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ग़ज़ल -- प्यास में अब. पानी न मिले शबनम ही सही -- ( गिरिराज भंडारी )

२११२२        २११२२         २११२      

प्यास में अब. पानी न मिले शबनम ही सही

*****************************************

प्यास में अब. पानी न मिले शबनम ही सही

ख्वाब तो हो, सच्चा न सही  मुबहम ही सही

 

लम्स तेरा जिसमें न मिले वो चीज़ ग़लत

आब हो या महताब हो या ज़म ज़म ही सही 

 

मेरे सहन में आज उजाला , कुछ तो करो    

धूप अगर हलकी है उजाला कम ही सही

 

कुछ तो इधर अब फूल खिले सह्राओं में भी 

काँटों लदी हो डाल खिले…

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Added by गिरिराज भंडारी on April 2, 2015 at 1:25pm — 29 Comments

जल - पंकज त्रिवेदी

जल बहता है -

झरनें बनकर, लिए अपनी शुद्धता का बहाव

वन की गहराई को, पेड़, पौधों, बेलों की झूलन को लिए

जानी-अनजानी जड़ीबूटियों के चमत्कारों से समृद्ध होकर

निर्मलता में तैरते पत्थरों को कोमल स्पर्श से शालिग्राम बनाता हुआ

धरती का अमृत बनकर वनवासियों का, प्राणियों का विराम !



जल बहता है -

नदी बनकर, नालों का बोझ उठाती, कूड़ा घसीटती

मंद गति से बहती, अपने निज रंग पर चढी कालिमा को लिए

भटकती है गाँव-शहरों की सरहदों से छिल जाते अपने अस्तित्व को लेकर…

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Added by Pankaj Trivedi on April 2, 2015 at 12:30pm — 15 Comments

हिंदी गजल: बहरे हजज मुसद्दस (6) सालिम

1222 1222 1222

""""""""""""""""""""'"""""""'''"''''''

गजब ये रंग देखा है जमाने का।

सहारा है सभी को इक बहाने का।

*****

नजर के तीर से कर चाक दिल मेरा,

कहेगें हाल तो कह दो निशाने का।

*****

रही आदत खिलौना प्यार को समझा,

किया है खेल रोने औ रुलाने का।

*****

हमारा दर्द ही हमको सिखाया है,

बुरे हालात में, हँसने हँसाने का।

*****

मरा है क्यों उसीपे ऐ दिवाना दिल,

हिदायत दे गया जो छोड़ जाने का।

*****

तड़पते देख हैं-हैरान…

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Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on April 2, 2015 at 12:00pm — 11 Comments

जमाना और था जब प्यार आँसू पोंछ देता था - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

1222    1222     1222 1222

******************************

ये कैसी  हलचलें  नवयुग  बता  तेरी  रवानी में

बचे  भूगोल  में  नाले  नदी   किस्से  कहानी में

****

बनीं नित नीतियाँ ऐसी हुकूमत हो किसी की भी

नफा व्यापार  में  बढ़चढ़  रहे  फाका किसानी में

****

दिलों का जोश ठंडा है, उमर कमसिन उतरते ही

बुढ़ापा  हो गया हावी  सभी  पर  धुर  जवानी में

****

जमाना  और  था  जब  प्यार  आँसू पोंछ  देता था

मगर अब अश्क मिलते हैं मुहब्बत की निशानी में…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 2, 2015 at 11:00am — 12 Comments

ओ बी ओ पर्याय (दोहें) - लक्ष्मण रामानुज

विद्वजनों के योग से,सफल हुआ यह काज,
पाँच वर्ष के काल में, खूब सजाया साज |
 
रसिक मंच से जुड़ सके, करें कौन पाबन्द
दूर देश से जुड़ रहें,  देख  यहाँ  आनंद |  
 
छंदों को यूँ खोजकर, देते सबको ज्ञान,
मान धरोहर देश की,  लाते सबके ध्यान |
 
ह्रदय भाव से आ मिले, इक दूजे के संग,
होली से माहौल में, खिले प्रीत के रंग |
 
पाँच वर्ष की साधना, ओ बी ओ पर्याय,
कृपा…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 2, 2015 at 11:00am — 16 Comments

