सड़क के बीचो –बीच नन्ही सी कोपल को पैर तले आते देख मनीष सिहर गया था .क्या करने जा रहा था .तपती धरा ,गर्म हवा ,पथरीली जमीन पर पसरा पिघला डामर,अंगुल बराबर हैसियत पर टक्कर इनसब से.सीना ताने उस हरीतिमा की जिजीविषा ने उसे हिम्मत से लबरेज कर दिया कि वह मजबूती से घर में सबसे बोल सके कि गर्भ में बेटी है तो क्या वह उसे पोषित करेगा .जिबह के लिए जाती बकरी सम उसकी पत्नी खिल गयी और कभी जुबान नहीं खोलने वाले बेटे के जुर्रत पर माता पिता थम गए .नेपथ्य में नन्हा अंकुर एक बड़े से फलदार पादप में…
ContinueAdded by Rita Gupta on June 15, 2015 at 5:55pm — 21 Comments
Added by somesh kumar on June 15, 2015 at 2:16pm — 13 Comments
बच्चा करीब छह महीने का हुआ था ,लेटे - लेटे इधर उधर देखता और रोने लगता। माँ - बाप उसे बहलाने की कोशिश करते पर वह चुप नहीं होता। परेशान माँ - बाप उसे डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने उसे देखा और कहा, बच्चा बिलकुल ठीक है , इसे स्वास्थ्य सम्बन्धी कोई समस्या नहीं है। पर बच्चा था कि शांत ही नहीं होता , जो खिलौना दिया जाता उसे फेंक देता, गुस्सा दिखाता और रोने रोने को हो जाता।
परेशान माँ - बाप उसे मनोवैज्ञानिक के पास ले गये. उसने परीक्षण किया, कहा बच्चा बिलकुल…
Added by Dr. Vijai Shanker on June 15, 2015 at 1:41pm — 22 Comments
स्याह धब्बा
ढलते सूरज-से रिश्ते की बुझती लालिमा
सिकुड़ती सिमटती जा रही
अनकही बातों के अरमानों की
अप्राकृतिक अकुलाहट
अपने ही कानों में भयानक
दुर्घटना-सी…
ContinueAdded by vijay nikore on June 15, 2015 at 8:41am — 24 Comments
" दिमाग ख़राब हो गया है इस लड़की का ", मम्मी बुरी तरह परेशान थीं । इतना अच्छा घर और वर था फिर भी मना कर दिया । अपने आप को कोस रही थीं कि क्यों सब बता दिया उसको ।
" आपको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता , इतने अस्पृह कैसे रह सकते हैं आप लोग "।
" अरे , घर में कौन काम करता है , इसमें तुम्हे क्या दिक़्क़त है "।
" माँ , जो इंसान अपने घर में एक बच्चे के काम करने पर इतना संवेदनहीन हो सकता है , वो मेरे प्रति संवेदनशील रह पायेगा "?
मौलिक एवम अप्रकाशित
Added by विनय कुमार on June 15, 2015 at 2:39am — 18 Comments
एक गज़ल,,,,
===========================
वज़्न = २१२२ २१२२ २१२२ २१२
फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलातुन,फ़ाइलुन
===========================
सूख जातॆ फ़ूल पत्तॆ शाख़ भी हिलती नहीं !!
