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सुपरिष्कृत आस्था .... (विजय निकोर)

सुपरिष्कृत आस्था

 

भर्रायी आवाज़

महीने हो गए जाड़े को गए

क्यूँ इतनी ठिठुरन है आज

आस्था में, सचेतन में मेरे

आंतरिक शोर के ताल के छोर से छोर तक

ठेलती रही है आस्था मुझको, मैं इसको

पर आज बुखार में…

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Added by vijay nikore on July 13, 2014 at 8:00pm — 22 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दिल धड़कने लगता है क्यूँ मेरा इतनी ज़ोर से-ग़ज़ल

2122/ 2122/ 2122/ 212

इस ख़मोशी से कभी तो एक मुबहम शोर से

दिल धड़कने लगता है क्यूँ मेरा इतनी ज़ोर से

 

कौन सा है रास्ता महफूज़ जाऊँ किस तरफ़

आफ़तें तो आफ़तें हैं आयें चारों ओर से

 

एक झटके में बिखर जाते हैं रिश्ते टूटकर

इतना क्यूँ मुश्किल इन्हें है बाँधना इक डोर से

 

और कितने राज़ अँधेरा अब छुपा ही पाएगा

इक किरण उठने लगी आफ़ाक़ के उस छोर से

 

बेसदा टूटा है दिल मेरा ये हालत हो गई

आँसुओं के नाम पर…

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Added by शिज्जु "शकूर" on July 13, 2014 at 7:45pm — 17 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़ी

२१२२     २१२२   २…

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Added by gumnaam pithoragarhi on July 13, 2014 at 1:01pm — 8 Comments

नई दिशायें खोज डालतें हैं-- डा० विजय शंकर

किताबें ज्ञान हैं , प्रतिमान हैं .

प्रतिबन्ध हैं , दंड हैं , विधान हैं ,

बस कभी कभी हमारे और

आपके प्रति अंध हैं , अज्ञान हैं ,

औरों के लिए महान हैं ,

उनकीं समस्याओं के उत्तर

उनमें विद्यमान हैं .

बस हमारी समस्याओं से ,

अनभिज्ञ हैं , अनजान हैं .

चलो , स्वयं को फिर से विचारते हैं ,

जिन रास्तों से आये

उन्हें मुड़कर निहारते हैं

चूक हुई नज़र आये तो

नये रास्ते निकालते हैं .

दूसरों के पद चिन्हों पर क्यों चले

नैये नैये पद चिन्ह… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on July 13, 2014 at 10:39am — 6 Comments

दोहे-१७ (प्रेम पियूष)

खिली रातरानी यहाँ,हुई रुपहली रात!

कानों में आ फिर कहो,वही प्यार की बात !!

 

अधरों से बातें करें,नयनों से आदेश!

घायल कर जाती सदा,झटके जब वे केश !!

 

कर में कर लेकर किया,हमने यूँ अनुबंध!

खिला रहे फूले फले,प्यारा मृदु सम्बन्ध !!

 

वही रुपहली रात है,सुन्दर सुखद प्रभात!

लेकिन तुम बिन हो प्रिये,किससे मन की बात !!

 

दीवाना कुछ यूँ हुआ,न दिवस दिखे न रात !

खुद से ही करने लगा,बहकी बहकी…

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Added by ram shiromani pathak on July 12, 2014 at 6:00pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अतुकांत ---- तुम , तुम ही न रहे तो क्या बचा ? ( गिरिराज भंडारी )

तुम्हारे फूल अलग रंग के क्यों लग रहे हैं आज

पत्तों का आकार भी बदला बदला सा है

तुम्हारे फूल और पत्ते ऐसे तो उगते न थे

 

पोषण किसी और श्रोत से तो प्राप्त नहीं करने लगे

जड़ या तना बदल तो नहीं लिया है तुमने

बेतुक की बडिंग तो नहीं करवा ली है

किसी और प्रजाति के पौधे से

प्रजातियाँ अच्छी बुरी तो नहीं होतीं  

सभी अपनी जगह ठीक होतीं हैं

पर अपनी, अपनी होती है 

तुक की होती है !

