Added by vijay on January 26, 2015 at 10:53pm — 12 Comments
२१२ २१२ २१२
वो वफ़ा जानता ही नहीं
इस खता की सजा ही नहीं
फिर वही रोज जीने की जिद
जीस्त का पर पता ही नहीं
शहर है पागलों से भरा
इक दिवाना दिखा ही नहीं
पूजता हूँ तुझे इस तरह
गो जहां में खुदा ही नहीं
खा गए थे सड़क हादसे
सारे घर को पता ही नहीं
मौलिक व अप्रकाशित
गुमनाम पिथौरागढ़ी
Added by gumnaam pithoragarhi on January 26, 2015 at 8:30pm — 20 Comments
अराजक(लघुकथा )
“ अरे !भाई ये रिजर्व कैबिन है ,टिकट वालों का कैबिन पीछे है,वहीं जाओ |”-परेड देखने आए युवक को पुलिस वाले ने समझाते हुए कहा
“ यहाँ की टिकट कैसे मिलेगी ?क्या ज़्यादा पैसे लगते हैं ?”
“ क्या तेरा कोई जान-पहचान वाला मिनिस्टर है या मिनिस्ट्री का कोई अफसर |”पुलिस वाला व्यंग्य में मुस्कुराया
“नहीं!”वो मायूस हो गया
“ तो भाई पीछे जा या घर जाकर टीवी पर देख |”-पुलिस वाला खिसियाते हुए बोला
“ पर !”उसने उसकी बात काटते हुए कहा
“…
ContinueAdded by somesh kumar on January 26, 2015 at 6:30pm — 9 Comments
किरणें चित्र उकेरें अँगना, है प्रीत तेरी हमें बांधन निकली
धरती का मैं लहंगा सिला लूँ, हरियाली की पहनूं चोली
अम्बर की बन जाए ओढ़नी, देखूं फिर नववर्ष रंगोली
तारों की मैं माला गूंथुं, चाँद बने बिंदिया की रोली
बने चांदनी मेरी मेहँदी, सज जाए मेरी भी हथेली
नेह झड़ी की आस लगाए, सुलगी जाए मरी दूब हठीली
सूरज को मैं बांधू राखी, फिर घोलूं किरणों की शोखी
बन जाए मेरा भाई सूरज, सज जाए मेरी भी डोली.....
केसर रंग में मांग सजाऊं, देख घटा की अलक…
ContinueAdded by sunita dohare on January 26, 2015 at 2:30pm — 14 Comments
थकन से चूर होकर , गिरे तो सो गये हम
जो चलते चलते गाफ़िल , हुये तो सो गये हम
हमारी भूख का क्या , हमारी प्यास का क्या
ये अहसासात दिल में , जगे तो सो गये हम
शनासा भी न कोई , तो अपना भी न कोई
अकेले थे अकेले , रहे तो सो गये हम
हमारी नींद सपने , सजाती ही नहीं है
हक़ीक़त से जहाँ की , डरे तो सो गये हम
मनाओ शुक्र तुम हो , गमों से दूर साथी
हमें तुम मुस्कुराते , मिले तो सो गये हम
हमारा दर्द…
ContinueAdded by khursheed khairadi on January 26, 2015 at 2:00pm — 22 Comments
“अरे यार ओबामा साहब के रास्ते में कुत्ता आ गया, सुरक्षा व्यवस्था में भयंकर चूक हो गयी, अगर उसमें बम लगा होता तो?”
“कुछ नहीं यार “भारतीय कुत्ता” था, जान दे देता पर ओबामा साहब को कुछ नहीं होने देता, यार देश की इज्ज़त का सवाल था आखिर ।" जय हिन्द !