क्यूँ ग़रीबी कॆ बगीचॆ मॆं कली खिलती नहीं !!(१)
बॆटियॊं का बाप हूँ दिल जानता है सच सुनों,
आज कॆ इस दौर मॆं बॆटी सहज पलती नहीं !!(२)
बात करतॆ हॊ यहाँ अच्छॆ दिनॊं की खूब तुम,
तीरग़ी सॆ है भरी यॆ रात क्यूँ ढलती नहीं !!(३)
दॆख लॊ मुझकॊ…
Added by कवि - राज बुन्दॆली on June 15, 2015 at 12:16am — 12 Comments
हजज मुरब्बा सालिम
1222 1222
खुदा से जो भी डरता है
खुदा को याद करता है
समय है जानवर ऐसा
जरा धीरे से चरता है
कृषक की छातियाँ देखो
पसीना नित्य झरता है
बिछे जब राह में काँटे
पथिक पग सोंच धरत़ा है
भला है जानवर उससे
उदर जो आप भरता…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 14, 2015 at 9:00pm — 20 Comments
वो पत्थर था , बहुत थे फेंकने वाले
बन गए हीरे पर , उसे तराशने वाले
कब समझा है कोई वक़्त का इशारा
बन गए हैं ख़ुदा , उसे समझने वाले
ख्वाहिशें तो रखते है ज़माने में सब
और ही होते हैं ,उन्हें पूरा करने वाले
ग़ुम है बदगुमानी में ,ये सारी दुनिया
मिलते हैं कहाँ ,अब सच लिखने वाले
तलाश थी सिर्फ , एक फूल की विनय
हज़ार मिले राह में, कांटे रखने वाले !!
मौलिक एवम अप्रकाशित
Added by विनय कुमार on June 14, 2015 at 4:00pm — 16 Comments
उम्र
‘आप मुझे जानते हैं ?’
‘आप ही बता दें’।
‘फ्रेंड– रेकुएस्ट तो आपका था न?’
‘हाँ, एक दोस्त के साथ आपका नाम था’।
‘दोस्त का नाम बताइये’।
‘था कुछ नाम जी’।
‘अच्छा चलिये, अपने ही बारे में बता दीजिये’। उधर से महिला ने संदेश भेजा ।
‘ मेरे बारे में तो मेरे प्रोफ़ाइल में है सब कुछ’।
‘कहाँ रहते हैं?’
‘आप बताइये’।
‘मैं तो जट मारवाड़ से हूँ, आप ?’
‘कोल्हापुर से जी’।
‘पर, आप बावन के हैं , मैं तो बस…
ContinueAdded by Manan Kumar singh on June 14, 2015 at 12:30pm — 1 Comment
Added by Samar kabeer on June 14, 2015 at 10:57am — 32 Comments
१२२ १२२ १२२ १२
मिला कीमती वक़्त जाया न कर
बुरी बात होंठों पे लाया न कर
बड़ी जितनी चादर उसी में सिमट
तू ये नाज़ नखरे दिखाया न कर
कभी वो तेरा हाथ देंगे मरोड़
किसी को तू ऊँगली दिखाया न कर
अदब से कहेगा सुनेंगे सभी
सुलगती जुबाँ से सुनाया न कर
तवा गर्म है सब्र से काम ले
इन हाथों को अपने जलाया न कर
सही है अगर तू दिखा तो सबूत
हवा में यूँ तोते उड़ाया न…
ContinueAdded by rajesh kumari on June 14, 2015 at 9:40am — 30 Comments
122 122 122 122
जो कहते थे उनको इशारा बहुत है
वो सुनते नहीं कुछ , पुकारा बहुत है
ऐ तन्हाई आ मेरी जानिब चली आ
कि यादों को तेरा सहारा बहुत है
तबीयत से इक फूँक भारो तो यारों
जलाने को दुनिया, शरारा बहुत है
ये मजहब का ठेका हटा लो यहाँ से …
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on June 14, 2015 at 7:30am — 28 Comments
जिज्ञासा
प्रश्न?
केवल प्रश्नों के घेरे में
छटपटाता जीवन,
चीर दिया आकाश
फिर भी चंचल था यह मन
वह था मेरा प्यारा बचपन ;
हाईफन –
यौवन का हाईफन लाया
तटस्थ जीवन
क्या किसीसे हो पाया
कोई सेतु बंधन !
