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सदस्य कार्यकारिणी
प्रेम दीपक

प्रेम दीपक

 

बंधन में मत बाँध सखी

उन भावों को

जो नित-नित

मानसपट पर चित्रित होते हैं –

स्वप्नों के छंद में बाँध सखी

उन छंदों को

जो पलकों पर पुलकित, अधरों पर बिम्बित होते हैं.

 

नयनों से ढुलके जो दो-चार बूँद सखी

अपने हिय के पत्र-पुष्प पर

टल-मल-टल

उनमें अपनी किरणों को पिरो देना

मेरी पीड़ा के होमकुण्ड में गंगाजल.

जब आग बुझे, कुछ राख उड़े

तम छाए सखी,

उस नीरव हाहाकार को तुम कुचल देना

स्वप्निल रातों…

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Added by sharadindu mukerji on July 19, 2014 at 2:00am — 20 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
प्रेम की नवल पहेली.... डॉ० प्राची

अचानक ही हो गयीं कुछ पंक्तियाँ....

बदरी के पहलू में

सूरज की अठखेली....

 

सूरज की साज़िश ने

लहरों की बंदिश से बूँद चुराकर,

प्रेम इबारत अम्बर पर लिख दी

सतरंगी पट ओढ़ाकर,

 

बूझ रही फिर भोर

प्रेम की नवल पहेली....

 

आतुर बदरी बेसुध चंचल

लटक मटक नभ मस्तक चूमे,

अंग-अंग सिहरन बिजली सी…

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Added by Dr.Prachi Singh on July 18, 2014 at 7:30pm — 14 Comments

दोहे- बृजेश

धूप, दीप, नैवेद बिन, आया तेरे द्वार

भाव-शब्द अर्पित करूँ, माता हो स्वीकार

 

उथला-छिछला ज्ञान यह, दंभ बढ़ाए रोज

कुंठाओं की अग्नि में, भस्म हुआ सब ओज

 

चलते-चलते हम कहाँ, पहुँच गए हैं आज

ऊसर सी धरती मिली, टूटे-बिखरे साज

 

मौन सभी संवाद हैं, शंकाएँ वाचाल

काई से भरने लगा, संबंधों का ताल

 

नयनों के संवाद पर, बढ़ा ह्रदय का नाद

अधरों पर अंकित हुआ, अधरों का अनुनाद

 

तेरे-मेरे प्रेम का, अजब रहा…

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Added by बृजेश नीरज on July 17, 2014 at 9:45pm — 26 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आशा और निराशा- अतुकांत

निराशा की ऊँची लहरों

और आशा के सपाट प्रवाह के बीच

मन हिचकोले खा रहा है

कभी निराशा अपने पाश में बाँध कर खींच ले जाये

कभी आशाएँ

मुझे ले जाकर किनारे पहुँचा दें

कभी सोचता हूँ

बह चलूँ लहरों के साथ

कभी लगे

बाहर आ जाऊँ इस गर्दिश से

 

ये किस मुकाम पर हूँ

ये कौन सा मोड़ है

पल-पल उठती रौशनी भी

भ्रमित कर दे कुछ देर को

कि रास्ता बदल लूँ

या चलता रहूँ

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by शिज्जु "शकूर" on July 17, 2014 at 1:02pm — 20 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़ी

१२२२   १२२२   १२२२    १२२२ 

 

मिलो गर ज़िन्दगी से तुम कोई फ़रियाद मत करना

बिठाना बैठना हँस  लेना दिल  नाशाद  मत करना

 

रखो दिल  काबू में  पहली नज़र के प्यार में यारो

जमाना कहता खुद को कैस ओ फरहाद मत करना

 

किताबें मजहबी रहने दो इन अलमारियों में बंद

मिलो जो आदमी से पोथियों को याद मत करना

 

सियासत की फरेबी चाल में फंसकर ऐ लोगो तुम

मुहब्बत चैन अमन को तुम कभी बर्बाद मत करना

 

मैं उधड़े जख्मो की तुरपाई…

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Added by gumnaam pithoragarhi on July 16, 2014 at 11:00pm — 15 Comments

नहीं मालूम उसे बीमारी क्या है...

