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सत्य की लम्बी उमर हो - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122     2122

***************

पाप   का  अवसान  मागूँ

पुण्य  का  उत्थान   मागूँ

**

सत्य  की  लम्बी उमर हो

झूठ  को  विषपान   मागूँ

**

व्यर्थ   है  आकाश  होना

सिर्फ  लधु  पहचान  मागूँ

**

राजपथ  की   राह   नीरस

पथ  सदा  अनजान  मागूँ

**

स्वर्ण   देने   की  न  सोचो

मैं तो  बस  खलिहान मागूँ

**

कोयलों   का   वंश   फूले

आज  यह  वरदान   मागूँ

**

साथ ही पर  काक के हित

इक  मधुर  सा गान मागूँ

**

मिल गए  नवरात …

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 23, 2015 at 11:31am — 26 Comments

ग़ज़ल---१२-२२ १२-२२ १२-२२ आ रहा है अब

ग़ज़ल में दर्द ढल कर आ रहा है अब

कोई दरिया मचल कर आ रहा है अब

 

बड़े साहब ने इक साँचा बनाया है

जिसे देखो पिघल कर आ रहा है अब

 

ज़रा सा होश खोते ही हुआ जादू

जुबां पर सच निकल कर आ रहा है अब

 

चलो अच्छा हुआ जो ठोकरें खायी

गिरा लेकिन सँभल कर आ रहा है अब

 

बनाया मोम से पत्थर जिसे मैंने

मेरी जानिब उछल कर आ रहा है अब

 

गरज़ ढुलते ही रस्ता हो गया चिकना

मेरे घर वो फिसल कर आ रहा है…

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Added by khursheed khairadi on February 23, 2015 at 10:23am — 21 Comments

कौन सा साहित्य रचते हो ( 2 )--डॉo विजय शंकर

भरा पड़ा है साहित्य ,

ऐसा साहित्य जो,

कभी जुड़ नहीं पाया लोगों से ,

आम आदमी से , सीमित रह गया एक

अत्यंत सूक्ष्म तथाकथित उच्च सभ्रांत वर्ग में |

वेद , गीता , पुराण , भरा-बिखरा पड़ा है ज्ञान ही ज्ञान ,

मिल जाएगा , ढेरों मिल जाएगा , इनसे , उनसे ,

ऋचाओं से , श्रुतियों से , स्मृतियों से , संहिताओं से ,

बस , जुड़ नहीं पाया कभी दाल रोटी की समस्याओं से |

वह सर्वस्व है , वह यहां है , वहां है ,

अन्न अन्न के दाने दाने में है , सर्वत्र है वह ,

वह… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 23, 2015 at 10:08am — 14 Comments

ग़ज़ल -- तू मेरे लिए है न अजनबी ( बराए इस्लाह )

न तो मंज़िलों की तलाश है, न ही रास्तों की तलाश है

जो सँवार दें मेरी रहगुज़र , उन्हीं रहबरों की तलाश है



तू मुआफ़ करना मुझे ख़ुदा, मुझे मस्जिदों से न वास्ता

मेरे ज़ेहन में तो हैं तितलियाँ, मुझे ख़ुशबुओं की तलाश है



मेरी ख़्वाहिशें हैं दबी दबी, मेरी ज़िन्दगी है बुझी बुझी

मेरा इश्क़ आब-ए-हयात अब, मुझे जन्नतों की तलाश है



तू मेरे लिए है न अजनबी, मैं तेरे लिए हूँ न अजनबी

है हमारे बीच जो राब्ता, उसे क़ुर्बतों की तलाश है



कोई पास मेरे भी बैठता, मेरे… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 23, 2015 at 6:30am — 17 Comments

वर्दी नंबर १२ : लघुकथा (हरि प्रकाश दुबे)

“हर बार, वह उस आखिरी ‘समोसे’ की तरह मन मसोस कर रह जाता, जिसे कोई नहीं खाता था, आखिर वह अपने डिग्री कॉलेज की क्रिकेट टीम का ‘१२ वाँ खिलाड़ी जो था’ पर आज उसने हिम्मत जुटाकर ‘कप्तान’ से कहा ‘सर’ एक बार मुझे भी खेलने का मौका चाहिए!”

