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हँसी दो चार दिन की है...(ग़ज़ल) //डॉ. प्राची

1222.1222.1222.1222



हैं बस दो-चार दिन आँसू, हँसी दो-चार दिन की है।

सँजोयें क्या भला, जब ज़िन्दगी दो-चार दिन की है?



भले हो काँस्य या कञ्चन ये कारागार टूटेगा

यहाँ पर श्वास केवल बंदिनी दो-चार दिन की है।



अँधेरी रात से लड़ने को इक दीपक सहेजें खुद

मिली जो रहमतों की रौशनी, दो-चार दिन की है।



पिये हर घूँट में नदिया, वही लहरों में इतराए

समंदर की भला कब तिश्नगी दो-चार दिन की है?



मेरी आँखों में गर देखो, तो पत्थर दिल पिघल जाए

मुझे… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 15, 2016 at 12:41pm — 8 Comments


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ग़ज़ल - हवादिस पूछने आते हैं अब मेरा पता मुझसे ( गिरिराज भंडारी )

1222        1222      1222        1222

न जाने बे खयाली में हुआ है क्या बुरा मुझसे

हवादिस पूछने आते हैं अब मेरा पता मुझसे

 

मुहब्बत हो कि नफरत हो , झिझक कैसी है कहते अब  

हया कैसी है डर कैसा , बयाँ कर दे, जता मुझसे

 

अगर इनआम देना है , कहीं से भी शुरू कर तू

सजा का वक़्त गर आये तो फिर कर इब्तिदा मुझसे

 

न कह मुझसे जलाऊँ मै चरागों को कहाँ, कैसे

जलाऊँगा , अभी ठहरो , मुख़ालिफ़ है हवा मुझसे

 

समझ पाते तो अच्छा…

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Added by गिरिराज भंडारी on March 15, 2016 at 10:49am — 5 Comments

विभक्त चिड़िया (लघुकथा)

नीलामी में चित्र उस व्यक्ति ने खरीद ही लिया, उस चित्र का सौन्दर्य ही कुछ ऐसा था कि उसकी नीलामी में देश के कई बड़े नेता, उद्योगपति, शिक्षाविद, कलाकार, लेखक और बुद्धिजीवी आये थे|

उसने धन देकर चित्र हाथ में लिया और देखा| एक हरे-भरे बगीचे की आकृति देश के मानचित्र के समान थी, बगीचे में एक हाथ में पुस्तक लिए कुछ शिक्षाविद थे, एक हाथ में सफ़ेद झंडे फहराते कुछ बच्चे थे, कुछ उद्योग थे जिनकी गगनचुम्बी चिमनियाँ थी, कुछ धनवान धन बाँट रहे थे, आकाश में सूर्योदय के केसरिया-नारंगी रंग की छटा बिखरी हुई…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on March 15, 2016 at 9:30am — 1 Comment

हे पथिक (अतुकान्ति कविता)

हे पथिक!

कुछ देर ठहर।



ले स्वास ,बांध आस

चलना ही तेरा काम

पर चलने का उद्देश्य

फिर सन्धान

चलते-चलते थका हुआ

उद्देश्य से भटका हुआ

कर तो तनिक आराम



हे पथिक!

कुछ देर ठहर।

कुछ सोच!

तूने जो अपना

पन्थ चुना है

सोच तो क्या

तू ठीक चला है?

या वह पन्थ ही

तुझको भटकाता

हुआ आगे बढ़ा है



पूरा रास्ता

तू भरमाया

खोता चला तू

न कुछ पाया

अब तो अपना

ध्येय बनाले

उस की लौ… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 14, 2016 at 10:30pm — 2 Comments

हारे हरि का नाम

सावन के दिन झर गये, ठरी पूस की रात.

रंग बसंती रो रही, पतझड़ करते घात.१

 

आंखों का सावन कभी, हुआ न तन का मीत.

कहें बसंती-फाग रस, पतझड़ जग की रीत.२

 

वन उपवन नद ताल को, देकर दु:ख अतीव.

दशा दिशा श्रुति ज्ञान सब, बिगड़े मौसम जीव.३

 

सरोकार रखते नहीं, जो समाज के साथ.