 

बात केवल स्वतंत्रता पर खत्म…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 12, 2014 at 9:00am — 18 Comments

अंतिम संस्कार

" मेरे पास समय बहुत कम है , डाक्टर ने बता दिया है कि कैंसर अपने आखिरी स्टेज में है , प्लीज बेटे को बुला लो अब" | पापा की दर्द भरी आवाज सुनकर वो अपने आप को रोक नहीं सकी , आँसू बेशाख्ता आँखों से बह निकले | माँ तो जैसे जड़ हो गयी थी , सिर्फ सूनी सूनी आँखों से कभी पापा को , तो कभी उसे देखती रहती |

कैसे बताये उनको , कल ही तो उसने फोन किया था भाई को | पूरी बात सुनने से पहले ही बोल पड़ा " मैं बार बार नहीं आ सकता वहां , अभी १५ दिन पहले ही तो आया हूँ | इतनी छुट्टी नहीं मिल सकती मुझे , और हाँ…

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Added by विनय कुमार on July 12, 2014 at 4:30am — 15 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़ी

२२ २२ २२ २२ २२ २२ २



पीते अश्क़ समंदर के आवारा ये बादल

लुटते हैं दुनिया के लिए हमेशा ये बादल



माँगा नहीं हिसाब कभी अपने अहसानो का

निभा रहे हैं दस्तूर भी निराला ये बादल



हर एक चेहरे पर देखो प्यास झुलसती सी

किसकी प्यास बुझाए एक अकेला ये बादल



कभी रुलाये कभी हसए बतियाये संग में

कजरारी आँखों की याद दिलाता ये बादल



गरजकर सुनाये हाले दिल भी अपना लेकिन

सब दरवाजे बंद खड़ा तनहा ये बादल



दुनिया में…

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Added by gumnaam pithoragarhi on July 11, 2014 at 4:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल-निलेश "नूर"-न कोई कशिश है न कोई में ख़ला है

१२२/१२२/१२२/१२२

.

न कोई कशिश है न कोई ख़ला है,

ये दिल बावला था ये दिल बावला है.

.

गुनहगार ग़ैरों को क्यूँ कर कहें हम,

वो थे लोग अपने जिन्होंने छला है.   

.

टटोला कई बार ख़ुद को तो पाया, 

जहाँ धडकने थीं वहाँ आबला है.....  आबला- छाला 

.

चढ़ा था नज़र में, जिगर तक न पहुँचा,

नज़र से जिगर तक बड़ा फ़ासला है.         

.

उठाऊंगा मुद्दा क़यामत के दिन ये,

मेरे हक़ का हर फ़ैसला क्यूँ टला है.  

.

समझना है मुश्किल…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on July 11, 2014 at 2:30pm — 20 Comments

कितना अनजान है आदमी-डा० विजय शंकर

हमदर्दी की क्या कहें

कौन किसी के दुःख सुनता है

दूसरे को छोड़िये. आदमी

कब अपने दुखड़े सुनता है

सुनना छोड़िये , अपने

दुःख कब समझता है आदमी ।

ये तो औरों को देख कर

कुछ जान लेता है आदमी ,

अच्छा ऐसे जीता है आदमी ?

ऐसे खाता है , ऐसे पीता है

ऐसे ऐसे हँसता है आदमी

मुझे नहीं सिखाता है आदमी

आदमी का भला करना ही

नहीं चाहता है आदमी ।

आदमी से दूरी बनाता है आदमी

आदमी आदमी के बीच तरह ,

तरह की दीवारें बनाता है आदमी

दीवारों के इस… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on July 11, 2014 at 1:54pm — 10 Comments

दस्तख़त...(लघु-कथा)

“बेटा..! ऐसा मत कर, फेंक दे ये ज़हर की बोतल I ले हमने जमीन के कागज़ पर दस्तख़त कर दिए हैं. जा, अब मर्ज़ी इसे बेच या रख। बस अपनी पत्नी और बच्चों के साथ ख़ुशी से रह । हमारा क्या है बेटा, हम कुछ दिन के मेहमान हैं,जी लेंगे जैसे-तैसे...” माँ रुंधे हुए गले से कहा.