“अरे यार, तुम तो टीम के अभिन्न अंग हो, तुम तो बस मैच का आनन्द लो, हां बस बीच –बीच में चाय, पानी, समोसा, कोल्डड्रिंक, जूस –वूस ले आया करो !”

“समय बदला और फाइनल मैच से ठीक एक दिन पहले कप्तान और उसका प्रिय खिलाड़ी कार दुर्घटना में जख्मीं हो गए, और उस दिन…

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Added by Hari Prakash Dubey on February 23, 2015 at 2:48am — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल :: इक परिन्दा पागल-सा (मिथिलेश वामनकर)

212 / 1222 / 212 / 1222

 

वाकिया हुआ  कैसे   बाद   ये  जमानों  के

मस्ज़िदी भजन  गाये  मंदिरी अजानों के

 

हौसला  चराग़ों  का  यूं चला  तबीयत…

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Added by मिथिलेश वामनकर on February 22, 2015 at 11:30pm — 31 Comments

ग़ज़ल .........;;;गुमनाम पिथौरागढ़ी

2122 2122 212

पढ़ चुके जब से किताबें चार हम

भूल बैठे आपसी सब प्यार हम

बादलों ने ढक लिया सूरज अगर

मान लें सूरज की कैसे हार हम

उम्र भर कागज़ किये काले मगर

कह न पाए शेर भी दो चार हम

है भरोसा तेरे झूठे वादे पे 

यार दिल के हाथ हैं लाचार हम

जीतना तो चाहते हैं दिल मगर

फिर जमा क्यों कर रहे हथियार हम

बस डकैती लूट हत्या अपहरण 

देखते डरने लगे अखबार हम

मौलिक व…

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Added by gumnaam pithoragarhi on February 22, 2015 at 5:53pm — 5 Comments

ग़ज़ल -- आया था जो भी ज़ेहन में काग़ज़ पे लिख दिया ( बराए इस्लाह )

तरतीब से सजे दर-ओ- दीवार घर नहीं

सुख दुख में जब कि साथ तेरे हमसफ़र नहीं



ऐसा नहीं कि राहे सफ़र में शजर नहीं

आसान फिर भी जिन्दगी की रहगुज़र नहीं



उपदेश दूसरों को सभी लोग दे रहे

खुद उन पे जो अमल करे ऐसा बशर नहीं



रिश्तों की भीड़ में कहीं गुम हो गये सभी

अब रौनकें वो पहले सी, चौपाल पर नहीं



जीवन की भागदौड़, चकाचौंध में बशर

खोया है इस कदर उसे खुद की खबर नहीं



गुटका शराब पीते हैं अब सब के सामने

आया अजीब दौर है बच्चों को ड़र… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 22, 2015 at 12:30pm — 11 Comments

घास उगने लगी है मेरी कब्र पर

212 212 212 212

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जिन्दगी थी बहुत ही सुहानी मेरी

मौज मस्ती कभी थी निशानी मेरी

------

एक ज़लसा हुआ था मेरे गाँव में

मिल गयी उसमें परियों की रानी मेरी

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सिलसिला चल पडा फिर मुलाकात का

मुझको लगने लगी जिन्दगानी मेरी

------

बात अबकी नहीं है मेरे दोस्तो

ये कहानी बहुत ही पुरानी मेरी

------

एक साज़िश रची थी रक़ीबों ने फिर

और साज़िश में शामिल दिवानी मेरी

------

मैं तो मरने लगा…

Continue

Added by umesh katara on February 22, 2015 at 10:30am — 16 Comments

कौन सा साहित्य रचते हो (1)--डॉo विजय शंकर

क्या करते हो,

कौन सा साहित्य रचते हो,

क्यों रचते हो ,

किसके लिए रचते हो ?

