For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

चुनावी वर्ल्ड-कप ( कविता )

देख चुनावी वर्ल्ड कप, का सज गया मैदान

ट्रोफी इसकी पाने को , सब नेतागन परेशान

 

सोच रहे हैं सब कैसे,  मतदाता को रिझायें

कम ओवर मैं अब कैसे, रन तेजी से बनायें

 

कैसे उसे मनाये जो, मतदाता पहले से रूठा

निकल जाये न मैच, कैच जो हाथों से छूटा

 

जो बॉलर भी आये समक्ष, उसको मारो बल्ला

चाहे चौका लग न पाये, मचे छक्के का हल्ला

 

जीतेंगे है हर हाल मैं हमतो, ठोंक रहे हैं ताल

गति गेंद की तेज रहे चाहे, हो जाये नो…

Continue

Added by Sachin Dev on April 8, 2014 at 4:30pm — 8 Comments

राम तुम्हें फिर.../गज़ल/कल्पना रामानी

मात्रिक छंद

असुरों के सुर उच्च हुए हैं, मौन मंत्र सिखलाना होगा।

राम, तुम्हें  फिर से कलियुग में, भारत भू पर आना होगा।

 

ओढ़ चदरिया राम नाम की, घूम रहे चहुं ओर अधर्मी।

धर्म-पंथ उनको दिखलाकर, गूढ़-ज्ञान  फैलाना होगा।

 

मानवता का ढोंग रचाकर, रावण ताज सजा …

Continue

Added by कल्पना रामानी on April 8, 2014 at 11:00am — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
चिन्दियाँ इतिहास की, रूहों तलक फिर जाएँगी ग़ज़ल (राज )

२१२२  २१२२ २१२२  २१२ 

रोक लो तूफ़ान चिंगारी भड़क फ़िर जाएँगी

नफ़रती लपटें जमीं से अर्श तक फ़िर जाएँगी

 

इन दरारों पे जरा आँचल बिछा कर छाँव दो   

आंच पाकर बैर की वरना दहक फ़िर जाएँगी

 

अम्न- ओ-इंसानियत से चूर थी  गलियाँ यहाँ 

देख वो अपने उसूलों से भटक फ़िर जाएँगी  

 

खाई जाती थी कसम जो  दोस्ती के दरमियाँ 

उस वफ़ा की पाक़  मीनारें चटक  फ़िर जाएँगी

 

फिर झडेंगे शाखों से पत्ते ख़जां आये बिना   

बिजलियाँ जब उन…

Continue

Added by rajesh kumari on April 8, 2014 at 11:00am — 14 Comments

कुछ चुनावी दोहे-लक्ष्मण लडीवाला

पहन मुखौटा घूमते, आया पास चुनाव,

खेती बो विश्वास की, तापे खूब अलाव । 

 

छलियाँ बनकर लूटने, करे प्रेम की बात,

सबकी बाते मानते,  दिन हो चाहे रात ।

 

मीठा मंतर मारते, मन में रखते खोट,

बंजर को उर्वर कहे, लेने इनको वोट । 

 

पाखण्डी कुछ आ गए, देख हमारे गाँव,

आकर लूटे  कारवाँ,  बोझिल से है पाँव ।

 

देख हवा के रूख को, झट पलटी खा जाय, 

अपने दल को छोड़कर, दूजे दल में जाय |

 

होड़ लगी है मंच पर, फिसला…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 8, 2014 at 9:43am — 12 Comments

बस्ती में कोई बच्चा नहीं देखा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

1222 1222 1222 1222

***

सियासत पूछ मत तुझमें पतन क्या-क्या नहीं देखा

बहुत  खुदगर्ज  देखे  हैं  मगर  तुझ  सा  नहीं  देखा

**

महज  कुर्सी को  दुश्मन से  करे तू लाख  समझौते

चरित तुझ सा  किसी का भी  यहाँ गिरता नहीं देखा

**

सपन में भी दिखा करती मुझे तो बस सियासत ही

सियासत से  मगर कच्चा  कोई  रिश्ता  नहीं  देखा

**

बराबर  बाटते   देखी   मुहब्बत  भी   समानों  सी

बड़ा-छोटा  करे  माँ  प्यार  का  हिस्सा  नहीं …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 7, 2014 at 12:30pm — 23 Comments

बंटवारा....(लघु-कथा)

  “अरे! रामेश्वर भाई..समझ नही आता क्या करें ? किस को क्या समझाएं ? किस दुःख में शामिल होने चलें?”

