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ग़ज़ल -फिर ‘नूर’ हर्फ़ हर्फ़ वहाँ तितलियाँ रहीं.

221/2121/122/1212

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आसानियों के साथ परेशानियाँ रहीं, 

गर रौशनी ज़रा रही, परछाइयाँ रहीं.

.

क़दमों तले रहा कोई तपता सा रेगज़ार, 

यादों में भीगती हुई पुरवाइयाँ रहीं.

.

नाकामियों में कुछ तो रहा दोष वक़्त का,  

ज़्यादा कुसूरवार  तो ख़ुद्दारियाँ रहीं.

.

ऐसा नहीं कि तेरे बिना थम गया सफ़र

हाँ! ज़िन्दगी की राह में तन्हाइयाँ रहीं.

.

क़िरदार.. कुछ कहानी के, कमज़ोर पड़ गए

कुछ लिखने वाले शख्स की कमज़ोरियाँ रहीं.

.

मिलते…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 18, 2016 at 9:08pm — 19 Comments

कैक्टस का फ़ूल –( लघुकथा ) –

कैक्टस का फ़ूल –( लघुकथा ) –

कालेज की ग्रीष्मकालीन छुट्टियों में सुबोध इस बार अपने मित्र आनंद का आग्रह टाल ना सका और उसके गॉव आगया!काफ़ी बडा गॉव था!कहने को गॉव था पर शहरी हर सुविधा मौज़ूद थी!रेलवे स्टेशन,बस स्टॉप,अस्पताल,बैंक ,बिजली,पानी,टी वी,इंटरनैट आदि सब उपलब्ध था!

बैठक में सुबोध अकेला बैठा था कि एक सज्जन मिलने आगये!बडा अजीब प्रश्न किया,"क्या तुम भी माया को देखने आये हो"!

सुबोध कुछ कहता उससे पहले ही आनंद आगया और वह सज्जन खिसक लिये!सुबोध को कुछ समझ नहीं आया अतः आनंद से…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 18, 2016 at 8:06pm — 6 Comments

गीत-देखो आये ऋतुराज प्रिये!

देखो आये ऋतुराज प्रिये!

अंग-उमंग, तरंग भरे उर,

राग-रंग सुर-साज लिए।

देखो आये ऋतुराज प्रिये!



नित नवीन पल्लव तरु आए,

 सारे आम्रकुंज बौराए।

आये, कामदेव-सुत आये,

सुरभि-सुगंधित साथ लिए।

देखो आये ऋतुराज प्रिये!



चारो ओर कुसुम हर्षाएँ।

पुष्प पराग कलश छलकाएँ।।

तितली-भौंरे अति इतराएँ,

मन-मधुरस की आस लिए।

देखो आये ऋतुराज प्रिये!





पिक उपवन में कूक लगाएं,

हरखें, राग वागश्री गायें।

मोर-मोरनी रास… Continue

Added by रामबली गुप्ता on March 18, 2016 at 7:58pm — 2 Comments

कुण्डलिया छंद

सरस्वती माँ! शारदे, करूँ वंदना आज।
हर लो तम उर ज्ञान दो, सफल करो सब काज।।
सफल करो सब काज, जननि सुर में बस जाओ।
भर दो नित नव राग, हृदय में ज्योंति जगाओ।।
हरूँ जनों के त्रास, सुखी होए धरती माँ।
ऐसा दो वरदान, जयति जय सरस्वती माँ ।।

-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on March 18, 2016 at 7:49pm — 3 Comments

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22 (112)

लोग मिलते नहीं रिश्तो को निभाने वाले 

बीच मँझधार में कश्ती को बचाने वाले ||१||

कौन कीमत समझते हैं किसी की खुशियों की 

लोग मिलते हैं यहाँ ख्वाब चुराने वाले ||२||

जानते हैं मगर इस दिल को कैसे समझायें

लौट के आते नहीं छोड़ के जाने वाले ||३||

आँख में हो अना बाक़ी यही तो दौलत है 

हाँ मगर देखे हैं कागज को कमाने वाले ||४||

ज़िन्दगी भर हमे रखते रहे अंधेरों मे॥

रोज तुरबत पे आके शमआ जलाने वाले॥…

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Added by Rama Verma on March 18, 2016 at 4:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल--क्यूं कभी मेरी किसी से या खुदा बनती नहीं।

