For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

June 2015 Blog Posts


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - फिल बदीह -- बे ज़ुबाँ कह सके रास्ता भी नहीं ( गिरिराज भंडारी )

 २१२    २१२    २१२    २१२

 *******************************

दोस्त निर्लिप्त है, टोकता भी नहीं

और पूछो अगर बोलता भी नहीं  

 

बोलना जब मना,  फाइदा भी नहीं

बे ज़ुबाँ कह सके रास्ता भी नहीं 

रात तारीकियों से घिरी इस क़दर

मंज़िलें बेपता , रास्ता भी नहीं

 

तुम अभी तो…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on June 18, 2015 at 5:30pm — 24 Comments

उनके बाहों की सौग़ात मिली

उनके बाहों की सौग़ात मिली
इक मुद्दत पे ऐसी रात मिली

जाने मेरे हक़ का था वो पल
या मुझको कोई खैरात मिली

रिमझिम रिमझिम मेरी आँखों से
उसकी याद लिए बरसात मिली

सोचा क्या था क्या पाया मैंने
टूटे सपनों की बारात मिली

जिनको सज़दे में माँगा ता-उम्र
उनसे कुछ पल कि मुलाक़ात मिली

जब सोचा की अब जीतेंगे हम
बस उस पल ही मुझको मात मिली

© परी ऍम. 'श्लोक'

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Pari M Shlok on June 18, 2015 at 5:13pm — 18 Comments

बुराई बुराइयै का काट डालत है -- डॉo विजय शंकर

- चच्चा , ई का वखत आय गयो , बेईमान बेईमानै की शिकायत कर रहा है , कहत है कि इका सजा देयो । चोरै चोर का पकड़ावाय देही का ?

हम तो यही जाने रहे कि सबै मौसेरे भाई होत हैं।

- अब का कींन जाए , जब सब भले मनई मुह बांधे बैठे रहिये , सबै बुराईयन पे आँखें मूंदें रहिये , कान बंद किये रहिये तब और का होई, यही होई , बुराइयै बुराई का मार डाली , चोरै चोर का पकड़वाए देई। …………बुराई फलत नाइ है बचवा, ज्यादा दिन चलत नाई है, नाही तो दूनियाँ तो कब्बै खत्म हुई गई होत.

अच्छाई अच्छाई का कब्बो…

Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on June 18, 2015 at 3:32pm — 4 Comments

चेहरे की रेखाओं में …

चेहरे की रेखाओं में …

जाने कैसी बेरहम हो तुम

सिसकने की वजह देकर

खामोशी से चली जाती हो

चेहरे की रेखाओं में

दर्द के रंग भर जाती हो

स्मृति के किसी कोने में कुछ दृश्य

मेरे अन्तःमन को विचलित कर जाते हैं

और मैं बेबस निरीह सा

अपने सर को झुकाये

काल्पनिक लोक के दृश्यों से

स्वयं को जोड़ने का

बेवजह प्रयत्न करता हूँ

जानता हूँ कि उन दृश्यों से

एकाकार असंभव है

फिर क्योँ तेरी प्रतीक्षा करूं

क्योँ तुझसे स्नेह करूं

ऐ नींद…

Continue

Added by Sushil Sarna on June 18, 2015 at 3:30pm — 6 Comments


प्रधान संपादक
सुबह का भूला (लघुकथा)

इस बार बनवास सीता को मिला था। पीत वस्त्र धारण कर श्री राम और लक्ष्मण भी बन गमन हेतु तैयार खड़े थे। लेकिन सीता जी ने लक्ष्मण को साथ चलने से साफ़ मना कर दिया। अश्रुपूर्ण नेत्र लिए भरे हुए गले से लक्ष्मण ने पूछा: 

"क्या हुआ माते ?"

"कुछ नहीं हुआ लक्ष्मण,  तुम अयोध्या में ही रहोगे।" 

"मुझ से कोई भूल हो गई क्या ?"