सभी निगाहें बेटे पर केंद्रित थीं जो जहर की बोतल को आँगन में ही फेंक दस्तखत किये हुए कागजों को  समेटने में व्यस्त था. लेकिन उसी बोतल को उठाकर अपनी कोठरी में ले जाते बापू पर किसी की भी नज़र नही पडी थी.

   …

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on July 11, 2014 at 11:30am — 30 Comments

दूब का चरित्र देखो, आम जन जैसा है,// जवाहर

दूब का चरित्र

दूब का चरित्र देखो, आम जन जैसा है,

सुख दुःख से विरक्त, संत मन जैसा है.

झुलसे न ग्रीष्म में भी, ओस को सम्हाल रही  

ढांक ले मही को मुदित, पहली बौछार में ही

दूब अग्र तुंड को, चढ़ावे विप्र पूजा में,

जैसे हो नर बलि, स्वांग यह कैसा है ! दूब का चरित्र देखो, आम जन जैसा है,

गाय चढ़े, चरे इसे, बकरियों भी खाती है,

खरगोश के बच्चे को, मृदुल दूब भाती है.

क्रीडा क्षेत्र में भी, बड़े श्रम से पाली जाती है

देशी या…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on July 11, 2014 at 10:30am — 13 Comments

अपनें

" क्या बात है वर्माजी , बड़े खुश नज़र आ रहे हैं आप , कोई लाटरी तो नहीं लग गयी इस उम्र में" |
" नहीं भाई , दरअसल अख़बार में खबर थी कि एक वृद्धाश्रम बन रहा है अपने शहर में , अब कम से कम बाक़ी जिंदगी तो अपनों में गुजरेगी "|

मौलिक एवँ अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on July 11, 2014 at 2:30am — 10 Comments

सहर

बहुत रोया मैं,
पड़ोसी चाची के मर जाने पर
गाँव से शहर जाने पर
हाल के दंगे में
आग देखकर

डर जाने पर
खुद को लूटा के

घर जाने पर
आंसुओं ने साथ छोड़ दिया
नहीं रोया मैं,
माँ के मर जाने पर,
वो 

हर सहर के साथ

हॅसते देखना चाहती थी.
विजय प्रकाश शर्मा
मौलिक व अप्रकाशित

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on July 10, 2014 at 9:50pm — 12 Comments

हो क़लम हथियार पावन......ग़ज़ल

हो क़लम हथियार पावन......ग़ज़ल



शारदे माँ अर्ज इतनी ज्ञान सबको दीजिए.

भाव से भरपूर जीवन दान सबको दीजिए.



शब्द के उपहार अनुपम स्वर सरस अनुराग हो,

कोकिला की तान सरगम शान सबको दीजिए.



द्वेष का उद्गार निश की भाँति मन से नष्ट हो,

प्यार का, सत्कार का दिनमान सबको दीजिए.



दुःख में संवेदनायें आदमी का धर्म हो,

हों दलित-मज़लूम भी सम्मान सबको दीजिए.



भूख से बच्चे बिलखते बेसहारा नग्न भी,

अन्न, कपड़े, घर सहित उपमान सबको… Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 10, 2014 at 8:34pm — 10 Comments

नवगीत - शशि पुरवार

हस्ताक्षर की कही कहानी

चुपके से गलियारों ने

मिर्च मसाला , बनती ख़बरें

छपी सुबह अखबारों में.

