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ये कैसी धुन है !

सबकुछ जाने सबकुछ समझे  

पागल ये फिर भी धुन है

औचक टूट गए सपनों की

उचटी आँखों की धुन है |

 

इस धुन की ना जीभ सलामत

ना इस धुन के होठ सलामत   

लँगड़े, बहरे, अंधे मन की  

व्याकुल ये कैसी धुन है |  

 

खेल-खिलौने टूटे-फूटे   

भरे पोटली चिथड़े-पुथड़े

अत्तल-पत्तल बाँह दबाए

खोले-बाँधे की धुन है |

 

क्या खोया-पाना, ना पाना  

अता-पता न कोई ठिकाना

भरे शहर की अटरी-पटरी  

पर…

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Added by Santlal Karun on September 4, 2014 at 8:12pm — 27 Comments

चाहें पिया का हो घर परदेश में, पीहर तो मेरा है, तेरा घर कृष्णा !!

चाहें पिया का हो घर परदेश में, पीहर तो मेरा है, तेरा घर कृष्णा !!

मोहब्बत का पहला पयाम कृष्णा, उगता हुआ सा जैसे चाँद कृष्णा !

बिन तेरे महफ़िलों में नूर नहीं है, मोहब्बत का तुझे है सलाम कृष्णा !!

सर पे रखा हो जैसे दस्ते खुदा, मंजिल-ए-इश्क है राधेनाम कृष्णा !

मुझे तो नदिया की धार सा लगे, जैसे रिश्तों का घुला जाम कृष्णा !!

मुझे मिल जाए बस तेरी दुआ, तू है सबकी निगाहों का प्यार कृष्णा !

माँ का दुलार, पिता का प्यार सा लगे, मेरे लिए तो भाई का दुलार कृष्णा !!…

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Added by sunita dohare on September 4, 2014 at 7:00pm — 12 Comments

अनोखा ममत्व (लघुकथा)

आज पूरे दो वर्ष बाद बेटा घर आया था, माँ कि पथराई आँखों में जैसे खुशियों का शैलाब उमड़ पड़ा हो। रमेश अपने माँ-बाप का इकलौता बेटा था। शादी होने के बाद पत्नी को लेकर शहर में ही रहने लगा था। घर पर पैसा बराबर भेजता रहता था, पर पैसो में वो आत्मसुख कहा जो अपने आँख के तारे के पास होने में है। दो दिन किसी तरह रहने के बाद ही वह वापस जाने की जिद करने लगा। नौकरी छोड़ के आया हूँ, बीबी अकेली है, छुट्टी कम ही मिली है, फिर जल्दी ही आ जाऊँगा, तमाम बहाने बनाने लगा। माँ बाप भी बेबस थें, बेचारे क्या करतें,…

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Added by Pawan Kumar on September 4, 2014 at 5:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल-निलेश "नूर"

२१२२/११२२/22 (११२)

.

यूँ वफ़ाओं का सिला मिलता रहा,

ज़ख्म हर बार नया मिलता रहा.

.

एक छोटी सी मुहब्बत का गुनाह,

और इल्ज़ाम बड़ा मिलता रहा.

.

मै तुझे दोस्त मेरा कैसे कहूँ,

तू भी तो बन के ख़ुदा मिलता रहा..

.

कोई मंज़िल न मिली मंज़िल पर,

सिर्फ मंज़िल का पता मिलता रहा.

.…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on September 4, 2014 at 4:30pm — 27 Comments

हिन्‍दी पखवाड़े पर 2 कुण्‍डलिया छंद

1-

मोबाइल की क्रांति से, सम्‍मोहित जग आज।

वैसी ही इक क्रांति की, बहुत जरूरत आज।

बहुत जरूरत आज, देश समवेत खिलेगा।

कितनी है परवाज, तभी संकेत मिलेगा।

आए वैसा दौर, अब हिन्‍दी की क्रांति से।

आया जैसे दौर, मोबाइल की क्रांति से।…

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Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on September 4, 2014 at 3:00pm — No Comments

