रोज की तरह आज भी मैं उसे पढ़ाने उसके घर पहुँचा और वो भी आदतन पहले ही दरवाज़े के पास खड़ा मेरा ही इंतज़ार कर रहा था. उसने आनन-फ़ानन में दरवाज़ा खोला और बिना दरवाज़ा बंद किए ही पुस्तकें लाने अन्दर की ओर भागा. वो यही कोई 6-7 साल का बहुत ही प्यारा और कुशाग्र बुद्धि का बालक था. उसका नाम दर्शन था. मैं उसे जो भी पढ़ता था, वो सब बड़े गौर से सुनता और सहेज कर रखता था. प्रश्नों की खान था वो बच्चा और उसकी जिज्ञासाएँ कभी शांत नहीं होतीं थीं और यही उसकी सबसे बड़ी ख़ासियत थी कि वो आसानी से संतुष्ट नहीं होता…
ContinueAdded by Prashant Priyadarshi on July 24, 2015 at 9:00pm — 9 Comments
"जानती है ? नया मेहमान आने वाला है सुनकर, माँ-बाबूजी कितने खुश हैं । "
"और आप ? "
" हाँ , माँ कह रही थीं , बड़ी भाभी की दोनों संतानें लड़कियाँ हैं, इसलिए बहू से कहना कि वह सिर्फ़ बेटा ही जने । "
"आपने क्या कहा ? '
"कहना क्या ? मैं माँ से अलग थोड़े हूँ , और तू भी माँ की इच्छा के विरूद्ध तो जाने से रही ।"
"सो तो है , पर माँ जी की इच्छा पूरी हो , उसकी जवाबदेही आपके ही हाथों में है । "
"मेरे हाथों में ? पागल हो गई है क्या ? '
"लो भई ! साइंस ग्रेजुएट हो । इतना भी नहीं…
Added by shashi bansal goyal on July 24, 2015 at 7:30pm — 19 Comments
सरकारी खर्चे पर होटल के कमरे में बैठे बैठे साहब ने एक तंदूरी मुर्गा खत्म किया। फिर पानी पीकर डकार मारते हुए किसी बड़े लेखक का अत्यन्त मार्मिक उपन्यास पढ़ने लगे। उपन्यास में गरीबों की दशा का जिस तरह वर्णन किया गया था वह पढ़ते पढ़ते साहब का पहले से भरा पेट और फूलने लगा। अन्त में जब साहब से पेट दर्द सहन नहीं हुआ तो वो उठकर अपनी मेज पर गए। दराज से अपनी डायरी निकाली और एक सादा पन्ना खोलकर शब्दों की उल्टी करने लगे।
पेट खाली हो जाने के बाद उन्हें…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 24, 2015 at 3:12pm — 14 Comments
Added by Jatinder Aulakh on July 24, 2015 at 12:21pm — 7 Comments
धूमिल होती भ्रांति सारी, गण-गणित मैं तोड़ रही हूँ
कलम डुबो कर नव दवात में, रूख समय का मोड़ रही हूँ
मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ ......
नई भोर की चादर फैली, जन-जीवन झकझोर रही हूँ
धधक रही संग्राम की ज्वाला, सागर सी हिल-होर रही हूँ
मैं दुर्गेश्वरी बोल रही हूँ ......
टूटे हृदय के कण-कण सारे, चुन-चुन सारे जोड़ रही हूँ
उद्वेलित मन अब सम्भारी, विषय-जगत अब छोड़ रही…
Added by kanta roy on July 24, 2015 at 9:30am — 36 Comments
सूरज बोला रात से, आना नदिया पास।
घूँघट ओढ़े मैं मिलूँ , मिल खेलेंगे रास । ।
गोद निशा रवि आ गया , सोया घुटने मोड़ ।
चन्दा भी अब चल पड़ा , तारा चादर ओढ़ । ।
पीड़ा वो ही जानता , खाए जिसने घाव ।
पाटन दृग रिसत रहे ,कोय न समझा भाव । ।
विरह मिलन दो पाट हैं, जानत हैं सब कोय ।
सबहि खुशी गम सम रहे, दुःख काहे को होय। ।
नदिया धीरे बह रही ; पुरवइया का जोर ।
चाँद ठिठोली कर रहा , चला क्षितिज जिस ओर । ।
बदरा घूँघट…
Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 23, 2015 at 8:00pm — 4 Comments
अपराधी सब एक हैं, धर्म कहाँ से आय|
सजा इन्हें कानून दे, करें न स्वयम उपाय||
कल तक जो थी मित्रता, आज न हमें सुहाय|
तूने छेड़ा है मुझे, अब खुद लियो बचाय||
सूनी सड़कें खौफ से, सायरन पुलिस बजाय|
बच्चे तरसे दूध को, माता छाती लगाय||
शहर कभी गुलजार था, धरम बीच क्यों आय|
कल तक जिससे प्यार था, फूटी आँख न भाय!!
