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गज़ल : मधु-मिलन -रामबली गुप्ता

वह्र-122 122 122 122



निशा मध्य धीरे से घूँघट उठेगा।

खिला रूप विधु का ये मन मोह लेगा।।



प्रतीक्षा हृदय जिसकी करता रहा है।

उसी रात्रि का इंदु हिय में खिलेगा।।



मुदित होंगे मन सुख के सपने सजेंगे।

अमित स्रोत सुख का उमड़ के बहेगा।।



रहा आज तक है जो अव्यक्त हिय में।

वही प्रेम-सागर तरंगें भरेगा।।



नयन बंद होंगे अधर चुप रहेंगे।

मुखर मौन ही हाल हिय का कहेगा।।



खिला पुष्प-यौवन बिखेरेगा सौरभ।

भ्रमर पी अमिय मत्त आहें… Continue

Added by रामबली गुप्ता on July 25, 2016 at 2:00pm — 8 Comments

ताक़त वतन की हमसे है [लघु कथा ]

“ऑफिस के लिए देर नहीं हो रही ?यहीं बैठे है आप अभी तक i

“वो बाहर बाबूजी बैठे हैं ना ,फिर पूछेंगे कि अशोक का फ़ौज से कागज़ आया कि नहीं I”

“आप साफ़ कह क्यों नहीं देते कि नहीं भेजना हमें अपने बेटे को फ़ौज में I कागज़ आ गया और हमने फाड़ कर फेंक भी दिया I”

“साफ़  कहने की हिम्मत ही तो  नहीं कर पा रहा हूँ सविता i बहुत प्यार करते हैं अशोक को , फ़ौज में ऑफिसर देखना चाहते हैं उसे”I

“इन्हें क्या मिला फ़ौज से ? टूटी टांग ,बैसाखियाँ और थोड़ी सी पेंशन.. बस i”

“जानता हूँ ,पर बहस…

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Added by Pradeep kumar pandey on July 25, 2016 at 10:35am — 3 Comments

चोर को चोर कहना गुनाह होता है - डॉo विजय शंकर

हर गुनाह की सजा होती है ,
ये तो पता नहीं ,
पर हर गुनाह पर किसी न किसी का
हक़ होता है , ये पता है।
कभी कोई गुनाहगार मजबूर लाचार भी होता है ,
ये तो पता नहीं ,
पर बड़ा गुनाहगार अक्सर बड़ा ताक़तवर होता है ,
ये सबको पता है।
चोरी तो चौसठ कलाओं में से एक है ,
पता है न ,
पर चोर ताक़तवर हो तो
चोर को चोर कहना गुनाह होता है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on July 25, 2016 at 10:00am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - उस मंज़र को खूनी मंज़र लिक्खा है ( गिरिराज भंडारी ) ज़मीन , मोहतरम जनाब समर कबीर साहिब ।

आदरणीय समर कबीर साहब की ज़मीन पर एक ग़ज़ल

22   22   22   22   22   2

उस मंज़र को खूनी मंज़र लिक्खा है

***********************************

जिसने तुझको यार सिकंदर लिक्खा है

तय है उसने ख़ुद को कमतर लिक्खा है

 

समाचार में वो सुन कर आया होगा

एक दिये को जिसने दिनकर लिक्खा है

 

वो दर्पण जो शक़्ल छिपाना सीख गये

सोच समझ कर उनको पत्थर लिक्खा है

 

भाव मरे थे , जिस्म नहीं, तो भी…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 25, 2016 at 9:00am — 18 Comments

नफरत का रिश्ता--

नफरत का रिश्ता--

पूरा गाँव पार कर गए पंडित लेकिन दुक्खू नहीं दिखा| जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते वो गाँव से बाहर निकल गए, बहुत जरुरी काम से जा रहे थे और ऐसे में दुक्खू न दिखे, यही मना रहे थे| पंडित को लगा कि लगता है गाँव के बाहर चला गया है आज, राहत की सांस ली उन्होंने| पंडित पूरे नियम कानून वाले थे, बिना नहाए धोए अन्न ग्रहण नहीं करते थे और सारी गणना करके ही घर से निकलते थे| कब किस दिशा में जाना है, कब नहीं, सब देख समझ ही किसी यात्रा की तैयारी करते थे| ख़ुदा न खास्ता अगर किसी ने छींक दिया या…

