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धूप का होना - ग़ज़ल

गजल/धूप

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1222 1222 1222 1222

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करो  तय दोस्तो  थोड़ा  जिगर में  धूप का होना

मिटा सीलन को देता है कि घर में धूप का होना /1



दुआ मागी थी रिमझिम में जरा सी धूप तो दे दो

अखरता क्यों तुझे  है अब डगर में धूप का होना /2



जहाँ  देखो  वहीं  जलवा  करें  साए  इमारत के

पता चलता किसे है अब नगर में धूप का होना /3



चलो आँगन में रख आए चटखती हड्डियों को अब

जरूरी   है  बुढ़ापे   की   उमर  में   धूप   का  होना…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 11, 2016 at 11:52am — 18 Comments

शिल्पी और धूप

सदा सच से दूर भागते

धूप ताप सब सह जाते

भगवान की मूर्ति बनाते

पूजा के हैं नियम बनाते

धर्म के पीछे ढोग रचाते

धूप दीप और नैवेद चढ़ाते

हवन के नाम अन्न जलाते

पत्थर पर हैं दूध पिलाते

भूखे बालक दूध न पाते

शिल्पी इनको जरा न भाते

उसे मूर्ति को छूने नहीं देते

मूर्ति को भगवान बताते  

मंत्रो का उच्चारण करते

सुबह शाम आरती करते

शंख मजीरा ढ़ोल बजाते

सदा सुख की आशा करते  

नारायण की कथा…

Continue

Added by Ram Ashery on March 11, 2016 at 9:00am — 5 Comments

बिटिया को अपने अगर देखते हैं

बह्र- 122-122-122-122
बिटिया को अपनी अगर देखते है।।
खुदा का करम अपने घर देखते है।।

वो नीली परी है खिलौना है घर का।
उसे जब भी देखूँ समर देखते है।।

जो सज धज के बेटी की डोली उठी तो।
पड़ोसी भी भर के नजर देखते है।।

अभी तक पिता की दुआ का असर था।
ये बेटे तो अक्सर ही जर देखते है।।

वो पुरखों ने सींचा कभी प्यार से जो।
वही आज सूखा शजर देखते हैं।।

मौलिक/अप्रकाशित
आमोद बिन्दौरी

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 10, 2016 at 9:32pm — 3 Comments

तुम्ही से ये सारा बसर देखते हैं

बहर 122/122/122/122

निगाहे नशा बेख़बर देखते है।
तुम्हे आज कल आँख भर देखते है।।

तुम्हारी अदा से जिधर देखते है।
मुहब्बत का अपने नगर देखते है।।

रूमानी है आबो हवा यार तेरी।
भरी बज्म में भी हुनर देखते है।।

जो सीखें हैं पेंचों के हमने करीने।
चलो आज उनका असर देखते है।।

तुम्ही गांव हो और* गालियाँ हमारी।।
तुम्ही से ये सारा बसर देखते है।।
मौलिक ,अप्रकाशित

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 10, 2016 at 9:28pm — 4 Comments

गजल(व्यंग्य),मनन

2212 12 12
मछली बड़ी तो' जाल क्या?
निकली अगर मलाल क्या?
चारा बड़ा भला लगा
टोनाा गया बवाल क्या?
बंसी मगर रही कहूँ-
बेधार की,निहाल क्या?
पिटता रहा दफा दफा
पीटता अभी कपाल क्या?
घोंपे गये छुरे बहुत
बतला नमकहलाल क्या?
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on March 10, 2016 at 7:56pm — No Comments

कितना टूटा कितना हारा

कितना टूटा कितना हारा

ज़िन्दगी ने कितना मारा



हर घङी मातम है

मायूसी का आलम है

चारों ओर निराशा है

अश्रुमिश्रित भाषा है

कलम भी मेरी सब है जाने

दु:ख के मेरे क्या हैं माने

कि झूठे उद्गारों की ज़द में गर में

खुशी कभी जो लिखना भी चाहूँ

झूठ नहीं यह सहती है

'गम ही गम हैं' कहती है।

नादां है यह ये न जाने जग में

सच ही सदा न चलता है

सफेदपोशी का नक़ाब ओढे

सफेद झूठ मचलता है

ऐसे झूठे मोती पिरो के

माला बनाना चाहूँ… Continue

Added by Ashish Painuly on March 10, 2016 at 6:36pm — No Comments

अनचाहा (लघु कथा )