पत्थर गोली गालियाँ, किसको भला सुहाय|
अमन चैन से सब रहें, फिर से गले लगाय ||
(मौलिक व अप्रकाशित)
जवाहर लाल सिंह
Added by JAWAHAR LAL SINGH on July 23, 2015 at 6:58pm — 7 Comments
अपने अधरों से ....
अपने अधरों से अधरों पर कोई कथा न लिख जाना
अंतर्मन के प्रेम सदन की कोई व्यथा न लिख जाना
श्वास सुरों में स्पंदन तुम्हारा
स्मृति भाल पे चंदन तुम्हारा
प्रेम पंथ की मन कन्दरा में
कोई विरह प्रथा न लिख जाना
अपने अधरों से अधरों पर कोई कथा न लिख जाना
अंतर्मन के प्रेम सदन की कोई व्यथा न लिख जाना
संचित पलों की मृदुल अनुभूति
अभी रक्ताभ अधरों पर जीवित है
तुम नीर भरे नयनों के भाग्य…
Added by Sushil Sarna on July 23, 2015 at 5:23pm — 4 Comments
शहर की रूमानियत, जाने कहाँ पर खो गयी
एक चिंगारी से गुलशन, खाक जलकर हो गयी
अजनबी से लग रहे हैं, जो कभी थे मित्रवत
रूह की रूमानियत, झटके में कैसे सो गयी
ख्याल रखना घर का मेरा, जा रहे हैं छोड़कर
सुन के उनकी बात जैसे, आत्मा भी रो गयी
सड़क सूनी, सूनी गलियां, बजते रहे थे सायरन
थे मुकम्मल कल तलक सब, आज ये क्या हो गयी
रब हैं सबके बन्दे उनके, एक होकर अब रहो
इस धरा को पाक रक्खो, साख सबकी खो गयी
(मौलिक व अप्रकाशित)
- जवाहर लाल…
ContinueAdded by JAWAHAR LAL SINGH on July 23, 2015 at 12:30pm — 4 Comments
रहें जो खुद मकानों में वो घर की बात करते हैं
जड़ों को काटने वाले शज़र की बात करते हैं.
जहाँ जिस थाल में खाते उसी को छेदते देखो
रहें तन से इधर लेकिन उधर की बात करते हैं
लगे अच्छी उन्हें बस आग फिरते हैं लिए माचिस
अजब वो लोग हैं केवल समर की बात करते हैं.
छपी तस्वीर अखबारात में उस बाँध की देखो गिरा वो चार दिन में ही अजर की बात करते… |
Added by rajesh kumari on July 23, 2015 at 10:15am — 14 Comments
दोनों बुराई के लिये लड़ रहे थे, एक दूसरे पर खूब कीचड़ उछाल रहे थे ।
देखने वालों ने समझा दोनों बुराई मिटा के रहेंगे ,
जब कि वो दोनों बुराई पर अपना अपना हक़ जता रहे थे।
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Dr. Vijai Shanker on July 23, 2015 at 3:00am — 27 Comments
Added by shree suneel on July 23, 2015 at 12:16am — 18 Comments
‘शहर’ जो गुलजार था,
हाँ, धर्म का त्योहार था.