मै तो बलिहारी............'जान' गोरखपुरी

२१२ २२१२ १२१२

मै तो बलिहारी,अमीर हो गया

इश्क़ में रब्बा फकीर हो गया

***

मेरे रांझे का मुझे पता नही

बिन देखे ही मै तो हीर हो गया

**

उसके जलवे यूँ सुने कमाल के

दिलको किस्सा उसका तीर हो गया

***

शिवशिवा घट-घट मुझे पिलाओ अब

तिश्न मै वो गंग नीर हो गया

**

उसको पहनूं धो सुखाऊँ रोज मै

लाज मेरी अब वो चीर हो गया

***

गाऊँ कलमा मै सुनाऊँ दर-ब-दर

‘’जान’’ज्यूँ मै कोई पीर हो…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 2, 2015 at 10:30am — 18 Comments

वफ़ादारी....(लघुकथा)

“ बेटा!! अभी दो महीने पहले ही तेरी इकलौती जवान बहन का तलाक हुआ है. जैसे तैसे आस-पड़ोस वालो का मुंह बंद हुआ और तू गैर समाज की लड़की से चोरी छुपे शादी कर घर ले आया. तुझे अपने माता-पिता के मान-सम्मान का जरा भी ख्याल नहीं रहा..”

“ माँ! मैं पिछले चार-पांच साल से इस लड़की को प्यार करता हूँ, अब यह मेरे बच्चे की माँ बनने वाली है. अगर शादी नहीं करता तो बेवफ़ा कहलाता..”

      जितेन्द्र पस्टारिया

  (मौलिक व् अप्रकाशित)

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on April 2, 2015 at 10:23am — 14 Comments

" हम " का बार बार बिखरना

चैन से रहते थे कभी

तीन कमरों की छत के साये में 

मैं ,मेरे माँ-बाबूजी

मेरी पत्नि 

मेरे बच्चे शामिल थे

एक 'हम ' शब्द में ।





धीरे धीँरे 

'हम ' शब्द बिखर गया

मा-बाबूजी बाहर वाले 

कमरे में भेज दिये गयेे

अब वो दोनों हो गये थे

' हम ' और माँ-बाबूजी 

अब हम ' का विस्तार 

मैं,मेरी पत्नि,मेरे बच्चों

तक सिमट गया था

माँ -बाबूजी 'और' हो चुके थे ।।





मेरा बेटा भी अब

बाल बच्चेदार हो गया हैे

'हम ' शब्द  आतुर है

एक…

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Added by umesh katara on April 2, 2015 at 9:38am — 22 Comments

अंदर अंदर रोता हूँ मैं, ऊपर से मुस्काता हूँ,

गजल लिखने का प्रयास मात्र है, कृपया सुधारात्मक टिप्पणी से अनुग्रहीत करें  

अंदर अंदर रोता हूँ मैं, ऊपर से मुस्काता हूँ,

दर्द में भीगे स्वर हैं मेरे, गीत खुशी के गाता हूँ.



आश लगाये बैठा हूँ मैं, अच्छे दिन अब आएंगे,

करता हूँ मैं सर्विस फिर भी, सर्विस टैक्स चुकाता हूँ.



राम रहीम अल्ला के बन्दे, फर्क नहीं मुझको दिखता,

सबके अंदर एक रूह, फिर किसका खून बहाता हूँ.



रस्ते सबके अलग अलग है, मंजिल लेकिन एक वही,

सेवा करके दीन दुखी का, राह…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on April 2, 2015 at 9:30am — 20 Comments

एक प्रयास ग़ज़ल,,,

कभी तुम चीन जाओगे कभी जापान जाओगे ।।

नया रुतबा दिखाने को कभी ईरान जाओगे ।।(1)



गिरानी के तले दबकर मरे जनता तुम्हारा क्या,

विदेशों में मियाँ खाने मिलें पकवान जाओगे ।।(2)



पड़े ओले किसानों के मुक़द्दर में बनीं पर्ची,

जताने तुम रहम-खोरी चले खलिहान जाओगे ।।(3)



मिलेंगे कब हमें अच्छे दिनों की आस है भाई,

विदेशी नोट लाने को कभी हनुमान जाओगे ।।(4)



हमारी बेवशी को तुम न समझोगे बड़े साहब,

ज़रा ख़ुद डूब कर देखो,हमें पहचान जाओगे ।।(5)…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on April 2, 2015 at 8:00am — 10 Comments

चींटियाँ .......'इंतज़ार'

जब तुम गयी हो

तो दिल का भवंरा बेसुध

तेरे दिल के बंद दरवाज़े से

जा टकराया

और गिर पड़ा जमीन पर

होश ना रहा उसको !

