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नियाग्रा फाल

।।नियाग्रा फाल।।

" मम्मी बधाई हो ,आप दादी बनने वाली है ।तीन माह हो गये।"

खुशी से सराबोर, जल्दी से स्पीकर आन कर ।"बधाई हो,बधाई

हो, बेटा ख्याल रखना बहू का ,पहले क्यों नहीं बताया, बहू

ठीक तो है ना , कोई परेशानी तो नहीं ?"

"सब ठीक है मम्मी । मम्मी, पापा से कहो पासपोर्ट बनवा लें दोनों का।अभी टाइम है तब तक में बन ही जायेगा ।"

"पासपोर्ट का क्या करना है बेटा ?"

"क्यों ,यहाँ अमेरिका घूमने नहीं आओगे ?"

"तेरे पापा को छुट्टियां कहां मिलती है ?"

"मम्मी मैं कुछ…

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Added by Pawan Jain on December 20, 2015 at 5:25pm — 2 Comments

अहसास ( लघुकथा )

परीक्षाएं सिर पर होने से उसका अधिक से अधिक समय कमरे में ही बीतता था I आज फिर भीतर से ही आवाज़ आई थी I ' मॉम आज मटर की दाल बनाओ न !! '

' अच्छा ' कह मैं मुस्कुराई थी I संभवतः उसने सुन लिया था की मैंने आज सब्जी वाले से मटर ख़रीदे हैं I सोचा ,जा कर पूछ लूँ ! ' और कुछ भी चाहिए !!' भीतर गयी तो कमरे में जो नजारा दिखा ,जेहन में एक ही बात आई ' उफ़ ! ये लड़की भी न !! '…

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Added by meena pandey on December 20, 2015 at 1:30am — 6 Comments

सच की कमज़ोर आवाज़ (लघुकथा)

एक दिन सच और झूठ एक दूसरे से मिले, दोनों ने सोचा हमें एक जैसा दिखना चाहिये, ताकि लोग खुद ही अपने विवेक से सच और झूठ को पहचान सकें|

और उन्होंने एक जैसे कपड़े पहने और एक जैसे मुखौटे चेहरे पर लगा दिये फिर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर वादा किया कि किसी को अपना चेहरा उजागर नहीं करेंगे|

उसके बाद आज तक झूठ की मधुर आवाज़ के कारण कई लोग झूठ को ही सच समझते हैं और सच अपने वादे के कारण खुद…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 19, 2015 at 7:05pm — 4 Comments

मुखौटे (लघुकथा)/ रवि प्रभाकर

 ‘बेशक हमारे भाई साहिब को देश छोड़े एक अर्सा हो गया यू.एस.ए. में उन्होनें अपना बिजनेस एम्पायर खड़ा कर लिया है पर उन्हें अपने देश और अपनी संस्कृति से अब भी बहुत प्यार है। इसलिए वो अपने बेटे के लिए मेम नहीं बल्कि एक सुसंस्कृत भारतीय बहू चाहते है।’ शहर के नामचीन बिल्डर अपनी डाॅक्टर पत्नी सहित मेयर साहिब के घर उनकी इकलौती बेटी के लिए अपने भतीजे के रिश्ते के सिलसिले के लिए बतिया रहे थे।

‘यह तो बहुत अच्छी बात है। मेरी बहन व बहनोई भी यू.एस.ए. सिटीज़न हैं । वो आपके भाई साहिब को बहुत…

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Added by Ravi Prabhakar on December 19, 2015 at 1:46pm — 9 Comments

मार्गदर्शिका (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी (44)

"हाँ दीदी , आपने जैसा समझाया था, वैसा ही कर रही हूँ। देवरानी, जिठानी और यहाँ तक कि मेरे पति देव जी को भी पता नहीं चल पाता कि मैं सास- ससुर की कब सेवा कर उनकी पसंद की चीज़ें कब उन्हें खिला देती हूँ । पूरी पकड़ हो गई है मेरी उन पर !" - छत पर बैठे हुए उमा ने कहा।



"बढ़िया है । देवरानी और जिठानी को उनकी नज़रों में चढ़ने मत देना । सास-ससुर को यही लगना चाहिए कि तुम ही सबसे अच्छी बहू हो । कोम्पीटीशन का ज़माना है !"



