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कव्वा चला शायर की चाल ......

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दिल में शायरी का जब भी दोर उट्ठेगा

सबसे पहले तेरे नाम का शोर उट्ठेगा !!

पहली बारिश की रिमझिम शुरू क्या हुई

देख आज बगिया में नाच मोर उट्ठेगा !!

तेज हवाएँ तेरे इश्क़ में कुछ चलीं ऐसी

दिल में एहसासों का बबंडर जोर उट्ठेगा !!

जब आयेगा धुवाँ पड़ोस के घर के चुल्हे से

तभी मेरे हाथ से ये खाने का कोर उट्ठेगा !!

बचा कर रखना ये दिल मेरी तीरंदाजी से

वर्ना लूटने 'इंतज़ार' के दिल का…

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Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on July 14, 2015 at 9:34am — 21 Comments

भूस्खलन इंसानियत का (लघुकथा)

लगातार हो रही वर्षा के पश्चात पुनः विद्यालय सुचारू रूप से चलना शुरू ही हुआ था कि चीख-पुकार मच गयी सभी अपनी -अपनी जान बचाकर भाग रहे थे।नया विवादित भवन पहली ही बरसात में विद्यार्थी और शिक्षकों की कब्र में परिवर्तित हो गया ।अधिकारीयों का तांता लगा रहा तत्काल प्रभाव से भेजी गयी रिपोर्ट में भवन का खण्डहर होने का कारण -
" अत्यधिक वर्षा से भूस्खलन " था।

और ठेकेदार की बहुमंजिली कोठी बरसते सावन में घी के दीयों से जगमगा रही थी।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Archana Tripathi on July 13, 2015 at 11:30pm — 13 Comments

प्राकृतिक चुनाव (लघुकथा)

बड़े से मंदिर की बड़ी सी मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर खड़े एक बड़े आदमी ने कहा, "भगवन, हम सब जानते हैं कि प्रकृति उसी का चुनाव करती है जो सबसे शक्तिशाली होता है। जो प्रजाति कमजोर होती है और अपनी रक्षा नहीं कर पाती वो मिट जाती है। इस तरह सीमित संसाधनों का सबसे शक्तिशाली प्रजातियों द्वारा उपयोग किया जाता है और उसी से ये दुनिया विकसित होती है। तो भगवन मैंने जो मज़दूरों, गरीबों, कमजोरों और लाचारों का अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल किया है वो मैंने एक तरह से प्रकृति की मदद ही की है। ऊपर से मैंने आपका ये…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 13, 2015 at 9:30pm — 10 Comments

मिठाई ( लघुकथा )

नास्तिक बाबूजी को देर रात ,चुपके से पूजाघर से निकलते देख मानस की उत्सुकता जाग गई,और पुलिसिया मन शंकित हो उठा।वो चुपके से उनके पीछे चल पड़ा।

उन्होंने हाथ में पकड़ा लड्डू माँ की ओर बढ़ा दिया
" लो खा लो "
" ये कहाँ से लाए आप ?"
"पूजा घर से "उन्होंने निगाह चुराते हुए कहा।
उसकी आँखें भर आयीं अपनी लापरवाही पर। घर में सौगात में आये मिठाई के डिब्बों का ढेर मानो उसे मुँह चिढ़ा रहा था।


( मौलिक एवम अप्रकाशित )

Added by jyotsna Kapil on July 13, 2015 at 7:00pm — 17 Comments

कवि

कवि

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आत्मावलोकन

-----------------

सभागार

खचा खच था भरा

कुछ सहमा सा

कुछ डरा डरा

खड़ा मैं किनारे धरे मौन

उसने

पूछा परिचय

मैं हूँ कौन ?

सकपकाया थर्राया

फिर तोडा मौन

तुम कौन ?

कभी अपने को जाना

नही समझोगे

व्यर्थ समझाना



मैं कवि हूँ अदना सा

नही हूँ डॉन



हकीकत

---------



भीतर घुसा

ढाढ़स कुछ पाया

अंधियारे में कुछ

समझ न आवा…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 13, 2015 at 5:07pm — 4 Comments

बस इतनी सी मेहर रखना/लक्ष्य “अंदाज़

    बस इतनी सी मेहर रखना

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      (लक्ष्य “अंदाज़”)

हम फकीरों से घर की उम्मीद न इधर करना !

