सकता था। शिव अगर चाहते तो उसे भुनगे की तरह मसल सकते थे पर उन्होंने उसे छोड़ दिया था। छोड़ ही नहीं दिया था अपना वात्सल्य भी प्रदान किया था। उसकी सारी अवज्ञा को क्षमा कर दिया था। कितना अद्भुत शौर्य है उनमें, शायद त्रिलोक में दूसरा कोई नहीं होगा उनकी समता करने वाला फिर भी कितना शांत व्यक्तित्व है। अपनी शक्ति का कोई दंभ…

Continue

Added by Sulabh Agnihotri on July 26, 2016 at 8:43am — No Comments

बैठा चिता पर हवन कर रहा है-ग़ज़ल

22 122 122 122

बैठा हुआ बस मनन कर रहा हूँ।
दुख बाँटने का जतन कर रहा हूँ।।

पीड़ा जगत की है मन को लपेटे।
नयन नीर से आचमन कर रहा हूँ।।

संसार से तम मिटाने की चाहत।
चिन्ता चिता पर हवन कर रहा हूँ।।

अधरों पे मुस्कान आई अचानक।
प्रियतम से मानो मिलन कर रहा हूँ।।

लिखता चला जा रहा भावनायें।
कहते हैं सब मैं सृजन कर रहा हूँ।।

हर शब्द महके मेरी लेखनी का।
मनुजता मनुजता भजन कर रहा हूँ।।

मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 25, 2016 at 11:00pm — 2 Comments

लोकतंत्र और विकास

राष्ट्र का विकास रास्ते में पड़ा नहीं है,

विकास की राह में हर कोई बढ़ा नहीं हैं.

पर बयार बह रही है विकास की.

आम नागरिक ख़ुशी से उछल रहा है,

टैक्स की मार भी चुपचाप सह रहा है,

विकास की धार में बह रहा है.

 

नीति धर्म स्पष्ट है, समझ जाओगे.

सेवा करो, मेवा पाओगे,

सेवा करवाओगे तो

सेवा कर चुकाओगे.

नौकर मालिक से अड़े नहीं,

आज्ञाकारी माथे पे चढ़े नहीं,

ईमानदार सिर्फ शिकायत करता है.

और चुपचाप अपना काम करता…

Continue

Added by डा॰ सुरेन्द्र कुमार वर्मा on July 25, 2016 at 7:00pm — 3 Comments

सूर्य ने छाया को ठगा .......

नव गीत
सूर्य ने
छाया को ठगा |


काँपता थर.थर अँधेरा
कोहरे का है बसेरा
जागता अल्हड़ सवेरा
किरनों ने
दिया है दग़ा |


रोशनी का दीपकों से
दीपकों का बातियों से
बातियों का ज्योतियोँ से
नेह नाता
क्यों नहीं पगा |


छाँव झीनी काँपती सी
बाँह धूपिज थामती सी
ठाँव कोई ताकती सी
अब कौन है
किसका सगा

......आभा

प्रस्तुत  नव गीत  अप्रकाशित एवं मौलिक है .....आभा 

Added by Abha saxena Doonwi on July 25, 2016 at 6:00pm — 9 Comments

दोहे

दोहे !

डायन महँगाई  करे, पिया को परेशान

काट छाँट हर चीज़ में, कम हुआ खान -पान

खमा बहादुर ही करे, कायर का क्या काम

क्रोध घृणा की भावना, खुद को करे तमाम |

   

रस्सी खोलो मोह की, फिर देखो  संसार   

भौतिक धन दौलत सभी, दुनियाँ निरा असार |

चिंता छोड़ जहान की, चिन्तन कर भगवान

चिन्ता मन का रोग है, चिन्ता चिता समान

ज्योत जलाकर  ज्ञान की, रोशन कर तू राह 

राह नहीं चलना सरल, आँधार है अथाह…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on July 25, 2016 at 5:00pm — 6 Comments

उनकी शाम दे दो ....

उनकी शाम दे दो ....

आज

सहर में अजीब उजास है

हर शजर पर

समर के मेले हैं

सबा में अजीब सी

मदहोशी है

साँझ के कानों में

तारीक की सरगोशी है

शायद किसी को

मेरी तन्हाई पे

तरस आया है

किसके हैं लम्स

कौन मेरे करीब आया है

मुद्दतों की नमी ने

आज सब्र पाया है

लम्हे रुके से लगते हैं

अब्र झुके झुके लगते हैं

देखो ! तरीक के कन्धों पे

शाम झुकी है

सहर भी कुछ रुकी रुकी है

पसरती सम्तों में

पसरती…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 25, 2016 at 4:10pm — 4 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) 33

कल से आगे .........

गुरुदेव वशिष्ठ और महामात्य जाबालि की आशंका अकारण नहीं थी। दोनों ही चिंतन प्रधान व्यक्तित्व के स्वामी थे और दोनों का ही सामाजिक चरित्र पर विशद चिंदन था।



अगली बार जब वेद घर पहुँचा तो उसने मित्रों के साथ समय व्यतीत नहीं किया था। इस बार उसके पास कुछ विशेष था मंगला को बताने के लिये। अभी दोपहर नहीं हुई थी। वह घर पहुँचते ही सीधा अंदर गया। मंगला घर के आँगन में स्थित कुयें से पानी खींच रही थी। वेद ने सीधे उसकी चोटी में झटका मारते हुये सूचना दी…

Continue

Added by Sulabh Agnihotri on July 25, 2016 at 3:49pm — No Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"इल्म गिरवी है अभी अपनी जहालत के लिए ढूँढ लो क़ौम नयी अब तो बग़ावत के लिए अब अगर नाक कटानी ही है हज़रत…"
17 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। तरही मिसरे पर सुंदर गजल हुई है। गिरह भी खूब लगाई है। हार्दिक बधाई।"
21 hours ago
Richa Yadav replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"2122, 1122, 1122, 112/22 सर झुका देते हैं हम उसकी इबादत के लिए एक दिल चाहिए हमको तो मुहब्बत के…"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सादर अभिवादन।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
"सर कोई जब न उठा सच की हिमायत के लिएकर्बला   साथ   चले   कौन …"
Saturday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-190
" स्वागतम "
Friday
Admin posted a discussion

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 190 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है | इस बार का मिसरा नौजवान शायर…See More
Tuesday
आशीष यादव posted a blog post

मशीनी मनुष्य

आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत…See More
Apr 20
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब, प्रस्तुत दोहों की सराहना हेतु आपका हार्दिक आभार। सादर"
Apr 19
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय जयहिंद रायपुरी जी सादर, प्रदत्त चित्र पर आपने  दोहा छंद रचने का सुन्दर प्रयास किया है।…"
Apr 19
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी  सही कहना है हम भारतीय और विशेषकर जो अभावों में पलकर बड़े हुए हैं, हर…"
Apr 19
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया प्रतिभाजी हार्दिक धन्यवाद आभार आपका"
Apr 19

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service