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सपनों का सच--डा० विजय शंकर

यूँ तो सपनों का सच से

कोई वास्ता नहीं होता है |

सच सामने से

ज्यों ज्यों गुजरने लगता है ,

सपनों से डर लगने लगता है ॥

सपने जब टूटने लगते हैं ,

सच से डर लगने लगता है ॥

फिर भी कोई सपने देखना

छोड़ नहीं पाता है ।

रोज सपनों के सच होने के

सपने सजाता है ॥

सपने एक आशा हैं ,

एक उम्मीद हैं ,

कुछ पाने की , कुछ होने की

किसी चिर प्रतीक्षित

अभिलाषा के पूरी होने की |

क्योंकि यही तो जीवन है ,

यही तो जीवन का सच है… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on September 18, 2014 at 10:21am — 10 Comments

ग़ज़ल- दर्द जब पत्थर को सुनाता था......सूबे सिंह सुजान

 दर्द पत्थर को जब सुनाता था

मुझको पत्थर और आजमाता था।

बोलना,उसके सामने जाकर,

मैं तो अन्दर से काँप जाता था

वो समझता न था,मेरे अहसास,

मैं तो मिट्टी पे लेट जाता था

इतनी पूजा की विधि थी उसके पास,

हर किसी को वो लूट जाता था

आज मालूम हो गया मुझको,

एक पुतला मुझे डराता था।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सूबे सिंह सुजान on September 18, 2014 at 9:55am — 5 Comments

गीत 'लो बरखा फिर आई'

गीत

-लो बरखा फिर आई-



बादल की झोली में भरकर

बिखराती जल लाई।

सुप्त प्राण में प्राण सींचने

लो बरखा फिर आई।



सूखे विटप तृप्त तन्मय अब

करते झुक अभिनन्दन।

झूम झूम उत्साहित हों ज्यों

गीत गा रहे वन्दन।

उष्ण अनल से तपे ग्रीष्म की

अब तो हुई बिदाई।...सुप्त प्राण....



तप्त दिवाकर ने झुलसाया

वन उपवन सब सूखे।

दरक रहा धरती का सीना

बिन तृण के सब भूखे।

मदमाते रिमझिम सावन ने

जग की पीर मिटाई।...सुप्त प्राण…

Continue

Added by seemahari sharma on September 18, 2014 at 9:00am — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
प्रार्थना

प्रार्थना

जब सांझ ढलने लगेगी,

जब दिन का कोलाहल

थक कर किसी कोने में

दुबक कर बैठ जाएगा –

तुम्हारे स्पर्श का सिहरन लिए

धीरे-धीरे

आकाश का सभागार

तारों के दीपक से प्रफुल्लित हो उठेगा,

जागृत हो उठेंगी चेतनाएँ

सजीव होने लगेंगे हृदय के तंतु –

नीरवता के उस महाधिवेशन में

अपने अहंकार,

अपने गौरव की सच्ची-झूठी कहानियाँ,

अपनी अदम्य इच्छाओं की दबी आवाज़,

अपने टूटे सपनों का आर्त चीत्कार

और अचानक, लगभग कुछ…

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Added by sharadindu mukerji on September 18, 2014 at 1:00am — 2 Comments

ख़्वाबों की बातें । (गीत)

ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!

फिर  शब-ए-तन्हाई  में,  रोया  करते  हैं  वो..!

शब-ए-तन्हाई= रात का अकेलापन;

ज़िंदगी  में कई  हादसे, आप ने  झेले  मगर..!

टूटे ख़्वाबों का  शिकवा  किया  करते  हैं  वो..!

ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!

शिकवा=शिकायत,

बिखरा सा  वो  ख़्वाब  और  अँधेरी  वो  रात..!

हाँ, मातम अब उनका, मनाया  करते  हैं  वो..!

ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया करते  हैं …

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Added by MARKAND DAVE. on September 17, 2014 at 5:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल .......... सुलभ अग्निहोत्री

हद से अपनी गुजर गया कोई ।

चुपके दिल में उतर गया कोई ।।

आँख में आसमान लाया था

मेरी अंजुरी में भर गया कोई ।।

छोटी बच्ची सा झूल बाहों में

मन की हर पीर हर गया कोई

टूटी छत से उतर के कमरे में

चाँदनी सा पसर गया कोई ।।

डाल पे फूल खिल गया जैसे

स्वप्न जैसे सँवर गया कोई ।।

रोशनी को सहेजने में ही

कतरा-कतरा बिखर गया कोई ।।

सामने वालमीकि के फिर से

क्रौंच पर वार कर गया कोई

बह…

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Added by Sulabh Agnihotri on September 17, 2014 at 3:07pm — 23 Comments

जब बहाने थे नये तो दिल को भी उम्मीद थी - गजल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’ )

2122    2122    2122    212

*********************************

दिल  हमारा  तो  नहीं था आशियाने के लिए

फिर कहाँ से आ गये दुख घर बसाने के लिए

***

हम ने सोचा  था कि होंगी महफिलों में रंगतें

पर  मिली  वो  ही  उदासी जी दुखाने के लिए

***

था सुना हमने बुजुर्गो से  कि कातिल नफरतें

प्यार  भी  जरिया  बना पर खूँ बहाने के लिए

***

जब सभल जाएगा तुझको पीर देगा अनगिनत

हो  रहा   बेचैन  तू  भी   किस  जमाने के लिए

***

जब बहाने थे नये तो दिल…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 17, 2014 at 10:48am — 14 Comments

पंख परेवों ने खोले नव भोर हुई

रास (चौपाई +अलिपद )8-8\6=22

 

पंख परेवों ने खोले नव भोर हुई

भजनों सा चहका फिर खगरव भोर हुई

 

शबनम झाड़ी ली अँगड़ाई किसलय ने

बाग बगीचों में है उत्सव भोर हुई

 

मंदिर की घंटी से और अजानों से

सुप्त धरा का टूटा नीरव भोर हुई

 

धूप गुलाबी उबटन सी कण कण पर है

निखरा फिर धरती का वैभव भोर हुई

 

अखबारों के पन्नों में जागी दुनिया

गर्म चाय का पीकर आसव भोर हुई

 

दिन भी गुजरेगा ही रात कटी…

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Added by khursheed khairadi on September 17, 2014 at 10:30am — 5 Comments

बस तुम ही थे

पलकों के महके उपवन में

गीतों के सारे सरगम में

हर उलझन में हर सुलझन में

कोई और नहीं तुम ही थे



कुछ बंद किताबों के पन्ने

फिर फिर से जैसे खुल जाए

आखर आखर बन सरगम ज्यो

प्राणों में आकर घुल जाए

नयनो की मोहक चितवन में

कोई और नहीं तुम ही थे



महकी महकी सी साँसों में

तेरी मोहक खुशबू बस जाए

हरपल पलछिन रात और दिन

यादे तेरी सज सज जाएँ

सपनो के खिलते गुलशन में

कोई और नहीं तुम ही थे



श्वाँस श्वाँस मधुरिम स्पंदन… Continue

Added by Priyanka Pandey on September 17, 2014 at 7:29am — 11 Comments

ग़ज़ल - - - सुलभ अग्निहोत्री

कुछ ऐसे सिलसिले हैं जो हमेशा साथ चलते हैं

कुछ ऐसे फासले हैं जोकि यादों में ठहरते हैं

छुपे कुछ राज होते हैं हरेक पैगाम में उसके

कभी हम जान लेते हैं, कभी अनजान रहते हैं

सँदेशे दिल के आते हैं, हमेशा आँख के रस्ते

कभी गालों को तर करते, कभी नूपुर से बजते हैं

वो मेरे साथ ज्यादा रासता तय कर नहीं पाये

पर उतनी राह पर अब भी हजारों फूल खिलते हैं

उन्हें जब याद करते हैं तो कोई गीत होता है

ग़ज़ल होती है जब कोई, उन्हें हम याद…

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Added by Sulabh Agnihotri on September 16, 2014 at 3:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल ..रूबरू हम हो गए

खुद ज़रा गर्दन झुकाकर रूबरू हम हो गए.

