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ग़ज़ल - जीत गाएगी थोड़ा सबर कीजिए - पूनम शुक्ला

2122. 1221. 2212





जा चुकी यामिनी मुश्तहर कीजिए

हो सके अब तो थोड़ा सहर कीजिए



भेज दें गंध जो भी हो आकाश में

गुलशनों को कहीं तो खबर कीजिए



हर तरफ आग ही आग जलती तो है

तान सीना उसे बेअसर कीजिए



झूठ की आज चारों तरफ जीत है

सत्यता की कहानी अमर कीजिए



जुल्म की रात हरदम डराती हमें

जालिमों का खुलासा मगर कीजिए



तीरगी घेर ले गर कभी राह में.

अश्क से फिर न दामन यूँ तर कीजिए.



रेत सी जिन्दगी हाथ आती… Continue

Added by Poonam Shukla on February 27, 2014 at 12:05pm — 9 Comments

शिवरात्रि दोहावली

उत्सव भारत देश के ,करें सभी हम गर्व

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी , महाशिवरात्रि पर्व /



फाल्गुन में शिवरात का होता पर्व विशेष

रंगों भरी फुहार से मिटाओ गिले द्वेष /



मध्यरात अवतरित हो धरा रूप सारंग

गले में सर्प हार औ रमे भस्म से अंग/



रूद्र रूप को देख के भर लो ह्रदय उमंग

शिव शक्ति का मिलनदिवस मनाओ प्रेम संग /



सदा ही मिले आपको शिव का आशीर्वाद

शिव के नित उपवास से मिले दुआ प्रसाद /



धतूरे बेलपत्र से, करना कर्म विशेष…

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Added by Sarita Bhatia on February 26, 2014 at 7:34pm — 14 Comments

आयी चंद्रिका धवल..............( अन्नपूर्णा बाजपेई )

चाँदी के रथ पे सवार लिए जीवन नवल 

चिर प्रीतम संग चंद्रिका आयी धवल .............. 

प्रिय सखी निशा संग 

भरती किलकारियाँ 

गगन से धरा तक 

करती अठखेलियाँ 

रूप किशोरी सी चंद्रिका आयी धवल .........

शशि प्रियतम संग

चमचम सितारों वाली 

श्याम चुनरिया ओढ़े  

धीरे धीरे दबे पाँव 

प्रिय सुंदरी सी चंद्रिका आयी धवल ................ 

दुग्ध अभिसिंचित हये 

सभी तरुवर तड़ाग 

मुसकुराती…

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Added by annapurna bajpai on February 26, 2014 at 4:30pm — 9 Comments

बिटिया [कुण्डलिया]

बिटिया ना अपनी हुई कैसा रहा विधान 

राजा हो या रंक की बिटिया सभी समान /

बिटिया सभी समान रहेंगी सदा बेगानी

छोड़ेगी वो गेह रीत पड़ेगी निभानी 

चाहे गेह अमीर या रही गरीब की कुटिया 

सरिता कहती मान पराई होती बिटिया//…

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Added by Sarita Bhatia on February 26, 2014 at 10:27am — 3 Comments

अतुकांत

बचपन का गाँव

नीम की छांव

छोटा सा कोना

कच्चा सा आँगन

बहुत याद आता है ।

गाँव के मेले 

ढेरों झमेले

दोनें में चाट

बर्फ को गोला

बहुत याद आता है ।

बचपन की सखियाँ

डिब्बे में गुड़ियाँ

छोटा सा गुड्डा

उन से बतयाना

बहुत याद आता है ।

सावन के झूले

हाथों में मेंहदी

काँच की चूड़ी

निवौली की पायल

बहुत याद आते है…

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Added by kalpna mishra bajpai on February 25, 2014 at 8:51pm — 5 Comments

सखि री ! फागुन के दिन आए

सखि री ! फागुन के दिन आए

 

तृषित रूपसी ठगि – ठगि जाए

कलरव  से   गूँजे   अमराई

प्रिय जाने किस  देश  पड़े ?

हर पल , हर क्षण काटे तनहाई ।

सूना – सूना  दिन लागे , साजन  की याद  सताये

सखि री ! फागुन के दिन आए ।

फूली सरसों और पगडंडी –

आज  दिखे सुनसान रे !

करवट लेते रात गुज़र गयी ,

ऐसे  हुयी  विहान  रे !