मानसिक रूप से तैयार न होने के बावजूद उसने बीज डाल दिया और अंकुर भी फूट गया ।नौ माह कैसे सिंचित हुआ,चूसता रहा रस परजीवी बन कर ।
"लो ये आ गया आपका कुल दीपक ।"
बच्चे को सास के सुपुर्द करते हुए।"अब सम्हालो इसे।"

छुट्टी खराब कर दी छः महीने की और छः स्ट्रेच निल की बोतल ।

.

पवन जैन,जबलपुर।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Pawan Jain on March 10, 2016 at 5:00pm — 3 Comments

"छप्पय छंद"

करे वंदना आज, नाज हिय तुम पर करके।
रहो वीर सरताज, आज दो आँसूं छलके।।
तुम वीरों की शान, आन पर मिटने वाले।
देश करे अभिमान, जान-तन देने वाले।।
श्रद्धा-सुमन स्वीकार करो, राष्ट्र-क्रांति-प्रतिमान हे!
चंद्रशेखर! सत्य वीर्यवर! पूज्यमूर्ति-बलिदान हे!

--रामबली गुप्ता
क्रांतिवीर चंद्रशेखर आजाद को शत-शत नमन
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on March 10, 2016 at 4:37pm — 1 Comment

अनाम रिश्ते......

अनाम रिश्ते......

 

मैंने कभी

उसके बारे में सोचा न था

न कभी

उसे ख्वाब में देखा था

उसके नाम से

मैं कभी आशना न थी

न कभी अपने दिलोदिमाग में

उसे पाने की तमन्ना का

कोई बीज बोया था

फिर भी न जाने क्यूँ 

सदा मुझे किसी साये के

करीब होने का अहसास होता था

शब की तारीकियों हों

या मेरी तन्हाईयाँ हों

मेरे हर लम्हे को

वो अपनी मौजूदगी के अहसास से

लबरेज़ करता था

उसके अहसास ने…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 10, 2016 at 3:39pm — 7 Comments

कसक – ( लघुकथा ) –

 कसक – ( लघुकथा ) –

रोहित बिहार के पटना ज़िले के एक छोटे से गॉव के एक गरीब  किसान परिवार का इकलौता मगर होनहार पुत्र था!वह  हैदराबाद विश्वविद्यालय में "भारतीय राजनीति का गिरता स्तर" विषय पर शोध कार्य कर रहा था!उसकी कार्य शैली और थीसिस के संस्करण देख उसके गाइड चकित थे!

राजनीतिज्ञों को जैसे ही इन बातों की हवा लगी, वे रोहित को साम, दाम, दंड, भेद खरीदने में लग गये!वे नहीं चाहते थे कि उसका शोध कार्य छपे!सबके चेहरे बेनक़ाब हो जायेंगे!जब कोई युक्ति कारगर साबित नहीं हुई तो रोहित को खत्म…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 10, 2016 at 11:52am — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
उसे ज़िन्दगी की वो ताल दे (ग़ज़ल)...//डॉ.प्राची

11212 ,11212 ,11212 ,11212



हो भले कठिन मेरी हर डगर, मुझे चाहे कोई भी हाल दे।

मेरा हर कदम यूँ सधा पड़े, कि जहान जिसकी मिसाल दे।



न किसी किताब के प्रश्न हों, न जवाब उनकेे कहीं मिलें

मेरी नज़्र ही हो जवाब हर, तू उसे ज़रा वो सवाल दे।



वो घुला है मुझमे कुछ इस कदर, कि न हो सके कोई वापसी

मेरा चीर दिल, मेरे होश ले, मेरी जान चाहे निकाल दे।



मैं चलूँ चले, मैं थमूँ थमे, जो हँसू हँसे, मेरे साथ ही

मेरा प्यार छू ले हर इक ज़हन, मेरी शख्सियत में कमाल… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 10, 2016 at 7:46am — 6 Comments

