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खोट--

" ज़रा इसको सिल कर बढ़िया पॉलिश कर देना "।
उसने सर हिला कर जूता ले लिया और साहब ने बड़े अनमने मन से वहाँ रखी टूटी चप्पल पैर में डाल ली ।
" लीजिये साहब , जूता ठीक हो गया ", पर उन्होंने जैसे ही पैर निकाला , मोज़ा चप्पल में लगी कील में फंस गया।
" कैसी चप्पल रखते हो तुम लोग ", नाराज़गी दिखाते हुए उन्होंने उसके बताये पैसों का आधा दिया और चल दिए।
वो अपनी टूटी चप्पल की कील दुरुस्त करते हुए सोच रहा था कि छेद मोज़े में हुआ था या नीयत में।
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 29, 2015 at 2:09am — 18 Comments

वफ़ाओं का अपनी सिला चाहता हूँ

फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन



वफ़ाओं का अपनी सिला चाहता हूँ

ख़रीदो मुझे मैं बिका चाहता हूँ



मिरी ज़िन्दगी तो हुई ख़त्म,बेटे

मैं तेरे लिये सोचना चाहता हूँ



मुझे रोक लेती हैं मासूम कलियाँ

मैं ख़ुद से अगर भागना चाहता हूँ



मुझे उनकी ख़ुश्बू से महकाए रखना

मैं क्या तुझ से बाद-ए-सबा चाहता हूँ



लगाते हो क्यूँ दैर-ओ-मस्जिद प ताले

ख़ुदा का हर इक घर खुला चाहता हूँ



छियालीस डिग्री से ऊपर है गर्मी

मैं सावन की ठंडी हवा… Continue

Added by Samar kabeer on May 28, 2015 at 11:00pm — 24 Comments

ग़ज़ल -नूर -सपने क्या क्या बुन लेते थे छोटी छोटी बातों में

मात्रिक बहर 22/22/22/22/22/22/22/2 



क्या क्या सपनें बुन लेते थे छोटी छोटी बातों में

क़िस्मत ने कुछ और लिखा था लेकिन अपने हाथों में.

.

कैसे कैसे खेल थे जिन में बचपन उलझा रहता था

मोटे मोटे आँसू थे उन सच्ची झूठी मातों में.

.

कितने प्यारे दिन थे जब हम खोए खोए रहते थे 

लड़ते भिड़ते प्यार जताते खट्टी मीठी बातों में.

. 

एक ये मौसम, ख़ुश्क हवा ने दिल में डेरा डाला है

एक वो ऋत थी, साथ तुम्हारे भीगे थे बरसातों में.

.

एक समय तो…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 28, 2015 at 10:00pm — 20 Comments

सच का ओज......'जान' गोरखपुरी

२२२ /२२२ /२२

सच का ओज भरम क्या जाने

रौशनी मेरी तम क्या जाने

*

अँधियारे को झुकने वाले

इक दीये का दम क्या जाने

*

दुधिया रंग नहाने वाले

लालटेन का गम क्या जाने

*

मटई प्याल की सौंधी बातें                       मटई/मटिया (भोजपुरी)= मिट्टी

पालथीन के बम क्या जाने

*

हमको सिर्फ साकी से मतलब…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 28, 2015 at 9:30pm — 28 Comments

जाम छूते मेरे हंगामा क्यूँ

२१२२  १२१२   २२

हुस्न वाले सलाम करते हैं 

क़त्ल यूं ही तमाम करते हैं 

वो मसीहा चमन को लूट कहे 

काम ये लोग आम करते हैं 

आग दिल में लगाते गुल दिन में 

रात तन्हाई नाम करते हैं 

काम मेरा हुनर जो कर न सका 

मैकदे के ये जाम करते हैं 

जाम छूते मेरे हंगामा क्यूँ 

शेख तो  सुब्हो-शाम करते हैं 

कैसे रिश्तों में वो तपिश मिलती 

रिश्ते जब तय पयाम करते हैं 

उनको बुलबुल…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on May 28, 2015 at 5:06pm — 19 Comments

रामलीला... /श्री सुनील

शहर की चहारदीवारी से कान लगाओ तो

शहर के हालात का पता चलता है.