हरि प्रकाश दुबे
"मौलिक व अप्रकाशित
Added by Hari Prakash Dubey on January 26, 2015 at 1:00pm — 29 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on January 26, 2015 at 11:10am — 19 Comments
रूपमाला छंद पर एक छोटा सा प्रयास
हैं अचल पर चल रही हैं, पटरियाँ पुरजोर
दौड़ती हैं साथ महि के, ये क्षितिज की ओर
अनवरत चलना यही तो, जिन्दगी का नाम
दो कदम के बीच ही बस, है इन्हें आराम
(मौलिक व अप्रकाशित)
Added by शिज्जु "शकूर" on January 26, 2015 at 8:30am — 8 Comments
संघर्ष,
कहीं भी हो ,
कैसा भी हो,
होता, बहुत बुरा है ,
बहुत तड़पाता है,
काटता है ,
दुधारा छुरा है !
लेकिन,
संघर्ष न हो ,
तो सूख जाता है ,
मन का चमन ,
हर हाल में,हरा रखे ,
आदमी को,
संघर्ष वो सुरा है !
डरता,
जो पीने से ,
संघर्ष के,
छलकते हुए पैमाने ,
उस आदमी का जीवन,
बड़ा बेरंग,
बड़ा बेसुरा है !
लड़ता ,
हर आदमी…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on January 26, 2015 at 2:00am — 12 Comments
वो अलसाया-सा इक दिन
बस अलसाया होता तो कितना अच्छा
जिसकी
थकी-थकी सी संध्या
जो गिरती औंधी-औंधी सी
रक्ताभ हुआ सारा मौसम
ऐसा क्यों है.....
बोलो पंछी?
ऐसा मौसम,
ऐसा आलम
लाल रोष से बादल जिसके
और
पिघलता ह्रदय रात का
अपना भोंडा सिर फैलाकर अन्धकार पागल-सा फिरता
हर एक पहर के
कान खड़े है
सन्नाटे का शोर सुन रहे
ख़ामोशी के होंठ कांपते
कुछ कहने को फूटे कैसे…
ContinueAdded by मिथिलेश वामनकर on January 26, 2015 at 12:30am — 32 Comments
बडा मंदिर न मस्जिद , न कोई गिरजा शिवाला है
न कोई अर्चना , पूजा बडी , अरदास , माला है
वतन सबसे बडा मंदिर , वतन सबसे बडी पूजा
है ईश्वर तुल्य वो , जो अपने वतन पर मरने वाला है ।
जो सच की पैरवी और झूठ का प्रतिकार करता है ,
मोहब्बत हो जिसे इंसानियत से और एतबार करता है
जरूरी है नहीं हर शख्स सरहद पर लडे जाकर ,
वही सच्चा सिपाही है , जो वतन से प्यार से करता है ।
न कोई आरजू , ख्वाहि श , न कोई शर्त रखते हैं ।
न बोझा कोई सीने पर , न सर पे कर्ज…
Added by ajay sharma on January 25, 2015 at 11:01pm — 9 Comments
आसमान में उगता सूरज, जलता सूरज तपता सूरज
बदरियों की बगियाँ में, लुका-छिपी करता सूरज
सांझ सकारे किसी किनारे, धीरे धीरे ढलता सूरज
मैं भी तो इस सूरज सा, चढ़ा कभी कभी ढ़ल गया हूँ
जाने क्यों कहते हैं लोग, की मैं बदल गया हूँ!…
ContinueAdded by Ranveer Pratap Singh on January 25, 2015 at 10:00pm — 6 Comments
यह बचपन ,बचपन मैं जवान हो गया
जानता नहीं बचपन ,बचपन क्या चीज है
नहीं जानता है यह हंसना -खेलना
नहीं जानता यह रूठना मनाना,
जानता नहीं यह माँ बाप का प्यार
सीखा नहीं क्या होता है बचपन का दुलार
नहीं सीखा इसने पढ़ना लिखना ,
हाँ सीख लिया है जिंदगी को पढ़ना
जानता हैं चौबीसों घंटे मेहनत करना
रोटी कपडा मिलता है इसे इनाम
यह बचपन,बचपन मैं जवान हो गया
अब यह जवान हो गया है
जवान होते होते जिसने अपनी जवानी ,
बचपन मैं…
ContinueAdded by Shyam Mathpal on January 25, 2015 at 9:05pm — 7 Comments
रात में फुटपाथ पर इक बेबसी रोती रही,
लोग तो जागे मगर संवेदना सोती रही,
शाम होते ही जमीं पर तीरगी छाने लगी,
आसमानों में सुबह तक रोशनी होती रही,
याद की चादर वो अपने आंसुओं की धार से,
दर्द की कालिख मिटाने के लिए धोती रही,
किसलिए इतनी मशक्कत, जब उसे पीना नहीं
शहद मधुमक्खी न जाने किसलिए ढोती रही
ऐ खुदा तेरी खुदाई का सबब ये भी मिला,
मौत ने काटी फसल और जिंदगी बोती रही।।
.