राजमहल में बसी रौशनी

भारी भरकम खर्चा है

महँगाई ने बाँह मरोड़ी

झोपड़ियों की चर्चा है

रक्षक ही भक्षक बन बैठे है

खुले आम दरबारों में.

अपनेपन की नदियाँ सूखी,

सूखा खून शिराओं में

रूखे रूखे आखर झरते

कंकर फँसा निगाहों में

बनावटी है मीठी वाणी

उदासीनता व्यवहारों में.

किस पतंग…

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Added by shashi purwar on July 10, 2014 at 7:30pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - रोज़ करवट हम बदल के देखते हैं ( गिरिराज भंडारी )

2122    2122      2122 

 

नाम  अपना  चल  बदल  के देखते हैं

घेरे से  बाहर  निकल  के  देखते   हैं

 

चाँद  सुनता  हूँ  कि थोड़ा पास आया

आ  ज़रा  फिर से  उछल के देखते हैं

 

पैरों  को  मज़बूतियाँ  भी  चाहिये कुछ

चल  ज़रा  काटों पे चल  के  देखते हैं

 

रोशनी  की  चाह में तो  हैं  बहुत, पर 

कितने हैं ? जो ख़ुद भी जल के देखते हैं 

 

कुछ मज़ा फिसलन में है,गर है यक़ीं तो  

हम  कभी  यूँ  ही  फिसल के देखते…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 10, 2014 at 7:00pm — 22 Comments

मेरी पहली अमरनाथ यात्रा

मेरी पहली अमरनाथ यात्रा

बात 22 जुलाई वर्ष 2009 की है। मेरे पिता अपनी डियुटी से घर आये हुए थे।घर का कोई काम न कर पाने के मेरे दुकान से आने के बाद मुझ पर नाराज हेा रहे थे। मैं चुपचाप खाना खाया और उनके नाराज होने पर घर से बाहर चले जाने की आदत के अनुसार घर से बाहर निकल कर अपनी दुकान पर आ गया। दुकान पर आरकुट खोल कर इधर उधर करने लगा। उसी समय मेरे मैसेज बाक्स में अमरनाथ यात्रा संबंधी रजिस्टेªशन का विज्ञापन आया। मैं उसे खोल कर देखने लगा, पता नहीं क्या दिमाग में आया मै उसमेें दिये लिंक केा क्लिक…

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Added by Akhand Gahmari on July 10, 2014 at 5:16pm — 10 Comments

किस्मतें कब हैं जगी -गजल

** 2122 2122 2122 212

*******************************

दोष थोड़ा सा समय का कुछ मेरी आवारगी

सीधे-सीधे चल न पायी इसलिए भी जिंदगी

**

हम  तुम्हें  कैसे कहें  अब  दूरियों  को  पाट लो

कम न कर पाये जो खुद हम आपसी नाराजगी

**

कल हवा को भी  इजाजत  दी न थी यूँ आपने

आज  क्यों  भाने  लगी   है  गैर की मौजूदगी

**

रात-दिन  करने  पड़ेंगे यूँ जतन कुछ तो हमें

कहने भर से दोस्तों  ये किस्मतें कब हैं…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 10, 2014 at 11:30am — 22 Comments

ग़ज़ल -चाँद छुपकर अँधेरों में रोता रहा

212      212    212     212

रात जगता रहा दिन में सोता रहा

चाँद के ही  सरीखे से होता रहा

 

बादलों की हुकूमत हुई चाँद पर

चाँद छुपकर अँधेरों में रोता रहा

 

उल्टे रस्ते ही जब मुझको भाने लगे

बारी बारी से अपनों को खोता रहा

 

रस्म मैंने निभायी नहीं है मगर

दिल में रिश्तों को अपने संजोता रहा

 

जो न मांगा मिला मुझको सौगात में

जिसको चाहा वो मुश्किल से होता रहा

 

मैंने अपने गले से…

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Added by अमित वागर्थ on July 10, 2014 at 10:58am — 30 Comments

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