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March 2012 Blog Posts

सेनानी

बचपन बीता खेलों में 
माँ के सुन्दर सुन्दर गीतों में 
मन मयूर  मचलता फिरता  गलियन में 
भौंरा बन मंडराता छुप जाता  कलियन में 
गावों की नागिन सी  पग डंडियाँ 
बलखाती जा मिली जब हसीं शहरों से 
प्रेम रंग में डूब गया जा टकराया लहरों से 
कुछ मीत यहाँ कुछ मीत वहां 
कुछ साथ रहे  कुछ बिछड  गए 
हमने देखा  उसने पहचाना 
वादा था जीवन साथ निभाना 
वादे करते वो आईने…
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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 18, 2012 at 10:00pm — 15 Comments

इश्क़

इश्क़ की बात चली

रात आँखों में जली

————

मौजूदगी तेरी हर लम्हा मौजूद रहे

तू साथ हो न हो, साथ बावजूद रहे

ख़यालों में गुज़रा ये दिन सारा

शाम यादों में ढली

इश्क़ की बात चली..

————…

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Added by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 18, 2012 at 5:57pm — 22 Comments

कविता- डाक्टर

डाक्टर 

 

मरीजों की भीड़ को-

डाक्टर झट-पट ऐसे निपटाता रहा,

बगैर गर्दन उठाये-

मरीज का हांल-चाल कुछ सुनता रहा

मरीज दर्द से कराहता रहा-…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 18, 2012 at 3:00pm — 5 Comments

बेबसी

रात्रि का अंतिम प्रहर घूम रहा तनहा कहाँ

थी ये वो जगह आना न चाहे कोई यहाँ

हर तरफ छाया मौत का अजीब सा मंजर हुआ

घनघोर तम देख साँसे थमी हर तरफ था फैला धुआं

नजर पड़ी देखा पड़ा मासूम शिशु शव था

हुआ जो अब पराया वो अपना कब था

कौंधती बिजलियाँ सावन सी थी लगी झड़ी

कौन है किसका लाल है देख लूं दिल की धड़कन बढ़ी

देखा तनहा उसे सर झुकाए समझ गया कि उसकी दुनिया लुटी

जल रही थी चिताएं आस पास ले रही थी वो सिसकियाँ घुटी घुटी

देती कफ़न क्या कैसे…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 17, 2012 at 10:00pm — 26 Comments

गजल

वो खुद में इतना सिमटे-सिमटे थे
जैसे वो दिल को पकड़े-पकड़े थे |


उनको देख हुए थे बेसुध हम तो
क्या बात करें अब मुखड़े, मुखड़े थे |…
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Added by dilbag virk on March 17, 2012 at 7:28pm — 12 Comments

जिंदगी ले के चली

जिंदगी ले के चली, एक ऐसी डगर,

राह के उस पार, चलते हैं हम सफ़र. 



रात और दिन, मील के पत्थर जैसे हैं,

मोड़ बन जाते कभी, हैं चारों पहर.

  

फादना पड़ता है, दीवारें अनवरत,

ढूँढना चाहूँ मै, 'उसको' जब भी अगर.

 

शख्शियत में नये, बदलता हूँ धीरे से,

नये चेहरे मिले और, नये से राही जिधर.



द्वार-मंदिर मिले न मिले, पर चाहतें,

बांहों में ही भींचे रहती हैं, ता-उमर.



जिंदगी में लेने आता, एक बार पर-

बैठती हूँ रोज, 'बस्तीवी'…

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Added by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 17, 2012 at 9:07am — 13 Comments

मन का चन्दन

मन का चन्दन महक उठता है…

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Added by RAJEEV KUMAR JHA on March 17, 2012 at 9:00am — 9 Comments

एक पैग (कहानी)

बटेश्वरनाथ गाँव के सबसे बड़े आदमी हैं। भगवान का दिया हुआ सबकुछ है उनके पास। माता पिता अभी सलामत हैं। दो लड़के और एक लड़की भी है। बड़ा लड़का गटारीनाथ ८ साल का है। लड़की सुनयनी ६ साल की और सबसे छोटा लड़का मेहुल नाथ अभी ३ साल का है जिसे प्यार से सब मेल्हू कहते हैं।