स्वान्तः सुखाय ,

कोई पढ़ता है ,

ऐसा लिख देते हो ,

अर्थ ढूंढना पड़ता है ,

जो है ही नहीं वो

निकालना पड़ता है ,

गाय है , घास है,

गाय घास खा चुकी ,

गाय जा चुकी ,

अब कुछ नहीं ,

सब अदृश्य है, पर है ,

समझ से परे है, पर है ,

क्योंकि लिखा है तुमने ,

जिनको दिख जाए , चक्षुवान।

बाकी ,

बाकी के लिए कहाँ लिखते हो तुम ,

तुम तो अपने लिए… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on February 22, 2015 at 9:52am — 17 Comments

कौन कब किसको रोक पाता है -- डॉo उषा चौधरी साहनी

 
न जाने ऐसा क्यों लगता है , 
किसी एक पल कि सबकुछ 
अपना है, अपने हाथों में है, 
बस , हाथ उठाऊं और ले लूँ , 
समेट लूँ , अपनी बाँहों  में ,
रख लूँ ,सहेज कर अपने पास । 
कितनी खुशियाँ हैं दुनियाँ में , 
सब मेरे लिए , कितनी अपनी हैं ,
पर, दूसरे ही क्षण लगता है…
Continue

Added by Usha Choudhary Sawhney on February 22, 2015 at 9:35am — 9 Comments

टिकट (लघु कथा )

‘दो टिकट बछरावां के लिए’ –मैंने सौ का नोट देते हुए बस कंडक्टर से कहा I

‘टूटे दीजिये, मेरे पास चेंज नहीं है I’

‘कितने दूं ?’

‘बीस रुपये ‘

   मैंने उसे बीस रूपए दे दिये और पर्स सँभालने में व्यस्त हो गया I वह रुपये लेकर आगे बढ़ गया I

-'क्या कंडक्टर ने टिकट दिया ?'- सहसा मैंने पत्नी से पूछा i

‘नहीं तो ‘ उसने चौंक कर कहा I  तभी बगल की सीट पर बैठा एक अधेड़ बोल उठा –‘टिकट भूल जाइये साहेब , बछरावां के दो टिकट तीस रुपये के हुए उसने आपसे बीस ही तो लिए i दस का…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 21, 2015 at 8:39pm — 19 Comments

ग़ज़ल-झील सा शीतल चाँद से सुन्दर लिख्खा है |

झील सा शीतल चाँद से सुन्दर लिख्खा है

हमने जो देखा है मंज़र लिख्खा है



अबजद हव्वज़ का भी जिन को इल्म नहीं

दुनिया ने उन को भी सुख़नवर लिख्खा है



आज उसी पर फूल वफ़ा के खिलते हैं

तुमने जिस धरती को बंजर लिख्खा है



पढ़कर देखो मेरी इन तहरीरों को

तुमको ही उन्वान बनाकर लिख्खा है



कुछ लोगों ने दौर-ए-ख़िज़ाँ के बारे में

कमरे में फूलों को सजाकर लिख्खा है



हमने बग़ावत करके सारी दुनिया से

महरूमी का नाम सिकन्दर लिख्खा है



"समर… Continue

Added by Samar kabeer on February 20, 2015 at 11:14pm — 42 Comments

मुहब्बत खुदा है ~ गजल

122 122 122 122

सुना था किसी से मुहब्बत खुदा है ।
हुयी तो ये जाना कोई हादसा है ।

थे तनहा कभी फिर भी अच्छे भले थे ,
सिवा दर्द के उसकी यादोँ मेँ क्या है ।

भला किस से कह दूँ भला कौन समझे ,
के जिसको लगी है वही जानता है ।

गये अपने दिल से गये अपनी जाँ से ,
ये है मर्ज ऐसी न जिसकी दवा है ।

अजब जिन्दगी के ये हालात समझो ,
वो ही वो है दिल मेँ जो दिल से जुदा है ।

मौलिक व अप्रकाशित
नीरज मिश्रा

Added by Neeraj Nishchal on February 20, 2015 at 8:00pm — 22 Comments

आवाज़ का रहस्य (कहानी )

आवाज़ का रहस्य (कहानी )

प्रशिक्षु चिकित्सक के रूप में दिनेश और मुझे कानपुर देहात के अमरौली गाँव में भेजा गया था |नया होने के कारण हमारी किसी से जान-पहचान ना थी इसलिए हमने अस्पताल के इंचार्ज से हमारे लिए आस-पास किराए पर कमरा दिलाने को कहा |उसने हमे गाँव के मुखिया से मिलवाया |

“ किराए पे तो यहाँ कमरा मिलने से रहा |तुम अजनबी भी हो और जवान भी | परिवार भी नहीं है !ऐसे में कोई गाँव वाला - - - “