मेरे बदन में ये खुमारी क्या है
लो हम आ गए हैं तैयारी क्या है,

अच्छा खासा कारोबार मिट गया
दुकानदार से पूछो उधारी क्या है,

हम आपसे भी सलीके से निभा लेते
ये बताओ अपनी रिश्तेदारी क्या है,

तुम भी यार किससे सवाल करते हो
बेईमानों से पूछा है ईमानदारी क्या है,

वो रोज दवा लेने अस्पताल जाता है
नहीं मालूम उसे बीमारी क्या है।।
— मौलिक व अप्रकाशित
— अतुल

Added by atul kushwah on July 16, 2014 at 10:34pm — 8 Comments

हृदयाग्नि

आत्मपीडा में अनुभूति सुख की लिए

दग्ध होता रहा अनुभवो  में सदा

सत्य ही उस करुण के ह्रदय कोश में

पल रहा कोई जीवंत अनुराग है i

 

मृत्यु आती नहीं चैन मिलता नहीं

युद्ध होता है विष चेतना में प्रबल

दंश लेता है जब फिर न देता लहर

क्रुद्ध फुंकारता नेह का नाग है i

 

मौन बेसुध पड़ा प्राण के अंक में

याद की वेदना में सजल जो हुआ

स्वेद-श्लथ गात में कुछ चुभन सी लिए

स्नेह सोया हुआ था गया जाग है  i

 

सिसकियो…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 16, 2014 at 8:30pm — 28 Comments

व्यवस्था...(लघु-कथा)

" अरे..! आओ बेटा रजनी, और सुनाओ कैसी  हो..? . बड़े दिनों बाद आना हुआ..  अरे हाँ तुमने अपने बेटे , बिट्टू को नही लाई. वो वहां तुम्हारे बिन रोयेगा तो.." राधेश्याम जी ने अखबार के पन्नो की घड़ी करते हुए कहा

" प्रणाम चाचाजी....सब कुछ कुशल है..    बिट्टू  तो बहुत परेशान करने लगा था , दिन भर मम्मी मम्मी ..!! .  मैंने उसे टेलीविजन का ऐसा शौक लगाया है की, उसे मेरी बिलकुल भी जरुरत नहीं. शाम तक आराम से जाउंगी.."   रजनी ने बड़ी चैन की सांस लेते हुए…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on July 16, 2014 at 8:26pm — 20 Comments

मील का पत्थर …

मील का पत्थर …

कल जो गुजरता है....

जिन्दगी में....

एक मील का पत्थर बन जाता है//

और गिनवाता है....

तय किये गये ....

सफर के चक्र की....

नुकीली सुईयों पर रखे....

एक-एक कदम के नीचे....

रौंदी गयी....

खुशियों के दर्द की....

न खत्म होने वाली दास्तान//

दिखता है ....

यथार्थ की....

कंकरीली जमीन पर....

कुछ दूर साथ चले....

नंगे पांवों…

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Added by Sushil Sarna on July 16, 2014 at 7:00pm — 11 Comments

अटूट बंधन

अटूट बंधन

कल रात भर आसमान रोता रहा

धरती के कंधे पर सिर रख कर

 इतना फूट फूट कर रोया कि

 धरती का तन मन

सब भीगने गया

पेड़ पौधे और पत्ते भी

इसके साक्षी बने

उसके दर्द का एक एक कतरा

कभी पेडो़ं से कभी पत्तों में से

टप-टप धरती पर गिरता रहा

धरती भी जतन से उन्हें

समेटती रही,सहेजती रही

और..