 बटेश्वरनाथ के पिता कोई ३ साल पहले रिटायरमेन्ट लिये थे जब मेल्हू का जन्म हुआ था। रिटायरमेन्ट के समय खूब सारा पैसा भी मिला था। ये लोग खानदानी रईस भी थे। बटुकनाथ के पिता बहुत सारा पैसा छोड़ गये थे। इनके परिवार की खूबियाँ बहुत…

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Added by आशीष यादव on March 17, 2012 at 9:00am — 16 Comments

जब तुम रहते हो पास मेरे

जब तुम रहते हो पास मेरे,

जग भरा भरा सा लगता है।

व्याकुल करती गर्मी के ऋतु में,

मलय समीर बहा लगता है।



चिलचिल करती कड़क धूप में,

बरगद का छांव मिला लगता है।

बारिस के मौसम में सिर पर,

मजबूत एक छत टिका लगता है।



कई दिनों से प्यासे मुख में,

शीतल नीर पड़ा लगता है।

कई दिनों से भूखे जन को,

मधुर भोज्य मिला लगता है।



एक अंधेरी अंजान गुफा में,

प्रकाश पुंज खिला लगता है।

कई जन्म से बिछड़ा प्रेमी,

इस जन्म में मिला लगता… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 16, 2012 at 10:29pm — 11 Comments

जरा देखें

खामोश इन निगाहों का इश्तिहार जरा देखें।
टूटे हुए दिलों के पुकार जरा देखें॥
जरूरी नहीं जरूरतमंद की जरूरत पुरी हो।
जरूरत से ज्यादा लम्बी कतार जरा देखें॥
घनानन्द यहां मरता है हरवक्त प्यार में।
मगर सुजान का मौसमी प्यार जरा देखें॥
हर सूं यहां कुबेर का दबदबा बना हुआ है।
और दवताओं के पुरअसरार जरा देखें॥
इस दुनिया में जीने से मर जाना भला है।
पटे मौत की खबर से अखबार जरा देखें॥
दोस्त गर जीने की चाहत अभी बची है।
इकबार चलो चांद के उस पार जरा देखें॥

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 16, 2012 at 9:30pm — 8 Comments

वो आंखें

खिला धूप चेहरा मदमाती वो आंखें।

सुर्ख से अधर, पर शर्माती वो आंखें॥

.

देखूं जो नजर भर चुराती वो आंखें।

हटे जो नजर तो बल खाती वो आंखें॥

.

लगे दर्द दिल में छुपाती वो आंखें।

छुपे राजे दिल को बताती वो आंखे॥

.

क्यों ही न जाने दिल जलाती वो आंखें।

बहा अश्क फिर से बुझाती वो आंखें॥

.

सब्र के अब्र को छेद जाती वो आंखें।

अब्र से आब ले बरसाती वो आंखें॥

.

सुनो दोस्त मेरे मदमाती वो…

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Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 16, 2012 at 9:30pm — 9 Comments

गज़ल........उनको हवा नाम दूँ जाने मैं क्या करूँ .............

गज़ल........उनको हवा नाम दूँ जाने मैं क्या करूँ .............

   वो दूर हैं आज यूँ जाने मैं क्या करूँ

  वो मूक हैं आज क्यूँ जाने मैं…

Continue

Added by Atendra Kumar Singh "Ravi" on March 16, 2012 at 1:21pm — 15 Comments

शिक़ायत

शिक़ायत

मेरे दिल के कुछ कांटे
मेरे साथ रहे और चुभते रहे
वोह मुझको छलनी करते रहे
हम उनकी हिफाज़त करते रहे
अपना गुनाह बस इतना था
हम उनको अपना कह बैठे
वह हमसे नफरत करते रहे
हम उनसे मुहब्बत करते रहे
हम दीपक थे जलना ही था
पर वफ़ा की आग में जलते रहे
वह समझ न पाए प्यार मेरा
दुनियाँ से शिक़ायत करते रहे

दीपक शर्मा 'कुल्लुवी'
9350078399
१६.०३.१२.

Added by Deepak Sharma Kuluvi on March 16, 2012 at 11:46am — 9 Comments

बस!