व्यर्थ,
व्यर्थ ही कुछ क्रंदन ;
अल्पविराम ,
प्रौढ़त्व के अल्पविराम पर
टिका हुआ है जीवन
इच्छाओं के जंगल से निकलकर
जान पाया मन
जीवन है एक उपवन ;
अंत में,
पूर्णविराम के साथ
हे मेरे…
Added by sharadindu mukerji on June 14, 2015 at 4:52am — 14 Comments
Added by Manan Kumar singh on June 13, 2015 at 11:00pm — 1 Comment
पत्थर-दिल पूँजी
के दिल पर
मार हथौड़ा
टूटे पत्थर
कितनी सारी धरती पर
इसका जायज़ नाजायज़ कब्ज़ा
विषधर इसके नीचे पलते
किन्तु न उगने देता सब्ज़ा
अगर टूट जाता टुकड़ों में
बन जाते
मज़लूमों के घर
मौसम अच्छा हो कि बुरा हो
इस पर कोई फ़र्क न पड़ता
चोटी पर हो या खाई में
आसानी से नहीं उखड़ता
उखड़ गया तो
कितने ही मर जाते
इसकी ज़द में आकर
छूट मिली…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 13, 2015 at 4:15pm — 12 Comments
" बहुत गुमान था तुमको सृजन पर , देखो मेरी ताक़त ", विनाश इतरा रहा था । पूरा इलाका तबाह हो गया था , दूर दूर तक कहीं जीवन का कोई नामोनिशान नज़र नहीं आ रहा था ।
लेकिन श्रृष्टि अभी भी मुस्कुरा रही थी " तुमने शायद पीछे मुड़ कर नहीं देखा "।
विनाश ने पलट कर देखा , उसका दर्प चूर चूर हो गया ।
एक नन्हीं सी कोंपल सृजन की विजय पताका फहरा रही थी , जीवन पुनः जीत गया था ।
मौलिक एवम अप्रकाशित
Added by विनय कुमार on June 13, 2015 at 1:38pm — 20 Comments
1.
थोड़ा सा झूठा हूँ ....
थोड़ा सा झूठा हूँ थोड़ा सा सच्चा हूँ
थोड़ा सा बुरा हूँ थोड़ा सा अच्छा हूँ
भुला देना दिल से मेरी गल्तियों को
दिल से तो यारो मैं थोड़ा सा बच्चा हूँ
सुशील सरना
......................................................
2.
तेरे अल्फ़ाज़ों से....
तेरे अल्फ़ाज़ों से हसीन जज़्बात बयाँ होते हैं
तेरे ख़तूत में कुछ बीते लम्हात निहाँ होते हैं
हर शब तेरे जिस्म की बू से लबरेज़ होती है
हर ख़्वाब में बस तेरे…
Added by Sushil Sarna on June 13, 2015 at 1:30pm — 4 Comments
"खुदा का कहर तो खुदा का ही है पर ये सब तो हमने किया। टूटे हुए आशियाने, स्याह काले रंगों में बदलती हरियाली और उपजाऊ जमीन को बंजर करती बारूदी तबाही। आखिर दहशतगर्दी को ख़त्म करने के लिए क्या यही एक रास्ता था?" अपनी 'कमांडरशिप' में किये 'आपरेशन' के बाद इलाके को एक नज़र देखते हुए वो सोच रहा था।
इस वीरान धरती को देख, इस खेल में खुद की हिस्सेदारी के लिए, बतौर इनाम लगे तमगे भी अब उसे चुबने लगे थे। मन का बोझ जब खुद का भार सहने में नाकाम हो गया तो अश्को के रस्ते बह निकला। फलक की और देखता हुआ वो कह…
Added by VIRENDER VEER MEHTA on June 13, 2015 at 1:01pm — 9 Comments
2122 2122 2122 212
जिंदगी से जो चली अपनी ढ़िठाई दोस्तों
खाक में ही उम्र सारी यूँ बिताई दोस्तों
अम्न की वंशी बजाई और गाये गीत भी
नफरतों की होलिका हमने जलाई दोस्तों
जब कभी दुश्वारियाँ आयी हमारी राह में
एक माँ की ही दुआ फिर काम आई दोस्तों
दोस्ती है एक नेमत टूटना अच्छा नहीं
साथ चलने में कहाँ कोई बुराई दोस्तों
हो भला सबका यहाँ मेरी दुआ है बस यही
ना करें कोई भी मज़हब की लड़ाई…
ContinueAdded by MAHIMA SHREE on June 13, 2015 at 12:00pm — 13 Comments
Added by गिरिराज भंडारी on June 13, 2015 at 9:00am — 28 Comments
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