ढल जाये शाम तो दरख्त तले भी बसर करना !!

राहे-उल्फत में तुम हवा के परों पर सवार हो ,

अहले-ज़मीं हैं हम ,बस सड़क पे सफ़र करना !!

फूल मुहब्बत के तारीखे-शुआओं से जल गए ,

कोंपलों की आस में अब भी क्यूँ शज़र रखना !!

तुम्हारी हर दुआ कुबूल है उस इलाही के दर ,

दुआओं में याद रखना बस इतनी…

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Added by डॉ.लक्ष्मी कान्त शर्मा on July 13, 2015 at 2:30pm — 4 Comments

दिल आज उदास है // कान्ता राॅय

आईये पास कि दिल आज उदास है

आपकी आस में दिल आज उदास है



याद का भँवर उडा ले चला इस कदर

थाम लीजिए मुझे दिल आज उदास है





हाथ में आपकी हैं छुअन सी लगीं

घटा को देख फिर दिल आज उदास है





दिल का धडक जाना आपके नाम से

बदलियों को देख दिल आज उदास है





छतरी में सिमटना एक ठंडी शाम में

यादों में तनहा दिल आज उदास है



रूहानी तलाश रूह की जैसी प्यास

ढुंढना आस पास दिल आज उदास है



पूछना मुझसे नाम मेरे यार… Continue

Added by kanta roy on July 13, 2015 at 1:30pm — 18 Comments

अन्तर्मन (कहानी)

पेड़ के बगल ही खड़ी हो पेड़ से प्रगट हुई स्त्री ने पूछा , “अब बताओ इस रूप में ज्यादा काम की चीज और खूबसूरत हूँ या पेड़ रूप में |

पेड़ बोला , “खूबसूरत तो मैं तुम्हारे रूप में ही हूँ , पर मेरी खूबसूरती भी कम नहीं | काम का तो मैं तुमसे ज्यादा ही हूँ |”

” न ‘मैं’ हूँ |”

पेड़ ने कहा, ” न न ‘मैं’ ”

पेड़ ने धोंस देते हुए कहा , “मुझे देखते ही लोग सुस्ताने आ जाते हैं |जब कभी गर्मी से बेकल होते हैं |”

“मुझे भी तो |” रहस्यमयी हंसी हंसकर बोली स्त्री

“मुझसे तो छाया और सुख मिलता हैं…

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Added by savitamishra on July 13, 2015 at 12:00pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हम को तो सागर का लेकिन रोष दिखाई देता है (एक हिंदी ग़ज़ल 'राज')

२२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २  

.

दूजे  में हमको जो अक्सर दोष दिखाई देता है 

अपने में तो वो खूबी का कोष दिखाई देता है

 

उथला पथली हो लहरों की, चाहे समझो अँगडाई 

हम को तो सागर का लेकिन रोष दिखाई देता है

 

कितना टूटा होगा बादल खुद की हस्ती को खोकर

लेकिन नभ के मुख दर्पण में तोष दिखाई देता है

 

जिसके मन में खोट नहीं है उसको लगता सब अच्छा             

 पतझड़ में भी जीवन का उद्धोष  दिखाई देता है

 

खुशियाँ हो तो…

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Added by rajesh kumari on July 13, 2015 at 11:30am — 17 Comments

सीख....(लघुकथा)

“सुन बेटा!! बारिश तो ठीक हुई और खेतों में नमी पर्याप्त है, बस बीज को सही नमी और शुष्कता के बीच में ही बोना, अंकुरण का प्रतिशत अच्छा रहेगा. ज्यादा गहरी नमी में मत उतार देना, वरना सड जायगा..” रमेश ने अपने बेटे को खेत में बोनी करने से पहले समझाते हुए कहा

“ जी पिताजी.. मैं आपकी बात समझ गया, सब संभाल लूँगा. आप घर जा रहे हो, अगर हो सके तो छोटू के खाते में कुछ पैसे जमा कर आना. कल उसका फोन आया था. वहां शहर में गर्मी बहुत है पंखे से काम नहीं चलता, तो कूलर का कह रहा था..”  बेटे ने काम…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on July 13, 2015 at 11:02am — 5 Comments

जैसे को तैसा (लघुकथा)

इधर  गॉव से ताई जी अपने परिवार के साथ, पूरे बीस दिन के लिये आ गयीं थी! उधर पिछले तीन दिन से काम वाली बाई नहीं आरही  थी!