नजर किसकी लग गयी
क्यों अशांति हो गयी
दोष किसका क्या बताएं
मन में ‘भ्रान्ति’ हो गयी
होती रहती है कभी भी…
ContinueAdded by JAWAHAR LAL SINGH on July 22, 2015 at 9:00pm — 13 Comments
है सजी महफ़िल यारों
फिर से जख्मों को उठाओ
याद फिर कर लो उसे
जिससे मोहब्बत की थी यारों
फिर वही कुछ हँसते गाते
रुठते और फिर मनाते
अश्क़ जब आँखों में आये
गीत बन जब दर्द जाये
जख्म तुम सबको दिखाओ
फिर वही अपनी पुरानी
सुनो-सुनाओ, दर्द घटाओ
अपनी अपनी प्रेम कहानी |
उसको भी बतलाओ यारों
वो कहाँ और हम कहाँ हैं
हमने तो जख्मों को अपने
जीने का जरिया बनाया
गिर के खुद संभले जहाँ…
ContinueAdded by maharshi tripathi on July 22, 2015 at 7:00pm — 11 Comments
आज एक महीना होने को आया था और क़लम ऐसी जड़ हुई थी कि आगे बढ़ने का नाम ही ना लेतीI
ऐसा उसके साथ पहले भी कई बार हुआ था ,कि वो लिखने बैठता और पूरा पूरा दिन गुज़र जाने पर भी काग़ज़ कोरा रह जाता, लेकिन यहाँ बात कुछ और ही थी ,आज खयालात उसके साथ कोई खेल नहीं खेल रहे थे , वो जानता था कि उसे क्या लिखना है ,कहानी के सारे किरदार उसके ज़हन में मौजूद थे I
वो बूढी मज़लूम औरत , वो भोली सी कमसिन बच्ची , वो सफ्फ़ाक आँखों वाला बेरहम क़ातिल , सारे किरदार उसकी आँखों के सामने…
ContinueAdded by saalim sheikh on July 22, 2015 at 2:00pm — 26 Comments
पीहर के आँगन छूटी उस मिट्टी का रंग पीला था
गाँव से संदेसा लायी उस चिट्ठी का रंग पीला था
जनक ने विदा किया दहेज़ का हर सामान देकर
पीठ पर निशान किये उस पट्टी का रंग पीला था
बहुत मन से बनाया साग नमक जियादा हो गया
थाली से जो फेंक मारी उस लिट्टी का रंग पीला था
गाँव बाहर पुल पर मजदूरी को भेजा घर वालों ने
तसले भरके जो ढोया उस गिट्टी का रंग पीला था
वंश बेल आगे करने को उनको इक बेटा जरूरी था
बेटी को मिला…
ContinueAdded by Nidhi Agrawal on July 22, 2015 at 11:30am — 8 Comments
Added by Rahul Dangi Panchal on July 22, 2015 at 7:48am — 18 Comments
ला रहा रवि पालकी
खोल कर आकाश के पट
चल पड़ा है सारथी
खिल रहीं मदहोश कलियाँ
ला रहा रवि पालकी
भोर में ममता लुटाती
स्वर सजीली रागिनी
आ विराजा श्याम कागा
चल सखी-री जाग-री
प्रात का मंचन अनोखा
रश्मियाँ— अप्लावतीं
तृप्त तारक चल पड़े
विश्रांति की आगोश में
चाँदनी मुख ढक चली
सब आ गए यूं होश में
मौन सपनों को सजाने
चल पड़े सब…
ContinueAdded by kalpna mishra bajpai on July 21, 2015 at 10:01pm — 14 Comments
"हम फलों से जरा लदे नहीं , हर राह चलता पत्थर फेंकना शुरू कर देता है । सिर्फ इसीलिए क्योंकि हम राह पर अनाथों के तरह फल-फूले हैं ।"
"हाँ भाई ! ठीक कहते हो । यदि हम भी किसी बाग़ की शोभा होते तो नाज़ों से पलते , ठाठ से रहते । पत्थर की कोई छुअन हम तक नहीं पहुँच पाती ।"
"अजीब विडम्बना है , परवरिश गुलशन में मिले तो कीमत लाखों की , सरे राह क्या जन्मे ,आँख का कांटा हो गए ।"
"हूँ...। गोया कि बाग़ से इतर हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं । "
युवा पेड़ों के वार्तालाप को सुन पास खड़ा बूढ़ा वृक्ष बोल…
Added by shashi bansal goyal on July 21, 2015 at 8:30pm — 10 Comments
कागज़, कलम, और स्याही स्वयं को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगे हुए थे। कोई भी एक दूसरे के सामने झुकने को तैयार नहीं था। उनका झगड़ा देखकर कवि चुप न सका:
"क्या तुम लोगों को इस बात का भी आभास है कि बिना मेरी उँगलियों के सहारे तुम सब अस्तित्व हीन हो ! "
"किस अस्तित्व की बात कर रहे हो कविवर? अगर मैं न रहूँ तो तुम अपनी भावनाओ को किस चीज़ पर उकेरोगे?" कागज ने चेताया।
"अगर में रोशनाई न बिखेरूं तो लोग कागज पर क्या ख़ाक पढ़ेंगे?" पीछे से स्याही की आवाज आई I
"मेरे बगैर तुम्हारी…
Added by Pankaj Joshi on July 21, 2015 at 5:00pm — 5 Comments
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