दर्द बाँट्ने की कोशिश करती रही

ताकि उसे कुछ राहत मिल जाए

**********************

महेश्वरी…

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Added by Maheshwari Kaneri on July 16, 2014 at 6:34pm — 8 Comments

नज़र मुझ पे कर दे ......गज़ल

एक गज़ल 

वज्न- 122 122 122 12

मेरे दिल को तुझसे वफ़ा चाहिए 

न जख्म ए जिगर फिर नया चाहिए 

~

है अरसा हुआ मै हूँ अब भी वहीँ 

तेरे दिल से निकली सदा चाहिए 

~

जो बीमार को कर सके है भला 

किसी हाथ में वो शिफ़ा चाहिए 

~

ये हैं इन्तेज़ामात तेरे ख़ुदा 

है किसने कहा इब्तिला* चाहिए                               दुःख 

~

जो दिल हैं परेशां जफ़ा से यहाँ 

महज़ उनके खातिर दुआ…

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Added by वेदिका on July 16, 2014 at 12:02pm — 30 Comments

मैंने सुना तू सोने को मिट्टी बताता है

२२     १२२२      २१२    २१२   २२

कोशिस मसीहा बनने की जब  कर रहा है तू

तो  सूलियों पे चढ़ने से क्यूँ  डर रहा है तू ?

 

मैंने सुना तू सोने को मिट्टी बताता है

क्यूँ फिर तिजोरी सोने से ही भर रहा है तू ?

 

सबको दिखाया करता है तू मुक्ति के पथ ही

खुद सोच क्यूँ घुट घुट के ही यूं मर रहा है तू ?

 

तूने उठायी उंगली सभी के चरित्र पर है

सबको खबर रातों में कहाँ पर रहा है तू

 

ले नाम क्यूँ मजहब का लड़ाता सभी को…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on July 15, 2014 at 4:30pm — 21 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हो किसी बात पर यकीं यारो- ग़ज़ल

2122 1212 22/112

हो किसी बात पर यकीं यारो

हौसला दिल में अब नहीं यारो

 

इक दफ़ा शोरे इन्क़िलाब उठा

दब गई फिर सदा वहीं यारो

 

काफिले रौशनी के दूर हुए

छुप गया चाँद भी कहीं यारो

 

दिल सुलगता है मेरा रह-रह के

बैठे चुपचाप हमनशीं यारो

 

आबले पड़ गये हैं पैरों में

गर्म होने लगी ज़मीं यारो

 

आइने का बिगड़ता क्या लेकिन

तर हुई खूँ से ये ज़बीं यारो

 

मेरा महबूब बनके इस ग़म…

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Added by शिज्जु "शकूर" on July 15, 2014 at 4:24pm — 21 Comments

यात्रा संस्मरण, मेलबोर्न

मेलबोर्न, औस्ट्रेलिया यात्रा का एक सुखद संस्मरण बाँटना चाहूँगी । जैसे मै भीगी आपको भी यादों की बारिश में भिगोना चाहूँगी . बड़ी -बड़ी मिलों , कारखानों वाले क्षेत्रों को पार करते हुए , नेशनल पार्क में संरक्षित ,सड़कों के किनारे लगाई गई फेंसिंग के समीप तक आ गए कंगारुओं के झुण्ड का विहंगम अवलोकन करते हुए हम प्राचीन गाँव सोरेन्टो आ गए। . इतिहास को गर्भ में रखे हुए ऑस्ट्रेलियाई सभ्यता व् संस्कृति का भरपूर जायज़ा यहां लिया जा सकता है। यहाँ का समुद्री तट भी उतना ही रम्य.