श्वेत वस्त्र उनके मगर, रंगे रक्त से हाथ.४

तंत्र मंत्र हर यंत्र जब, हारे हरि का नाम.

कृषक छात्र जन आज खुद, हुये कृष्ण-बलराम.५

राम…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 14, 2016 at 9:00pm — 6 Comments

कुछ तुम बदलो, कुछ हम (लघुकथा)

एक पारिवारिक फिल्म घर पर ही देखने के बाद दोनों के चेहरे ऐसे मुरझा गये थे, मानो फ़िल्म ने उन्हें आइना दिखाकर शर्मिन्दा कर दिया हो!

कुछ पलों के बाद वह उसके पास जाकर बैठ गया। लम्बी चुप्पी के बाद मन के भाव बह पड़े।

" सच है कि मैं तुम्हें कभी ख़ुश नहीं रख सका, और न ही तुम मुझे!"

वह चौंककर उसकी तरफ़ देखती रही, फिर बोल पड़ी, "मालूम है, बच्चों की वज़ह से तुमने मुझे तलाक़ नहीं दी, वरना..."

"वरना क्या? उस वक़्त मेरी माली हालत अच्छी नहीं थी, मेरी पसंद की कोई दूसरी मुझसे निकाह कैसे…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 14, 2016 at 8:00pm — 9 Comments

मत जाओ रात बाहर - ग़ज़ल

221    2122    2212    122

**************************************

मत पूछ  किस लिए  वो तेवर बदल रहे हैं

शह पा के  दोस्तों  की  दुश्मन उछल रहे हैं  l1l



होगी वफा वतन  से यारो  भला कहाँ अब

हुंकार  जाफरों   की   शासन   दहल  रहे हैं l2l



हमको पता  है  लोगों  शैलाब बढ़ रहा क्यों

दरिया के प्यार में कुछ पत्थर पिघल रहे हैं l3l



आँखों को सबकी यारों चुँधिया न दें कहीं वो

तम  के   दयार  में  से  तारे  निकल  रहे हैं l4l



ताकत विरोध की तज अपनायी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 14, 2016 at 11:15am — 14 Comments

हालात उतने भी ख़राब नहीं ( लघुकथा)

हालात उतने भी खराब नहीं



घड़ी पर नज़र डाल शांता बुदबुदाई, “छः बज गए, श्वेता ने फोन नहीं किया अभी तक! कितनी बार कहा है कि ऑफिस में मनाही है तो क्या हुआ, बाहर निकलने पर तो तुरंत फोन कर दिया करे. पता है पापा भी घर पर नहीं हैं और मैं अकेली हूँ, पर ये आज कल के बच्चे माता-पिता की चिंता समझे तब ना!”

‘ओह! अब तो साड़े छः हो गए, मैं ही कर लूँ,’ सोच शांता ने फोन मिलाया

टिक-टिक-टिक ट्रिंग!

फोन कट गया. दुबारा मिलाने पर दो बार ट्रिंग-ट्रिंग हुई और फोन कट गया. फिर चार बार, आठ… Continue

Added by Seema Singh on March 14, 2016 at 9:49am — 10 Comments

मनस पृष्ठ मुझको पढ़ाती नहीं हो- ग़ज़ल

122 122 122 122



निगाहें भला क्यूँ मिलाते नहीं हो।

मनस पृष्ठ मुझको पढ़ाते नहीं हो।।



छिपाते हो तुम राज अपने जिया के।

बताओ मुझे क्यों बताते नहीं हो।।



हैं चेहरे पे क्यों ये उदासी की पर्तें।

भला नूर क्यूँ तुम दिखाते नहीं हो।।



सघन वेदना के जो घन हैं हृदय में।

भला फिर क्यूँ दरिया बहाते नहीं हो।।



मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है।

सिवा इसके तुम मुस्कुराते नहीं हो।।



है 'पंकज'का नाता अगर नीर ही से।

तो नैनों में…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 14, 2016 at 12:00am — 17 Comments

ग़ज़ल(एतबार न कर )

ग़ज़ल(एतबार न कर )