"जी दीदी, अब तो आलम ये है कि सास-ससुर मेरे पति तक की नहीं सुनते,… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 19, 2015 at 9:15am — 7 Comments

पिज़र - लघु कथा जानकी बिष्ट वाही

" छाना बिलौरी झन दिया बौज्यू , लागला बिलौरी को घामा ." ( बेटी अपने पिता से कहती है।मेरा ब्याह छाना बिलौरी गाँव में मत करना।वहाँ की जानलेवा धूप में काम नहीं कर पाऊँगी।) गुनगुनाती हुई बसन्ती पीठ में लकड़ियों का बोझ उठाये पाले से आच्छादित रास्ते पर एक सार लय में पावँ जमा-जमा कर जंगल से नीचे उत्तर रही है।जरा सी लापरवाही उसे नीचे गरजती -उफनती काली नदी में विलीन कर देगी।



"आज़ बबा होते तो उसे ये सब क्यों करना पड़ता?" कुहासे बादलों की तरह यादें मन में घुमड़ने लगी।बबा चाहते थे बसन्ती खूब… Continue

Added by Janki wahie on December 19, 2015 at 7:16am — 6 Comments

गमख्वार समझा था मक्कार निकला- बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

बैजनाथ शर्मा 'मिंट'

अरकान - 122  122  122  122

गमख्वार समझा था मक्कार निकला|

जो दिखता था सज्जन गुनहगार निकला|

 

जिसे…

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Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on December 17, 2015 at 11:41pm — 9 Comments

हे भारत जागो !

गंगा जमुनी परंपरा को

मानव मन में झंकृत कर दो

वेद रिचाएँ महक उठे सब

मंत्रों को उच्चारित कर दो

हे! भारत जागो

 

गुंफित हो वन उपवन सारे

अवनी को शुभ अवसर दे दो

रुके पलायन गाँव गली का

हृदय में समरसता भर दो

हे! भारत जागो

 

बलिदानों के प्रतिबिम्बन में

रिश्ते फूलें खुले गगन में

छुपी हुई मंथर ज्वाला को

मानवता में मुखरित कर दो

हे! भारत जागो

 

रूप तरुण तेरा मन…

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Added by kalpna mishra bajpai on December 17, 2015 at 8:44pm — 6 Comments

ख़ूबसूरती (लघु कथा ) जानकी बिष्ट वाही

विशाल प्राँगण की खूबसूरत बुलन्द इमारत की मुंढेर पर बैठा ब्लड कैंसर उदासी के साथ नीचे कड़ाके की ठण्ड में काँपते मरीज़ों के परिजनों को देख रहा है।



" इतने मायूस क्यों हो भाई ? "थके स्वर में दिल की बीमारी ने पूछा।



" बहन ! बारह साल का बच्चा अंतिम सांसें गिन रहा है। मेरे नाम एक और मौत दर्ज़ होने जा रही है।"



" ये तो यहाँ का रोज़ का ही काम है।मेरा भी दिल दुखी हो जाता है।"



तभी वहाँ किडनी की बीमारी आ गई

" मैं तो असमंजस में हूँ।अभी तक कोई डोनर नहीं मिला। न… Continue

Added by Janki wahie on December 17, 2015 at 10:50am — 11 Comments

वह रहस

आदम फितरत है

भई

राम ने आसन्न -प्रसूता

को छोड़ दिया वन में

जीने, भटकने या  मरने 

भला हो वाल्मीकि का --- I

और कुछ ऐसा ही किया

कृष्ण ने राधा के साथ

छोड़ दिया निराश्रित

जीने, भटकने या मरने I

सीता का अंत तो जानते है सभी

इसी माटी में दफ़न हुयी थी कभी

पर राधा ------?

कब तक तकती रही राह ?

भेजती रही पाती और सन्देश

फिर कहाँ गयी वह ?

कैसे हुआ उसका अंत ?

