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ग़ज़ल

1222 -1222-1222-1222

उन्हें ढूंढे मेरी ऑंखें बनी बीमार बरसों से

निकलता ही नहीं दिल से मेरा दिलदार बरसों से

नहीं काबू रहा ये दिल, तेरी उल्फ़त का जादू है 

धड़कता है मचल कर ये मेरी सरकार बरसों से

किया है वायदा उसने कि अच्छे दिन मैं लाऊंगा

तभी विश्वास से जनता है बैठी यार बरसों से

नहीं झुकना नहीं गिरना कसम तुमको है भारत की

हिमालय आज है मांगे दिया जो प्यार बरसों से

वही धोखा है फितरत में कि तौबाजिस से की…

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Added by munish tanha on April 23, 2016 at 10:30am — 3 Comments

ज़िंदगी के सागर से ....

ज़िंदगी के सागर से ....



मेरी आँखों के मुंडेरों पर

तुम आज भी

मेरे ख़्वाबों के

रूहे मुहब्बत का

पहला अहसास बने बैठे हो //



तुम्हारे साथ गुजरे लम्हे

मेरी तन्हाईयों के साथ

सरगोशियां करते हैं //



तमाम शब मेरा बदन

तुम्हारे लम्स की गिरफ़्त में

करवटें बदलता है //



बारिशों के मौसम में

रुख़सार पर गिरी ज़ुल्फ़ों के ख़म

अब तक किसी के इंतज़ार में उलझे

हवाओं से शिकायत करते हैं //



तुम्हारे अलम * में

गुजरता… Continue

Added by Sushil Sarna on April 22, 2016 at 10:03pm — 11 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
उफ़ अपनी चाहत का पन्ना बन बैठा रद्दी अखबार

चाहा था रामायण होता अपने सपनों का संसार

उफ़! अपनी चाहत का पन्ना, बन बैठा रद्दी अखबार



श्रद्धानत हो शीश झुकाते

उस पर तुलसी पत्र चढ़ाते,

मन मंदिर में प्रेम भाव ले

पुष्पों का शृंगार सजाते,

मन के भाव ज़रा भटके तो, रिश्तों में खटका व्यवहार...



शंखनाद सी गूँजा करती

थी मन में आवाज़ तुम्हारी,

संयम नेह झलकता था तब

बात तुम्हारी थी हर प्यारी,

चीखमचिल्ली चुभती बातें, करतीं बस अब तो चीत्कार...



कुछ हम भूले कुछ तुम भूले

गठबंधन के… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on April 22, 2016 at 11:44am — 6 Comments

मेरे महबूब

मेरे महबूब सपनों से हक़ीक़त बन तू आ जाए

मेरा उजड़ा हुवॉ जीवन मेरी जाँ फिर सवर जाए



मुझे अहसास अब होने लगा है इश्क़ में तेरे

कहीं ना ज़िन्दगी तेरी ही गलियों में गुज़र जाए

जिसे हो जुस्तजू तेरी वो बेचारा किधर जाए

जिए वो ज़िंदगी अपनी या आहें भर के मर जाए

मैं अक्सर आह भरता हूँ तेरे दीदार के ख़ातिर

झलक तेरी मिले गर तो मेरा जीवन सँवर जाए

तेरी गलियों की मिट्टी भी मुझे जन्नत से प्यारी है

चले गर साथ हम दोनों मुहब्बत भी निखर…

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Added by Amit Tripathi Azaad on April 22, 2016 at 10:03am — 6 Comments

ग़ज़ल : बना कर इक बड़ी लाइन

1222 1222 1222 1222



बना कर इक बड़ी लाइन कई बीमार बैठे हैं,

उन्हींके साथ में कितने यहां एमआर बैठे हैं।



न जाने सेल को किसकी नज़र ये लग गई यारब,

रिटेलर सब हमारी कोशिशों के पार बैठे हैं ।



ये जितने डाक्टर है सब मुझे जल्लाद लगते है,

मरीजो को दवा क्या दें लिए तलवार बैठे हैं।



मरीजे इश्क हैं सारे इन्हें मतलब नज़ारे से,

लिए आँखों में कब से हसरते दीदार बैठे हैं।



दुपहिया धूप में रक्खा उठा कर चल पड़े थे वो,

बयाँ के बाद की तकलीफ…

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Added by Ravi Shukla on April 21, 2016 at 10:30pm — 16 Comments