---------------------------

2122 ----1212 -----112

मान मेरी सलाह प्यार न कर |

हुस्न वालों का एतबार न कर |

हो न  जज़्बात  जाएँ   बेक़ाबू

जानेजां हद वफ़ा की पार न कर

बेच दी जिन सुख़नवरों ने क़लम

उनके जैसा मुझे  शुमार न कर|

हुस्न वाले  वफ़ा नहीं  करते

तू यक़ीं उनपे  बार बार न कर |

आँख भीगी है और हंसी लब  पर

राज़े उल्फ़त को आशकार न कर |

वक़्ते रुख़सत निगाह नम…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 13, 2016 at 9:20pm — 12 Comments

ग़ज़ल-आह उफ कर ले रू ब रू न आए।

२१२२ १२१२ २२

क्यूं मुझे मौत की ये बू न आये।
तेरी याद आए और तू न आये।

जख्म दर जख्म चींख,दर्द,आह,उफ।
हाल-ए-दिल,शे'र हू-ब-हू न आये।

रोज देखे किसी को छुप के हम।
आह उफ कर ले रू ब रू न आए।

रोज आए नजर से लब तक हम।
पर लबों तक ये आरजू न आये।

वो ग़ज़ल क्या ग़ज़ल जिसे सुनकर।
दर्द की आँख में लहू न आये।

होंठ पर फूल और दिल काला।
मुझको ये इल्मे गुफ्तगू न आये।

मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by Rahul Dangi Panchal on March 13, 2016 at 9:00pm — 14 Comments

कैनवास ...

कैनवास ...

मुझे बहुत खुशी हुई थी

जब हर शख़्श

तुम्हें सलाम कर रहा था

तुम्हारे हर रंग की कद्र हो रही थी

तुम वाहवाही के नशे में गुम थे //



भीड़ में तन्हा

मैं तुम्हारे चहरे को निहार रही थी

इतने चहरे लिए

न जाने लोग कैसे जी लेते हैं

खुद को ज़िंदा रखने के लिए

न जाने

कितनों की खुशियाँ पी लेते हैं //



तुम कैसे पुरुष हो

औरत चाहते हो पर

उसे समझ नहीं पाते

उसके अहसासों से खिलवाड़ करते हो

न जाने कौन से…

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Added by Sushil Sarna on March 13, 2016 at 6:16pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल-वक्त का अब हिसाब कौन रखे

2122 1212 112/22



वक्त का अब हिसाब कौन रखे

अपनी आँखों में आब कौन रखे



वक्त आखिर गुज़र ही जायेगा

सो तबीअत ख़राब कौन रखे



जब मुअय्यन नहीं कि कल क्या हो

तो भला इज़्तिराब कौन रखे



जब हर इक नक़्श तेरा किस्सा है

साथ अपने क़िताब कौन रखे



मुस्कुराने के हैं सबब लाखों

रुख पे अपने नक़ाब कौन रखे



सच से क्यों हो गुरेज़-पा कोई

थाली में आफ़ताब कौन रखे



फूट ही जाना है रवाँ होकर

सत्ह-ए-दिल पर हुबाब कौन… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on March 13, 2016 at 3:30pm — 6 Comments

सोने की चिडिया - (लघुकथा ) -

सोने की चिडिया - (लघुकथा )  -

"भाई साहब, आपने  घनश्याम  के साथ बहुत बडा अन्याय कर दिया"!

"ऐसा क्या होगया छोटे,  कुछ साफ़ साफ़ बोल ना"!

"आपके इस फ़ैसले पर सारी बिरादरी और खानदान थू थू कर रहा है"!

"किस फ़ैसले की बात कर रहा है "!

" घनश्याम की शादी का फ़ैसला ! ऐसी बदसूरत लडकी आजतक पूरे समाज और रिश्तेदारी में नहीं आयी, ना रंग, ना रूप, पता नहीं घनश्याम  जैसे गोरे चिट्टे, सुंदर,सजीले , शिक्षित और प्रोफ़ेसर बेटे के लिये यही एक लडकी मिली थी आपको"!

" छोटे, कभी कभी…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 13, 2016 at 10:45am — 10 Comments

पूरा अधूरा वायदा

पूरा अधूरा वायदा

शब्दों के अभाव में कहे-अनकहे के

कढ़वे अन्तराल में

पार्क में पत्थर के बैंच को साक्षी बना

आसान था कितना

हम दोनों का अलविदा के समय कह देना ...

