तूने व्यर्थ नयन छलकाये हैं…
राही प्रेम पगडंडी पर
क्योँ तूने कदम बढाये हैं
हर कदम पर देते धोखे
छलिया हुस्न के साये हैं
तेरे निश्छल भाव को समझें
किसके पास ये फुर्सत है
पल भर में ये अपने हैं
अगले ही पल पराये हैं
व्यर्थ है बादल भटकन तेरी
प्रेम विहीन ये मरुस्थल है
तुझे पुकारें तुझसे लिपटें
कहाँ वो व्याकुल बाहें हैं
हर और लगा बाजार यहाँ
हर और मुस्कानों के मेले हैं
छद्म वेश में करती घायल
बे-बाण यहाँ…
Added by Sushil Sarna on January 24, 2015 at 12:30pm — 20 Comments
रात के ९ बजे थे |खाना खाकर विनीत बिस्तर पर लेट गया और radio-mirchi on कर दिया- “चूड़ी मजा ना देगी,/कंगन मजा ना/देगा, तेरे बगैर साजन /सावन मजा ना देगा"
तभी खिलखिलाती हुई मुग्धा ने कमरे में घुसकर ध्यान भंग किया –“ चाचा-चाचा, अदिति दीदी कुछ कहना चाहती है
“ हाँ बेटा बोल ,” विनीत ने कहा |
“ चाचा मुझे चाची के चूड़ीदान से कुछ रंग-बिरंगी चूड़ियाँ लेनी है वो सहमते हुए बोली |”
विनीत ने अदिति को देखा, एकबार आलमारी की तरफ देखा जहाँ निम्मा का चुड़ीदान रखा था | कुछ देर चुप…
ContinueAdded by somesh kumar on January 24, 2015 at 11:30am — 14 Comments
" वाह !! बहुत खूब रितेश गुप्ता , तुमने संस्था का नाम ऊँचा किया है । हम सबको तुम पर गर्व है । " पीठ थपथपाकर मोहित सर ने जब शाबाशी दी तो रितेश दर्प से भर उठा ।
" सर , सब आपके मार्ग दर्शन का ही नतीजा है । "
" फिर तो मुझे गुरू दक्षिणा भी मिलना चाहिए तुम से । " मोहित सर की बाँछे खिल उठी ।
" क्या बात करते है सर ...? लाखों रूपयों की फीस के बाद अब यह गुरू दक्षिणा भी ___ ...? "
कान्ता राॅय
भोपाल
मौलिक और अप्रकाशित
Added by kanta roy on January 24, 2015 at 8:00am — 14 Comments
Added by Anurag Singh "rishi" on January 24, 2015 at 12:30am — 8 Comments
2122 1212 22
झूठ ही बन गया है आँचल क्या
धूप लगने लगी है अफ़्ज़ल क्या (अफ़्ज़ल –भला)
अक्ल की बंद खिड़कियाँ खोलो
टाट लगने लगा है मखमल क्या
जो मुहब्बत दिखा रहे हो आज
दिल में कायम रहेगा ये कल क्या
किस्से कुछ और थे हकीकत और
ये रवायात बदलीं पल-पल क्या
छटपटाहट सी क्यूँ है चेहरे पर
मच उठी दिल में कोई हलचल क्या
फर्ज़ अपना भुला दिया…
ContinueAdded by शिज्जु "शकूर" on January 23, 2015 at 10:16pm — 14 Comments
चादर झीनी देख कबीरा
मैली ओढ़ी देख कबीरा
जीना मरना सब साथ चले
काया साझी देख कबीरा
ईश भगत का रिश्ता ऐसा
भूखा रोटी देख कबीरा
ऊँच नीच का अंतर कैसा
काया माटी देख कबीरा
यम इक राजा मिलना चाहे
आत्मा रानी देख कबीरा
मौलिक व अप्रकाशित
गुमनाम पिथौरागढ़ी
आपके सुझाओं व समालोचना की प्रतीक्षा में ......