बंद करली आँख अपनी गुफ़्तगू में खो गए.

वस्ल की जो थी तमन्ना किस क़दर हावी हुयी.

ख्व़ाब में आयेंगे वो इस जुस्तजू में सो गए.

कौन जाने थी नज़र या वो बला जादूगरी.

देख मुझको बीज दिल में इश्क का वे बो…

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Added by harivallabh sharma on September 16, 2014 at 1:30pm — 16 Comments

ग़ज़ल : जिया गुमनाम हूँ तो मौत को तशहीर मत देना

नए ज़हनों को छूने दो अदब के अनछुए पहलू

इन्हे मीरास में उलझी हुई ज़न्जीर मत देना

लबों को सी लिया मैने,खुदा ये बस में था मेरे

जो आहें दिल से उठ जाएं उन्हें तासीर मत देना

नई है नस्ल नई जंगें नए हथियार भी होंगे

क़लम दो मुल्क के हाथों में अब शमशीर मत देना

मचल जाए ना मेरी रूह फिर दुनिया में आने को

जिया गुमनाम हूँ तो मौत को तशहीर मत देना

रहूँ मैं मुन्हसिर दीदार…

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Added by saalim sheikh on September 16, 2014 at 1:30pm — 13 Comments

चारसू आइने लगाना भी

चारसू आइने लगाना भी

और ख़ुद से नज़र चुराना भी

बैठकर साये में मेरे रहरौ

चाहता है मुझे गिराना भी

मेरी मौजूदगी भी नादीदा

सुर्ख़ियों में तेरा न आना भी

शौक आवारगी का किसको है

हो कहीं अपना आशियाना भी

बस्तियों को उजाड़ने वालों

सीख लो बस्तियाँ बसाना भी

हो गया एक जंग के जैसा

आजकल रोटियाँ जुटाना भी

आज ‘खुरशीद’ बालता है दिल

साथ देगा कभी ज़माना भी 

मौलिक व…

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Added by khursheed khairadi on September 16, 2014 at 10:30am — 5 Comments

हर खुशी तुमसे पिता //गजल// कल्पना रामानी

घर-चमन में झिलमिलाती, रोशनी तुमसे पिता

ज़िंदगी में हमने पाई, हर खुशी तुमसे पिता

 

छत्र-छाया में तुम्हारी, हम पले, खेले, बढ़े

इस अँगन में प्रेम की, गंगा बही तुमसे पिता

 

गर्व से चलना सिखाया, तुमने उँगली थामकर 

ज़िंदगी पल-पल पुलक से, है भरी तुमसे पिता

 

 याद हैं बचपन की बातें, जागती रातें मृदुल

ज्ञान की हर बात जब, हमने सुनी तुमसे पिता

 

प्रेरणा भयमुक्त जीवन की, सदा हमको मिली

नित नया उत्साह भरती, हर घड़ी…

Continue

Added by कल्पना रामानी on September 15, 2014 at 9:30pm — 10 Comments

मनोकामना....(लघुकथा )

" भाई! रामौतार.. यह साल तो खेती के हिसाब से बहुत ही बढ़िया रहा. काश! ऐसा हर साल ही होता  रहे "     दिनेश ने अपनी हथेली पर तंबाकू मे चूना लगाकर , रगड़ते हुए कहा