जब जागा नींद से

तो बेवफ़ाई की चींटियों ने

था उसे घेरा हुआ

नोच नोच कर खा रहीं थी

मेरे दिल के नादान भंवरे को

घसीटते हुए ले जा रहीं थी

अपनी मांद में

तड़पा था बहुत

कोशिश भी की छुटने की

जालिमों ने मौका न दिया

सोचा.... लोग तो चार कांधों की

आरजू करते हैं

और मुझे चार नहीं

हज़ार कांधे नसीब हुए

और…

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Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 2, 2015 at 5:10am — 17 Comments

चलते चल्ते जब भी हम रुक जाएँगे..................

चलते चल्ते जब भी हम रुक जाएँगे

तेरी बाहों में हम छुप जाएँगे ................

जब छा जाएँगे रिश्तों के निपट अंधेरे

और थकन की धूल पाँव से सर तक बोलेगी

थकते थकते जब इक दिन चुक जाएँगे

तेरी बाहों में हम छुप जाएँगे................

जब जब बोले हैं , बोले हैं खामोशी से हम

और प्रति-उत्तर भी पाए हैं , वैसे ही हमने

मिलते मिलते मौन कहीं जब थक जाएँगे

तेरी बाहों में हम छुप…

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Added by ajay sharma on April 1, 2015 at 11:29pm — 7 Comments

विष से अमरता - लघुकथा

ब्रह्मा बड़ी शांति से इंद्र की बात सुन रहे थे, "पूजनीय, धरती पर आर्यव्रत नामक स्थान सोने की चिड़िया कहलाता है। कई अविष्कार हुए हैं, वेद लिखे गए, महाकाव्य लिखे गए, कितने ही उत्तम शास्त्र भी लिखे गए। सभी नागरिक स्वस्थ, सुखी और संपन्न हैं। श्री कृष्ण ने वेदों का परिष्करण कर अमर-अजर आत्मा की अवधारणा तक दे दी है।"

“सत्य है, लेकिन ईर्ष्या और स्वार्थ के कारण आपसी फूट आत्मा की तरह ही रोग, दुःख और विपन्नता को अमर कर देगी।“ वाणी में भारीपन था|

(मौलिक और…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on April 1, 2015 at 9:30pm — 9 Comments

वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर ..... Nazeel



२१२२  २१२२  २१२२  २१२

जिंदगी मेरी कहाँ जाके गई है तू ठहर ॥

ले गई है फिर वहां ,जो छोड़ आया था  शहर



है खुदा भी एक ,एक ही आसमां , एक ही  ज़मीं

सरहदों पर किस लिए हमने मचाया है  कहर   



मारता आया है बरसों  बाद भी अक्सर  हमें ॥

घुल गया था जो दिलों  में  लकीरो  का जहर



भूल कर भी भूल सकता हूँ भला कैसे  उसे  ,

वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर



वायदा करके नहीं आये अभी तक क्यों  भला ,

यूँ अकेला बैठ…

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Added by Nazeel on April 1, 2015 at 8:44pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
शह्र छोड़ गई-ग़ज़ल

1212 1122 1212 112/22

गई तो रंग बदलता ये शह्र छोड़ गई

घटा बहारों में ढलता ये शह्र छोड़ गई

 

सबा चमन से गुज़रते हुये महक लेकर

रविश-रविश* यूँ टहलता ये शह्र छोड़ गई                                    *बाग़ के बीच की पगडण्डी          

 

फ़िज़ा ए शह्र तलक आके यक-ब-यक आँधी

यूँ मस्तियों में उछलता ये शह्र छोड़ गई

 

तमाम रात भटकती वो तीरगी* आखिर                                        *अँधेरा

पिघलती शम्अ पिघलता…

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Added by शिज्जु "शकूर" on April 1, 2015 at 5:30pm — 20 Comments