अपहरण के बाद अपह्रीत की गिड़गिड़ाहट...

बलात्कारी की ख़ामोशी

और नारी की दीर्घ चीख.



ख़ून के छींटे बेचता अख़बार वाला.



पेट्रोल और डीजल अब कारक नहीं प्रदूषण के

उसकी जगह ले चुकी बारूद की गंध- फांद चुकी शहर की चहारदीवारी.



रेंगने की आवाज़ पे मैं चौंका -

वह सुकून था-दीवारों में सुराख ढूँढता हुआ.



चहारदीवारी से चिपके कान की नसें क्या तनीं,

दीवार पे चढ़ के शहर… Continue

Added by shree suneel on May 28, 2015 at 3:06pm — 7 Comments

अतुकांत कविता का चरित्र

एक कविता सुनाता हूँ –

 

“पीडाओं के आकाश से  

चरमराती टहनियां

मरुस्थल की आकाश गंगा

की खोज में जाती हैं

धुर दक्षिण में अंटार्कटिक तक

जहाँ जंगलों में तोते सुनते हैं

भूकंप की आहट

और चमगादड़ सूरज को गोद में ले

पेड़ से उछलते है

खेलते है साक्सर

और पाताल की नीहरिकायें

जार –जार रोती हैं

मानो रवीन्द्र संगीत का

सारा भार ढोती हैं

उनके ही कन्धों पर

युग का…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 28, 2015 at 1:30pm — 8 Comments

जीवन.....

जीवन.....

हरी पत्तियो से ढके 

और फलों से लदे 

पंछियोंं के घने बसेरे

आस-पास वृहद सागर सा लहराता वन,

आल्हादित हैं पवन-बहारें

सॉझ-सवेरे झंकृत होते

पंछियो के कलरव स्वर

नदियों की कल-कल,

आते-जाते नट कारवॉ

उड़ते गुबार, मद्धिम होती रोशनी, आँख मींचते बच्चे

तम्बू में घुस कर खोजते, दो वक्त की रोटी...

पेट की आग का धुआँं, करता गुबार

रूॅधी सांसों के कुहराम

आधी रोटी के लिए करते द्वन्द

तलवारें चमक जाती, बिजली सी

धरा…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 27, 2015 at 10:30pm — 14 Comments

जो छला जाए कभी विश्वास मत देना

मौत देना मौत का अहसास मत देना, 
जो छला  जाए कभी विश्वास मत देना ।

पंख दे पाओ नहीं गर तो वही अच्छा
सामने मेरे खुला आकाश मत देना।

दश्त देना, धूप देना , गरमियाँ देना
ऐसे में लेकिन खुदाया प्यास मत देना ।

है हमे मंजूर अंधेरा उम्र भर का
जुगनुओं से ले मुझे प्रकाश मत देना ।
---------------
नीरज कुमार नीर
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neeraj Neer on May 27, 2015 at 10:28pm — 11 Comments

कविता की चोरी(कविता,मनन कु.सिंह)

कविता की चोरी

कविता छपी किताब में

'कविता' हुई प्रसन्न,

नाम अपर का देख कर

रह गयी फिर सन्न।

बोली जाकर अंकिता से

'तू करती कविता की चोरी,

मुद्रित मेरी,तूने मरोड़ी।'

अंकिता अलग गुर्रायी-

'कहाँ की है तू रे लुगाई?

कविता क्या होती पता है?

यह मेरे रग-रग में बसी है,

मेरे कुल-सरोवर की हंसी है,

मेरी विरासत, आदत है,

मत समझ तिजारत है,

कविता चुराकर थी छपवायी,

मेरी थी,छपी तो आ चिल्लायी,

जा कहीं पल्ले पड़,ऐसा न कर।'

कविता थी… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 27, 2015 at 9:30pm — 7 Comments

छलकते अमी का-----

तरही गजल...