परिंदा क़ैद का आदी नहीं था, घर चला आया (ग़ज़ल)

1222   1222   1222   1222

निगाहों  में  किसी की  चंद-पल  रुक कर चला आया

परिंदा   क़ैद  का  आदी   नहीं  था,   घर  चला  आया

सितमगर  की  ख़िलाफ़त  में  उछाला था  जिसे हमने

हमारे   आशियाने   तक   वही   पत्थर   चला   आया

सभी  क़समों,  उसूलों,  बंदिशों  को  तोड़कर,आखिर

मैं  अरसे  बाद आज उसकी  गली होकर  चला आया

दनादन   लीलता   ही   जा   रहा   है   कैसे  हरियाली

कि चलकर शह्र से अब गाँव तक अजगर चला…

Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on March 9, 2016 at 9:59pm — 10 Comments

दोहे(विविधा-20)

वो अपने घर बो रहा,फिर से नया बबूल।

इसीलिए नाराज़ है,उसके घर के फूल।।



उन्हें देख फिर से हुआ,ऐसा मेरा हाल।

ठिठुरे तन को घूप ज्यों, शुक को मिले रसाल।



उन्हें देख फिर से जगी,ऐसी नई उमंग।

गगन बीच मन उड़ रहा,जैसे उड़े पतंग



फटे वस्त्र औ भूख का,मचा हुआ है शोर।

जाकर कुछ तो दीजिये,नेता जी उस ओर।



मुझे देख उनको लगा,हुआ मुझे उन्माद।।

नयनों से वाचन किया,अधरों से अनुवाद।।



उन्हें देख फिर खिल उठा,मन का पावन फूल।

प्रकृति सुंदरी ने… Continue

Added by ram shiromani pathak on March 9, 2016 at 5:40pm — 4 Comments

सोच असुरों सी करो मत दोस्तो - ग़ज़ल

2122    2122    212

**********************  

कब   यहाँ   पर्दा  उठाया  जाएगा

कब  हमें  सूरज दिखाया  जाएगा /1



थक गए हैं झूठ  की उँगली पकड़

सच का दामन कब थमाया जाएगा /2



सब   परेशाँ   तीरगी   से   दोस्तो

कब  दिया  कोई  जलाया जाएगा /3



है  सुरक्षा  खाद्य  की   कानून में

पर अनाजों  को  सड़ाया  जाएगा /4



दूर महलों से खड़ी कुटिया में फिर

इक  निवाला  बाँट  खाया जाएगा /5



यह समय है झूठ का कहते है सब

राम  को  रावण  बताया  जाएगा…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 9, 2016 at 12:09pm — 16 Comments