किसी ने भी याद नही रखा

लानत…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 16, 2015 at 7:19pm — 2 Comments

याद नहीं - कुछ अशआर

जोश-ए-वस्ल में हुजूर को, उम्र का तकाजा याद नहीं

तड़पता जिस्म, भरी आँखे, कैसे हुआ कलेजा याद नहीं

 

भूल गया था वहशी, थी फकत शरारत की इक रात

हया और ज़िल्लत-ए-ज़माना, कब उठा जनाजा याद नहीं

 

होठों पे हंसी थी उनके और आँखों में चमक झलकी थी

दफ़न ही था दर्दे-दिल फिर, कैसे हुआ अंदाजा याद नहीं

 

राह बजी जब सीटियाँ, कान बंद और नज़र झुकी रहीं  

जुनूने इश्क में जालिम ने, कब कसा शिकंजा याद नहीं

 

ज़माना क्यों नहीं देखता, मन की…

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Added by Nidhi Agrawal on December 16, 2015 at 2:44pm — 5 Comments

भारत स्वच्छ बनाना है / एक कोशिश

स्वच्छता की शपथ लेकर,घर- घर अलख जगाना है

भारत स्वच्छ बनाना है, आदर्श देश बनाना है-----------

नागरिक की भागीदारी, जन-सेवा की अब तैयारी

स्वच्छता की जिम्मेदारी , जन-जन की हो भागीदारी

जन-आँदोलन स्वच्छता के , नाम पर चलाना है

भारत स्वच्छ बनाना है ,आदर्श देश बनाना है ------------------

स्वच्छता ही सम्पदा है ,बात यह तुम जान लो

सड़कों ,गलियों की सफाई ,अभियान यह ठान लो

सुव्यवस्थित शौचालय ,कचरा ठिकाने लगाना है

भारत स्वच्छ बनाना है ,आदर्श देश…

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Added by kanta roy on December 16, 2015 at 1:45pm — 1 Comment

सर्द साँझ ( लघुकथा )

बेचैनी उसकी आँखों से साफ नज़र आ रही थी।उधर अमन कश्मकश भरी निगाह से कभी डॉक्टर, कभी बच्चे, तो कभी अपनी पत्नी कली को देखे जा रहे थे।

सर्दी अपने शबाब पर थी।साँझ के धुंधलके में वे दोनों खरीदारी करके लौट रहे थे तो घर के आगे भीड़ देखकर रुक गए।झाड़ियों के पास नर्म, मुलायम कम्बल से लिपटा एक नवजात शिशु पड़ा हुआ था।लोग अनर्गल प्रलाप में लगे थे पर उसे किसी ने हाथ भी न लगाया था।

" चलो,न जाने किसका पाप है " अमन ने उसकी बाँह सख्ती से पकड़ते हुए कहा।कली ने कुछ कहना चाहा पर पति के चेहरे पर कठोरता के भाव… Continue

Added by jyotsna Kapil on December 16, 2015 at 12:32pm — 4 Comments

घाव खोल कर बैठ न जाना -( ग़ज़ल )-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

ग़ज़ल

*******

2222    2222    2222    222

********************************

आग लगाई क्या अपनों ने अरमानों के मेले में

बैठ गया जो आँसू  लेकर  मुस्कानों  के मेले में /1



कर के बहाना सब मरहम का दुखती  रग को छेड़ेंगे

घाव खोल कर  बैठ न  जाना  पहचानों  के  मेले में /2



छोड़ गए हैं अपने अकेला एक अपाहिज बोझ समझ

अब्दुल्ला  सा  मन  होता  है  अनजानों  के  मेले में /3



जब तक जेब भरी थी अपनी घर आगन सब अपना था

जेबें   खाली  तो  बदला  सब …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 16, 2015 at 11:43am — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जाने क्यों

जाने क्यों

क्या ढूँढ़ने उतरते हो

रात के अंधेरे में ओ कोहरे,

चुपचाप, इस धरती की छाती पर

फिर अक्सर थक कर सो जाते हो

पत्तियों के ठिठुरते गात पर

और सहमी, पीली पड़ गयी

तिनके की नोक पर –

गाड़ी के शीशे से

न जाने कहाँ झाँकने की कोशिश में

चिपक जाते हो तुम,

अक्सर.