" हाँ भाई! दिनेश.. सच इस बार, हर साल की तुलना मे अतिवृष्टि से थोड़ी कम फसल ज़रूर हुई लेकिन लोक-सभा और विधान- सभा चुनाव के रहते सरकारों ने खूब मुआवज़ा भी दिया और फसल बीमा को भी मंज़ूरी  दिलवाई , तो देखो न! दोगुने से भी ज्यादा बचत हो गई " रामौतार ने दिनेश की हथेली पर से मली हुई तंबाकू अपने मुंह में दबाते हुए…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on September 15, 2014 at 8:30pm — 12 Comments

गज़ल - मेरा पिता

है जहाँ में सदा तन के चलता पिता।

हँस दूँ इक बार में घोड़ा बनता पिता।

वो जगत का पिता ये है मेरा पिता।

नाम इससे लिया उसने लगता पिता।



दिन मिरे थे कभी बेफिकर वो सभी

मौज करता रहा कर्ज भरता पिता



इम्तहानों का जब भी पड़ा दौर है

नींद सोया कभी, रात जगता पिता



ठोकरें जब कभी भी लगीं हैं मुझे

दर्द मुझको हुआ आह भरता पिता



कब मेरे नाम से उसकी पहचान हो

ख्वाहिशें हैं सदा रब से करता पिता



देखता है पिता बढ़ रहा कद मिरा…

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Added by seemahari sharma on September 15, 2014 at 7:00pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल --आदमी खुद को बनाता आदमी है आदतन ( गिरिराज भंडारी )

आदमी खुद को बनाता आदमी है आदतन

****************************************

२१२२     २१२२     २१२२     २१२

आदमी  में   जानवर    भी    जी  रहा  है  फ़ित्रतन

आदमी   में  आदमी  को   देखना   है  इक  चलन 

साजिशें  रचतीं   रहीं हैं   चुपके   चुपके   बदलियाँ

सूर्य को ढकना कभी मुमकिन हुआ क्या दफअतन ?

 

पर   ज़रा तो   खोलने   का वक़्त  दे, ऐ  वक़्त  तू  

फिर   मेरी   परवाज़   होगी   और ये   नीला गगन

 

बाज,   चुहिया   खा  …

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on September 15, 2014 at 4:30pm — 28 Comments

धनवान बनाम विद्वान् (चार दोहे)

धन प्रभुता ना मिले विद्वान् जो ना हो साथ |

कर्म यज्ञ में दे आहुति विद्वान् ही का हाथ ||

 

विद्वता का उपयोग कर धनवान धन कमाए|

विद्वान् इस राह चले तो धनी निर्धन बन जाए||

 

धनवान को वाहन मिले संग्रह करके धन |

विद्वान वाहन में घूमे निग्रह करके मन ||

 

धन की करे चौकीदारी हर रात धनवान |

ज्ञान का सृजन करे हर रात विद्वान् ||

 

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on September 15, 2014 at 11:30am — 5 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
नदी, जिसका पानी लाल है (कविता) // --सौरभ

संताप और क्षोभ

इनके मध्य नैराश्य की नदी बहती है, जिसका पानी लाल है.



जगत-व्यवहार उग आये द्वीपों-सा अपनी उपस्थिति जताते हैं

यही तो इस नदी की हताशा है

कि, वह बहुत गहरी नहीं बही अभी

या, नहीं हो पायी…

Continue

Added by Saurabh Pandey on September 15, 2014 at 3:00am — 41 Comments

हाइकु

1-        

संस्‍कार होंगे

राम राज्‍य के स्‍वप्‍न

साकार होंगे !

2-        

बेच ज़मीर

बनता है तब ही

कोई अमीर !

3-        

स्‍वतंत्र हुए

बगल के नासूर

हैं पाले हुए !

4-        

है नारी वो क्‍या

न सिर पे पल्‍लू न

आँखों में हया !

5-        

क्‍या नाजायज

सत्‍ता, युद्ध, प्रेम में

सब जायज !

*मौलिक एवं अप्रकाशित*

 

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on September 14, 2014 at 10:51pm — 4 Comments

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