चाँद आकाश में खो गया - हिन्दी गजल (एक प्रयास)

मुतदारिक मुसद्दस सालिम

212     212          212

सो गया सो गया सो गया

चाँद आकाश  में खो गया I

 

ढूंढते  थे जिसे  उम्र भर

लो यहीं था अभी तो गया I

 

प्यार का बीज मन में मेरे

कोई चुपके से आ बो गया I

 

नैन जबसे  उलझ ये गये

चैन ना जाने क्या हो गया I

 

चोट खाया  बहुत प्यार में

वो  दिवाना अभी जो गया I

 

था  सहारा बहुत  प्यार से  

दूर लेकिन  चला वो गया…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 1, 2015 at 2:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल : नीली लौ सी तेरी आँखों में शायद पकता है मन

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

 

यूँ तो जो जी में आए वो करता है, राजा है मन

पर उनके आगे झटपट बन जाता भिखमंगा है मन

 

उनसे मिलने के पहले यूँ लगता था घोंघा है मन

अब तो ऐसा लगता है जैसे अरबी घोड़ा है मन

 

उनके बिन खाली रहता है, कानों में बजता है मन

जिसमें भरकर उनको पीता हूँ वो पैमाना है मन

 

पहले अक़्सर मुझको लगता था शायद काला है मन

पर उनसे लिपटा जबसे तबसे गोरा गोरा है मन

 

मुझको इनसे अक्सर भीनी भीनी…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 1, 2015 at 12:36pm — 23 Comments

किसको रोऊँ मैं दुखड़ा ?

ग्रीष्म में तपता हिमाचल, घोर बृष्टि हो रही

अमृत सा जल बन हलाहल, नष्ट सृष्टि हो रही

काट जंगल घर बनाते, खंडित होता अचल प्रदेश

रे नराधम, बदल डाले, स्वयम ही भू परिवेश

धर बापू का रूप न जाने, किसने लूटा संचित देश

मर्यादा के राम बता दो, धारे हो क्या वेश

मोड़ी धारा नदियों की तो, आयी नदियाँ शहरों में

बहते घर साजो-सामान, हम रात गुजारें पहरों में.

आतुर थे सारे किसान,काटें फसलें तैयार हुई

वर्षा जल ने सपने धोये, फसलें सब बेकार हुई

लुट गए सारे ही…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on April 1, 2015 at 11:30am — 19 Comments

अक़्ल पे यकीन नहीं रह गया दोस्तों ---डा० विजय शंकर

पहली अप्रेल की भेंट



अब तो अक़्ल पे यकीन नहीं रह गया दोस्तों ,

आप ही बताएं अक़्ल बड़ी या भैंस दोस्तों ॥

आप कहेंगें अक़्ल बड़े काम की चीज है

मैं कहूँगा, अक़्ल से काम लो , अक़्ल

किसी काम की चीज नहीं है दोस्तों ॥

अक़्ल हमेशा भैंस से मात खा जाती है ,

सामना भैंस से हो तो गुम हो जाती है ॥

अक़्ल अपनी हिफाज़त ही नहीं कर पाती है

भैंस उसे देखते देखते ही चर जाती है ॥

अक़्ल कुछ देती है , पक्का मालूम नहीं ,

भैंस अक्सर दूध देती तो है दोस्तों… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on April 1, 2015 at 10:10am — 14 Comments

ग़ज़ल- निलेश 'नूर' रुसवाइयों से रोज़ मुलाक़ात काटिये

गागा लगा लगा लल गागा लगा लगा 



रुसवाइयों से रोज़ मुलाक़ात काटिये

जबतक है जान जिस्म में, दिनरात काटिये.

.

है आप में अना तो अना मुझ में भी है कुछ 

यूँ बात बात पे न मेरी बात काटिये.  

.

ये कामयाबियों के सफ़र के पड़ाव हैं  

अय्यारियाँ भी सीखिए जज़्बात काटिये.

.

अगली फसल कटे तो करें इंतज़ाम कुछ

तब तक टपकती छत में ही बरसात काटिये.

.

ये इल्तिज़ा है आपसे इस मुल्क के…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on April 1, 2015 at 7:57am — 28 Comments

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