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गोली (लघुकथा)राहिला

उसके अब्बा को खानदान में ही बेटी ब्याहनें की जाने कैसी सनक सवार हुई,कि अपने भतीजे से शादी के फरमान की गोली मेरे सीने में दागकर, मेरी और शब्बो की मुहब्बत का जनाज़ा निकाल दिया ।इसके बाद मैंने शहर ही छोड़ दिया और पूरे तीन साल बाद आज जब बस अड्डे पर उतरा तो उसे पूरे साजो सामान और एक छोटे से बच्चे के साथ सामने खड़ा पाकर यूं लगा जैसे किसी ने फिर दिल पर गोली दाग दी हो।मैं लड़खड़ा सा गया और जाने कब, कैसे उसके पास पहुँच गया पता नहीं ।शायद वो मेरी कैफियत समझ गई थी । तभी उसका शौहर रिक्शा लेकर आ पहुंचा ।… Continue

Added by Rahila on March 8, 2016 at 12:22pm — 22 Comments

भले ही रंग कुछ भरते - ग़ज़ल

1222    1222    1222    1222

************************************

उसे तो मुक्त होना  बस उसी की काहिली से है

कमी जो जिंदगी में यार  वो उसकी कमी  से है /1



जरा ये तो बताओ क्यों बुरा कहते हो किस्मत को

अगर है दूर मंजिल तो  समझ लो बुुजदिली से है /2



मनुज सब  एक से  ही हैं नहीं  छोटा बड़ा कोई

सभी का वास्ता  केवल उसी  इक  रोशनी से है /3



जहाँ गुजरा था इक बचपन सुहाना यार उसका भी

उसी  को  छोड़  आया  वो  बहुत  ही  बेदिली से है /4



हकीकत आप समझो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2016 at 10:55am — 8 Comments

इज़्ज़त (लघुकथा)

ट्रेन की बोगी में पाँच मुरझाये चेहरे बाक़ी सवारियों के वार्तालाप को सुनते हुए बातें समझने की कोशिश कर रहे थे। किसान की जवान बेटी बुरी नज़रों से बचने के लिए अपने शरीर को किसी तरह ढांकने की कोशिश कर रही थी। बाक़ी दोनों बच्चे सवारियों की खाने-पीने की वस्तुओं को टकटकी लगाये देख रहे थे। उनकी मां उन्हें सुलाने की कोशिश में नाकाम हो रही थी।

"जब से यह ठेका मिला है, पैसा ही पैसा बरस रहा है, वरना पिछले धंधे में तो बरबाद हो गया था!" एक सवारी ने संतोष की सांस लेते हुए अपने साथी से कहा।

"मेरे बाप…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 7, 2016 at 11:30pm — 7 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
खुला आकाश तेरा है ..... (विश्व महिला दिवस पर) //डॉ. प्राची

ये माना रात गहरी है, सुनहरा पर सवेरा है।

सलाखें तोड़ दे बुलबुल, खुला आकाश तेरा है।



तुझे जो रोकती है वो

हर इक ज़ंज़ीर झूठी है,

ज़रा झंझोड़ हर बंधन,

कहाँ तकदीर रूठी है ?

उड़ानों पर तेरा हक़ है, ये पिंजर कब बसेरा है?

सलाखें तोड़.....



ज़माने के तराजू पर

न अपने पंख अब तू तोल,

'खुले अम्बर' की परिभाषा

जो सच समझे, वही तू बोल।

ये तेरा चित्र है जिसका, तेरा दिल ही चितेरा है।

सलाखें तोड़.....



तुझे छूना है चन्दा को

तुझे… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 7, 2016 at 9:53pm — 11 Comments

ग़ज़ल...देर तक

2122      2122      2122     212

रात का सन्नाटा' मुझपे मुस्कुराया देर तक

हाथ पर उनको लिखा लिखके मिटाया देर तक



आज ऐसा क्या हुआ क्या साजिशें हैं शाम की

आरजू जिसकी नहीं वो याद आया देर तक



उल्फतें हैं हसरतें हैं और ये दीवानगी

नाम तेरा होंठ पे रख बुदबुदाया देर तक



है अज़ब मंज़र वफ़ा की रहगुज़र में आजकल

चाहतें उस शख्स की जिसने रुलाया देर तक

.