२१२२ २१२२ २१२२ २१२



क्यूं कभी मेरी किसी से या खुदा बनती नहीं।

आपने मेरे लिए कोई खुशी सोची नहीं ।



लोग जो अच्छे है मुझको सोच लेते हैं बुरा।

क्या मेरी नादानियों की आदतें अच्छी नहीं ।



मैंने उनसे सिर्फ अपनी भावनाएँ बाँटी थी।

बेवजह गुस्सा ये उनका क्या गलतफहमी नहीं।



मान ली मैंने चलो मुझसे खता कुछ हो गयी।

हो गयी अनजाने में अब क्या मुझे माफी नहीं।



सीख में आकर जमाने की किया है फैसला।

बात की दहलीज तक तो आप पहुँचे भी… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on March 18, 2016 at 8:10am — 3 Comments

होली, का त्योहार

रंगो का त्योहार है होली आओ मिलकर खेले

भेद भाव सब दूर भगाकर आओ होली खेले ॥

जो अपने भूले भटके हैं

धर्म दीवारों से बिछड़े हैं

और दूर देश में अटके हैं

कड़वी पर यह सच्चाई है

एक प्यार भरा संदेशा है

यह आज सुनहरा मौका है

रंगो का त्योहार है होली आओ मिलकर खेले

भेद भाव सब दूर भगाकर आओ होली खेले ॥

दुख सुख का यह जीवन है

यहाँ मिलकर सबको रहना है

हमें जीवन बाधा से लड़ना है

दुश्मन से देश को बचाना है

हमें मिलकर आगे…

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Added by Ram Ashery on March 18, 2016 at 8:00am — 1 Comment

केक्टस मे फूल

पड़ोस के गुप्ता आंटी के घर से आती तेज आवाज़ से तन्मय के कदम अचानक बालकनी मे ठिठक गये। अरे! ये आवाज़ तो सौम्या की है। …
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Added by नयना(आरती)कानिटकर on March 17, 2016 at 11:30pm — 12 Comments

स्त्रीत्व

"वो सफर लगातार चलता ही रहा.....

वो रस्ते बस आगे, और आगे ही बढ़ते रहे।

मैं कभी ज़मीन पर तो कभी आसमान पर,

दिन भर बुने अपने ख़ाबों की लड़ी सजती रही।

अपने ही वजूद को कभी बच्चों में, कभी घर की दीवारों में,

तो कभी उनकी आँखों में तलाशती रही.......

जानती हूँ सब हैं मेरे, पर.... फिर भी,

मैं अपने ख़ाबों के साथ अकेली सफर तय करती रही।

और ये आस ये उम्मीद बांधती रही कि,

मेरे अस्तित्व से निरंतर झरती जीवन धारा को

ये समाज आज नहीं तो कल सहृदय अपनायेगा।…

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Added by Monika Jain on March 17, 2016 at 6:30pm — 3 Comments

प्रतिशोध (लघुकथा)

शाम का धुंधलका फ़ैल रहा था, वह गाड़ी में पीछे बैठी थी, रोज़ की तरह रास्ते में वही मकान आने वाला था,  उसका दिल घबराना शुरू हो गया,  उसने अपना एक हाथ दूसरे हाथ से थाम लिया और मन ही मन बुदबुदाने लगी, "ये भेड़िये क्यों अँधेरी रातें खत्म नहीं होने देते?"