ग़ज़ल ( आसरा ढूंढने किधर जाए )

2122--1212--22

उनकी नज़रों से जो उतर जाए |

आसरा ढूंढ़ने  किधर  जाए |

कर लिया है यक़ीन उनपे मगर

डर  है यह भी न वो मुकर जाए |

जो ज़ुबां कर न  पाए उल्फ़त में

आँख चुप चाप उसको कर जाए |

भीड़ आए नज़र क़ियामत सी

शोख़ उनकी नज़र जिधर जाए |

मिल गया जब खिताबे दीवाना

उनके कूचे से कौन घर जाए |

जिसके घर का पता नहीं कोई

कैसे उस तक कोई ख़बर जाए |

दिन में तस्दीक़ आए रात…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 21, 2016 at 8:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल
जख्म फिर से हरा हो गया
दर्द -ए -दिल आइना हो गया
याद ऐसा किया देख कर
सोच के बाबरा हो गया
काम के नाम ने चोट की
दिल बचा दिल जला हो गया
नींद का आँख से रूठना
रोज़ का सिलसिला हो गया
फीस में छूट थी जो मिली
लाडला फिर बड़ा हो गया
दाद दो तुम जरा इसलिए
गिर के वो खड़ा हो गया
खेल की पोल थी जब खुली
फिर मज़ा किरकिरा हो गया
मुनीष 'तन्हा'...नादौन..
9882892447

Added by munish tanha on April 21, 2016 at 3:50pm — 7 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल
जख्म फिर से हरा हो गया
दर्द -ए -दिल आइना हो गया
याद ऐसा किया देख कर
सोच के बाबरा हो गया
काम के नाम ने चोट की
दिल बचा दिल जला हो गया
नींद का आँख से रूठना
रोज़ का सिलसिला हो गया
फीस में छूट थी जो मिली
लाडला फिर बड़ा हो गया
दाद दो तुम जरा इसलिए
गिर के वो खड़ा हो गया
खेल की पोल थी जब खुली
फिर मज़ा किरकिरा हो गया
मुनीष 'तन्हा'...नादौन..
9882892447

Added by munish tanha on April 21, 2016 at 3:50pm — 1 Comment

ग़ज़ल (जख्म फिर से हरा हो गया)

जख्म फिर से हरा हो गया

दर्द -ए -दिल आइना हो गया

.

याद ऐसा किया देख कर

सोच के बाबरा हो गया

.

काम के नाम ने चोट की

दिल बचा दिल जला हो गया

.

नींद का आँख से रूठना

रोज़ का सिलसिला हो गया

.

फीस में छूट थी जो मिली

लाडला फिर बड़ा हो गया

.

दाद दो तुम जरा इसलिए

गिर के वो खड़ा हो गया

.

खेल की पोल थी जब खुली

फिर मज़ा किरकिरा हो गया

.

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

मुनीष…

Continue

Added by munish tanha on April 21, 2016 at 3:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल (एक प्रयास) // रवि प्रकाश

बहर-SISS SISS SISS SISS



पंथ का आलोक हो गंतव्य का आधार हो तुम।

श्वास का संगीत मधुमय चेतना का द्वार हो तुम।।

प्राण भरते हो हृदय की मौनधर्मी धड़कनों में,

मोहता जो मन अहर्निश स्वप्न वो साकार हो तुम।

भोर की मृदु लालिमा की ओसकण से भेंट जैसे,

कुमुदिनी पे रीझते भ्रमरों का मंत्रोच्चार हो तुम।

मत्त पावस की झड़ी में हो शिखी के नृत्य निश्छल,

कोकिला की रागिनी के उल्लसित उद्गार हो तुम।

सांध्य वेला में हठीली दीपमाला से प्रकाशित,

घन तमस में कौमुदी का विश्व… Continue

Added by Ravi Prakash on April 21, 2016 at 3:23pm — 2 Comments

बंद कोठरी की ज़िन्दगी (कविता)

