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बुलाकर नेह को रखो

मिली जब से पनाहें सच, यहां इल्जाम को घर में

लिए बदनामी संग फिरते, छुपाकर नाम को घर में



बुलाकर नेह को रखो, यहां सम्मान से तुम नित  

मगर भूले से भी मत देना, “शरण काम को घर में



निपट लेगा फिर वन में, अकेली ताड़का से तो वो

यहां सौ-सौ लंकेश  बैठे हैं, बुलाओ राम को घर में



सुना है सबसे रखवाया, वचन बेटी की इज्जत का

मगर बोलो कि कब दोगे, इसी अंजाम को घर में



अभी तो साथ चलनी है, कर्ज में लिपटी हुर्इ सुबहें

भला फिर कैसे रोकें हम, धुआंती…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 5, 2013 at 6:00am — 7 Comments

माटी का आसमान

वह माटी  थी पर नहीं थी वह  ...जिसे कुम्हार ने माजा चाक पे चढ़ाया, गढा, चमकाया बाजार  में बिठाया ... वह तो किस्मत की धनी थी पर वह ?  वह तो सिर्फ उसके बगिया की माटी  थी  उसके पैरों तले गाहे बगाहे आ जाती  ... कुचली जाती रही .. टूटती रही, खोदी जाती रही, तोडी जाती रही ..... और बदले में रंगबिरंगे फूलों से फलों से  अपनी हरियाली को सजा कर बगिया को महकाती रही .... यही तो था  उन् दोनों के अपने अपने हिस्से का आसमान .. लेकिन उन् दोनों के लिए एक आसमान से इतर एक दूसरा आसमान किसी बंद दरवाजे से बाहर भीतर…

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Added by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on October 4, 2013 at 9:30pm — 17 Comments

कवित्त (सफ़र)

सफ़र

ओ बी ओ के संग मेरा, सफ़र पुराना भाई,

जानते नहीं जो मुझे, जान लो क़रीब से।

धन औ दौलत से भी, बड़ी चीज़ पाई मैंने,

शारदे की कृपा मिली, मुझको नसीब से।

लेखन में रुचि मेरी, लेखन ही जान मेरी,…

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Added by Sushil.Joshi on October 4, 2013 at 9:14pm — 21 Comments

ग़ज़ल

कलाम सबकी जुबाँ पर है लाकलाम तेरा।

सलाम करता है झुक कर तुझे गुलाम तेरा।

वो पाक़ साफ है इल्जाम न लगा उस पर,

करेगा काम वो वैसा ही जैसा दाम तेरा।

किसी को ताज़ किसी को दिये फटे कपड़े,

बड़े गज़ब का है दुनिया मे इन्तजाम तेरा।

जो अपने आप को पहुँचा हुआ समझते हैं,

समझ में उनके भी आता नहीं है काम तेरा।

तेरे ही नाम से होते हैं सारे काम मेरे,

मैं मरते वक्त तक लेता रहूँगा नाम तेरा।

मौलिक अप्रकाशित…

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Added by Ram Awadh VIshwakarma on October 4, 2013 at 8:00pm — 19 Comments

टिफिन में कैद रूह

हम क्या हैं

सिर्फ पैसा बनाने की मशीन भर न !

इसके लिए पांच बजे उठ कर

करने लगते हैं जतन

चाहे लगे न मन

थका बदन

ऐंठ-ऊँठ कर करते तैयार

खाके रोटियाँ चार

निकल पड़ते टिफिन बॉक्स में कैद होकर

पराठों की तरह बासी होने की प्रक्रिया में

सूरज की उठान की ऊर्जा

कर देते न्योछावर नौकरी को

और शाम के तेज-हीन सूर्य से ढले-ढले

लौटते जब काम से

तो पास रहती थकावट, चिडचिडाहट,

उदासी और मायूसी की परछाइयां

बैठ जातीं कागज़ के…

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Added by anwar suhail on October 4, 2013 at 8:00pm — 9 Comments