सुबह की थाप तुम्हें सुनायी नहीं देती

उद्दण्ड बालक की तरह

धरती का बिस्तर पकड़कर,

मुँह फेरकर सोये रहते हो

जब तक कि फुटपाथ पर

रात भर करवटें…

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Added by sharadindu mukerji on December 16, 2015 at 2:30am — 6 Comments

धुंध [लघु कथा ]

" नानी ,आप दोनों की शादी को पचास साल के ऊपर हो गए i वाऊ "I

"और फिर भी हम दोनों खुश दिख रहे हैं ,ये ही पूछना चाह रही हो ना ?"नाना जी पीछे खड़े मुस्करा रहे थे I

"तब  ऑप्शंस  कम थे न बेटा , मोबाइल इन्टरनेट कुछ भी नहीं था ,जो माँ बाप ने ढूँढ दिया बस उसी को झेल रहे हैं I"नानी की आँखों में शैतानी थीI

"ऑप्शंस  होते तो मैडम इतनी अच्छी खिचड़ी खिलाने  वाला मिलता तुम्हे "? नानी के हाथ में गरम खिचड़ी की प्लेट थमाते नाना पास आके बैठ गएI

छःमहीने पहले जब से इस शहर में नौकरी लगी है…

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Added by pratibha pande on December 15, 2015 at 11:00pm — No Comments

एक तरही गजल

2122 2122 2122 22/112



शाम लिख ले सुबह लिख ले ज़िंदगानी लिख ले

नाम अपने हुस्न के मेरी जवानी लिख ले।

कब्ल तोहमत बेवफ़ाई की लगाने से सुन

नाम मेरा है वफा की तर्जुमानी लिख ले ।

जो बनाना चाहता है खुशनुमा संसार को

अपने होंठो पे मसर्रत की कहानी लिख ले।

मंहगाई बढ़ रही है रात औ दिन चौगुनी

वादे अच्छे दिन के निकले लंतरानी लिख ले।

लाल होगी यह जमी गर इन्सानो के खूँ से

रह न जाएगा अंबर भी आसमानी लिख ले…

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Added by Neeraj Neer on December 15, 2015 at 10:46pm — 16 Comments

नस्री नज़्म :- आओ सबका ग़म बाँटें

आओ सबका ग़म बाँटें,

गीतों से,कविताओं से,

ग़ज़लों से,नज़्मों से,

हल्का होगा मन का बोझ

अपने ऐसा करने से,

शायद कुछ परिवर्तन आए,

दिल की कली फिर मुस्काए,

गंगा जमुना का संगम हो,

कुछ तो रब्त-ए-बाहम हो,

सुनते हैं,ताक़त से क़लम की,

इन्क़िलाब आ जाता है

क्यूँ न फिर इस इन्क़िलाब की,

तैयारी में जुट जाऐं,

ये सब मिल जुल कर ही होगा,

आओ इस मक़सद को लेकर,

कोई ऐसा गीत रचें,

ऐसी नज़्म जो दिल को छू ले,

ऐसी कविता,जो रस घोले,

सब को अपनी… Continue

Added by Samar kabeer on December 15, 2015 at 10:24pm — 7 Comments

भौंक रहे कुत्ते (नवगीत)

हर आने जाने वाले पर

भौंक रहे कुत्ते

 

निर्बल को दौड़ा लेने में

मज़ा मिले, जब तो

क्यों ये भौंक रहे हैं, इससे

क्या मतलब इनको

 

अब हल्की सी आहट पर भी

चौंक रहे कुत्ते

 

हर गाड़ी का पीछा करते

सदा बिना मतलब

कई मिसालें बनीं, न जाने

ये सुधरेंगे कब

 

राजनीति, गौ की चरबी में

छौंक रहे कुत्ते

 

गर्मी इनसे सहन न होती

फिर भी ये हरदम

करते हरे भरे पेड़ों…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 15, 2015 at 9:49pm — 4 Comments

टुकड़खोर सेवादार

अइसई नहीं मिलता 

सेवादारी का ओहदा 

बड़ी कठिन परीक्षा है 

निभा ले जाना ड्यूटी सेवादारी की

हाकिम-हुक्काम तो 

कोई भी बन सकता है 

सेवादार बनना बहुत कठिन है 

सेवादार को होना चाहिए 

भाव-निरपेक्ष...संवेदनहीन 

अपने ड्यूटी-काल में 

और उसके अलावा भी 

जाने कौन सा राज़ 

कब किस हालत में फूट जाए 

और लेने के देने पड़ जाएँ 

हाकिम बना रहे 

हाकिम बचा रहे 

हुकुम सलामत रहे 

तो रोज़ी-रोटी की है गारंटी 

इतनी…

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Added by anwar suhail on December 15, 2015 at 5:53pm — 2 Comments

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