वो बंद घरों की खुली आशाएं
अपनी उम्र से कहीं आगे जाती हुई
अपने देह पर सभ्य समाज की कतरन ओढ़े
देखती हैं खिड़की से बदनाम दुनियां
इशारों में पास बुलाने की मज़बूरी
देह पर निशाँ छुडवाने की…
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Added by kumar gaurav mishra on April 21, 2016 at 1:27pm — No Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मौत ही रास्ता नहीं होता (ग़ज़ल 'राज ')

२१२२ १२१२ २२

हुस्न गर  बावफ़ा नहीं होता,

दिल कभी आशना नहीं होता

 

खेलना दिल से तोड़ देना फिर

ये कोई  कायदा नहीं होता

 

दिल्लगी से हुए तमाशे का

हर कहीं तज़करा नहीं होता

 

जान पाता कभी नहीं उसको

,मैं अगर आइना नहीं होता 

 

मार देती ये तिश्नगी मुझको,

काश ये मयकदा नहीं होता

 

मुश्किलों से निजात पाने को,

मौत ही रास्ता नहीं होता

 

छेड़ता वो न बारबार इसको,

जख्म मेरा…

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Added by rajesh kumari on April 21, 2016 at 11:18am — 8 Comments

कविता-प्रियतम की याद में

प्रियवर! अब तुम आन मिलो ।

सच में अब तुम आन मिलो ।।



तुम बिन भटकूँ मै बन पगली ।

हुई जिन्दगी जल बिन मछली ।।

रात चाँदनी आये जब-जब ।

मन की अगन बढ़ाये तब-तब ।।

दिन का दूजा नाम उदासी ।

हुई तिहाई तन से दासी ।।

नैना हर पल बाट तके हैं ।

विरह वेदना सह न सके हैं ।।

पर यादों में आते जब तुम ।

मन को बड़ा रिझाते तब तुम ।।

किन्तु चेतना लौटे ज्योंही ।

बिलख हृदय रो बैठे त्योंही ।।

नैन धैर्य खो देते हैं तब ।

अश्रु कपोल धो देते हैं तब… Continue

Added by रामबली गुप्ता on April 21, 2016 at 10:37am — 2 Comments

ग़ज़ल ( आसरा ढूंढने किधर जाए )

2122 1212 22

उनकी नज़रों से जो उतर जाए |

आसरा ढूंढ़ने  किधर  जाए |

कर लिया है यक़ीन उनपे मगर

डर  है यह भी न वो मुकर जाए |

जो ज़ुबां कर न  पाए उल्फ़त में

आँख चुप चाप उसको कर जाए |

भीड़ आए नज़र क़ियामत सी

शोख़ उनकी नज़र जिधर जाए |

मिल गया जब खिताबे दीवाना

उनके कूचे से कौन घर जाए |

जिसके घर का पता नहीं कोई

कैसे उस तक कोई ख़बर जाए |

दिन में तस्दीक़ आए रात…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 20, 2016 at 9:00pm — 14 Comments

आहट

क्या कहा जो सुना नहीं

आँखों ने पढ़ लिया होगा

कह न सके वो जो बातें

आँखो ने पढ़ लिया होगा।



दूर दराज से आया कोई

अपनों ने जान लिया होगा

खो गया था जो उस जहाँ में

अपनों ने पा लिया होगा।



स्वप्न सा अँधेरे को वो

चीर कर वहाँ से जब आया

निशाँ अपने छोड़ कर वो

फिर अपनी दुनिया में गया होगा।



यादें है या है आहट उनकी

किसी ने तो यह जाना होगा

दिल से पूछा जब यह उसने

उसका दिल भी क्या वहाँ धड़का होगा।



(मौलिक एवं…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 20, 2016 at 9:00pm — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
चाहत की रस्म हमने निभाई कुछ इस तरह...ग़ज़ल// प्राची