 

उसने आँखें बंद करने को सोचा ही था कि वो मकान आ ही गया और गाड़ी उस मकान को पार करने लगी, आज उसकी आँखों ने बंद होने से इनकार कर दिया|

 

उसने देखा मकान के मुख्य द्वार पर उसके शिक्षक के नाम की तख्ती थी, जिससे वो पढने जाती थी,…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on March 17, 2016 at 4:30pm — 6 Comments

झूठ मिटता गया देखते देखते (ग़ज़ल)

२१२ २१२ २१२ २१२

 

झूठ मिटता गया देखते देखते

सच नुमायाँ हुआ देखते देखते

 

तेरी तस्वीर तुझ से भी बेहतर लगी

कैसा जादू हुआ देखते देखते

 

तार दाँतों में कल तक लगाती थी जो

बन गई अप्सरा देखते देखते

 

झुर्रियाँ मेरे चेहरे की बढने लगीं

ये मुआँ आईना देखते देखते

 

वो दिखाने पे आए जो अपनी अदा

हो गया रतजगा देखते देखते

 

शे’र उनपर हुआ तो मैं माँ बन गया

बन गईं वो पिता देखते…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 16, 2016 at 7:45pm — 20 Comments

पहन पोशाक गांधी की - ग़ज़ल ( लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’ )

1222    1222    1222    1222

**********************************



जिसे  राणा सा  होना था  वो  जाफर बन गया यारो

सियासत  करके  गड्ढा भी  समंदर बन गया यारो ।1।



हमारी  सीख कच्ची  थी  या उसका रक्त ऐसा था

पढ़ाया  पाठ  गौतम  का सिकंदर  बन गया यारो ।2।



करप्सन  और  आरक्षण  का  रूतबा   देखिए ऐसा

फिसड्डी था जो कक्षा में वो अफसर बन गया यारो ।3।



तरक्की  है कि  बर्बादी  जरा  सोचो नए  युग की

जहाँ बहती नदी  थी इक वहाँ घर बन गया यारो ।4।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 16, 2016 at 10:48am — 18 Comments


प्रधान संपादक
कुल्हाड़ियाँ और दस्ते: लघुकथा:

हॉल कमरे के बीचों बीच मौजूद गोल मेज़ पर आज फिर गंभीर मंत्रणा का एक और दौर जारी थाI विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधिमंडल काफ़ी दिन गुज़र जाने के बाद भी किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाने में असफल रहे थेI जब भी उन्हें आशा की कोई किरण दिखाई देती तो कोई-न-कोई नई समस्या सामने आ खड़ी होतीI माहौल में निराशा तारी होने लगी थी जो सभी के चेहरों से साफ़ …
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Added by योगराज प्रभाकर on March 16, 2016 at 10:30am — 22 Comments

मत्तगयन्द सवैया

आय गयो मधुमास सखी! प्रिय की अब याद सताय सदा रे।
रात कटे नहि प्रीतम के बिन जोगन हो गइ पंथ निहारे।
सौतन के घर जाय बसे प्रिय लीन्हि नही सुधि मोहि बिसारे।
नैनहि नीर बहे अब तो मन धीर धरे नहि आज पुकारे।

-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on March 15, 2016 at 8:42pm — 4 Comments

कुण्डलिया छंद

मधु मधुऋतु मधुकाल हे! कुसुमाकर ऋतुराज।
रंग-बिरंगे पुष्प हैं, स्वागत में सुर-साज।।
स्वागत में सुर-साज, आज मन नाचे गाये।
अंग-अंग मदमात, पात नव तरु पर आये।।
वसुधा पुलकित आज, सजी जैसे नूतन वधु।
कोयल गाये राग, मधुप इतराएं पी मधु।।

-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on March 15, 2016 at 7:39pm — 5 Comments

दीवार

हमको खबर है कितने, हम बेखबर हो गए

अपने ही घर से कितने बाशिंदे बेघर हो गए



जब हम एक थे तो सारा शहर एक था

जो राहें हुईं अलग हमारी तो सब कुछ बंट गया

और अब तो आलम ये है कि ये सारा शहर दो खेमों में बंट चुका है

आधे इधर हो गए आधे उधर हो गए

अपने ही घर से कितने बाशिंदे बेघर हो गए-2



हर महफिल में सन्नाटा है हर शै सूनी हो गई है

मंज़िल खोती जाती है राहें दूनी हो गई हैं

सदमे में हर कोई यहॉँ सदमे में उधर भी हैं

लफ़्ज़ शोला उगलते हैं आँखें खूनी हो गई…

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Added by Ashish Painuly on March 15, 2016 at 6:30pm — 2 Comments