(अतुल)
मौलिक व…
Added by atul kushwah on January 25, 2015 at 7:30pm — 23 Comments
Added by Samar kabeer on January 25, 2015 at 6:12pm — 19 Comments
परिवर्तन
*******
बून्द की नाराजगी का संज्ञान
सागर ले ही
ज़रूरी नहीं
फिर भी नाराजगी बून्द की अपनी स्वतंत्रता है
प्रकृति प्रदत्त
संज्ञान अगर सागर ले भी ले तो
खुद में कोई परिवर्तन भी करे ये नितांत ज़रूरी नहीं
वैसे हर नाराजगी कोई परिर्वतन ही चाहती हो किसी में
ये भी ज़रूरी नहीं
कुछ नाराजगी व्यवहारिक खानापूर्तियाँ भी होतीं है
कुछ स्वांतः सुखाय
अपने ज़िन्दा होने के सबूत के…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on January 25, 2015 at 10:00am — 25 Comments
‘अजी सुनते हो ---
‘हाँ सुनाओ, ‘
‘वह मिसेज मल्होत्रा की बहू, जिसके फरवरी में बेटा हुआ था I वह बेटा निमोनिया से मर गया और हमारी जो महरिन है इसकी ननद के भी लल्ला हुआ था, वह भी तीन दिन पहले डायरिया से मर गया और अपनी बेटी की सहेली -----‘
‘--- उसका बच्चा भी मर गया होगा I’
‘हां बिलकुल ---- ‘
‘मगर यह स्टैटिक्स तुम मुझे क्यों बता रही हो ?’
‘किसे बताऊँ, एक वह अपनी पोती है I छह महीने की हो गयी, उसे जुकाम तक न हुआ I’
(मौलिक व् अप्रकाशित…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 24, 2015 at 9:10pm — 32 Comments
"अरे!! तुम्हारे जैसे गरीब अनाथ के झोपड़े में महात्मा गाँधी की तस्वीर...”
“हाँ! साहब, अभी कुछ दिन पहले ही लोगों ने चौराहे पर इस तस्वीर को लगाकर.. मालायें पहनाई, खूब जोर-शोर से भाषण-बाजी की. फिर इसे सब, वहीं छोड़कर चले गये.. ये वहां बे-सहारा थे, तो इन्हें अपने घर ले आया...”
जितेन्द्र पस्टारिया
(मौलिक व् अप्रकाशित)
Added by जितेन्द्र पस्टारिया on January 24, 2015 at 7:33pm — 22 Comments
Added by Rahul Dangi Panchal on January 24, 2015 at 6:26pm — 25 Comments
विकट विरल है राह कठिन कदम कदम कुहासा है
खड़ा मुसाफिर मुश्किल में वो बेबस बहुत रूआंसा है
संयम और सहजता से निरंतर नित निज काम करो
शनै शनै पुरजोर प्रयासों से प्रज्ज्वलित इक आशा है
संकल्पों के यज्ञकुंड में श्रमनीर का अर्घ्य दान करो
दिनकर दिलबर रश्क करे जिन्दगी की यह परिभाषा है
अरमानों के बीज रोप कर सींचो रोज पसीने से
छ्टे कुहासे साफ़ डगर स्फुटन अंकुर की अभिलाषा है
@आनंद ०७/०१/२०१५ "मौलिक व…
ContinueAdded by anand murthy on January 24, 2015 at 1:30pm — 9 Comments
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