2212,121,122,1212

पल में हुई मैं खुद से पराई कुछ इस तरह

थामी उन्होंने हाय! कलाई कुछ इस तरह



नस-नस में सिहरने हैं, निगाहों में है सुरूर

साँसों में उनकी याद समाई कुछ इस तरह…

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Added by Dr.Prachi Singh on April 20, 2016 at 3:47pm — 5 Comments

अच्छे दिन

अच्छे दिन की यही तो शुरुआत है

सब बिज़ी ही रहें,खुशनुमा बात है

बात तन्हाइयों की चलाना नही

सब अंधेरे हो रुखसत, तो क्या बात है!!

झटका बिजली का अबतक तो खाया नही

रोशनी है मुसलसल,बड़ी बात है

जिन्दगी के सबब, वे सिखाने चले

जो जिये ही नही,क्या अज़ब बात है

मुफलिसी जिन्द़गी की अमानत सही

नूर झांका कमश्कम शुरुआत है

फालतू जिन्दगी यूँ ही ढोते रहे

एक मिशन अब मिला, खुशनुमा बात है

संगदिल बिन हुये सब चलें संग संग

आज सूरज से अपनी मुलाकात है

रोशनी हाथ…

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Added by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on April 20, 2016 at 10:39am — No Comments

ग़ज़ल : पुल की रचना वो करते जो खाई के भीतर जाते हैं

बह्र : 22 22 22 22 22 22 22 22

 

वो तो बस पुल पर चलते जो गहराई से घबराते हैं

पुल की रचना वो करते जो खाई के भीतर जाते हैं

 

जिनसे है उम्मीद समय को वो पूँजी के सम्मोहन में

काम गधों सा करते फिर सुअरों सा खाकर सो जाते हैं

 

धूप, हवा, जल, मिट्टी इनमें से कुछ भी यदि कम पड़ जाए

नागफनी बढ़ते जंगल में नाज़ुक पौधे मुरझाते हैं

 

जिनके हाथों की कोमलता पर दुनिया वारी जाती है

नाम वही अपना पत्थर के वक्षस्थल पर खुदवाते…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 19, 2016 at 10:05pm — 4 Comments

ज़िंदगी डूब जाती है ....

ज़िंदगी डूब जाती है ....

ऐ बशर !

इतना ग़रूर अच्छा नहीं

ये दौलत का सुरूर अच्छा नहीं

साया तेरे करमों का

हर कदम तेरे साथ है

कुछ दूर तक दिन है

फिर लम्बी अंधेरी रात है

रातों में साये भी रूठ जाते हैं

दिन के करम

तमाम शब सताते हैं

शब की तारीकियों में

अहम के पैराहन

जिस्म से उतर जाते हैं

ज़न्नत और दोज़ख

सब सामने आ जाते हैं

बशर ख़ाके सुपुर्द हो जाता है

लाख चाहता है

फिर लौट नहीं पाता है

फिर न कोई रहबर होता…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 19, 2016 at 9:48pm — 4 Comments

चेहरा तेरा चाँद का टुकड़ा

चेहरा तेरा चाँद का  टुकड़ा

भौहें तनी कमान हैं क्या

इन आँखों में मैं मर जाऊँ

होंठों का तिल शान है क्या..2

तेरे तन की ख़ुशबू लेकर

फूल चमन में खिलते हैं

शायर तेरे हुशनो जवाँ की

दिल में किताबें लिखते हैं

उठी नज़र फिर झुक जाए तो

ढल जाती ये शाम है क्या

इन आँखों पे ...

तेरे लबों की बात करूँ तो

खिले कमल शर्माते हैं

तेरे क़दम जो पड़े जमी पे

शहंशाह झुक जाते हैं

तेरा खनकता स्वर गूंजा या

वीना की कोई तार है…

Continue

Added by Amit Tripathi Azaad on April 19, 2016 at 6:14pm — No Comments

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