सोनचिरैया (लघुकथा)

“तुम साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहती, विमला की माँईं, तुम्हे शादी करवानी भी है या नहीं? एक से एक रिश्ते बताये तुमको... तुम हो कि किसी के कान छोटे, किसी के होठ मोटे बता रिश्ते ठुकराती ही चली जा रही हो!” वामन काकी के सब्र का बाँध टूट गया था आज तो. “पूरे गाँव के रिश्ते करवाएं हैं मैंने. कोई कह तो दे किसी की भी बिटिया अपने घर में सुख से ना है, या किसी भी घर में बेमेल बहू आई है आज तक.”

“ना, ना, काकी, तुम तो बेकार में लाल-पीली हो रही हो. मेरा वो मतलब ना था,” ठकुराइन मक्खन सी नरमी आवाज़ में लाकर बोली.…

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Added by Seema Singh on March 15, 2016 at 6:00pm — 8 Comments

गजल

22  22  22  22 

खंजर या तलवार नहीं हूँ

मैं घातक हथियार नहीं हूँ

अपनी शर्तों पर जीती हूँ

क्यूँ कहते खुद्दार नहीं हूँ

मैं नदिया की शीतल धारा

जलता सा अंगार नहीं हूँ

ईश्वर की अनमोल कृति हूँ

औरत हूँ लाचार नहीं हूँ

उज्जवल रश्मि हूँ सूरज की

रातों का अंधियार नहीं हूँ

स्वाभिमान मुझे है प्यारा

मैं दुनिया में भार नहीं हूँ

मुझसे ही परिवार है…

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Added by Rama Verma on March 15, 2016 at 5:30pm — 11 Comments

तलब / लघुकथा

" पापा मुझे कुछ रूपये चाहिए " ड्यूटी पर निकलने को तैयार भँवरलाल , बेटे की आवाज पर चौंक उठे ।

" कितने बार कहा , ड्यूटी पर जाते वक्त मत टोका करो , अभी तो दिये थे पिछले हफ्ते दस हजार ,उसका क्या हुआ ? "

" दस हजार से होता क्या है पापा ! सारे खर्च हो गये " नजरें चुराते हुए उसने कहा ,तो भँवरलाल ठठा कर हँस पड़े ।

" बता कितना चाहिए ? " जेब में पर्स टटोलते हुए पूछा ।

" सिर्फ चालिस हजार "

" क्या ,इतने सारे रूपये ! कौन सा ऐसा काम आन पड़ा ? "

" उससे आपको मतलब नहीं , बस आपको देना ही…

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Added by kanta roy on March 15, 2016 at 4:00pm — 13 Comments

कहर (लघुकथा) राहिला

पकी फसल पर असमय बरसात और ओलों के कहर ने किसानों के पेट और कमर पर जो लात मारी थी। उसी का सर्वे चल रहा था। कौन किस हद तक घायल है उसी हिसाब से मुआवजा मिलना था। सो,दो सरकारी मुलाजिम एक पुरवा से दूसरे पुरवा जा जाकर कागज़ रंग रहे थे।

"भाग यहाँ से साsssले, यहाँ आया तो तेरी खैर नहीं। हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की? तेरा मन नहीं भरा मेरे बाल बच्चे खा कर? और कितनों को खायेगा?आ..ले,खाले...सब को खाजा..आजा,आ के दिखा तुझे अभी मजा चखाता हूं"कह कर वो अंधाधुंध पत्थर मारने लगा। उसकी विक्षिप्त सी हालत देख…

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Added by Rahila on March 15, 2016 at 1:30pm — 31 Comments

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