कुछ पलों की जुस्तजू वो कुछ पलों की तिश्नगी

प्यार का गमगीं तराना गुनगुनाया…
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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 7, 2016 at 9:30pm — 24 Comments

कुण्डलिया छंद

"कुण्डलिया"

साजे उर अहि-माल तुम, हृदय बसो गिरिजेश।
उमा-सहित तुमको नमन, हे! व्योमेश महेश।।
हे! व्योमेश महेश, केश से निकली गंगा।
नाचें सुर-नर-शेष, धिनक-धिन बजे मृदंगा।।
भंग रमे तन-भस्म, डमाडम डमरू बाजे।
हरो जनों के कष्ट, शीश पर विधु को साजे।।

-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on March 7, 2016 at 9:16pm — 6 Comments

पाषाण होने तक

विद्रोहिणी सी बन गयी थी मैं

मेरी कुंठा और संत्रास 

कैसे पनपे

नहीं जान पाई मै

और कितना असत्य था

उनका दुराग्रह   

यह तब मैं न जानती थी

सच पूछो तो

नहीं चाह्ती थी जानना भी

कोई समझाता यदि

तो आग लग जाती वपुष में

अरि सा लगता वह

पर कोई देता यदि प्रोत्साहन

मुझे उस गलत दिशा में जाने का

तो वह लगता सगा सा

हितैषी और शुभेच्छु

संसार का सबसे प्रिय जीव  

क्योंकि तब थी मैं  

उसके प्यार…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 7, 2016 at 8:13pm — 3 Comments

उम्मीद (लघुकथा)

उसकी बेटी से छेड़खानी कर रहे तीन उपद्रवियों से अकेले ही लड़ा था वो, इस मुठभेड़ में उस पर दो बार चाकू के वार हुए, लेकिन घायल होने के बावजूद भी वो पूरी शक्ति से लड़ा और अंततः उन बदमाशों को भगा ही दिया| उसकी बेटी एक नर्स थी, वो उसे तुरंत उसी चिकित्सालय में लेकर गयी, जहाँ वो काम करती थी| रास्ते भर वो मुस्कुराता रहा और बेटी को दिलासा देता रहा| चिकित्सालय में उसके घावों पर मरहम-पट्टी की गयी| चिकित्सक ने दवा और एक इंजेक्शन भी लिख दिया| इंजेक्शन उसी की बेटी ने लगाया, इंजेक्शन लगते ही वो चिल्लाया, "उफ़...…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on March 7, 2016 at 8:00pm — 6 Comments


प्रधान संपादक
कसक (लघुकथा)

"ये मिठाई कहाँ से आई जी ?" अपने खेत के किनारे चारपाई पर चुपचाप लेटे शून्य को निहारते हुए पति से पूछाI

"अरी, वो गुलाबो का लड़का दे गया था दोपहर को।" उसने चारपाई से उठते हुए उत्तर दियाI

"कौन? वही जो शहर में सब्ज़ी का ठेला लगाता है?"

"हाँ वही! बता रहा था कि अब उसने दुकान खोल ली है, उसकी ख़ुशी में मिठाई बाँट रहा थाI" पति ने मिठाई का डिब्बा उसकी तरफ सरकाते हुए कहाI

"चलो अच्छा हुआI" पत्नी ने चेहरे पर कृत्रिम सी मुस्कुराहट आईI

"वो बता रहा था कि उसने बेटे को भी टैम्पो डलवा…

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Added by योगराज प्रभाकर on March 7, 2016 at 4:30pm — 12 Comments

कुण्डलिया छंद

कर्पूरी आभा लिए, हे! करुणा अवतार।
नाच रहे शशि-शिखर-धर, गले सर्प का हार।।
गले सर्प का हार, हरो जग-त्रास जगतपति।
नीलकण्ठ भगवान, करो कल्याण उमापति।।
विनय करूँ कर जोर, करो श्रद्धा सब पूरी।
बसो हृदय में ईश, लिए आभा कर्पूरी।।