“सही कह रहे हो..तुम किशन भाई, वहां बेचारे दीनानाथ जी का शव अंतिम संस्कार की राह देख रहा है और उनके चारों बेटे आपस में बटवारे को लेकर झगड़ रहे है..”

" हाँ भाई..! रामेश्वर ,  दीनानाथ जी ने अपनी अर्थी के लिए चार काँधे तैयार किये थे, न जाने क्या कमी रह गई "

 

   जितेन्द्र 'गीत'

(मौलिक व् अप्रकाशित)

 

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on April 7, 2014 at 11:09am — 30 Comments

गज़ल - जलते नयन बेतहाशा - इमरान

221 221 22



ठंडी पवन बेतहाशा,

जलते नयन बेतहाशा।



धरती पराई, सताये,

यादे वतन बेतहाशा।



ज़िन्दा अगर हो तो सुन्न क्यों,

ख़ूने बदन बेतहाशा।



मैला बदन कैसे पहनूँ,

उजला क़फन बेतहाशा।



मौसम चुनावी, मिलेंगे,

झूठे वचन बेतहाशा।



नेता न छोड़ेंगे करने,

भारी गबन बेतहाशा।



माज़ी जिगर का बना है,

कोई वज़न बेतहाशा।



मिलने लगे हैं कुछ अपने,

डाले शिकन बेतहाशा।



देखो न अंधा बना… Continue

Added by इमरान खान on April 6, 2014 at 8:30pm — 31 Comments

अब होश करौ .....

अब होश करौ मदहोश न हो,

नहीं तौ फिर से दुख पइहौ।

उप्पर सफेद अंदर करिया,

ई नेता केर स्वरूप आय।

घड़ियाली आंसू ढुरुकि क्यार,

वोटन का लेवैक रूप आय।

जौ जाति धर्म मां बंटि जइहौ,

तौ पांच साल तक पछितइहौ

अब होश करौ मदहोश न हो,

नाहीं तौ फिर से................।

ई प्रजा तंत्र तब बचि पाई,

जब रिश्ता नाता ना देखौ,

टेटे कै पैसा ना लेखौ,

गाड़ी कै बवंडर ना देखौ।

अब होश करौ मदहोश न हो,

नाहीं तौ फिर से................।

ई देश बचावै के खातिर,

गुंडन…

Continue

Added by Atul Chandra Awsathi *अतुल* on April 6, 2014 at 7:14pm — 7 Comments

गाँव , मसान एवं गुडगाँव

गाँव की फिजाओं में

अब नहीं गूंजते

बैलों के घूँघरू ,

रहट की आवाज.

नहीं दिखते मक्के के खेत

और ऊँचे मचान .

उल्लास हीन गलियां

सूना दृश्य

मानो उजड़ा मसान.

नहीं गूंजती  गांवों में

ढोलक की थाप पर

चैता की तान

गाँव में नहीं रहते अब

पहले से बांके जवान.

गाँव के युवा गए सूरत, दिल्ली और

गुडगांव

पीछे हैं पड़े

बच्चे , स्त्रियाँ, बेवा व बूढ़े

गाँव के स्कूलों में शिक्षा की जगह

बटती है खिचड़ी.