Added by gumnaam pithoragarhi on January 23, 2015 at 7:29pm — 14 Comments
ठण्ड भयानक पड़ने लगी थी और विभिन्न समाजसेवी संस्थाएं रोज लोगों से अपील कर रही थीं कि सड़क के किनारे रह रहे लोगों को गर्म वस्त्र दान करें | सड़क पर तमाम न्यूज़ चैनल की गाड़ियां घूम रही थीं और इन कार्यक्रमों को दिखा रही थीं |
उस मोहल्ले के आखीर में भी एक भिखारी सड़क पर पड़ा हुआ था | कुछ लोगों ने उसे ऊनी कम्बल इत्यादि दान किये और ये भी उन चैनल्स ने कैमरों में कैद किया लेकिन उसकी हल्की बुदबुदाहट पर किसी ने ध्यान नहीं दिया |
सुबह वो भिखारी मरा पड़ा था | लोग खाने के लिए देना भूल गए थे…
Added by विनय कुमार on January 23, 2015 at 6:00pm — 22 Comments
"आज की प्रलय"
कोहरे का कहर सांझ घिरने के साथ साथ बढ़ता जा रहा था, गंगाजी से उठती ठंडी हवा शरीर को छूरी की तरह काट रही थी। विश्वा को लगने लगा था कि आज की रात रेतीली जमीन पर बिछे चिथड़े भी उसको इस प्रलय से नही बचा पायगें। मानवीय आस तो बाकी थी नही सो विश्वा अपने ईष्ठ देव को ही बार बार याद करने लगा।
"भाई ये बहुत अच्छा हुआ जो सुरज ढलने से पहले संस्कार हो गया ।"
"सही कहा भैयाजी नही तो सारी रात ठंडी में गंगा किनारे ही बितानी पड़ती।"
सामने से गुजरते कुछ लोगो की आवाजे सुनकर…
Added by VIRENDER VEER MEHTA on January 23, 2015 at 4:30pm — 10 Comments
प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो ....
तुम ही आदि हो तुम ही अनन्त हो
प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो
नयन आँगन का तुम मधुमास हो
रक्ताभ अधरों की तुम ही प्यास हो
तुम ही सुधि हो मेरे मधु क्षणों की
मेरे एकांत का तुम ही अवसाद हो
नयन पनघट का मिलन पंथ हो
तुम ही आदि हो तुम ही अनन्त हो
प्रिय ! इस जीवन का तुम बसंत हो
इस जीवन की तुम हो परिभाषा
मिलन- ऋतु की तुम अभिलाषा
भ्रमर आसक्ति का मधु पुष्प हो…
Added by Sushil Sarna on January 23, 2015 at 1:06pm — 19 Comments
2122 1221 2212
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रूह प्यासी बहुत घट ये आधा न दो
आज ला के निकट कल का वादा न दो
रूख से जुल्फें हटा चाँदनी रात में
चाँद को आह भरने का मौका न दो
फिर दिखा टूटता नभ में तारा कोई
भोर तक ही चले ऐसी आशा न दो
प्यार के नाम पर खेल कर देह से
रोज मासूम सपनों को धोखा न दो
सात फेरों की रस्में निभाओ मगर
देह तक ही टिके ऐसा रिश्ता न दो
चाहिए अब …
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 23, 2015 at 11:00am — 10 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on January 23, 2015 at 10:42am — 15 Comments
धर्म के प्रति प्रगाढ़ आस्था के कारण ही सुधा आज घर द्वार सब त्याग गुरू आश्रम चली आई ।
"सुना है गुरूदेव आज रात खास आयोजन करने वाले है । जाने आज किसका भाग्योदय होने वाला है? " आश्रम में सुगबुगाहटें जारी थी ।
लगभग १२ बजे सभा गृह में सब गुरू सेविकायें उपस्थित थी कि सहसा गुरूदेव का आगमन हुआ । पीताम्बर धारण किये हुए, सिर पर मोर मुकुट सजाये हुए आज गुरूदेव कृष्ण रूप में रास के लिए राधा का चयन करने वाले थे ।
कृष्ण रूपी गुरूदेव जब सुधा के सामने ठिठके तो उसका हृदय रो उठा…
Added by kanta roy on January 23, 2015 at 8:30am — 26 Comments
हिम्मत साथ नहीं देती है
किसको अपना दर्द बतायें कौन सुनेगा अपनी बात
सुनने वाले व्याकुल हैं अब अपना राग सुनाने को
हिम्मत साथ नहीं देती है खुद के अंदर झाँक सके
सबने खूब बहाने सोचे मंदिर मस्जिद जाने को
कैसी रीति बनायी मौला चादर पे चादर चढ़ती है
द्वार तुम्हारे खड़ा है बंदा , नंगा बदन जड़ाने को
दूध कहाँ से पायेंगें जो, पीने को पानी न मिलता
भक्ति की ये कैसी शक्ति पत्थर चला नहाने को