नाम चाहे हो जुदा सब का है मालिक इक ही

समस्त गुरुओं को सादर प्रणाम के साथ 

2122     2122  2122     22/112 

रास्ता रब का हमें जिसने दिखाया यारों 

कह गुरु उसको है  सर हमने झुकाया यारों 

ज्ञान दीपक से किया जिसने जहाँ को रोशन 

फन भी जीने का हमें उसने सिखाया यारों 

भेद मजहब में कभी उसने किया ही है नहीं 

पाठ उल्फत का ही कौमों को पढ़ाया यारों 

नाम चाहे हो जुदा सब का है मालिक इक ही 

गूढ़ बातों को सहज उसने बताया यारों 

हाथ अन्दर से…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on September 4, 2014 at 12:46pm — 12 Comments

क्षणिकाएँ (पवन कुमार)

1-मेरी अधूरी कहानी
बस इतनी सी है,
मैं ढूढता रहा
वो मिला ही नही।

2-बंद आँखों से
सिर्फ वो नजर आता है,
एकदम खुशनुमा,
सुबह की पहली किरण की तरह।

3-प्यार में उससे,
सबकुछ मिला,
सिर्फ
प्यार के सिवा।

4-तुम्हे
याद करना,
पास होने जैसा ही तो है,
फर्क बस इतना है कि,
यादों में तुम साथ होते हो,
और पास होने पर दूरी बनी रहती है।

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Pawan Kumar on September 4, 2014 at 11:00am — 1 Comment

मिलन

मिलन

.

क्या मिलन परिणाम यही है ?

.

संध्या मिलन के हित वासर 

निज अस्तित्व को खो देता 

नद नदी में ,नदी उदधि में 

मिल खोते स्वनाम सभी हैं |

क्या मिलन परिणाम यही है ?

.

जब जब मिले धनुष से तीर 

पलटे वो खाकर दुत्कार 

लक्ष्य से मिल जाये यदि तो 

करता घायल प्राण यही है |

क्या मिलन परिणाम यही है ?

.

क्षिति मिलन के हित से अम्बर 

झुकने पर बाध्य नित्य हुआ 

दिशा मिलन की असीम दौड़ 

कि दौड़ा पवमान नहीं है ||

क्या मिलन परिणाम…

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Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on September 4, 2014 at 7:47am — 1 Comment

ग़जल ( बेमौसमी बादल )

अब खतरनाक हो गया बादल
या कहें बेलगाम है पागल

कोई तो इन्द्र को ये समझाये,
कर रहा है किसान को घायल

आसमाँ ने कहा शराबी है,
मेघ नाचे है बाँध कर पायल

ओ रे मूर्ख खडी फ़सल को देख,
बालियों में है धूधिया चावल

गडगडाहट करे, डराये है,
बिजलियाँ हो रही तेरी कायल

.
मौलिक व अप्रकाशित

Added by सूबे सिंह सुजान on September 4, 2014 at 12:00am — 8 Comments

क्षणिकाएँ -2 ---डा० विजय शंकर

गधा ,

वास्तव में उतना गधा

नहीं होता है , जितना

गधे उसे गधा समझते हैं ||



* * * * * * * * * * * * * * * * * *

भैंस के लिए हर रास्ता,हर द्वार ,

हर मंच खुला रहना चाहिए |

बंद करो अकल को बाड़े में ,

वहां पर सख्त पहरा रहना चाहिए ॥



* * * * * * * * * * * * * * * * * *

उल्लू बनाइँग , उल्लू बनाइँग ,

काहे को उल्लू बनाइँग ,

कृपया कउनों के उल्लू न बनाइँग

आप जेहि के उल्लू बनाइँग

वही लक्ष्मी के लइके

लॉन्गड्राइव पे निकल जाईं… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on September 3, 2014 at 8:50pm — 8 Comments

हिन्दी - अपने ही घर में दासी (अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव)