-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रामबली गुप्ता on March 7, 2016 at 3:30pm — 7 Comments

ग़ज़ल (मुहब्बत से किनारा कर रहा है )

ग़ज़ल (मुहब्बत से किनारा कर रहा है )

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1222 --------1222 --------122

मुहब्बत से किनारा कर रहा है |

हमें वह बे सहारा  कर रहा है |

तुम्हारा देखना रह रह के मुझको

वफ़ा को आश्कारा  कर रहा है |

न कोई देख ले यह डर मुझे है

वो खिड़की से इशारा  कर रहा है |

युं ही क़ायम रहे यह दोस्ताना

कहाँ आलम गवारा  कर रहा है |

वो लाके ग़ैर को महफ़िल में…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 7, 2016 at 1:08pm — 19 Comments

मौकापरस्त – ( लघुकथा ) –

समूचा क्षेत्र सूखे और अकाल की चपेट में था! चारों ओर त्राहि त्राहि मची हुई थी!लोग एक एक बूंद पानी को तरस रहे थे!ऐसे में  गॉव के प्रधान वीर पाल ने आस पास के सभी गॉवों में मुनादी पिटवा दी कि बारिस करवाने के लिये महायज्ञ और भागवत कथा का आयोजन कराया जा रहा है!यह कार्य क्रम पंद्रह दिन चलेगा!मथुरा वृंदावन से साधु संत और भागवत कथा वाचक बुलाये जायेंगे!अनुमानित खर्चा इक्यावन हज़ार के लगभग  होगा!सभी लोग अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा से इस दान पुन्य के महोत्सव मे बढ चढ कर भाग लें!

नियत तिथि पर प्रधान…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 7, 2016 at 11:00am — 12 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 2122

आग से ही आग का संधान फिर फिर

हाथ जलता छल रहा इंसान फिर फिर।1



आग अपनी तो भली सबको लगी है

ढल रहा कितना सुलग दिनमान फिर फिर।2



आग सागर की उफनती किस कदर यह

और उठने को गला हिमवान फिर फिर।3



जब पवन ठिठका लता फिर है लजाई

आँसुओं में बह रहा तूफान फिर फिर।4



आग का मंजर गजल का वाकया है

बह्न सजती है जुड़े अरकान फिर फिर।5





जब मिली मंजिल मुसाफिर है थमा बस

फिर चला है हो रहा हलकान फिर फिर।6



गाँठ… Continue

Added by Manan Kumar singh on March 7, 2016 at 11:00am — 2 Comments

बम बम भोलेनाथ

बम बम भोलेनाथ

 

बम बम भोलेनाथ शिव, आशुतोष भगवान।

नीलकंठ विरुपाक्ष अज, शंकर कृपानिधान।।

शंकर कृपानिधान, शिवाप्रिय भव त्रिपुरारी।

महादेव सर्वज्ञ, यज्ञमय हवि कामारी।।…

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Added by Satyanarayan Singh on March 7, 2016 at 2:00am — 2 Comments

सहारा (लघुकथा )

बेटा ख़ानदान का चराग़ और बुढ़ापे का सहारा होता है , बेटियां पराया धन हैं दूसरे के घर चली जाती हैं | शान्ती की यही सोच ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हो चुकी थी | ..... इकलौते बेटे को प्राइवेट कॉलिज में और बेटियों को सरकारी कालिज में पढ़ाया ,यही नहीं ज़ेवर बेचकर बेटे को एम बी ए कराया और बेटी इस से महरूम रह गयी | घर का खर्चा पति की पेंसन और सिलाई करने से चल रहा  था मगर हाय क़िस्मत बेटा भी बहू के बहकावे में आकर माँ और बहनों को बेसहारा छोड़ गया। ...... पति ज़िंदा होते तो यह दिन देखने न पड़ते | शान्ती दुखों…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 6, 2016 at 10:00pm — No Comments

भय (लघुकथा)