कविता -------सुबह सुहानी लगती है

छाने लगी सूरज की लाली ,
गाने लगी कोयलिया काली ,
छूमंतर होने लगा अन्धकार ,
मीठी निंद्रा से जागा संसार !
मंद हवा के शीतल झोंके ,
तरोताजा कर जाते है ,
और पत्तो पे बिखरे ओस के मोती ,
गायब कहीं हो जाते है !
सूरज की पहली किरण से ,
अंग अंग मस्त हो जाता है ,
और निंद्रा पूरी कर रात की ,
 आलस कहीं खो जाता है…
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Added by डॉ. अनुराग सैनी on October 4, 2013 at 6:03pm — 5 Comments

फरेब

अपनी  निगाहों से मेरा हर अक्श मिटाने चला है वो

दिल से अपने अब मेरा हर नक्श मिटाने चला है वो

 

मेरी महफ़िल की रंगीनियत कम होने लगी शायद   

इसलिए साथ गैरों के महफिलें सजाने चला है वो

 

उस शख्स की शख्सियत भी क्या होगी यारो

मोहब्बत से भरा एक शख्स मिटाने चला है वो

 

जिसने खुद ही जलाई थी मोहब्बत की शमा कभी

उस शमा की आखिरी लौ भी अब बुझाने चला है वो

 

और जिनकी रग-रग मैं हैं धोखे और फरेब भरे

साथ उनके अब यारियों…

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Added by Sachin Dev on October 4, 2013 at 5:30pm — 28 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ऐ खुशी तूने अगर मुझको पुकारा ही न होता - शिज्जु शकूर

बह्रे रमल मुसम्मन सालिम(2122 2122 2122 2122)

संग तेरे मैंने कोई पल गुज़ारा ही न होता

ऐ खुशी तूने अगर मुझको पुकारा ही न होता

 

तूने ऐ जज़्बा-ए-दिल मुझको सँवारा ही न होता

आइने में लफ़्ज़ के तुझको उतारा ही न होता

 

रह गया था मैं कहीं खो कर जहां की वुसअतों मे                        वुसअत= व्यापकता

गर मुहब्बत की न होती तो सहारा ही न होता

 

रात की जल्वागरी होती अधूरी रौनकें भी

चाँद की जो बज़्म…

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Added by शिज्जु "शकूर" on October 4, 2013 at 4:00pm — 31 Comments

माँ !! ( लघु कविता )

माँ !!

 

नेह ममता

लाड़  दुलार

अविस्मरण रूप

स्नेह की गागर

छलकाती ।

 

आँखों मे असंख्य

अबूझ स्वप्न

स्नेह सिक्त

जल धारा बरसाती ।

होती ऐसी माँ !!!..................अन्नपूर्णा बाजपेई 

 

अप्रकाशित एवं मौलिक 

Added by annapurna bajpai on October 4, 2013 at 2:00pm — 24 Comments

करते नहीं अनर्थ, फैसले शान्त चित्ति के-

शान्त *चित्ति के फैसले, करें लोक कल्यान |
चिदानन्द संदोह से, होय आत्म-उत्थान |


होय आत्म-उत्थान, स्वर्ग धरती पर उतरे |
लेकिन चित्त अशान्त, सदा ही काया कुतरे |


चित्ति करे जो शांत, फैसले नहीं *कित्ति के |
करते नहीं अनर्थ, फैसले शान्त चित्ति के ||


चित्ति = बुद्धि
कित्ति = कीर्ति / यश

अप्रकाशित / मौलिक

Added by रविकर on October 4, 2013 at 11:00am — 11 Comments

चाबी

राजकुमार तोते को दबोच लाया और सबके सामने उसकी गर्दन मरोड़ दी... “तोते के साथ राक्षस भी मर गया” इस विश्वास के साथ प्रजा जय जयकार करती हुई सहर्ष अपने अपने कामों में लग गई।