ऐसे मे कोयलिया रह – रह , हिय  की  आग बढ़ाए

सखि री ! फागुन के दिन आए…

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Added by S. C. Brahmachari on February 25, 2014 at 8:00pm — 6 Comments

तुम बिन प्रिय

कुछ कम रोशन है रोशनी तुम बिन

बरसात कम है गीली तुम बिन

हवाओं में खुश्बू नहीं है तुम बिन

चाँद की कम है चाँदनी तुम बिन

सूरज करे ना उजाला तुम बिन

घर बन गया मकान है तुम बिन

भंवरे नही हैं गुनगुनाते तुम बिन

थम सा गया है वक्त तुम बिन

 

पर मेरी हर ख्वाहिश है तुम से

पर अब भी हर सांस में बसे हो तुम

हर धड़कन में आवाज़ है तुम्हारी

हर पल जैसे छू जाते हो दिल को

हर आहट में अहसास है तुम्हारा

 

पीछे से…

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Added by Sarita Bhatia on February 25, 2014 at 4:00pm — 6 Comments

मेरा विश्वास

जब सब कुछ था

मेरे पास

जो

जीने के लिए काफी था

तुम्हारा प्यार,

तुम्हारा साथ,

तुम्हारा समय

तुम्हारा विश्वास

हमारा साहस

यही सब

मेरी बहुमूल्य पूंजी थी

वो

उड़ान भरते

सुनहरे सपने

जो

हम दोनों ने कभी देखे थे

दुनिया

अपने कदमों में थी

तो किसकी लगी नज़र ?

जो छूटा ...

तुम्हारा प्यार

तुम्हारा साथ

क्यों रुकीं

वो सांसें

वो जिन्दगी

टूटीं उम्मीदें

टूटे सपने

और

साथ ही

टूट…

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Added by Sarita Bhatia on February 25, 2014 at 3:03pm — 21 Comments

मगर अहसास पैदा हो - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

1222    1222    1222    1222



समझ   लूँ  मैं गुनाहों को भला अतवार1 से कैसे

मगर पूछूँ  तरीका  भी   किसी  अबरार2 से कैसे

**

सभी की थी दुआएं तो जला जब भी यहाँ  दीपक

मिटाया पर गया ना तब  बता अनवार3 से कैसे

**

हमेशा  बोलता  था  तू  नहीं  रिश्ता  रहा   कोई

गले लगती बता कमसिन किसी अगियार4 से कैसे

**

जुटा पाया न मैं साहस अना5 की बात कहने को

उलझ वो  भी  गई  पूछे किसी अफगार6 से कैसे

**

सदा लेते जनम वो तो गलत को ठीक करने…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 25, 2014 at 7:00am — 7 Comments

बस यूँ ही ……डर ……

बचपन से डरता रहा

दिल में डर बसता रहा 

बहुत अच्छा हुआ जो

मै नहीं हुआ निडर 

माँ हमेशा कहती थी 

चार लोग देखेंगे तो

क्या कहेंगे 

उन चार लोगो का डर 

पिता कि मार का डर 

अपने पैरों पर खड़े ना हो पाने का डर 

खड़े हुए तो दौड़ ना पाने का डर 

दौड़े  तो गिर जाने का डर 

जवान हुए तो पहचान खोने का डर 

मोहब्ब्त में नाकाम होने का डर 

जब हुई तो उसमे खोने का डर 

गृहस्थी ना चला पाने का डर 

बच्चो को ना पढ़ा…

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Added by pawan amba on February 25, 2014 at 7:00am — 3 Comments

कह-मुकरियाँ (१२ से १८) - कल्पना मिश्रा बाजपेई

12-)

तोल-मोल कर जब ये बोले ।

दिल के तालों को ये खोले ।

कभी ना होती इसे थकान,

क्या सखी साजन ?

ना सखि जुवान !

13-)

भारत माँ का सच्चा लाल ।

लंबा कद और ऊँचा भाल ।

इस पर बनते लाखों गान,

क्या सखि साजन ?

ना सखि जवान !

14-)

सर्दी गर्मी या हो बरसात।

हर दम रहता है तैनात ।

कभी ना करता आले बाले ,

क्या सखि छाते ?

ना सखि ताले!

15-)

गर्मी में मिलता ना…

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Added by kalpna mishra bajpai on February 24, 2014 at 11:00pm — 10 Comments

मोहक वसंत

वसंत

 

बीता कटु शीत शिशिर 

मोहक  वसंत आया

 

पुष्प खिले वृन्तो पर

मुस्काये हर डाली

मादक महक चहुँ दिशा

भरमाये मन आली

तरुण हुई धूप खिली

शीत का अंत आया

बीता कटु शीत शिशिर 

मोहक  वसंत आया

 

प्रिया की सांसों सी

मद भरा ऊषा अनिल  

अंग अंग उमंग रस

जग लगे मधुर स्वप्निल

कुहूक  बोले कोयल

कवि नवल छंद गाया

बीता कटु शीत शिशिर 

मोहक  वसंत आया…

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Added by Neeraj Neer on February 24, 2014 at 10:39pm — 8 Comments

ग़ज़ल : परों को खोलकर अपने, जो किस्मत आजमाते हैं

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

 

गगन का स्नेह पाते हैं, हवा का प्यार पाते हैं

परों को खोलकर अपने, जो किस्मत आजमाते हैं

 