मास्टर साहब…

Continue

Added by Neeraj Neer on April 6, 2014 at 12:30pm — 26 Comments

मुक्तक // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा //

मुक्तक

-------

मै भी खुश और तुम भी खुश लेकिन दुखिया सारा संसार

कथनी करनी में भेद रखता कैसे हो सुखी परिवार

आओ मिल हम खुशियां बोयें उन्नत हो सकल संस्कार

टुकड़ों में हम बंटे है फिरते सबका एक जगत आधार

------------------------------------------------------

जिंदगी की भाग दौड़ में रास्ते बदल जाते हैं

लाख रंजिश सही मिलते ही कदम ठहर जाते हैं

आसां नही यूँ ही किसी को इस कदर भुला देना

जख्म इतने सीने में सूखते फिर हरे हो जाते हैं…

Continue

Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 5, 2014 at 9:47pm — 21 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक सवाल

उसे मजदूरी में जितने रूपये मिले थे उसकी रोटियाँ खरीदी और खाने के बाद दो रोटियाँ बचा ली, उसने सोचा कल पता नहीं काम मिले या नहीं, इतने में उसकी नज़र एक बच्चे पर पड़ी वो उन रोटियो की तरफ कातर दृष्टि से देख रहा था। उसे दया आ गई, उसने रोटियाँ उस बच्चे को दे दी।

 

उधर -  एक आम मध्यमवर्गीय परिवार में शादी थी मेहमानों के चले जाने के बाद काफी खाना बच गया था इतना कि कम से कम 20 भूखे पेट भर सकते थे। मेजबान से पूछा गया इस खाने का क्या करें ? ……………?

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by शिज्जु "शकूर" on April 5, 2014 at 8:30pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - कचरों को दबाया जा रहा है ( गिरिराज भन्डारी )

2122     2122     2122     2122

चद्दरों से, सिर्फ़ कचरों को दबाया जा रहा है

साफ सुथरा इस तरह खुद को जताया जा रहा है

 

लूट के लंगोट भी बाज़ार में नंग़ा किये थे

फिर वही लंगोट दे हमको मनाया जा रहा है

 

रोशनी सूरज की सहनी जब हुई…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on April 5, 2014 at 4:00pm — 31 Comments

(कामरूप छंद) नकल न करें-अकल लगायें -अखिलेशकृष्ण श्रीवास्तव

(1)

अंग्रेजियत का, दंभ भरते, क्या दिये संस्कार।

रावण बनें कुछ, कंस भी हैं, पूतना भरमार ॥

नारी सुरक्षा, देश रक्षा, विफल है सरकार।

हैं बलात्कारी, आततायी,  व्याप्त भ्रष्टाचार ॥

              

(2)

नेता लफंगे, संग चमचे, जब पधारे गाँव।

वो गिड़गिड़ायें, वोट माँगें, पकड़ सब के पाँव॥

जीते अगर तो, भूल से भी, दिखें न बदमाश।

मंत्री बने तो, देश का फिर, करें…

Continue

Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on April 5, 2014 at 11:30am — 17 Comments

समय हमें क्या दिखा रहा है/गज़ल/कल्पना रामानी

1212212122

समय हमें क्या दिखा रहा है।

कहाँ ज़माना ये जा रहा है।

 

कोई बनाता है घर तो कोई,

बने हुए को ढहा रहा है।

 

बुझाए लाखों के दीप जिसने,

वो रोशनी में नहा रहा है।

 

गुलों को माली ही बेदखल कर,

चमन में काँटे उगा रहा है।

 

कुचलता आया जहाँ उसी को,

जो फूल खुशबू लुटा रहा है।

 

जो बीज बोकर उगाता रोटी,

वो भूख से बिलबिला रहा है।

 

हो बाढ़ या सूखा दीन का तो,

सदा…

Continue

Added by कल्पना रामानी on April 5, 2014 at 9:50am — 24 Comments

चेतनाहीन

चेतनाहीन

 

मैं

एक सपेरा हूँ , मदारी हूँ

कश्मीर से कन्या कुमारी , और –

गुजरात से अरुणाचल तक

दिल्ली

मेरी पिटारी है ।

बंद हैं इसमे काले विषधर साँप , बंदर

पर अफसोस –

ये गाँधीवादी नहीं

इनके आँख , कान और मुंह

सभी बंद हैं

क्यूँ कि ये अवसरवादी हैं ।

मैं गाँधी

एक सपेरा , मदारी !