ग़ज़ल-आरजू तुमसे मिलने की करने लगी

वह्र-212 212 212 212





आरजू तुमसे मिलने की करने लगी।

हसरतें मेरे दिल की सँवरने लगीं।।



कौन हो तुम अभी जानती भी नही।

जाने तुम पर ही क्यूँ ऐसे मरने लगी।।



हो गया है मुझे क्या ऐ मेरे सनम।

आहटों पर भी मैं गौर करने लगी।।



हुश्न की हूँ परी सब मुझे बोलते।

तुमसे मिलके मैं इतना निखरने लगी।।



झूठ कुछ भी किसी से न कहती थी मैं।

तुमसे मिल के बहाने भी करने लगी।।



देख लूँ जो सनम तुम चले आ रहे।

बन के राहों में कलियाँ… Continue

Added by रामबली गुप्ता on March 9, 2016 at 11:30am — 3 Comments

ग़ज़ल -- दुनिया का ढब दुनिया जैसा होता है। -- दिनेश कुमार

22--22--22--22-22--2





दुनिया का ढब दुनिया जैसा होता है

जो भी होता है वो अच्छा होता है



शाम ढले जब चिड़िया अपने घर लौटे

चोंच में उसके यारों दाना होता है



बाद में तो समझौते होते हैं दिल के

प्यार तो केवल पहला पहला होता है



अपने दम पर अब तक़दीर सँवारो तुम

मेहनतकश हाथों में सोना होता है



सोच रहा है आँगन का बूढ़ा बरगद

घर का आखिर क्यों बँटवारा होता है



चूड़ी कंगन पायल सब बेमानी हैं

लज्जा ही औरत का गहना होता… Continue

Added by दिनेश कुमार on March 9, 2016 at 6:00am — 10 Comments

खिले जो फूल सेंभल के ...

नवगीत........सेंभल के फूल

खिले जो फूल सेंभल के

रहे वह मात्र दस दिन के

वो दुनियां देख न पाये

अहं के झूठ के साये

लड़े हर वक्त मौसम से

हुये बस धूल कण-कण के.............खिले जो फूल सेंभल के 

रुई की नर्म फाहें उड़

गगन को भेदना चाहें

हवा रुख को बदल देती

उगाती रक्त की बांहें.

पकड़ कर ठूंसते-पीटें

लिहाफों में भरें धुन के...............खिले जो फूल सेंभल के 

हवाओं से भरे फूले

निशक्तों…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 8, 2016 at 10:30pm — 6 Comments

मैंने सोचा न था ......

मैंने सोचा न था ......

मुझे गीत का नाम देकर

तुम बार बार

मुझे गुनगुनाओगे

सच ! ऐसा तो कभी

मैंने सोचा न था//

मेरे रक्ताभ अधरों पर

अपनी अनुभूति का

अनमोल स्पर्श छोड़ जाओगे

सच ! ऐसा तो कभी

मैंने सोचा न था//

मेरे अंतरंग पलों में

प्रेम घनों की

नन्ही बूंदों सा बरसता

तुम कोई राग छोड़ जाओगे

सच ! ऐसे तो कभी

मैंने सोचा न था//

कभी मेरी मूक व्यथा

शून्यता से मिल

उसके अंक में…

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Added by Sushil Sarna on March 8, 2016 at 9:34pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक ही चिप (महिला दिवस के उपलक्ष में एक हास्य व्यंग लघु कथा )

 “हे भोले भंडारी, कुछ कर बहुत परेशान कर रक्खा है मेरी सास ने जीना दूभर हो गया है हर वक़्त कोई न कोई बखेड़ा खड़ा कर टें टें करती रहती है मैं क्या करूँ?”

“बहुत बार समझा चुका हूँ तुम दोनों को वो माँ जैसी और तुम बेटी जैसी हो एक दूसरे की अहमियत समझो और सम्मान करो महिला होकर महिला का सम्मान नहीं करोगी तो किसी और से क्या उम्मीद करोगी किन्तु मुझे तुम्हारा कोई समाधान नजर नहीं आता हर बार अपना वादा तोड़ देती हो अच्छा बताओ क्या चाहती हो”?

“हे प्रभु कुछ ऐसा करो कि मेरी सास बोल न सके उसे गूंगी…

Continue

Added by rajesh kumari on March 8, 2016 at 3:13pm — 12 Comments

इक उम्र जी जाती हूँ ....

इक उम्र जी जाती हूँ ....

उसके जाने के बाद मैं

कितनी बेख़बर सी हो गयी हूँ

नींदें सुहाती नहीं

यादें सुलाती नहीं

आईना बेगाना सा लगता है

अक्स भी अंजाना सा लगता है

लिबास बदलूं

तो किस के लिए

शाम-ओ-सहर उदासियों के

मंज़र कहर ढाते हैं

ज़िस्म पर लम्स के अहसास

कतरनों से सजे नज़र आते हैं

चलती हूँ तो न जाने

कितने लम्हे साथ चलते हैं

एक आहट के इंतज़ार में

काफिले अश्कों के पिघलते हैं

शब् तो अब भी होती है मगर

अब हर…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 8, 2016 at 2:06pm — 14 Comments

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