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हिज्र में भी उसकी याद ……

हिज्र में भी उसकी याद ……

आज वो रहगुज़र ..हमें बेगानी सी लगती है

उनके वादों पे यकीं इक नादानी सी लगती है

इक वाद-ऐ-फ़र्दा के साथ उनका यूँ ज़ुदा होना

फिर इंतज़ार उनका इक कहानी सी लगती है

जिनकी आमद से ख़ल्वत जलवत हो जाती थी

दीद-ओ-दिल में वही मूरत .पुरानी सी लगती है

दम भरती थी जो सदा जन्नत तक साथ देने का

तसव्वुर में उसकी तस्वीर .अंजानी सी लगती है

आज मेरे ख्वाब में वो इक शरर बनके चमकी है

हिज्र में भी…

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Added by Sushil Sarna on April 12, 2014 at 4:34pm — 10 Comments

ख़ाक में मिल जाएगा..

कोई कितना चाह ले , शक्ति से क्या वो जीतेगा
शक्ति का एक मौन भी ,उसपर कहर सा बीतेगा
तोड़ क्या पाएगा कोई शक्ति का फिर हौसला
पूज के शक्ति स्वरूपा क्या वो अब बच पाएगा ?
अपने पैरों पर कुल्हाड़ी खुद ही उसने मार ली
घाव अब नासूर होगा कब तलाक सह पाएगा
कब्र में हों पैर जिसके ,आग से है खेलता
कोई क्या काँधे चढ़ेगा ,स्वयं चित में जल जाएगा
दम्भी अभिमानी का दम्भ ,ख़ाक में मिल जाएगा

  मौलिक / अप्रकाशित

Added by Lata R.Ojha on April 12, 2014 at 10:30am — 4 Comments

मेरी माँ

मेरी माँ है सबसे सुन्दर
फूल सरीखी माँ
श्रृद्धा ,त्याग ,तपस्या की
मूरत मेरी माँ
चन्दन और कुमकुम सी
लगती मेरी माँ
बाधाओं से कभी न हारे
ऐसी मेरी माँ
पूजा की घन्टी सी हरदम
बजती मेरी माँ
गीता,वेद,पुराणों में भी
मिलती मेरी माँ
मौलिक व अप्रकाशित

Added by Pragya Srivastava on April 11, 2014 at 11:51pm — 10 Comments

उत्तर दो ! (कविता)

सुन कर द्रोपदी की चित्कार

कलेजा धरती का फटा क्यों नहीं

देख उसके आँसुओं की धार  

अंगारे आसमां ने उगले क्यों नहीं

चुप क्यों थे विदुर व भीष्म

नेत्रहीन तो घृतराष्ट्र थे

द्रोण ने नेत्र क्यों बंद कर लिए

नजरें क्यों चुरा लिए पाँचों पांडवों ने  

कहाँ था अर्जुन का गांडीव

बल कहाँ था महाबली भीम का

क्या कोई वस्तु थी द्रोपदी

जिसे दाँव पर लगा दिया  

ये कौन सा धर्म था धर्मराज ?



कहाँ थे कृष्ण,

वो तो थी सखी तुम्हारी …

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Added by Meena Pathak on April 11, 2014 at 2:00pm — 23 Comments

राजरानी के नवासे आप हैं - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122        2122     2122      212



जानता  हूँ  देह   के  बेलौस  प्यासे  आप  हैं

किन्तु जनता की नजर में संत खासे आप हैं

*

खुशमिजाजी आप की सन्देश देती और कुछ

लोग कहते  यूँ बहुत पीडि़त  जरा से  आप है

*…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 11, 2014 at 11:00am — 14 Comments

बेटियाँ ,बेटी,बिटिया [कुण्डलिया]

1.
बिटिया ना अपनी हुई कैसा रहा विधान 
राजा हो या रंक की बिटिया सभी समान 
बिटिया सभी समान रहेंगी सदा बेगानी
छोड़ो झूठे मोह ,पड़ेगी रीत निभानी 
उसका कहाँ कुसूर मिली गरीब की कुटिया 
सरिता कहती मान पराई होती बिटिया 
संशोधित 
........................................
2.
बेटी ना अपनी हुई, कैसा रहा विधान 
राजा हो या रंक की, बेटी सभी समान 
बेटी सभी समान, कहाँ चलती…
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Added by Sarita Bhatia on April 11, 2014 at 10:25am — 13 Comments

ऐसी ही होती है - माँ (तीन पंक्तियाँ)

मेरी मृत्यु नहीं हुई थी,

इसलिए बिछड़ी नहीं

हमेशा के लिए |

उसने मुझे रहने को

दे दिया बड़ा सा वृद्धाश्रम

कई लोगों के साथ में

कई सालों के लिए

घर से बस थोड़ी सी दूर|

जो रहा था

बस नौ महीने

अकेला

मेरी छोटी सी कोख में |

** मौलिक और अप्रकाशित

 