सागर के सीने पे…

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Added by mrs manjari pandey on July 15, 2014 at 2:30pm — 3 Comments

अनुशासन (लघुकथा) / रवि प्रभाकर

“आज तो आप कुछ ज्यादा ही देर से आईं है, आपने तीन पीरीयड मिस कर दिए"  सरकारी स्कूल की अध्यापिका ने दूसरी अध्यापिका से कहा

“क्या बताऊँ, मुन्ने के स्कूल में आज ‘पेरेन्ट-टीचर मीट’ थी, सो वहाँ जाना बहुत ही जरूरी था, अब आप तो जानती ही हैं कि कान्वेंट स्कूलों में अनुशासन का कितना ध्यान रखा जाता है।”

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on July 15, 2014 at 12:30pm — 7 Comments

कोसते रावण को हर दिन - ग़ज़ल

2122    2122    2122    2122

********************************

चल  पड़ी नूतन  हवा  जब से शहर की ओर यारो

गाँव के  आँगन उदासी,  भर  रही  हर  भोर यारो

**

अब  बुढ़ापा द्वार  पर  हर  घर  के बैठा है अकेला

खो  गया  है  आँगनों से   बचपनों  का  शोर यारो

**

ढूँढते तो हैं  शिरा  हम, गाँव  जाती  राह का नित

पर  यहाँ  जंजाल  ऐसा  मिल  न पाता छोर यारो

**

हो गये कमजोर रिश्ते, अब दिलों के धन की खातिर

मंद   झोंके   भी   चलें  तो   टूटती   हर   डोर …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 15, 2014 at 11:08am — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - कोई तो मिल जाये जो ठहरा दिखाई दे ( गिरिराज भंडारी )

2122    2122     2122      2   

कोई तो मंज़र कभी अच्छा दिखाई दे

एक तो आदम कभी सच्चा दिखाई दे

 

आपा धापी से लगे हैं पस्त हर कोई

कोई तो मिल जाये जो ठहरा दिखाई दे

 

उथलों में कब ठहरा है बरसात का पानी

ढूँढता है ताल , जो गहरा दिखाई दे   

 

भावनायें गूंगी हो कोनों में हैं सिमटीं  

शब्द क़ैदी सा लगा, पहरा दिखाई दे 

 

कोयला जो राख के नीचे दबा था कल

ये हवा कैसी ? कि वो दहका दिखाई दे…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 15, 2014 at 11:00am — 21 Comments

बरखा रानी

आई बरखा झूमती

कलियों का मुख चूमती

पवन झकोरे सर-सर करते

डाली –डाली झूमती

 

आँगन की महके है माटी

गमले में तुलसी लहराती

बैठ झरोके टुक –टुक देखूँ

भीगी मोरें नाचती

 

अंबर पर मेघों का पहरा

श्याम रंग फैला है गहरा

मेघों की धड़के है छाती

पपीहा टेर सुहाती

 

महक उठी कृषकों की पौरें

धीमी हो गई रहट की दौड़ें

गीली हो गई दिन और रातें

नई उमंगें झाँकती

मौलिक व…

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Added by kalpna mishra bajpai on July 14, 2014 at 11:00pm — 10 Comments

शाश्वत कोलाज

ऊपर क्या है

सुनील आसमान I

तारक , सविता , हिमांशु

सभी  भासमान I

बीच में क्या है ?

अदृश्य ईथर

कल्पना हमारी I

क्योंकि

ध्वनि और प्रकाश

नहीं चलते  बिना माध्यम के

वैज्ञानिक सोच है सारी I 

नीचे क्या है ?

सर ,सरि, सरिता, समुद्र, जंगल, झरने

उपवन में है पंकज, पाटल ,प्रसून

आते है मिलिंद, मधु-कीट, बर्र

तितलियाँ रंग भरने I 

चारो ओर मैदान, पठार .पर्वत, प्रस्तर

घाटी, गह्वर,…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 14, 2014 at 3:30pm — 21 Comments

वो घर ग़मज़दा था

वो घर ग़मज़दा था
ग़म का मैक़दा था

कुछ चिंगारियां थी
बाकी तो धुंआ था

हवा की सरसराहट
अजब सन्नाटा था

दरो दीवार सीली थी
वो रात भर रोया था

शक इक वज़ह थी
घर बिखर गया था
.
मुकेश इलाहाबादी ---

मौलिक/अप्रकाशित

Added by MUKESH SRIVASTAVA on July 13, 2014 at 11:00pm — 8 Comments

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