बस! 
-----

कभी 

प्यादों सी
बेबसी को
जीता!
कभी
ढाई -घर 
उछलती 
अश्व -शक्ति के
जोश में
उफनता!
कभी 
ऊँट की
आडी -तिरछी
तिरपट-चालों का
नशा ढोता !
कभी
कोने में बैठे
हाथी की
कुंद होती
बुद्धिमत्ता का
अहसास झेलता!
कभी
मंत्री…
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Added by AVINASH S BAGDE on March 16, 2012 at 10:25am — 16 Comments

आशा

दूर क्षितिज प्राची की लाली ,

अरे बावरी ओ मतवारी ,

उस पल को तूँ विस्मृत कर दे ,

जीवन मे विष को जो भर दे ,

इंद्रव्रज्या नही  बन दधीचि तूँ ,

परम दंभ का ना बन प्रतीक तूँ ,

कण्ठ गरल मुख पर मुस्कान…

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Added by अश्विनी कुमार on March 16, 2012 at 10:00am — 8 Comments

निजत्व की खातिर

निजत्व की खातिर

कर्तव्यो की बलिवेदी से

कब तक भागेगा इन्सान

ऋण कई हैं

कर्म कई हैं

इस मानव -जीवन के

धर्म कई हैं

अचुत्य होकर इन सबसे

क्या कर सकेगा

कोई अनुसन्धान

कई सपने हैं

कई इच्छाये हैं

पूरी होने की आशाये हैं

पर विषयों के उद्दाम वेग से

कब तक बच सकेगा इन्सान

भीड़-भाड़ है

भेड़-चाल है

दाव-पेंच के

झोल -झाल है

इनसे बच कर अकेला

कब तक चलेगा…

Continue

Added by MAHIMA SHREE on March 15, 2012 at 4:30pm — 60 Comments

चतुष्पथ पर...

मृगनयनी नवयौवना

लावण्य क्या कहना !

संकोच व लज्जा

बनी सुसज्जा.

सप्त-अंगुल भर

कटी प्रदेश कमाल.

ओ गजगामिनी

तेरी मदमस्त चाल.

अर्ध- पारदर्शी वस्त्र में कैद

अंग -प्रत्यंग में

लाती भूचाल,

तिर्यक दृष्टीपात

करती हृदय अघात

नारी सौंदर्य .

निहारते चक्षु.

अट्टालिकाओं से

चतुष्पथ पर...

 

 

रचयिता : डा अजय कुमार शर्मा ( सौंदर्य रस पूर्ण  बिम्ब )

Added by Dr Ajay Kumar Sharma on March 15, 2012 at 11:45am — 7 Comments

आर्तनाद!

मेरे ही पुत्रों ने,

मुझे,

लूटा है बार-बार!

एक बार नहीं,

हजार बार!

अपनी अंत: पीड़ा से

मैं रोई हूँ, जार जार!

हे, मेरे ईश्वर,

हे मेरे परमात्मा,

दे इन्हें सदबुद्धि,

दे इन्हें आत्मा,

न लड़ें, ये खुद से,

कभी धर्म या भाषा के नाम पर,

कभी क्षेत्रवाद,

जन अभिलाषा के नाम पर.

ये सब हैं तो मैं हूँ,

समृद्ध, शस्य-श्यामला.

रत्नगर्भा, मही मैं,

सरित संग चंचला.

मत उगलो हे पुत्रों,

अनल के अंगारे,

जल जायेंगे,

मनुज,संत…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on March 15, 2012 at 6:37am — 14 Comments

छलक जाते है आंसू

छलक जाते है आंसू

मेरी आंखों से

जब देखता हूं तुमको

बंद आंखों से

दिल होता है बैचेन

जब सोचता हूं

तुम्हारे बारे में

काश!

न देखा होता तुमको

न जाना होता तुमको

न आते दिल के करीब

न होता प्यार तुमसे

न होते जुदा हम

तब होती

एक ही बात

तुम भी रहती…

Continue

Added by Harish Bhatt on March 15, 2012 at 1:56am — 3 Comments

जीवन का सत्य

(१)

सुख औ दु:ख

प्रकृत या प्रारब्ध

मधु औ डंक।

(२)

आग औ धूम

प्रकाश संग तम

शराब गम।

(३)

आशा निराशा

कुछ पाने की आशा

पर हताशा।

(४)

मन है प्यासा

उत्कट अभिलाषा

जीत की आशा।

(५)

हार में जीत

हर जन से प्रीत

रहो निर्भीत।

(६)

पाने की चाह

उमंग औ उत्साह

सरल राह।

(७)

एकाग्र दृष्टि

सफलता की वृष्टि

मन की तुष्टि।

(८)

धैर्य औ ध्यान

उत्साह का उफान

लक्ष्य… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 14, 2012 at 9:00pm — 6 Comments

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