खड़ा बजा रहा हूँ बीन

पर , अफसोस –

ये चेतनाहीन हो गए से लगते हैं ।

-------…

Continue

Added by S. C. Brahmachari on April 4, 2014 at 9:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल -इक वहीँ से मुकद्दर दिला दीजिए

एक पुरानी ग़ज़ल -

२१२२    १२२१   २२१२

बेकली मेरे दिल की मिटा दीजिए

ऐ मेरे चारागर कुछ दवा दीजिए

 

कुछ तो जज्बात मेरे समझिए जरा

कुछ तो मेरी वफ़ा का सिला दीजिए

 

दिल धुआं है मगर…

Continue

Added by sanju shabdita on April 4, 2014 at 8:27pm — 26 Comments

खुश रहना

 5 हायकु

उदास हम

हो गये हैं फिर से

छले जो गये

मिले वो हमें

जिन्दगी बन कर…

Continue

Added by Akhand Gahmari on April 4, 2014 at 7:13pm — 6 Comments

पूछना उनसे

आँख कान और जुबान की सांकल खुले तो

पूछना उनसे

जिंदाबाद का नारा लगानेवालों में

कितने ज़िंदा थे यकीनन|  

पूछना आँखे खुल जाने के बाद

रोज निगली जाने वाली मक्खियों का स्वाद

पूछना वर्तनी उन गालियों का

जिसके एक छोर पर माँ तो दूसरे छोर पर

अक्सर बहने हुआ करती है|  

मगर मत पूछना जुबान से

उस मांसल देह का स्वाद

जिसकी कन्दराओं में ना जाने

कितनी माँए और बहने दुबकी होती है

मगर एक बार पूछना जरुर

इन सांकलों के खुल…

Continue

Added by Gul Sarika Thakur on April 4, 2014 at 2:00pm — 6 Comments

दिल तो दीवाना हुआ

दिल तो दीवाना हुआ

 

आपका इस घर मे कुछ इस तरह आना हुआ

ऐसा लगता है यह घर है आपका जाना हुआ ।

मुझको तो मालूम न था आप यूं छा जाएँगे

रेशमी ज़ुल्फों मे मुझको , यूं छुपा ले जाएँगे । 

आपकी ज़ुल्फों मे खोये  सुबह का आना हुआ

ऐसा लगता है यह घर है आपका जाना हुआ ।।

आप सावन की घटा हैं, या हैं फागुन की बहार ?

अब गले लग जाइए , मत देखिये यूं बार बार ।

नयन है मदहोश अब  तो प्यार पैमाना  हुआ

ऐसा लगता है यह घर है  आपका…

Continue

Added by S. C. Brahmachari on April 3, 2014 at 8:30pm — 6 Comments

गजल......उड़ रहा मानव नियति आवाक है.......

गजल......

अरकान--2122 2121 212

जिन्दगी की तीव्र गति आवाक है।

सोच कर दिन-रात मति आवाक है।।

बस चुनावी दौर का सुरूर अब,

उड़ रहा मानव नियति आवाक है।

चॉंद छिप कर सोचता वो क्या करे,

बादलों का खौफ रति आवाक है।

पीर के पत्थर पिघल के सो गए,

नग्न पर्वत देख यति आवाक है।

नारि तुलसी-गौतमी औ द्राैपदी,

पूॅूछती हैं प्रश्न पति आवाक है।

घोर कलियुग पाप का आधार जब,

धर्म के पथ पर जयति आवाक…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 3, 2014 at 8:09pm — 6 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11
जगदानन्द झा 'मनु' replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय, प्रणाम संगहि संग हार्दिक धन्यवाद। अपनेक मार्गदर्शन पाबि बहुत बेसी मोटिवेशन आ सीखक मिलैए…"
Sep 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to जगदानन्द झा 'मनु''s discussion गजल in the group मैथिली साहित्य
"आदरणीय जगदानन्द झा मनु जी, अहाँ बड्ड नीक गजल पठेलियै. सबसे पहिल, त हम प्रयुक्त भेल बहरक विषय में…"
Aug 18
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके…"
Aug 15
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post हरिगीतिका छंद
"आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी सादर, प्रस्तुत छंदों पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार.…"
Aug 15

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service