"भूल तुमसे नहीं श्री राम से हो गई थी, जिसे सुधारने का प्रयास कर रही हूँ।"

"भूल और मर्यादा पुरुषोत्तम से ? मैं कुछ समझा नहीं माते।"

"उर्मिला के हृदय…

Continue

Added by योगराज प्रभाकर on June 18, 2015 at 1:00pm — 20 Comments

प्रश्नचिह्न के घेरे में (लघुकथा )

"तुमने जन्म देकर कोई एहसान नहीं किया है ..! क्या हमनें कहा था कि हमें इस दुनिया में लाओ ..? एक ब्रांडेड टी - शर्ट के लिए तो तरसते है हम .... अगर परवरिश करने की ताकत नहीं थी तो पैदा करने से पहले सोचना था ना ... अब हमारा क्या ...? "

"इसलिए तो सब घरबार बेचकर तुम्हारा एडमिशन इतने बडे़ काॅलेज में करवाया है कि तुम अपने बच्चों को वो सब दो जो हम ना दे सकें तुम्हें । "

"कितना शर्मिंदा होता हूँ वहाँ कालेज में इन साधारण कपडों में ... कितना अच्छा होता कि मै पढ़ाई ही नहीं करता ..! "…



Continue

Added by kanta roy on June 18, 2015 at 11:00am — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
प्यार - एक वैचारिक अतुकांत -'' हाँ , आपसे ही कह रहा हूँ '' ( गिरिराज भंडारी )

प्यार - एक वैचारिक अतुकांत --'' हाँ , आपसे ही कह रहा हूँ ''

********************************************************************

वाह !

किसने कह दिया ?

आपके दिल में प्यार भरा है, सागर सा

खुद ही दे दिये सर्टिफिकेट , खुद को ही

वाह ! क्या बात है

बिना जाने सच्चाई क्या है ? कैसी है ?

प्यार है भी कि नहीं दुनिया में

प्यार नाम की चीज़ होती कैसी है ?

रहता कहाँ है प्यार ?

किन शर्तों में जी पाता है ?…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on June 18, 2015 at 10:00am — 10 Comments

खिलौने ( लघुकथा )

" आज के बाद ये सब खेल मत खेलना " और उसने सारे गुड्डे , गुड़िया को उठा कर फेंक दिया । बेटी सहम गयी , कुछ महीने पहले मम्मी ने ही इतने प्यार से ख़रीदे थे उसके लिए !
अगले दिन वो खिलौनों में बाइक्स और कार के अलावा कुछ गन भी ले आई थी और तलाक़ के नोटिस का ज़वाब भी भिजवा दिया था ।


मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on June 18, 2015 at 2:03am — 12 Comments

गजल---दिल है जो तेरा आशिक उसकी खता नहीं है ।।

२२१ २१२२ २२१ २१२२



हूँ जो नशे में धुत मैं मय का नशा नहीं है।

यह इब्तिदा-ए-उल्फत है इन्तिहा नहीं है ।।



किस ओर जाके खोले बोतल शराब की ये।

उनकी गली से अब तक हम आशना नहीं है ।।



ऐसा करूं मैं क्या जो तू खुद गले लगा ले।

तू ही बता दे मुझको, मुझको पता नहीं है ।।



है मय ये तेरी आँखें सावन है तेरी जुल्फे।

दिल है जो तेरा आशिक उसकी खता नहीं है ।।



हर रोज सोचता हूँ कह दूँ मैं आज उनसे।

अब प्यार तो बहुत है पर हौसला नहीं है… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on June 17, 2015 at 11:00pm — 18 Comments

सम्प्रदायिक दंगा...

सम्प्रदायिक दंगा...

चौराहों पर भीड़ अकड़ कर

भड़ास निकालती

दूकानें घबराकर छिप जाते बन्द डिब्बों में

जनानी खिड़कियां दुबक जातीं

देर सुबह तक.....शायद अनि-िश्चत काल के लिए

बिना पंख की हवाएं बिखेरतीं, सौरभ-अफवाहें

अर्ध्द खुली मर्द खिड़कियां, अवाक!

शहर की गली, सड़क सब सॉय-सॉय

...फुफकारते काले नाग

शोक में,  सब्जियां - फल सब दॉए-बॉए

नालियों में अपनी सूरतें देखतीं

सड़कों के मध्य चप्पलें दहाड़े मार कर रोती

जूते फटेहाल…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 17, 2015 at 8:30pm — 14 Comments

सांझ की सौतेली दुहिता...