अपने ही घर में दासी हिंदी                           

   हिंदी धीरे- धीरे समृद्ध हुई और फली फूली है। संस्कृत के सरल शब्दों, क्षेत्रीय बोलियाँ / भाषाओं को लेकर आगे बढ़ी, पवित्र गंगा की तरह लगातार कठिनाईयों को पार करते हुए । उर्दू , अरबी, फारसी आदि भी छोटी नदियों की तरह इसमें शामिल होती गईं जिससे हिंदी और मधुर हो गई। आज हिंदी के पास विश्व की किसी भी भाषा से अधिक शब्द हैं। लेकिन आजादी के बाद से सरकार की नीति से हिंदी निरंतर उपेक्षित होती गई। हिंदी के शब्द कोष में…

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Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on September 3, 2014 at 8:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल : खुदा से पूछता ये बात कब तक।

1222/1222/122

खुदा से पूछता ये बात कब तक।

कि सुधरेंगे मिरे हालात कब तक।।

मैं शर्मा हूँ कि वर्मा हूँ कि क्या हूँ

भला पूछोगे मेरी ज़ात कब तक।।

ज़माने कम से कम ये तो बता दे।

मुझे मिलती रहेगी मात कब तक।।

उजालों से हमेशा पूछता हूँ।

रहेगी ये अँधेरी रात कब तक।।

मेरे आकाश से होती रहेगी।

सुनो तेज़ाब की बरसात कब तक।।

वो देखेगा मुझे मुड कर कभी क्या।

वो समझेगा मिरे जज़्बात कब…

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Added by Ketan Kamaal on September 3, 2014 at 7:30pm — 17 Comments

सच कहता हूँ यारो मै - ( गजल ) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2222    2222    2222    222

*******************************

रिश्ते उधड़े खुद ही सिलना सच कहता हूँ यारो मैं

औरों  को  मत रोते दिखना सच कहता हूँ यारो मैं

***

अपना  हो  या  बेगाना  हो  सुख  में  ही अपना होता

जब भी मिलना हॅसके मिलना सच कहता हूँ यारो मैं

***

चाहे भाये कुछ पल लेकिन आगे चलकर दुख देगा

उम्मीदों  से  जादा  मिलना सच कहता हूँ यारो मैं

***

दुख से सुख का सुख से दुख का मौसम जैसा नाता है

हर  मौसम  को  अपना  कहना सच कहता हूँ यारो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 3, 2014 at 12:00pm — 13 Comments

हिन्‍दी दिवस पखवाड़े पर एक नवगीत

जन निनाद से ही

मंजिल तय हो

निश्चय ही। 

विश्‍वभाषाओं संग हो

हिंदी निश्‍चय ही। 

 

हिन्‍दी विश्‍वपटल पर चर्चित

पर्व मनायें 

अब समवेत स्‍वरों में

गौरवगाथा…

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Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on September 3, 2014 at 8:41am — 6 Comments

ग़ज़ल -

रदीफ़- रही

काफ़िया -चलती , ढलती

अर्कान -२१२२,२१२२,२१२२,२१२

दायरों में ही सिमट कर जिंदगी ढलती रही

तुम फलक थे मैं जमीं औ कश्मकश चलती रही।

मायने थे रौशनी के रात भर उनके लिये

लौ दिये की थरथराती ताक में जलती रही।

दे रहा दाता मुझे खुशियाँ हमेशा बेशुमार

फिर कमी किस बात की जाने हमें खलती रही।

ज़िद ज़माने को दिखाने की रही थी बेवजह

जानि - पहिचानी मुसीबत कोख में पलती रही।

हौसला रखकर फ़तह का जंग हम…

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Added by dr lalit mohan pant on September 3, 2014 at 1:30am — 9 Comments

हिन्दी गीत

आओ हिन्दी पढें-पढायें हम..

मिलके हिन्दी के गीत गायें हम....

जैसा लिखते हैं वैसा उच्चारण,

इसलिये हिन्दी को करें धारण

विश्व को आओ सच बतायें हम..

मिलके हिन्दी के गीत गायें हम.....

सभ्यता लिप्त हिन्दी भाषा में

एक इतिहास जिसकी गाथा में 

अपनी गाथायें मत भुलायें हम...