 

उधर दरबार में ठहाकों का दौर तारीं था... हंसी के बीच एक कद्दावर, आत्मविश्वास भरी गंभीर आवाज़ गूंजी... “युवराज! लोगों को पता ही नहीं चल पाया कि हमने अपनी ‘जान’ तोते में से निकाल कर अन्यत्र छुपा दी है...  प्रजा की प्रतिक्रिया से प्रतीत होता है कि आपकी युक्ति काम आ गई... राक्षस के मारे जाने के उत्साह और उत्सव के बीच…

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Added by Sanjay Mishra 'Habib' on October 4, 2013 at 9:36am — 22 Comments

जीवन संघर्ष - एक कहानी

                              और एक दिन  रामदीन  सचमुच  मर गया । आदर्श  कालोनी  में किसी के भी चेहरे पर दुःख का कोई भाव नहीं था । होता भी क्यों ? रामदीन था ही कौन जिसके  मर जाने पर उन्हें दुःख होता  । रामदीन तो इस कालोनी में रहते हुए भी इस कालोनी का नहीं था । सबके साथ रहते हुए भी  वो और उसका छोटा सा परिवार  अपनी  झोपड़ी में सबसे तनहा रहा करते थे । उसकी मौत से  यदि कोई दुखी थे ,  तो वो थी  फागो - रामदीन की घरवाली ,  उसका  एक  बच्चा टिल्लू, टिल्लू के बगल में बैठा मरियल कुत्ता मोती और टूटे…
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Added by Kapish Chandra Shrivastava on October 4, 2013 at 9:30am — 24 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मोतबर चुप है ( ग़ज़ल ) गिरिराज भंडारी

2122     1212    22  

       

जुल्म को देख रहगुज़र चुप है

गाँव सारा नगर नगर चुप है

खामुशी चुप ज़ुबां ज़ुबां है  चुप

दश्त चुप है शज़र शज़र चुप है

दोस्त चुप चाप दुश्मनी भी…

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Added by गिरिराज भंडारी on October 4, 2013 at 8:00am — 39 Comments

सुनाई शंख देता है यहाँ शुभ काम से पहले

1 2 2 2  1 2 2 2  1 2 2 2  1 2 2  2

चढा दी हसरतें सूली किसी ईनाम से पहले//

नमन है उन शहीदों को सदा आवाम से पहले//



बने आजाद परवाने कफ़न को सिर पे बांधा था

वतन पर जान देते थे किसी अंजाम से पहले //



भुला सकते न कुर्बानी वतन पर मर मिटे हैं जो

ज़माना सर झुकाएगा खुदा के नाम से पहले//

शहादत व्यर्थ उनकी यूँ नहीं अब तुम करा देना

नसीहत मानना उनकी किसी कुहराम से पहले//



वफ़ा कैसे निभानी सीखलो अपने वतन से तुम …

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Added by Sarita Bhatia on October 3, 2013 at 8:00pm — 24 Comments

उठते बैठते बस एक ही ख्याल हुआ

उठते बैठते बस एक ही ख्याल हुआ

क्यूँ जीना भी इस कदर मुहाल हुआ

लुटी आबरू तो चुप हैं सफ़ेद-पोश

ख़ामो ख्वाह की बातों पर बवाल हुआ

जलाता है रावण खुद अपना ही बुत

तमाशा ये देखो हर साल हुआ

जुबां…

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Added by Praveen Verma 'ViswaS' on October 3, 2013 at 6:43pm — 22 Comments