“ ऐसे में ये लड़के चले जाएंगे |फिर गाँव वालों का ईलाज - - - - कितनी बार लिखने…

Continue

Added by somesh kumar on February 20, 2015 at 11:12am — 4 Comments

ग़ज़ल -- सुब्ह से शाम हम कमाते हैं

सुब्ह से शाम हम कमाते हैं

तब भी मुश्किल से घर चलाते हैं



ये विरासत में हमको सीख मिली

हम तो मेहनत की रोटी खाते हैं



शाम होते ही हम परिन्दों से

लौट कर अपने घर को आते हैं



जिनके सर पर खुदा का हाथ है वो

आँधियों में दिये जलाते हैं



रोज़-ए-महशर की छोड़ कर चिन्ता

रिन्द मयखाने रोज़ जाते हैं



मुझको दुनिया सराय लगती है

लोग आते हैं लोग जाते हैं



हम तो फुरसत में दिल के छालों को

शे'र के पर्दों में छुपाते… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 20, 2015 at 7:04am — 27 Comments

उद्घाटन : लघुकथा (हरि प्रकाश दुबे)

“मंत्री जी, शानदार पुल बनकर तैयार है, आपके नाम की शिला भी रखवा दी है, बस जल्दी से उद्घाटन कर दीजिये !”

 “अरे यार देख रहे हो कितना व्यस्त चल रहा हूँ आजकल, लेन-देन तो हो गया है न, फिर तुम्हे उद्घाटन की इतनी चिंता क्यों है ?”

“साहब, चिंता उद्घाटन की नहीं है, बारिश की है !” 

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित”     

Added by Hari Prakash Dubey on February 20, 2015 at 3:13am — 31 Comments

पीछे मेरी दुआ है |

वो आज है नही मेरी दुनिया में 

फिर भी बसती है मेरे जिया में 

लगता है आज भी याद करती है 

मुझे पाने की फ़रियाद करती है

शायद  खुश है ,जिन्दा है

क्यूंकि उसे कुछ हुआ है

वो आज जो है, जैसी है ,पीछे मेरी दुआ है |

मन करता है फिर से पाऊं उसे

दर्द भरी दुनिया से चुराऊं उसे

वो चली गयी पर कुछ कशिश तो है

चिराग न सही ,पर माचिस तो है

एहसास हो रहा है , उसने ख़त छुआ है

 वो आज जो है, जैसी है ,पीछे मेरी दुआ है…

Continue

Added by maharshi tripathi on February 19, 2015 at 10:30pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - ' मौन को भी जवाब ही समझें ' -- गिरिराज भंडारी

' मौन को भी जवाब ही समझें '

2122   1212    112  /  22

***************************

जिन्दगी को हुबाब ही समझें

संग काँटे, गुलाब ही समझें

 

बदलियों ने चमक चुरा ली है

पर उसे माहताब ही समझें

 

शर्म आखों में है अगर बाक़ी

क्यों न उसको नक़ाब ही समझें  

 

इक दिया भी जला दिखे घर में

तो उसे आफ़ताब ही समझें

 

ठीक है , टूटता बिखरता है

पर उसे आप ख़्वाब ही समझें

 

दस्ते रस से अगर है दूर…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on February 19, 2015 at 10:25am — 42 Comments

नाम के बहाने (कहानी )

“शुभम|”

“यस सर|”

“ज्ञानू|”

“यस सर|”

“दुर्योधन|”

“हाजिर सSड़|”

यूँ तो पंचम ब वर्ग का ये अंतिम नाम था |परंतु परम्परा से परे प्राचीन महाकाव्य खलनायक का स्मरण

कर और हाजिरी देने के उसके लहजे से ध्यान बरबस ही उसकी तरफ टिक गया |

“दुर्योधन मेरे पास आओ|” मैंने आदेशात्मक लहजे में कहा |

लंबे चेहरे वाला वो लड़का सकुचाता सा मेरे सामने खड़ा हो गया |मैंने अपनी तीसरी कक्षा और पंचम के छात्रों को कार्य दिया |इस बीच वो गर्दन झुकाए ,जमीन को देखता…

Continue

Added by somesh kumar on February 19, 2015 at 10:00am — 12 Comments

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