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Added by विनय कुमार on July 25, 2016 at 12:49am — 9 Comments

कुण्डलियाँ

पीर पराई बूझता,है सच्चा इंसान

दर्द लगे सबका जिसे,अपने दर्द समान

अपने दर्द समान, दूर उसको वह करता

जाता खुद को भूल,देख औरों को मरता

लगता उसका जोर,बचाने में भी भाई

हर अच्छा इंसान,समझता पीर पराई।



------



आस लगाए जो रहें,करें नहीं कुछ कर्म

बनें रहें बस आलसी,नहीं उन्हें है शर्म

नहीं उन्हें है शर्म,रहें पुरषार्थ भुलाकर

जो देखें बस बाट, हाथ पर हाथ चढ़ाकर

उनका राखा राम,नहीं जिनको श्रम सुहाए

बिना करे कुछ कर्म,रहें जो आस… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on July 25, 2016 at 12:30am — 4 Comments

गजल(अब नयी पहचान देगा...)

2122 2122 212

अब नयी पहचान देगा आदमी

बात पत्थर से करेगा आदमी।1



जो मरा अबतक बचाते जिंदगी

क्या कभी आगे मरेगा आदमी?2



पोंछता आँसू जमाने से रहा

खून बन अब तो बहेगा आदमी।3



लाज का फटता वसन हर मोड़ पर

अब भला कितना सियेगा आदमी।4



मोहरों का बन रहा है मोहरा

आपको पहचान लेगा आदमी?5



गलतियों पर चढ़ रही कबसे बरक

कब भला यह मान लेगा आदमी?6



ढूँढते तुम आ गये हो दूर तक

देख लो शायद मिलेगा आदमी।7

मौलिक व… Continue

Added by Manan Kumar singh on July 24, 2016 at 3:11pm — 6 Comments

ग़ज़ल: यही बात दिल देख मेरा जलाये

१२२-१२२-१२२-१२२



यही बात दिल देख मेरा जलाये

तुझे याद भी क्या जरा हम न आए



मुहब्बत किसी से करो तो पता हो

इशारे से महबूब कैसे बुलाये



गुनाहों ने तुमको कहीं का न छोड़ा

शराफत खड़ी मुंह में ये बुदबुदाये



खुदा प्यार बांटे सभी को हमेशा

यही सोच मुझको सदा गुदगुदाये



बफा साथ लेकर परीक्षा है आती

दुआ है खुदा से मुझे आजमाये



नदी गुनगुनाती हुई बह रही है

मिलन साथ सागर तभी खिलखिलाए

.

 मुनीश…

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Added by munish tanha on July 24, 2016 at 11:30am — 2 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) 32

कल से आगे ..........

जैसा कि संभावित था, रावण ने अपने बड़े भाई कुबेर का मानमर्दन कर ही दिया। इस विजय ने उसके अहंकार का पोषण करने का कार्य भी किया। सत्ता के साथ सत्ता का मद आना स्वाभाविक ही है। इस मद के अतिरिक्त इस विजय से उसे जो कुछ भी प्राप्त हुआ था उसमें सबसे महत्वपूर्ण था कुबेर का पुष्पक विमान।



रावण ने कुबेर को परास्त करने के बाद अमरावती का राज्य हस्तगत नहीं किया। जैसे बहुत बाद में, ऐतिहासिक मध्य काल में इस्लामी आक्रमण कारी भारत आते थे और लूट का माल समेट कर लौट…

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Added by Sulabh Agnihotri on July 24, 2016 at 8:46am — No Comments

राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) 31

कल से आगे ...............