बह्र....122 122 122 122

तरानाा फॅसाना नया चाहता हूँ

तुम्हीं से मुहब्बत-वफा चाहता हूँ।



चमन, फूल-कॉटों सभी से निभाया,

रहा दोष फिर भी क्षमा चाहता हूँ।



हॅसीं खाब-जन्नत-बहारें तुम्हीं से,

तरो ताजगी की हवा चाहता हूँ।



कदम चूम कर नित्य सजदा करूं मैं,

मेरी जिन्दगी की दवा चाहता हूँ।



खयालों में अक्सर बहुत चोट खाये,

मिलो रूबरू फलसफा चाहता हूँ।



हुआ वक्त घायल ये इन्सा-जमीं भी,…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 27, 2015 at 8:00pm — 15 Comments

अतीत

अतीत

अस्पताल से खबर आई और वह बदहवास सा भागा  I 
" पापा ..." इसके आगे बेटी  कुछ न बोल पायी थी I वह जीवन -मृत्यु के बीच झूल रही थी  ! किसी दरिंदे ने उसके ऊपर तेज़ाब ......I 
" ओह !" उसका  हृदय चीत्कार कर उठा , साथ ही उसे याद आया अपना अतीत  i आज से तीस वर्ष पहले उसने भी तो यही किया था i  

मीना पाण्डेय
बिहार
मौलिक व् अप्रकाशित

Added by meena pandey on May 27, 2015 at 3:00pm — 6 Comments

3 मुक्‍तक

मुक्‍तक- 1

भला होता है वो कैसा जिसे सब प्‍यार कहते है

नही यह भी पता मुझको किसे सब यार कहते है

न जाना मैं कभी इनको न पहचाना कभी इनको

यही कारण मुझे सब आदमी बेकार कहते है

मुक्‍तक -2

नही होता अगर ये दिल तो हम भी शान से जीते

लड़ा कर जाम से हम जाम तुम्‍हारे साथ में पीते

मगर कमबख्त दिल मेरा हमेशा नाम ले उसका

भुलाने ही नही देता पलों को साथ जो बीते

मुक्‍तक -3

करू क्या काम दिन भर मै मुझे पत्नी बताती है

झुका कर के नज़र चलना मुझे हरदम…

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Added by Akhand Gahmari on May 27, 2015 at 2:12pm — 16 Comments

नासूर (लघुकथा))

" तुमको बुरा नहीं लगता इसमें , बिना अपनी मर्ज़ी के ये सब ", उसने पूछ लिया |
" हाँ , बहुत तक़लीफ़ हुई थी मुझे , जब अस्मत लुटी थी मेरी | और उससे भी ज्यादा तक़लीफ़ तब हुई थी , जब घर वालों ने भी दरवाज़ा बंद कर दिया था "|
उसने अपना चेहरा घुमा लिया , पुराना दर्द फिर उभर आया था |

.
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 27, 2015 at 2:00pm — 16 Comments

फिर से जन्म लेकर आऊंगा !

हुए न लक्ष्य पूर्ण किन्तु

मृत्यु द्वार आ गयी ,

देखकर मृत्यु को हाय !

ज़िंदगी घबरा गयी ,

हूँ नहीं विचलित मगर मैं ,

मृत्यु से टकराउँगा !

लक्ष्य पूरे करने फिर से

जन्म लेकर आऊंगा !

.....................................

छोड़ दूंगा प्राण पर

प्रण नहीं तोड़ूँगा मैं ,

अपनी लक्ष्य-प्राप्ति से

मुंह नहीं मोड़ूँगा मैं ,

है विवशता देह की

त्याग दूंगा मैं अभी ,

पर नहीं झुक पाउँगा

मृत्यु के आगे कभी ,

मैं पुनः नई देह…

Continue

Added by shikha kaushik on May 27, 2015 at 12:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल -नूर -कितनी सादा-दिली से मिलता है

२१२२/१२१२/२२ 

कितनी सादा-दिली से मिलता है

जब समुन्दर नदी से मिलता है.

.

इक नयी कायनात पनपेगी    

कोई भौंरा कली से मिलता है.  