स्वच्छ गगन मे - कविता

स्वच्छ गगन मे

सुवर्ण सी धूप

भोर की किरण ने

आ जगाया ।

अर्ध उन्मीलित नेत्र

उनींदा  मानस

आलस्य पूरित

यह तन मन

पंछियों ने राग सुनाया ।  

कामिनी सी कमनीय

सौंदर्य की प्रतिमा

नैसर्गिक छटा

फैली चहुं ओर

मुसकाते सुमन

झूमते  तरुवर

नव जोश जगाया ।

हुआ प्रफुल्लित ये मन

तोड़ कर मंथर बंधन

मानो  रोली कुमकुम

आ छिड़काया ।............. अन्नपूर्णा बाजपेई 

अप्रकाशित…

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Added by annapurna bajpai on October 3, 2013 at 4:59pm — 30 Comments

बधाई (लघु कथा )

सेमीनार में “कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न” विषय पर अपना भाषण देकर जब प्रिंसीपल साहिब स्टेज से उतरे तो सभी ओर तालियों की गड़गड़ाहट व वाहवाही गूंज रही थी,  सभी लोग बारी-बारी प्रिंसीपल साहिब को बधाईयां दे रहे थे। इसी क्रम में जब एक जूनियर अध्यापिका ने प्रिंसीपल साहिब को बधाई दी तो उन्हे लगा जैसे किसी ने सरे-बाजार उन्हे नंगा कर दिया हो।

- मौलिक व अप्रकाशित

Added by Ravi Prabhakar on October 3, 2013 at 4:00pm — 34 Comments

ग़ज़ल - कुर्बतों की बात आखिर क्यों करें

2122 2122. 2122. 212



खो गई है प्यार की पतवार लगता है यही

नाव अपनी पास ही मझधार लगता है यही



कुर्बतों की बात आखिर क्यों करें हम बोलना

कर रहे हैं मौत का व्यापार लगता है यही



रोज ही गढ़ते कहानी बारहा बढ़ते कदम

दिख गया कोई नया बाजार लगता है यही



मौत का मंजर कहीं रस्ते न आ जाए यहाँ

देखकर तैयारियाँ खूँखार लगता है यही



जुल्मतों नें घेर ली है राह चारो ओर से

हाथ में है सो गई तलवार लगता है यही



जीत का आलम कभी दीदार था… Continue

Added by Poonam Shukla on October 3, 2013 at 3:30pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
समझौता (लघु कथा )

"देखो सुशीला ये रूल में नहीं है मुझे अच्छी तरह पता है कि तुम दुबारा शादी कर चुकी हो फिर कैसे अपने मरहूम पति की पेंशन ले सकती हो मैं अभी नया आया हूँ ,जैसे चलता आया है सब वैसे  ही नहीं चलेगा; मैं इस मामले में बहुत सख्त हूँ"  बड़े बाबू   की फटकार सुनते ही सुशीला की आँखे भर आई हाथ जोड़ कर बोली "साहब मेरे दो बच्चों पर रहम खाइए आप किसी को कुछ मत कहिये बड़े साहब को पता चलेगा तो" !!!  और वो फफक कर रो पड़ी।…

Continue

Added by rajesh kumari on October 3, 2013 at 11:00am — 39 Comments

खयालों में वही पहली नज़र की मस्तियाँ भी थीं





1 2 2 2    1 2 2 2    1 2 2 2    1 2 2 2



हुए रुखसत दिले -नादां  की ही  कुछ सिसकियाँ भी थी

खयालों में वही पहली नज़र की मस्तियाँ भी थीं



लहर तडपी थी हर इक याद पे मचला भी था साहिल

ज़माने की वही रंजिश में डूबी किश्तियाँ  भी थीं



बिखरती वो घड़ी बीती न जाने कितनी मुश्किल से

दबी ही थी जो सीने में क़सक की बिजलियाँ भी थीं



कभी कहते थे वो भी उम्र भर यूँ साथ चलने को

चलीं हैं साथ जो अब तक वही गमगीनियाँ भी थीं



भुलाकर यूँ न जी पायेंगे गुजरे…

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Added by sanju shabdita on October 3, 2013 at 10:26am — 23 Comments

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