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on April 10, 2014 at 7:00pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - ' कहीं है आग जलती सी ' ( गिरिराज भंडारी )

1222     1222     1222      1222   

 

कहीं कुछ दर्द ठहरा सा , कहीं है आग जलती सी

कभी सांसे हुई भारी , कभी हसरत मचलती सी

कभी टूटे हुये ख़्वाबों को फिर से जोड़ता सा मै

कभी भूली हुई बातें मेरी यादों में चलती सी

कभी होता यक़ीं सा कुछ , कहीं कुछ बेयक़ीनी है

तुझे पाने की उम्मीदें कभी है हाथ मलती सी

कभी महफिल में तेरी रह के मै तनहा सा रहता हूँ

कभी तनहाइयों में संग पूरी भीड़ चलती सी

कभी बेबात ही…

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Added by गिरिराज भंडारी on April 10, 2014 at 4:00pm — 43 Comments

नन्ही गुड़िया ( कुण्डलिया छंद )

नन्ही गुड़िया चंचला ,खेले दौड़े खूब । 

नन्हे नन्हे पाँव हैं ,मनभावन है रूप ॥ 

मनभावन है रूप , तोतली बातें करती । 

बात बात मुस्कात ,सभी के मन को हरती॥ 

करे सभी  से प्यार ,हमारी प्यारी मुन्नी । 

सभी लड़ाते लाड़, मोहिनी गुड़िया नन्ही ।। 

अप्रकाशित एवं मौलिक 

Added by annapurna bajpai on April 10, 2014 at 12:00pm — 14 Comments

कुछ दोहे आज के हालात पर (भाग - 2)

रट्टू तोते की तरह, क्यों रटते दिन रात

दादा जी का नाम भी, गूगल पर मिलि जात



त्रेता के सज्जन कहैं, सबके दाता राम

कलियुग के ढोंगी कहैं, हमरे आशाराम



दिन भर आगे सेठ के, डरि के दुम्म हिलायँ

साँझ ढले पव्वा लगै, अउर शेर हुइ जायँ



हफ्ते में तो चार दिन, काटैं मदिरा माँस

बाकी के कुल तीन दिन, धरम करम उपवास



अबला से सबला हुई, नाच नचावैं आज

बाबू जी की खोपड़ी, बजा रहीं ज्यों साज



गुरु से चेला बीस अब, देय रहा है…

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Added by VISHAAL CHARCHCHIT on April 9, 2014 at 10:59pm — 18 Comments

चुनावी बाज़ार

 

1

गिरते – गिराते

उठा-पटक 

शातिर चालें

शह और मात

जूतम पैजार

चमकाते हथियार

भड़काते विचार  

हो जाइए तैयार

फिर गरम है

चुनावी बाज़ार ।

 

2

 

चापलूसों की फौज

शहीदों का अपमान

गिरती इंसानियत

बेचते ईमान   

लड़ते –लड़ाते

शोर मचाते

लक्ष्य है जीत।

 

3

झूठ पे झूठ

आरोप प्रत्यारोप

काम का दिखावा

बातों से…

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Added by नादिर ख़ान on April 9, 2014 at 9:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल

221  2121, 1221, 212 , 

इक ग़म में जब से मुब्तला रहने लगा हूँ मैं 

अपने वुजूद से खफा रहने लगा हूँ मैं...

देखा था बेनकाब किसी रोज़ चाँद को 

खिड़की के सामने खड़ा रहने लगा हूँ मैं ...

कागज़ पे इक रिसाले के छप कर मैं क्या करूँ 

अब तेरे दिल में दिलरुबा रहने लगा हूँ मैं .....

दिल को नहीं सुहाता है शोरे तरब ज़रा 

बज़्मे तरब में सहमा सा रहने लगा हूँ मैं....…

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Added by Ajay Agyat on April 9, 2014 at 7:30pm — 4 Comments

एक दूसरे के प्रति त्याग और समर्पण ही सच्चा प्रेम है

एक स्त्री का जब जन्म होता है तभी से उसके लालन पालन और संस्कारों में स्त्रीयोचित गुण डाले जाने लगते हैं | जैसे-जैसे वो बड़ी होती है उसके अन्दर वो गुण विकसित होने लगते है | प्रेम, धैर्य, समर्पण, त्याग ये सभी भावनाएं वो किसी के लिए संजोने लगती है और यूँ ही मन ही मन किसी अनजाने अनदेखे राज कुमार के सपने देखने लगती है और उसी अनजाने से मन ही मन प्रेम करने लगती है | किशोरा अवस्था का प्रेम यौवन तक परिपक्व हो जाता है, तभी दस्तक होती है दिल पर और घर में राजकुमार के स्वागत की तैयारी होने लगती है | गाजे…

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Added by Meena Pathak on April 9, 2014 at 6:40pm — 18 Comments