सांझ की सौतेली दुहिता....निशा,

अति हृष्ट-पुष्ट,

द्वेष में लिप्त अति उर्वरा

सघन तम में भी फलती है,

असंख्य नखत

अभावों में जीते, रह-रहकर चमकते

दम्भ में हठी

राहू-केतु-भद्रा सी उप-िस्थति

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को विचलित करते

चन्द्र अति शक्तिशाली किन्तु क्षीण

विपक्ष का नेता शशि शापित

उच्चताप में भी चन्दन

विषधारियों से आच्छादित

क्षण भर की लापरवाही से सौरभ छीन लेता

......बुद्धि-मन-प्राण भी,

तन.....बर्फ सा कठोर

चॉदनी उफ तक नहीं… Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 17, 2015 at 8:11pm — 12 Comments

एक ग़ज़ल ग़ालिब की ज़मीन में

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन/फ़इलुन



एक मिसरे में इधर मैंने मेरा दिल बाँधा

दूसरे में तेरे रुख़्सार का ये तिल बाँधा



यूँ लगा जैसे हुवा सारा ज़माना रौशन

मैंने दौरान-ए-ग़ज़ल जब महे कामिल बाँधा



ख़ून आँखों से टपकता है तो हैरत कैसी

तूने क्यूँ कस के बदन से ये सलासिल बाँधा



मुनकशिफ़ हो गया दुनिया पे मेरा फ़न आख़िर

उसने साफ़ा मेरे सर पे सर-ए-महफ़िल बाँधा



उस से अल्फ़ाज़ की कुछ भीक थी दरकार मुझे

इस लिये मैंने मियाँ शैर…

Continue

Added by Samar kabeer on June 17, 2015 at 7:00pm — 31 Comments

ग़ज़ल -नूर: मेहंदी उनकी बहुत रची होगी.

२१२२/१२१२/२२ (११२)

लोग समझे कि शाइरी होगी

बात तो सिर्फ़ आप की होगी

.  

रोज़ साहिल पे आ के रुकती है

शाम की कोई बे-बसी होगी

.

तेरे जाने का ग़म रहा मुझ को

ग़म को कितनी खुशी हुई होगी.

.

अपने जादू से जीत लेती है

ये कज़ा भी कोई परी होगी.

.

ले चलूँ बेटी के लिए गुडिया

मुँह फुलाए वो अनमनी होगी.

.

मेरे दर पे ख़ुशी है आने को

आती होगी!! कहीं रुकी होगी.

.

दर्द की चींटियाँ लिपटती हैं

दिल में यादों की चाशनी…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on June 17, 2015 at 4:30pm — 19 Comments

काम का आदमी ( लघुकथा )

" मंजू के यहाँ आज बडी़ वाली एल ई डी भी आ गई । पिछले ही महिने उसने गाड़ी भी ली थी । और एक आप है ...!!!"

" मै क्या ....? क्या कहना चाहती हो तुम ?"

वहीं पास के विडियो गेम में लगे बेटे ने भी कंधे को उचका कर पिता की ओर देख फिर अपने गेम में व्यस्त हो गया ।

" मै क्या कहूँगी भला आपसे .! आपकी ही आॅफिस का बाबू है वो ..और आप अधिकारी होकर भी किसी काम के नहीं ..! "

" किसी काम का नहीं मै ....? "- मन में रह - रह कर एक ही बात अब घुम रही थी कि वे क्या किसी काम के नहीं है सच में ..? कल…

Continue

Added by kanta roy on June 17, 2015 at 1:30pm — 22 Comments

भाभी माँ

“क्या बना रही है रूपा” बगल वाली चाची की आवाज़ सुन कर रुपाली ने सिर उठा कर ऊपर देखा और मुस्कराहट बिखेरते हुए कहा . “आइये चाची जी ..बस धूप मे बैठी थी तो सोचा कुछ काम ही कर लूँ. आप बैठिए मै माँ को बुलाती हूँ.” “नही बेटा तू अपना काम कर मै भीतर जाकर मिल लेती हूँ.” और चाची प्यार से रूपा के सर पर हाथ फेर कर अंदर चली गई. सामने से रूपा की माँ आती दिखी. पड़ोसन से रहा न गया खुश होते हुए बोली “जीजी ! बड़ी गुणी है अपनी रूपा जिस घर जायेगी स्वर्ग बना देगी” रूपा की माँ कुछ न बोली बस हँस कर सर हिला दिया. “नही जीजी… Continue

Added by Seema Singh on June 17, 2015 at 12:59pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
फिल बदीह ग़ज़ल(राज)

२१२२ २१२२ २१२   

 

चाँद को जो गुनगुनाना आ गया

चाँदनी को मुस्कुराना आ गया

 