"कल आपका बेटा परीक्षा में नकल करते हुए पकड़ा गया है, यह आखिरी चेतावनी है, अब भी नहीं सुधरा तो स्कूल से निकाल देंगे|" सवेरे-सवेरे विद्यालय में बुलाकर प्राचार्य द्वारा कहे गए शब्द उसके मस्तिष्क में हथौड़े की तरह बज रहे थे| वो क्रोध से लाल हो रहा था, और उसके हाथ स्वतः ही मोटरसाइकिल की गति बढा रहे थे|

"मेरी मेहनत का यह सिला दिया उसने, कितना कहता हूँ कि पढ़ ले, लेकिन वो है कि.... आज तो पराकाष्ठा हो गयी है, रोज़ तो उसे केवल थप्पड़ ही पड़ते हैं, लेकिन आज जूते ही....|" यही सोचते हुए वो घर पहुँच…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on March 6, 2016 at 10:00pm — 5 Comments

शिवरात्रि विशेष

महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर समस्त शिव भक्तों को सादर भेंट

.

जटाओं से निकल रही है, धार गंग नाथ शिव।

मुस्कुरा रहे गले में, धर भुजंग नाथ शिव।।

डमड्ड डमड्ड निनाद पर, हैं नृत्य कर रहे सभी।

मन लुभाये रूप आपका, मलंग नाथ शिव।।1।।



पाँव में कड़ा है और, त्रिशूल हाथ में धरे।

बाँध कर कमर में छाल, व्याह को चले हरे।।

चन्द्र ये ललाट पर, है विश्व दंग नाथ शिव।

मन लुभाये रूप आपका, मलंग नाथ शिव।।2।।



भंग की खुमार में हैं मस्त आज तो सभी।

सिर विहीन…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 6, 2016 at 9:30pm — 2 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : आस्तीन का साँप (गणेश जी बागी)

“मिस्टर सिंह, आप और आपकी टीम विगत छः माह से उस खूंखार आतंकवादी को पकड़ने में लगी हुई है, किन्तु अभी तक आपकी प्रगति शून्य है.”

“सर हम लोग पूरी निष्ठा और ईमानदारी से इस अभियान में लगें हैं, मुझे उम्मीद है कि हम शीघ्र सफल होंगे.”

“आई. बी. वालों ने भी सूचना दी थी कि वो पड़ोसी मित्र देश में छुपा हुआ है, फिर प्रॉब्लम क्या है ?”

“सर, यदि वो पड़ोसी देश में छुपा होता तो हम लोग उसे जिन्दा या मुर्दा दो दिन में ही पकड़ लेते,

लेकिन प्रॉब्लम तो यह है कि ....”

“क्या प्रॉब्लम…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 6, 2016 at 5:30pm — 13 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

221 1221 1221 22





करने को तो कर देते हैं हालात का चर्चा

लिखने में समाता नहीं जज़्बात का चर्चा



अब होश कहाँ मुझको तुझे देखने के बाद

लिखना भी अगर चाहूँ मुलाकात का चर्चा



वो रूठ गए हैं मेरे अंदाज़ से यारो

हर बात में करता था गई बात का चर्चा



देखा है फलक पे जो सितारों का ये जमघट

लगता है कि चलता है मेरी मात का चर्चा



हर बार बहा है मेरी मिट्टी का लहू ही

हरयाणा का कश्मीर का गुजरात का चर्चा



ए पर्दा नशी तेरे इशारो… Continue

Added by मनोज अहसास on March 6, 2016 at 10:36am — 5 Comments

नमक में हींग में हल्दी में आ गई हो तुम (ग़ज़ल)

बह्र : १२१२ ११२२ १२१२ २२

 

नमक में हींग में हल्दी में आ गई हो तुम

उदर की राह से धमनी में आ गई हो तुम

 

मेरे दिमाग से दिल में उतर तो आई हो

महल को छोड़ के झुग्गी में आ गई हो तुम

 

ज़रा सी पी के ही तन मन नशे में झूम उठा

कसम से आज तो पानी में आ गई हो तुम

 

हरे पहाड़, ढलानें, ये घाटियाँ गहरी

लगा शिफॉन की साड़ी में आ गई हो तुम

 

बदन पिघल के मेरा बह रहा सनम ऐसे

ज्यूँ अब के बार की गर्मी में आ गई हो…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 5, 2016 at 11:30pm — 10 Comments

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