आखिरकार पांच दिन बाद बाई जी आईं!जैसे ही बाई रसोई की तरफ़ बढी, ताई जी ने कडकती आवाज़ में उसे रोक दिया"ए रुको, पहले बताओ तुम कौन जाति की हो"!

"किसलिये, कोई रिश्ता करना है क्या"!

"अरे यह तो बडी मुंहफ़ट है"!

“क्यों बुरा लगा ना"!

"तुमको जाति बताने में क्या परेशानी है"!

"हमने तो कभी आपसे आप की जाति नहीं पूछी"!

"अरे वाह,तुम किसलिये…

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Added by TEJ VEER SINGH on July 13, 2015 at 11:00am — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- ख़ुदा हो जा, अगर क़ुव्वत है तुझ में (गिरिराज भंडारी )

1222   1222    122

बहारों पर् चलो चरचा करेंगे

ख़िजाँ का ग़म ज़रा हलका करेंगे

 

कभी सोचा नहीं, हम क्या बतायें

न होंगे ख़्वाब तो हम क्या करेंगे

 

सजा दे , हक़ तेरा है हर खता की

उमीदें रख न हम तौबा करेंगे

 

अगर जुगनू सभी मिल जायें, इक दिन

यही सर चाँद का नीचा करेंगे

 

सँभल जा ! हम इरादों के हैं पक्के

कि, मर के भी तेरा पीछा करेंगे

 

जिया अन्दर का बाहर आ तो जाये

सर इब्ने सुब्ह को नीचा…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 13, 2015 at 8:30am — 18 Comments

ग़ज़ल - इस्लाह के लिए

2122 2122 2122 212



या तो चाहत इश्क़ में थी या खुदा पाने में थी

एक समंदर की सी तमन्ना आँख के दाने में थी



बेगुनाही एक जिद इक़बाल जब तेरी ख़ुशी

और मेरी हर सजा तेरे बिछड़ जाने में थी



होश के इस फैसले से क्या मुझे हासिल हुआ

ज़िन्दगी की हर ख़ुशी छोटे से पैमाने में थी



सांस लेता है ये जाने कौन किसका जिस्म है

ज़िन्दगी तो अपनी तेरे गम के वीराने में थी



ये नहीं हासिल हुआ या वो नहीं मुमकिन हुआ

कशमकश ये हर घडी इस दिल को थर्राने में…

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Added by मनोज अहसास on July 13, 2015 at 8:30am — 14 Comments

समझ

हाइकू

१

मित्र हैं वही

जो न तोड़े विश्वास

शेष तो साथी

२

दूसरों पर

न करो दोषारोपण

यही बहुत

३

परोपकार

खुशबू चन्दन

करुना बसी

४

निराश न हों

असफलता देती

प्रेरणा नई

५

धन प्राप्ति से

दरिद्रता न मिटे

वित्तेष्णा छोडो

६

खरीददारी में

खुश होने का भ्रम

पाले रईस

७

जुंबा पर आये

पुरानी कई यादें

प्यार बढाए

८

कह के बात

खुले मन…

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Added by Manisha Saxena on July 13, 2015 at 12:12am — 4 Comments

चाँद मेरा आया है.........

चाँद मेरा आया है....

क्यों अपने रूप पे

ऐ चाँद तूं इतराया है

आसमां के चाँद सुन

मेरे चाँद का तू साया है

अक्स पानी में तेरा तो

इक हसीँ छलावा है

अक्स नहीं हकीकत है वो

जो इन बाहों में समाया है

वो ख़्वाब है मेरी नींदों का

हकीकत में हमसाया है

अपने हाथों से ख़ुदा ने

महबूब को बनाया है

एक शबनम की तरह

वो हसीं अहसास है

देख उसके रूप ने

तेरे रूप को हराया है

किसकी ख़ातिर बेवज़ह

देख तू शरमाया है

मुझसे मिलने चांदनी…

Added by Sushil Sarna on July 12, 2015 at 10:43pm — 4 Comments

लघुकथा : परमज्ञान

भक्त ने भगवान से कहा, "भगवन! आपके पास जितना ज्ञान है वो सारा का सारा मुझे भी प्रदान कर दीजिए।"