वेद बड़े उहापोह में था। किस प्रकार बात करे वह गुरुजी से मंगला के विषय में। गुरुदेव क्रोधी स्वभाव के कदापि नहीं थे तो भी उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी। वह नित्य प्रातः निश्चय करता कि आज मध्यान्ह में भोजन के समय अवश्य ही गुरुदेव से पूछेगा किंतु मध्यान्ह से साँझ पर टल जाता और साँझ से पुनः अगली प्रातः पर। अंततः एक दिन उसने निश्चय किया कि अब कोई सोच-विचार नहीं करेगा बस सीधे जाकर गुरुजी से पूछ लेगा, फिर जो होगा देखा जायेगा। नहीं पूछेगा तो फिर घर जाते ही मंगला…

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Added by Sulabh Agnihotri on July 23, 2016 at 10:11pm — No Comments

हुनरबाज [लघु कथा ]

दर्जी रमेश के एक कमरे के घर में आज उत्साह पसरा हुआ था I टी वी के एक कार्यक्रम में बेटे राजू का गाना आनेवाला था I

“काकी टी वी नहीं खोला i राजू भैया का गाना शुरू हो गया है “  पडौस  की लड़की  हाँफती  अन्दर आई I

“सुबह से इंतज़ार था और इनकी मशीन की खट खट में समय का ध्यान नहीं रहा, चल लगा  दे जल्दी से “I  बेटे को टी वी में देखने को बेताब कांता , टी वी के एकदम पास बैठ गई  I

टी वी खोलने तक गाना हो चुका था I तालियों की गडगडाहट के बीच राजू को देख उसकी आँखें भर आईं Iमाथे के…

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Added by pratibha pande on July 23, 2016 at 7:43pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मगर दीवार रिश्तों से कभी ऊँची नहीं होती फिल्बदीह ग़ज़ल (राज )

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

 

दिलों में दूर रहकर भी कोई दूरी नहीं होती 

किसी का प्यार पाने से बड़ी पूंजी नही होती

कहाँ किसको कोई पूछे यहाँ तो नाम बिकता है 

किसी मजदूर के फन की कोई गिनती नहीं होती

 …

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Added by rajesh kumari on July 23, 2016 at 6:30pm — 12 Comments

"विसर्जन" लघुकथा

अखबार हाथ में लेकर सृजन लगभग दौड़ते हुए  घर  मे घुसा

"मम्मा!, पापा! ये देखो ये तो वही है ने जो हमारे गणपति बप्पा को..."…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on July 23, 2016 at 3:30pm — 12 Comments

महाराणा प्रताप (वीर छंद प्रयास)

वीर कहीं रावल बप्पा थे,राणा कुम्भा की थी शान

आधी देह संग लड़ जाते,राणा सांगा बहुत महान

जिनके पुरखों की गाथा का,कर पाया न कोई बखान

कहें महाराणा जी सारे,उन प्रताप का गाऊं गान



जैवन्ता बाई थी माता,औ उदय सिंह जी थे तात

बड़े चाव से उनको पाला,शुरु से सीखी अच्छी बात

पलते-बढ़ते ही राणा ने,दुश्मन की जानी औकात

मौके पर ही धोखा देदे,ऐसी थी अकबर की जात



अकबर ने तो यह सोचा था,जीतेगा वह हिंदुस्तान

नतमस्तक बहु राज्य हुए थे,बढ़ जाती थी उसकी… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on July 23, 2016 at 7:48am — 4 Comments

बहुत क़र्ज़ है पापा मुझ पर

बहुत कर्ज़ है पापा मुझ पर

कैसे अदा करूं|



बचपन में मैं जब छोटी थी

कैरम की जैसे गोटी थी

घूमा करती छत के ऊपर

कभी न टिकती एक जगह पर

उन सपनों को उन लम्हों को 

कैसे जुदा करूँ ।



सुबह सुबह उठ कर तुम पापा

सरदी में ना करते कांपा

मुझे उठा कर मुंह धुलवाते

शिशु कवितायें भी तुम सिखलाते

कहाँ छिप गये तुम तो जा कर

कैसे निदा  करूं|

मेरे विवाह के थे वह फेरे

आँखों पर रूमाल के डेरे

थकी कमर थी, थकी थी…

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Added by Abha saxena Doonwi on July 22, 2016 at 10:00pm — 7 Comments