साथ उनका मिला

चल रहे थे अकेले हम वो मिल गये

साथ उनका मिला बुझे दीप जल गये



बीत गये हमारे पल इंतजार के

बंध गये थे हम धागो में प्‍यार के

जिन्‍दगी में चाहत के फूल खिल गये

साथ उनका मिला बुझे दीप जल गये

चल रहे थे अकेले हम वो मिल गये



हर चाहतो को मेरी जानने लगे

आँखो की भाषा को पहचाने लगे

जीवन के रंग ढ़ग सभी बदल गये

साथ उनका मिला बुझे दीप जल गये

चल रहे थे अकेले हम वो मिल गये



इक दिन जाने कैसा आया जलजला

टूट गया उसके आने का…

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Added by Akhand Gahmari on April 9, 2014 at 5:30pm — 10 Comments

कविता : पूँजीवादी ईश्वर

फल, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य,…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 9, 2014 at 10:30am — 26 Comments

मेरे जीवन के मधुबन में : गीत /नीरज नीर

सुगंध बनकर आ जाओ तुम

मेरे जीवन के मधुबन में

प्रेम सिंचित हरी वसुंधरा

पल पल में जीवन महकाओ

परितप्त ह्रदय के मरुतल पर

मेघा दल बन कर छा जाओ

बस जाओ न प्रतिबिम्ब बनकर

मेरे जीवन के दर्पण में.

सुगंध बनकर आ जाओ तुम

मेरे जीवन के मधुबन में ..

तुझ से ही है मेरा होना

तुझ से मिलकर हँसना रोना

तुम चन्दा , मैं टिम टिम तारा

अर्पण तुझ पर जीवन सारा

तुझ से दूर रहूँ मैं कैसे

आसक्त बंधा हूँ बंधन में

सुगंध बनकर आ जाओ…

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Added by Neeraj Neer on April 9, 2014 at 10:01am — 14 Comments

ग़जल

चल पड़े राह जो गुनाह में थे । 
गुम गए वो सभी सियाह में थे । 


वो क्या थी अदा हमें दिखाई ,
जब हमारी रहे निगाह में थे । 


वो  क्या ये बतायें तुझे अब ,
जब रहे वो न उस सलाह में थे । 


हम कहें भी क्या तो वेसा क्या ,
जब रहे हम उसी पनाह में थे । 


क्यों  लगे  वो यहीं रुके  होंगे ,
जो  सदा के लिए प्रवाह में थे। 

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by मोहन बेगोवाल on April 9, 2014 at 1:00am — 7 Comments

आखिर, कितने दिनों के वास्ते ?

खिलना नहीं है बाग में

मिलना है जिसको खाक में

ध्यान में उसका धरूँ

कितने दिनों के वास्ते ?

विश्वास अपनों का धरूँ

उपहास अपना क्यों करूँ ?

इतिहास अपना ही लिखूँ

कितने दिनों के वास्ते ?

अवसाद सपनों पर करूँ

फरियाद अपनों से करूँ

नित याद में खोई रहूँ

कितने दिनों के वास्ते ?

अभिमान मन की भूल है 

अरमान मन की चूक है

इस चूक को वरदान समझूँ

कितने दिनों के वास्ते…

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Added by kalpna mishra bajpai on April 8, 2014 at 11:00pm — 22 Comments

सह विनाश या सह विकास

सह विनाश या सह विकास  

 

दुनियाँ

परमाणु बम पर बैठी हुयी है

बस एक हिट की –

ज़रूरत है ,

मनु – युग मे जाने की

ज़रूरत नहीं होगी

तब मालूम होगा

अस्तित्व

सह विनाश का ।

पर यदि

नयी उमर की  नयी फसल -

देखनी है

तो सम्राट अशोक को

फिर से

बुद्ध के शरण मे आना होगा

गांधी और किंग की भावनाओं को

अपनाना होगा

फिर कल – कारखानों से 

सुमधुर संगीत जो…

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Added by S. C. Brahmachari on April 8, 2014 at 9:47pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आंखों देखी – 15 बैरागी अभियात्री, साधारण इंसान

आंखों देखी – 15  बैरागी अभियात्री, साधारण इंसान

     आसमान में बादल थे लेकिन दृश्यता (visibility) अच्छी होने के कारण छठे अभियान दल के दलनेता ने दक्षिण गंगोत्री आने का निर्णय लिया. नियमानुसार, जहाज़ के अंटार्कटिका पहुँचने के साथ ही अभियान की पूरी कमान नए दल के दलनेता के हाथों आ जाती है हालाँकि वे हालात के अनुसार लगभग सभी निर्णय शीतकालीन दल के स्टेशन कमाण्डर के साथ विचार-विमर्श करने के बाद ही लेते हैं. शिष्टाचार के अतिरिक्त इसका मुख्य कारण है शीतकालीन दल का विशाल अनुभव…

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Added by sharadindu mukerji on April 8, 2014 at 5:15pm — 4 Comments

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