भगवान बोले, "तथास्तु।"

भक्त को दुनिया की सारी कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक और धर्मग्रन्थ इत्यादि याद हो गए। उसे हर तरह की कला एवं संगीत का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो गया। उसे दर्शन एवं विज्ञान के सभी सिद्धान्त याद हो गए। इस तरह वह परमज्ञानी हो गया।

उसने अपनी कलम उठाई और एक कविता लिखने का प्रयास करने लगा। कुछ पंक्तियाँ लिखने के बाद उसे लगा कि इस तरह की कविता तो अमुक भाषा में…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 12, 2015 at 10:30pm — 13 Comments

कौन नहीं चोर (लघुकथा)

एक व्यक्ति का नौकर उसके रुपये चोरी करके चला गया|

दूसरे व्यक्ति ने कहा "जो बेईमानी और चोरी के रूपए से अपना घर बनाता है वो कभी सुखी नहीं रह सकता"

पहले ने चौंक कर दूसरे की तरफ देखा और व्याकुल होकर कहा, "नहीं, आजकल ऐसा तो नहीं होता"

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 12, 2015 at 10:00pm — 6 Comments

लंच बॉक्स (लघुकथा)

"मैंने अपना लंच बॉक्स खुद पैक कर लिया है, निकल रहा हूँ मै।"

"आज इतनी जल्दी क्या है निखिल को' रचना सोचने लगी I

उसने बाहर कमरे में आकर समय देखा, दस बज गए थेI आज उसे हर हाल में दो बजे से पहले पोस्ट ऑफिस जाकर अपनी कविता पोस्ट कर देनी है I लगभग एक महीने पहले अपने बेटे को हिंदी कविता पढ़ाते समय उसके दिमाग़ में एक बहुत पुराना दबा हुआ कीड़ा फिर रेंगने लगा थाI कॉलेज के दिनों में वो कविता लिखती थी और तारीफ भी पाती थीI फिर सब छूट गयाI कुछ दिन पहले एक अखबार में उसने कविता भेजने का आमंत्रण पढ़ कर…

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Added by pratibha pande on July 12, 2015 at 4:00pm — 7 Comments

सनकी ( लघुकथा )

विदेशी कुर्सी,दुनिया की नम्बर एक साॅफ्टवेयर कम्पनी , लाखों का पैकेज। ....लेकिन मन...? एक बंधन सदा मन को जकड़े रहता था । कितने वेब डिजाइन किए।पर प्रोजेक्ट की सफलता खुशी कहाँ दे पाती थी ।



देश के प्रति जिम्मेदारी ....

वतन की मिट्टी की पुकार ,अपने बन्धन में जकड़ रही थी ।



उसके भारतीय सहकर्मी भी विदेशी नीति से संतुष्ट नहीं थे ।



गिरीश के नेतृत्व में जब उनलोगो ने लाखों के पैकेज वाली नौकरी से इस्तीफ़ा दिया तो सहयोगियों ने उन्हें " सनकी " की उपाधि से नवाज़ा… Continue

Added by kanta roy on July 12, 2015 at 1:33pm — 10 Comments

लेखक मंडी ( हास्य )



कवि सम्मेलन

---------------

ट्रिन-ट्रिन

''हेलो '' लेखक मंडी

''दो दर्जन कवि , दोपहर ११ बजे , राम नाथ हाल, बेहाल मंडी भेज दीजिए''

''दहाड़ी कितनी ?

फिर दिमाग खराब हो गया तुम्हारा , दूसरे जिले से मंगवा लूँ ?मारे -मारे घूम रहे हैं। न इन्हें कोई सुनता , न छापता और न ही पढता।

'' फिर भी , कुछ तों देना ही होगा ''

'' २ टाइम चाय, बिस्कुट., ''

''बस, और कुछ नही भूखे मर जायेंगे बेचारे ''

''अभी कौन जिन्दा है ''

''कुछ तों बढाइये , बाल बच्चे दार…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 12, 2015 at 12:30pm — No Comments

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