जिसे देखिये मिलता है अब चेहरे पर मुस्कान लिए…
Added by Madan Mohan saxena on January 22, 2015 at 5:00pm — 5 Comments
सांस है मुसाफिर.......(एक रचना )
सांस है मुसाफिर इसको राह में ठहर जाना है
जिस्म के पैराहन को जल के बिखर जाना है
दुनिया को मयखाना समझ नशे में ज़िंदा रहे
होश आया तो समझे कि ख़ुदा के घर जाना है
याद किसकी सो गयी बन के अश्क आँख में
धड़कनें समझी न ये जिस्म को मर जाना है
ज़िंदगी समझे जिसे दरहक़ीक़त वो ख़्वाब थी
सहर होते ही जिसे बस रेत सा बिखर जाना है
कतरा-कतरा प्यार में जिस के हम मरते रहे …
Added by Sushil Sarna on January 22, 2015 at 3:30pm — 18 Comments
22 22 22 22 22 2
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दर-दर फिरते लोगों को दर दे मौला :
बंजारों को भी अपना घर दे मौला :
जोऔरों की खुशियों में खुश होते हैं :
उनका भी घर खुशियों से भर दे मौला :
दूर गगन में उड़ना चाहूँ चिड़ियों सा :
मुझ को भी वो ताक़त वो पर दे मौला :
ज़ुल्मो सितम हो ख़त्म न हो दहशतगर्दी :
अम्नो अमां की यूं बारिश कर दे मौला :
भूके प्यासे मुफ़लिस और यतीम हैं जो :
नज़्र-ए-इनायत उनपर भी कर दे मौला :
जो करते हैं खून…
Added by SALIM RAZA REWA on January 22, 2015 at 2:00pm — 10 Comments
फिर आधी रात को उनकी आँख खुल गयी , पसीने से तरबतर वो बिस्तर से उठे और गटागट एक लोटा पानी हलक में उड़ेल दिया | ये सपना उन्हें पिछले कई सालों से परेशान कर रहा था | अक्सर वो देखते कि एक हाँथ उनकी ओर बढ़ रहा है और जैसे ही वह उनके गर्दन के पास पहुँचता , घबराहट में उनकी नींद खुल जाती |
अब वो जिंदगी के आखिरी पड़ाव में थे और अब खाली समय था उनके पास | रिटायरमेंट के बाद वो और पत्नी ही रहते थे घर में , बच्चे अपने अपने जगह व्यस्त थे | पत्नी भी परेशान रहती थी उनकी इस हालत से और कई बार पूछती थी कि क्यों…
Added by विनय कुमार on January 22, 2015 at 12:12pm — 14 Comments
चुनावी जिन्न(कविता )
जांचे परखें और चुनें
चलों नया देश बुनें
रूढ़ परिपाटी हों छिन्न
सच्च हों ,अच्छे दिन |
ये भाषण का व्यवहार
और सतरंगी इश्तिहार
कायाकल्प हो सर्वांगीण
ना केवल चाय नमकीन |
बंद तोड़फोड़ और धरने
सियासी नफ़ा आमजन मरने
पहुंच जाएँगे बुलंदी पर
चटाकर हमें जमीन |
झाड़ू हाथी कमल हाथ
क्रांति जाति धर्म सब-साथ
एक थैली के ही चट्टे-बट्टे
देखों ना इन्हें भिन्न |
अज़ीब-अज़ीब…
ContinueAdded by somesh kumar on January 22, 2015 at 10:30am — 8 Comments
१२२२ १२२२ १२२२ २
कभी फुर्सत मिले तो सोच हारा कैसे
बिना तैरे मिले किसको किनारा कैसे
जहाँ लगती दिलों की भी बराबर कीमत
वहाँ पैसों बिना भी हो गुज़ारा कैसे
जिसे भाने लगे कबसे रकीबों के घर
भला दिल से कहें उसको हमारा कैसे
मुहब्बत की जहाँ रिमझिम फुहारें गिरती
सुलग उट्ठा वहाँ अदना शरारा कैसे
जहाँ मासूम लाशें हर तरफ फैली थी
डरी आँखों ने देखा वो नज़ारा कैसे
नहीं मिलती…
ContinueAdded by rajesh kumari on January 22, 2015 at 10:25am — 17 Comments
Added by विनोद खनगवाल on January 22, 2015 at 10:00am — 12 Comments
मै कभी नहीं मरता
******************
आप बच नहीं सकते
उलझने से
ऐसा इंतिज़ाम है मेरा
फैला दिया है मैने मेरा अहंकार हर दिशाओं मे
हर दिशाओं के हर कोणों में
बस मैं हूँ , मैं
कहीं भी जायें, उलझेंगे ज़रूर
जब भी कोई उलझता है , मेरे मैं से
चोटिल करता उसे
तत्काल मुझे ख़बर लग जाती है , और तब
मुझे खड़ा पाओगे तुम उसी क्षण
अपने विरुद्ध
तमाम हथियारों से सुसज्जित
ये भी तय है ,
हरा…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on January 22, 2015 at 9:30am — 18 Comments
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