सावन

इस बार सावन कुछ और होगा 

सखियों की छेड़ छाड़

और

और पिया का संग होगा |

झूलों पर गुनगुनाते गीत होंगे

फूलों के खुशबू

और

और पिया से मिलन होगा |

गुन गुनाएंगे पत्ते भी

हरी हरी डालियों पर

बिजली जब भी चमकेगी

पिया के आग़ोश में

यौवन पिघलेगा|

अधरों पर अधर

गीतों की फुहार होगी

सावन में लहेरिया पहने

सजन से मिलने की ख्वाहिश 

सजन होंगे प्रीत होगी

अब के सावन कुछ और होगा |

नाचेंगे मोर बागों…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 22, 2016 at 6:30pm — 3 Comments

जाने किस ऊंचाई पर सब लोग जाना चाहते

२१२२ २१२२ २१२२ २१२2

जाने किस ऊंचाई पर सब लोग जाना चाहते है

हो जमी पे ही खड़े सब क्या दिखाना चाहते हैं

 

जो समंदर पार  के ले आदमी वो ही बड़ा अब

आप ऐसी सोच रखकर क्या जताना चाहते है

 

आदि से कंगूरों की सूरत टिकी जिस नीव पर थी

आप क्यूँ उस नीव को ही अब भुलाना चाहते हैं

 

बंगले नौकर गाडी मोटर की तमन्ना तो नयी अब

पर अभी भी प्यार दिल में हम पुराना चाहते हैं

 

पढ़ लिया इतिहास सबने जानते अंजाम भी सब

फिर भी…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on July 22, 2016 at 1:30pm — 6 Comments

राम-रावण कथा (पूर्व-पीठिका) 30

कल से आगे ...

सभाकक्ष में सुमाली के साथ एक अपरिचित व्यक्ति भी प्रतीक्षारत था। वज्रमुष्टि, प्रहस्त और अकंपन भी उपस्थित थे। रावण के प्रवेश करते ही सब उठ कर खड़े हो गये। रावण अपने सिंहासन पर आसीन हुआ। अभिवादन की औपचारिकताओं के बाद उसने सुमाली से पूछा -

‘‘यह अपरिचित सज्जन कौन हैं मातामह ?’’

‘‘लंकेश्वर ! ये तुम्हारे भ्राता कुबेर के दूत हैं। उनका संदेश लेकर आये हैं।’’

‘‘महाराज ! मैं श्वेतांक हूँ, लोकपाल, धनपति कुबेर का दूत !’’

‘‘कहिये भ्राता कुशल से तो हैं ? और…

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Added by Sulabh Agnihotri on July 22, 2016 at 9:15am — 2 Comments

"मौन"कुर्सी मायावी है

रणवीर सिंह और अशोक कालकर  दोनो ने गुड़गाँव मे एक साथ  एक मल्टीनेशनल कंपनी ने ज्वाइन किया था । दो भिन्न संस्कृति, मातृभाषा के वे तीसरी तरह की संस्कृति मे रचने-बसने का प्रयत्न करने लगे थे। धीरे-धीरे आपसी मित्रता गहरा गई. ऑफ़िस के …

Continue

Added by नयना(आरती)कानिटकर on July 21, 2016 at 9:28pm — 4 Comments

बेला महका

नव गीत.....

बेला महका.......



बेला महका चम्पा महकी

महकी है कचनार

झूम रहीं सब काकी बहनें

नृृत्य करें हर बार।

गाँव में शादी है होली

फूलों से सजती है डोली

संबन्धी ने भेजा न्योता

गाँव मेरे अब क्यों ना आता

बातों की भर मार।

रात रात भर बेला जागा

खिल न सका वह कहीं अभागा

कहीं गुंथ गया गजरे अन्दर

समझ रहा वह तुझे सिकन्दर

नहीं पा सकी पार।

बचपन बीता यौवन आया

शैतानी ने कदम बढ़ाया

तंत्र मंत्र…

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Added by Abha saxena Doonwi on July 21, 2016 at 7:21pm — 8 Comments

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