.

रब्त इस बात पर टिके हैं अब

कोई कितना किसी से मिलता है.

.

हर किसी से यही वो कहते हैं

दिल मेरा आप ही से मिलता है. 

.

अब सुमंदर में भी है बे-चैनी

क़तरा अपनी ख़ुदी से मिलता है.

.

सुब’ह से पहले जुगनू यूँ चमका

गोया लम्हा सदी से मिलता है.

. 

मौत से क्या पता…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 26, 2015 at 9:21pm — 34 Comments

भविष्य - लघुकथा

"वकील साहब! जो चाहे करो लेकिन मेरे बेटे को सजा नही होनी चाहिये।" कहते हुये काली बाबू ने चेक बुक सामने रख दी।

"काली बाबू। मीडीया और 'एविडेन्स' भी तुम्हारे बेटे के खिलाफ है। अब तो एक ही रास्ता है 'पीड़िता' से आपके बेटे की शादी और उसकी तरफ से केस वापसी की दरख्वास्त।" वकील साहब ने ठंडी साँस भर कर हथियार डाल दिये।......................................



"लोगो की सवालिया नजरे, परिवार का मान और तुम्हारी बेटी का भविष्य। इन सबको देखा जाये तो मेरी इस 'आफर' से बेहतर कोई रास्ता नही है।"…

Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on May 26, 2015 at 8:30pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
किसी के चश्मे नम से गुज़री हैं राहें बलन्दी की

1222/ 1222/ 1222/ 1222

किसी की चश्मे नम से गुज़री हैं राहें बलन्दी की

गरीबों के शिकम* से गुज़री हैं राहें बलन्दी की                       *पेट

 

जिन्हें तू अपने पीछे यूँ तड़पता छोड़ जाता है

ये वो हैं जिनके दम से गुज़री हैं राहें बलन्दी की

 

न जाने नींद कैसे आती है ऐ बेरहम तुझको

तेरे कारे सितम से गुज़री हैं राहें बलन्दी की

 

कोई ये देख पाता काश कुछ भी कहने से पहले

कि कितने पेचो-खम* से गुज़री हैं राहें बलन्दी…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on May 26, 2015 at 8:00pm — 20 Comments

मेरी बेटी( दूसरी कविता) मनोज कुमार अहसास

मेरी बेटी

तपता सूरज

जब माथे पर सुलग रहा है

दो बातें अपने सीने की तेरे हिस्से मे रखता हूँ

ये सूरज एक बड़ा परीक्षक

ये सूरज एक बड़ा तपस्वी

ये सूरज एक सत्य अटल है

ये सूरज एक महा अनल है

इस सूरज के संरक्षण मे

जीवन के सब अर्थ खुलेगे

इस सूरज के साथ तू चलना

देख गगन से शब्द मिलेगें

चुपके चुपके....सुलग सुलग कर

चमक में हिस्सा मिल जाता है

तपते रहने से रंग जीवन का

एक ना एक दिन खिल जाता है

तपना जीवन को रंगना है

वरना सब फीका… Continue

Added by मनोज अहसास on May 26, 2015 at 7:16pm — 26 Comments

परित्यक्ता लघुकथा

"रामकली कँहा जा रही है ? "
"अरे !जिज्जी कहूँ नई इताइ आ जा र्इ हो।"
"काय री रामकली जो माथों सुनो तोहरी बिंदी कहा गई री ?और मांग भी सुनी है?"
"अरे सपरो हतो सो गिर गई हुहे"।
" हे राम !जा जिज्जी तो और अबै सबरो भेद खुल जातो ।हम तो पेंशन लाने जो सब कर रहे हते।का होत है दो पल सुहाग छुड़ा के सरकार से पैसा लेबे में।"
और रामकली पति के साथ होते हुए भी सरकारी परित्यक्ता की पेंशन लेने चली जाती है।

बबिता चौबे शक्ति
मौलिक व् अप्रकाशित

Added by babita choubey shakti on May 26, 2015 at 3:00pm — 10 Comments

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