 दीप राहों में जले कुछ इस कदर

 याद इक  मंजर पुराना आ गया

 

देख कर अठखेलियाँ वो अब्र की

 पंछियों को चहचहाना आ गया

 

मौतं से भी हो गई थी आशिकी

, जंग में जब जाँ लुटाना आ गया

 

पड़ गई कुछ जान उस मासूम में,

 पेट में जब एक दाना आ गया

 

जिंदगी की देखकर जद्दोजहद  ,

जोश हमको आजमाना…

Continue

Added by rajesh kumari on June 17, 2015 at 10:30am — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - फिल बदीह -- अब ज़रा सा मुस्कुराना आ गया ( गिरिराज भंडारी )

 2122    2122    212

क्या वही फिर से ज़माना आ गया ?

आदमी को दोस्ताना आ गया

 

शर्म उनकी आँखों मे दिखने लगी

इसलिये नज़रें चुराना आ गया

 

फ़िक्र अब करते नहीं यादों की हम

अब हमें उनको भुलाना आ गया

 

ऊब कर रोने से दिल को देखिये  

अब…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on June 17, 2015 at 9:00am — 22 Comments

ग़ज़ल -- कश्तियाँ बरसात में

2122-2122-2122-212

.

मुस्कुरा कर कह रही कुछ झुर्रियाँ बरसात में

देखीं थीं हमने कभी रंगीनियाँ बरसात में

.

आज का बचपन न जाने कौन सी चिन्ता में गुम

अब नहीं कागज़ की दिखतीं कश्तियाँ बरसात में

.

ज़ेह्न में रच बस गया है अब तो उनका ज़ायका

माँ खिलाती थी हमें जो पूरियाँ बरसात में

.

आज घर में शाम को चूल्हा जलेगा किस तरह

कह रही मजदूर की मजबूरियाँ बरसात में

.

मेरे घर की छत गिरी थी या गिरा था आसमाँ

जो हुईं उस रात थीं दुश्वारियाँ बरसात…

Continue

Added by दिनेश कुमार on June 17, 2015 at 8:34am — 14 Comments

गजल //// इश्क में हूँ जांबलब

2122  2122 2122 2  

फाईलातुन  फाईलातुन  फाईलातुन फा  

हम किसी से मिलने उसके घर नहीं जाते

आप भी  है जिद  में मेरे दर नहीं आते

 

बेबसी  महबूब  की किस भाँति  समझाऊँ  

आज भी  उनको   मेरे  चश्मेतर नहीं भाते

 

जिन्दगी  बीती  है उनकी  सूफियाना सी   

मस्त तो है  रहते   साजो पर नहीं गाते

 

इश्क  में हूँ  जांबलब  मेरा  भरोसा क्या

फ़िक्र उनको  कब है  चारागर  नहीं लाते

 

एक साया उसका   बांटी  जिन्दगी…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 16, 2015 at 9:30pm — 34 Comments

गजल-सुख की भी दोस्त गम सी तासीर बन गयी है।

221 2122 221 2122



नाकामयाबी मेरी तकदीर बन गयी है।

अब जिन्दगी ये गम की तस्वीर बन गयी है।।



मरहम समय का भी कुछ आराम दे न पाया।

ये चोट अब जिगर की जागीर बन गयी है।।



उलझी पडी है उल्फत की बेडियों में साँसें।

यादों से मिल के धडकन भी तीर बन गयी है।।



सुनती है गर कहीं तू इक बार आ के मिल ले।

रो रो के मेरी हालत गम्भीर बन गयी है।।



हँसता हुँ तब भी चहरा छोडें नहीं उदासी।

सुख की भी दोस्त गम सी तासीर बन गयी है।।



आँखों ने… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on June 16, 2015 at 7:30pm — 26 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

sushil yadav posted blog posts
23 hours ago
Sushil posted blog posts
23 hours ago
vijay nikore posted a blog post

अनसुने अनकहे के बीच

                        अनसुने अनकहे के बीच.कहे अनसुने-से रहे कुछ जज़्बातउसपर अनकहे एहसासों का…See More
23 hours ago
रोहित डोबरियाल "मल्हार" replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"1 लाख मासिक चाहिए ही क्यों भाई, वर्डप्रेस CRM में वेबसाइट को ट्रांसफर कर दिया जाए, तो सालाना खर्च…"
Oct 15
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service