Added by सतविन्द्र कुमार राणा on July 18, 2016 at 11:30am — 9 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on July 18, 2016 at 10:54am — 4 Comments
कल से आगे ...
‘‘महर्षि प्रणाम स्वीकार करें।’’ महर्षि अगस्त्य के आश्रम में प्रवेश करते हुये इंद्र ने कहा।
‘‘देवेंद्र को क्या आशीर्वाद दूँ मैं ?’’ अगस्त्य ने हँसते हुये कहा ‘‘देवेन्द्र के सौभाग्य से तो सारा विश्व पहले ही ईष्र्या करता है।’’
‘‘क्या गजब करते हैं मुनिवर ! इस समय तो इंद्र को आपके आशीर्वाद की सर्वाधिक आवश्यकता है। इस समय यह कृपणता, दया करें, इस समय भरपूर आशीर्वाद दें।’’
‘‘ महर्षि गौतम के साथ ऐसा घात करने के बाद भी जो विश्व में पूजनीय है भला उसे अगस्त्य के…
Added by Sulabh Agnihotri on July 18, 2016 at 9:00am — 3 Comments
Added by shree suneel on July 18, 2016 at 2:00am — 9 Comments
थक गए थे जलील चचा, कोई भी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था| सबको बस एक ही बात समझ आ रही थी कि बड़ी बड़ी बंदूकें उठाओ और हर उस शख्श को रास्ते से हटा दो जो उनकी बात नहीं माने| पता नहीं ये उन भड़काऊ तकरीरों का असर था या उनके द्वारा दिखाए गए प्रलोभन का असर| आज उनको बेहद अफ़सोस हो रहा था, अपने ऊपर और पत्नी के ऊपर भी जो उनको अकेला छोड़कर जन्नत सिधार गयी थी| काश उनको एक औलाद दे गयी होती तो कम से कम उसे तो सही रास्ते पर चला पाते|
आज शाम की मीटिंग में फिर से सबने उनके शांति और सौहार्द के प्रस्ताव को…
Added by विनय कुमार on July 17, 2016 at 3:23pm — 8 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on July 17, 2016 at 12:00pm — 4 Comments
कल से आगे ........
समय का चक्र अपनी गति से चलता रहा।
महाराज दशरथ पिता बन गये। बड़ी रानी कौशल्या ने पुत्र को जन्म दिया। दशरथ का मन खुशी से नाचने लगा। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अपना उल्लास कैसे व्यक्त करें। उनका बस चलता तो वे मुकुट आदि सारे राजकीय आडम्बरों को एक ओर रखकर नाचते, गाते, चिल्लाते अयोध्या की सड़कों पर निकल जाते और एक-एक आदमी को पकड़ कर उसे यह शुुभ समाचार सुनाते। पर हाय री पद की मर्यादा ! वे ऐसा नहीं कर सकते थे। फिर भी अयोध्या का कोष खोल दिया गया था। पूरी पुरी…
Added by Sulabh Agnihotri on July 17, 2016 at 10:26am — 1 Comment
Added by Manan Kumar singh on July 17, 2016 at 10:00am — 5 Comments
२२१ २१२१ १२२१ २१२
ये रूप रंग गंध सभी शान बन गए
कुछ रोज में ही जो मेरी पहचान बन गए
नफरत के सिलसिले जो चले धूप छाँव बन
इंसानियत के शब्द भी मेहमान बन गए
तुम-तुम न रह सके न ही मैं-मैं ही बन सका
दोनों ही आज देख लो शैतान बन गए
खेमों में बँट गए हैं सभी आज इस तरह
कुछ राम बन गए कई रहमान बन गए
हद के सवाल पर या कि जिद के सवाल पर
हद भूलकर गिरे सभी नादान बन…
ContinueAdded by Ashok Kumar Raktale on July 17, 2016 at 9:35am — 5 Comments
Added by सतविन्द्र कुमार राणा on July 17, 2016 at 7:30am — 4 Comments
२१२२ २१२२ २१२२ २२
जिंदगी क्या है ज़रा नज़रे उठा कर देखो
अश्क बारी बंद कर चश्में सुखा कर देखो |
जिंदगी भर लालसा के पीछे भागे तुम क्यूँ
शांति से तुम सोचकर कारण पता कर देखो |
मुफलिसी को तुम भी हंसी में चिढ़ाया होगा
मुफलिसों को कुछ कभी तो तुम खिला कर देखो |
चश्मा पहने हो जो उसको साफ़ करना होगा
शान शौकत धन के ऐनक को हटा कर देखो |