फ़लक पर झूमते हैं, नाचते हैं, गीत गाते हैं

जो उड़ते हैं उन्हें उड़ने के ख़तरे कब डराते हैं

 

परिंदों की नज़र से एक पल गर देख लो दुनिया

न पूछोगे कभी, उड़कर परिंदे क्या कमाते है

 

फ़लक पर सब बराबर हैं यहाँ नाज़ुक परिंदे भी

लड़ें गर सामने से तो विमानों को गिराते हैं

 

जमीं कहती, नई पीढ़ी के पंक्षी…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 24, 2014 at 10:15pm — 21 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सात दोहे –'' रिश्ते ''

सात दोहे – '' रिश्ते ''

*******    ******

नाराजी जो है कहीं , मिल के कर लो बात

खामोशी  देती  रही , हर  रिश्ते  को मात

 

रिश्तों  को  भी चाहिये , इन्जन जैसे तेल

बिना  तेल  देखे बहुत , झटके खाते मेल…

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Added by गिरिराज भंडारी on February 24, 2014 at 9:30pm — 46 Comments

बेटी से खुशनुमा है --नज़्म -सलीम रज़ा

बेटी
बेटी से  खुशनुमा  है  ये  संसार  दोस्तो
रौशन इसी से सारा  है घर-बार  दोस्तो 
.........
बेटी  कही पे माँ  कही  बहना  के  रूप में …
Continue

Added by SALIM RAZA REWA on February 24, 2014 at 9:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल - आज दिल उनका होने वाला है - इमरान ख़ान

********************************

आज दिल उनका होने वाला है

********************************



बहरे खफीफ मुसद्दस मखबून

फ़ायलातुन मुफाएलुन फालुन

2122 1212 22



होश लगता है खोने वाला है,

आज दिल उनका होने वाला है.



हर ख़ुशी जागने लगी दिल की,

ग़म थका है तो सोने वाला है.



कल जो जारो कतार था मंज़र,

हँस रहा देखो रोने वाला है.



रूह ये धूल से भरी मेरी,

आज आकर वो धोने वाला है.



दिल की बंज़र पड़ी ज़मीनों पर,…

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Added by इमरान खान on February 24, 2014 at 9:00pm — 5 Comments

राह के कांटें हुए बलवान भी

"राह  के  कांटें  हुए  बलवान  भी"

आप की खातिर है हाजिर जान भी।

हाथ  का  पंजा  हुआ  हैरान  भी।।



कोरे कागज का कमल खिलता नहीं,

आज कल भौंरे करें पहचान भी।



अब चुनावी दौर का मंजर यहां,

बढ़ रही है रैलियों की शान भी।



भुखमरी-बेकारी सिर चढ़ बोलती,

हर किसी रैली में जन वरदान भी।



खो गर्इ है शान-शौकत-आबरू,

बो रहे हैं लोभ-साजिश-धान भी।



अब भरोसा भी नहीं उस्ताद पर,

गिरगिटों के रंग में…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 24, 2014 at 9:00pm — 13 Comments

दान की लिखता कथा

दान की लिखता कथा

धर्म रेखा

खींच कर

जाति बंधन से बॅधें,

प्रेम सा 

उपकार करते

साधना 

सत्कार से।

उपहास होता कर्म का

अति…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on February 24, 2014 at 7:59pm — 6 Comments

कह-मुकरियाँ - कल्पना मिश्रा बाजपेई

1-)

छू जाता  है तन को मेरे। 

कह जाता  है मन को मेरे ।

उसको हरदम है कुछ कहना,

क्या सखि साजन ?

ना सखि नैना !

2-)

छूते है तन मन को मेरे ।

बिन बोले ही मेरे तेरे ।

मिल जाते हम सब के संग,

क्या सखि साजन ?

ना सखि रंग !

3-)

दिल को मेरे छू जाती है ।

भावनाओं को सहलातीं है ।

इन की नहीं है कोई म्यादे ,

क्या फरियादें ?

ना सखि यादें !

4-)

टिकट…

Continue

Added by kalpna mishra bajpai on February 24, 2014 at 7:30pm — 7 Comments

कह मुकरियाँ -- अन्नपूर्णा बाजपेई

प्रथम प्रयास 

***************

(1)

रखती उसको हिये लगाये 

सबके मन पर वो छा जाये 

उसकी सूरत दिल मे उतरी 

क्या सखि साजन ? न सखि मुंदरी 

(2)  

उसके नाम से ही डरूँ मै 

होती शाम छिपती फिरूँ मै 

आए जब चैन न पाऊँ क्षन भर 

क्या सखि साजन ? ना सखि मच्छर 

(3)

बालक बूढ़े सबको भाये 

बिना उसके चैन नहि पाये 

सुंदर सूरत सुनहरी चाम 

क्या सखि साजन  ? ना सखी…

Continue

Added by annapurna bajpai on February 24, 2014 at 2:30pm — 16 Comments

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