" हो सके तो भूल जाना  तुम  मुझको "

" तुम  भी ..."

उस शाम के मेघों की वाणी में कुछ था, कुछ कहा

अत: वायदा वह पूरा हो न सका, न तुमसे, न मुझसे

रुँधी हुई ज़िन्दगी में भुलाने के असफ़ल प्रयास में

स्मृतिओं  के धुँआते खंडहर के…

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Added by vijay nikore on March 13, 2016 at 6:35am — No Comments

सूर्य से जो लड़ा नहीं करता (ग़ज़ल)

२१२२ १२१२ २२

 

सूर्य से जो लड़ा नहीं करता

वक़्त उसको हरा नहीं करता

 

सड़ ही जाता है वो समर आख़िर

वक्त पर जो गिरा नहीं करता

 

जा के विस्फोट कीजिए उस पर

यूँ ही पर्वत झुका नहीं करता

 

लाख कोशिश करे दिमाग मगर

दिल किसी का बुरा नहीं करता

 

प्यार धरती का खींचता इसको

यूँ ही आँसू गिरा नहीं करता

-------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 12, 2016 at 11:22pm — 8 Comments

औरत

औरत .

सिर्फ एक

माँ, पत्नी, प्रेमिका

बेटी, बहू, सास,

दादी, नानी

ही नहीं.....

एक जीता जागता उदाहरण भी है

त्याग, ममता, बत्सलता

और संघर्ष का भी...........

एक निर्मात्री भी

मूल्यों , संस्कारों, परम्पराओं

और इतिहास की...............

एक इज्जत भी 

घर कुटुंब, गाँव 

और देश की.....

पर शायद अर्थहीन हो गया है 

उसका सब कुछ होना भी

सिमट गया है 

उसका बिरात स्वरुप 

सिर्फ…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on March 12, 2016 at 3:32pm — 3 Comments

ग़ज़ल -नूर- कहानी नहीं चली.

ग़ज़ल 

२२१/२१२/११२२/१२१२ 



कश्ती थी बादबानी, हवा ही नहीं चली,

मर्ज़ी नहीं थी रब की सो अपनी नहीं चली.

.

ज़ह’न-ओ-जिगर की, दिल की, अना की नहीं चली

मौला के दर पे क़िस्सा कहानी नहीं चली.  

.

कितने थे शाह कितने क़लन्दर क़तार में,

धमक़ी तो छोड़ दीजिये, अर्ज़ी नहीं चली.

.   

धुलवा दिए थे अश्क-ए-नदामत से सब गुनाह,   

चादर वहाँ ज़रा सी भी मैली नहीं चली.

.

होता रहा हिसाब-ए-अमल, रोज़-ए-हश्र, ‘नूर’  

कोई वहाँ पे बात किताबी नहीं…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on March 11, 2016 at 7:00pm — 18 Comments

बेटी

पहचान है,ईमान है,

अिभमान है बेटी ।

पिता की आन है,

माँ की जान है बेटी ।।

बगिया का चंदन है,

आँगन की तुलसी है ।

घर के हर कोने में,

मुस्कान है बेटी ।।

पुष्पों की माला है,

पूजा की थाली है ।

आरती है मंदिर की,

मस्जिद में अजान है बेटी ।।

सावन की राखी है,

भाईदूज की रोली है ।

दो कुलों का मान बडाये,

ऐसी भाग्यवान है बेटी ।।

गंगा का जल है,

शीतल और निर्मल है ।

क़ुरान की आयत है,

गीता ज्ञान है बेटी ।।

दुर्गा… Continue

Added by Jeevan s. Rajak on March 11, 2016 at 5:28pm — 3 Comments

ग़ज़ल: कांच के जज़्बात

कांच के जज़्बात, हिम्मत कांच की

यार ये कैसी है इज्जत कांच की

.

पालते हैं खोखले आदर्श हम-

माँगते हैं लोग मन्नत कांच की

.

पत्थरों के शहर में महफूज़ है-

देखिये अपनी भी किस्मत कांच की

.

चुभ…

Continue

Added by Ravindra Prabhat on March 11, 2016 at 2:53pm — 2 Comments

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