मानुषिकता में नहीं कोई बड़ा या…
ContinueAdded by Kalipad Prasad Mandal on July 17, 2016 at 7:30am — No Comments
Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on July 17, 2016 at 1:56am — 12 Comments
उस विशेष विद्यालय के आखिरी घंटे में शिक्षक ने अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए, गिने-चुने विद्यार्थियों से कहा, "काफिरों को खत्म करना ही हमारा मक़सद है, इसके लिये अपनी ज़िन्दगी तक कुर्बान कर देनी पड़े तो पड़े, और कोई भी आदमी या औरत, चाहे वह हमारी ही कौम के ही क्यों न हों, अगर काफिरों का साथ दे रहे हैं तो उन्हें भी खत्म कर देना| ज़्यादा सोचना मत, वरना जन्नत के दरवाज़े तुम्हारे लिये बंद हो सकते हैं, यही हमारे मज़हब की किताबों में लिखा है|"
"लेकिन हमारी किताबों में तो क़ुरबानी पर ज़ोर…
ContinueAdded by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 16, 2016 at 10:26pm — 9 Comments
Added by मनोज अहसास on July 16, 2016 at 4:54pm — 6 Comments
२२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२
मीत बनाते बस इक अपना दुश्मन सौ खुद मिल जाते है
गुल को पाने की चाहत में खारों से तन छिल जाते हैं
हम तो उसको भाई कहते वो हमको कमजोर बताता
नहीं समझता जब हम अपनी पे आते सब हिल जाते है
बसें चलाते गले लगाते क्या क्या नहीं किया करते हम
पर जिस वक़्त गले मिलते दुश्मन को मौके मिल जाते हैं
हम पूरब के बासी हमको मत तहजीब सिखा उल्फत की
यहाँ जमाने से उल्फत में बदले दिल से दिल जाते…
ContinueAdded by Dr Ashutosh Mishra on July 16, 2016 at 4:00pm — 6 Comments
कल से आगे ........
जैसी की सुमाली को अपेक्षा थी, पिता विश्रवा का निर्णय रावण के पक्ष में आया था।
दूसरे दिन प्रातः ही यह पूरा कुटुम्ब कुबेर के साथ पुष्पक में बैठकर विश्रवा के पास गया था। उन्होंने पूरी बात समझी और बोले- ‘‘मैं दोनों से पृथक-पृथक एकान्त में बात करना चाहता हूँ।’’
पहले रावण से बात हुई। विश्रवा ने उसे तभी देखा था जब वह दुधमुहाँ बच्चा था। आज उसको इस पूर्ण विकसित अवस्था में देख कर उन्हें प्रसन्नता हुई। उसे स्नेह से सीने से लगा लिया। फिर वे धीरे से विषय पर आये…
Added by Sulabh Agnihotri on July 16, 2016 at 10:23am — 1 Comment
शादी मे सारा कुछ अच्छे से निपट गया था।सभी मेहमानों को वापसी उपहार, मिठाईयो के डिब्बे देकर रुखसत किया गया था। घर को भी फ़िर से सवार कर पटरी पर ले आई थी कि अचानक एक सुटकेस और …
ContinueAdded by नयना(आरती)कानिटकर on July 15, 2016 at 8:00pm — 2 Comments
Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 15, 2016 at 5:39pm — 12 Comments
Added by Janki wahie on July 15, 2016 at 5:23pm — 4 Comments
कितने ही गिद्धमानव
आकाश में मुक्त होकर
उड़ रहे हैं
क्योंकि उनके मुँह पर
खून के निशान नहीं पाये गए
और तीन सौ रुपये चुराने वाला
अपनी सज़ा के इंतज़ार में
वर्षों जेल में सड़ता रहा
मैंने एक अवयस्क बलात्कारी को
हत्या करने के बाद इत्मीनान से
सुधारगृह जाते हुए देखा है
मैं क़ानून की क़ैदी हूँ ।
स्टोव हों या कि
बदले जमाने के गैस चूल्हे
बस बहू का आँचल थामते हैं
'न' सुनकर जगे पुरुषत्व के
नाखूनों से रिसते तेज़ाब से…
Added by Tanuja Upreti on July 15, 2016 at 3:30pm — 6 Comments
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