आओ हिन्दी पढें-पढायें हम.....

संस्कृत रक्त में समायी है

देव भाषा वही बनायी है

अपने सम्मान को बढायें हम..

आओ हिन्दी पढें…

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Added by सूबे सिंह सुजान on September 2, 2014 at 11:00pm — 12 Comments

चुनरी निचोड़ रही थी।

बस सबको पीछे छोड़ रही थी, बिलकुल सरपट दौड़ रही थी।

कीर्तिमान कई तोड़ रही थी, दोनों में लग होड़ रही थी।

चालक- परिचालक दोनों में

बस के चारों ही कोनों में

मची हुई होड़ा-होड़ी थी

सब्र सभी ने छोड़ी थी

इंद्रजाल का पाश पड़ा था

या फिर कोई नशा चढ़ा था

जिसने एक झलक भी पा ली

रह गया ठिठक कर वहीँ खड़ा था

कसी हुई थी जींस कमर पर, थी कुर्ती ढीली-ढाली।

जिसमे छलक-छलक जाती थी,यौवन-मदिरा की प्याली।

हर एक कंठ में प्यास जगी, कुछ ऐसी बनी कहानी। …

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Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on September 2, 2014 at 10:00pm — 2 Comments

एक ग़ज़ल..भारती की शान हिंदी (हिंदी दिवस पखवाड़े पर)

हैं अनेकों धर्म भाषा, ...एक हिंदुस्तान है l

मातृभाषा हिन्द की, हिंदी हमारी जान है ll

--

देश की संस्कृति रिवाजों पर हमें भी गर्व हो l

भारती की शान हिंदी, . विश्व में पहचान है ll

--

नृत्य शंभू ने किया, डमरू बजा, ॐ नाद का l

देववाणी के सृजन से ..विश्व का कल्यान है ll

--

पाणिनी ने दी व्यवस्था व्याकरण की विश्व को l

हम सनातन छंद रचते ...गीत लय मय गान है ll

--

सूर तुलसी जायसी, ......भूषण कवि केशव हुए l

चंद मीरा पन्त दिनकर, काव्य मय…

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Added by harivallabh sharma on September 2, 2014 at 4:00pm — 12 Comments

हिंदी दिवस पखवाड़े पर एक नवगीत

संस्कृत बृज अवधी

से सुवासित,

मैं हिंदी हूँ हिन्द

की शान।

बीते सात दशक

आजादी,

अब तक क्यों ना

मिली पहचान।



दुनियाँ के सारे

देशों में,

मातृभाषा का प्रथम

स्थान।

उर्दू, आंग्ल, फ़ारसी

सबको,

आत्मसात कर दिया

है मान।

हिंदी दिवस मनाता

अब भी,

मेरा लाडला हिन्दुस्तान

बीते सात दशक......



मैं हूँ स्वामिनी अपने

घर की,

भाषा पराई करती

राज।

लज्जा आती मुझे

बोलकर,

इंगलिश…

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Added by seemahari sharma on September 2, 2014 at 3:30pm — 11 Comments

अमृता प्रीतम जी ... दर्द की दर्द से पहचान (विजय निकोर)

अमृता प्रीतम जी ... दर्द की दर्द से पहचान

स्मृतियों की धूल का बढ़ता बवन्डर ... पर उस बवन्डर में कुछ भी वीरान नहीं। कण-कण परस्पर जुड़ा-जुड़ा, कण-कण पहचाना-सा। प्रत्येक स्मृति से जुड़ी सुखद अनुभूति, बीते पलों को जीवित रखती उनको बहुत पास ले आती है, अमृता जी को बहुत पास ले आती है...कि जैसे बीते पल बारिश की बूंदों में घुले, भीगी ठँडी हवा में तैरते, लौट आते हैं, आँखों को नम कर जाते हैं...

आज ३१ अगस्त ... मेरी परम प्रिय अमृता जी का पुण्य जन्म-दिवस ... वह…

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Added by vijay nikore on September 1, 2014 at 5:00pm — 10 Comments

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