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May 2017 Blog Posts

गज़ल

1222 1222 122

अना की बात में कुछ दम नहीं है ।

कहा किसने तेरा परचम नहीं है ।।



मिलेंगी कब तलक ये स्याह रातें ।

मेरी किस्मत में क्या पूनम नही है ।।



अभी तक मुन्तजिर है आंख उसकी ।

वफ़ा के नाम पर कुछ कम नहीं है ।।



चिरागे इश्क़ पर है नाज़ उसको ।

उजाला भी कहीं मध्यम नहीं है ।।



सजा देंगे हमे ये हुस्न वाले ।

हमारे हक़ का ये फोरम नहीँ है ।।



तेरी जुल्फों की मैं तश्वीर रख लूँ।

मगर मुद्दत से इक अल्बम नही है… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on May 21, 2017 at 6:06am — 3 Comments

दुनिया कहती है, मैं ऐसा हूँ। दुनिया कहती है, मैं वैसा हूँ॥

दुनिया कहती है,

मैं ऐसा हूँ।

दुनिया कहती है,

मैं वैसा हूँ॥

जेठ की दोपहरी

पसीने का एहसास,

ताम्र वर्ण की-

अतृप्त प्यास॥

तेरी काँख के गंध

जैसा हूँ॥



दुनिया कहती है,

मैं ऐसा हूँ।

दुनिया कहती है,

मैं वैसा हूँ॥

सही वक़्त, सही लोग

मिल नहीं पाए।

शब्द बिखरे रहे,

अर्थ मिल नहीं पाए॥

उनींदी रातों की,

सिलवटों जैसा हूँ॥



दुनिया…

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Added by SudhenduOjha on May 20, 2017 at 10:05pm — No Comments

टूटा पहिया (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"ये मैं नहीं, तुम हो जो झुकते, डगमगाते टूट चुकी हो!"

"नहीं, यह सच नहीं! मीडिया और जनता तो यह कहती है कि तुम ही तो हो जिसकी यह हालत हुई है, समझीं!"



काठगाड़ी के आगे का पहिया ग़ायब था और उसी पर वे तीनों स्वयं को पहिया मानकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहीं थीं।

दरअसल ग़रीबी और पर्यावरण-प्रदूषण लटकाये लोकतंत्र की यह काठगाड़ी खींचती भारत-माता बुढ़िया के वेष में सच्चाई जानने के लिए निकल पड़ीं थीं। उनके कानों में मीडिया और जनता के आरोप-प्रत्यारोप भी सुनाई देने लगे।

"इस… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 20, 2017 at 8:17pm — No Comments

तरही ग़ज़ल, जनाब निलेश 'नूर' साहिब की नज़्र

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन



बताऊँ,कैसे शब-ए-इन्तिज़ार गुज़री है

मेरे हवास पे होकर सवार गुज़री है



यही तो होता है हर शब हमारे सीने पर

ग़मों की फ़ौज बनाकर क़तार गुज़री है



न जाने कितनी तमन्नाओं का लहू पीकर

बड़ी ही धूम से फ़स्ल-ए-बहार गुज़री है



तुम्हें ख़बर ही नहीं है कि ये शब-ए-हिज्राँ

किसी ग़रीब का करके शिकार गुज़री है



तुम्हारा साथ जहाँ तक रहा वहाँ तक तो

हयात मेरी बहुत शानदार गुज़री है



हमारी नस्ल भी मग़रिब की तर्ज़… Continue

Added by Samar kabeer on May 20, 2017 at 12:08am — 25 Comments

ग़ज़ल--शम अ रोशन करो मुहब्बत की

ग़ज़ल

-----

(फ़ाइलातुन -मफ़ाइलुंन -फेलुंन)



आँधियाँ चल रही हैं नफ़रत की।

शमअ रोशन करो मुहब्बत की।



जिसको तदबीर पर यक़ीन नहीं

बात करता है वह ही किस्मत की।



दुश्मने जान हो गए उमरा

में ने मुफ़लिस की जब हिमायत की।



रहबरी के लिए चुना जिसको

साथ उसने मेरे सियासत की।



होश में आ जा बागबाने चमन

हो गई इब्तदा बग़ावत की।



उनके जलवों से वह नहीं वाकिफ़

बात करते हैं जो कियामत की।



वक़्त तस्दीक़ इम्तहान का… Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on May 19, 2017 at 9:18pm — 17 Comments

माँ

सुख के दुख के हर सांचे में, मिटटी जैसी ढलती माँ

मैं क्या कोई जान न पाया, कब सोती कब जगती माँ

गाँव छोड़कर, गया नगर में, लाल कमाने धन दौलत,

अच्छे दिन की आशा पाले, रही स्वयं को ठगती माँ

दीवाली पर सजते देखे, घर आँगन चौबारे

रहे भागती और दौड़ती, पता नहीं कब सजती माँ

घर के कोने कोने का, दूर अँधेरा करने को,

दीपक में बाती के जैसी, रात रात भर जलती माँ

बेटी और बहू की खातिर, जोड़े जाने क्या क्या तो,

सपने बुनकर…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on May 18, 2017 at 10:25pm — 4 Comments

ग़ज़ल.. जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में

1222 1222 1222 1222

उठा लो हाथ में खंज़र लगा दो आग सीने में

धरा है क्या नजाकत में नफासत में करीने में



बड़े खूंरेज कातिल हो जलाया खूब इन्सां को

जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में



उठी लहरें हजारों नागिनें फुफकारती जैसे

न कोई बच सका जिन्दा समंदर में सफीने में



न सर पे आशियाँ जिनके न खाने को निवाले हैं

उन्हें क्या फर्क पड़ता है यूँ मरने और जीने में



हुये मशहूर किस्से जब अदाए कातिलाना के

सहेजूँ किस तरह तुमको अँगूठी के नगीने… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 18, 2017 at 8:05pm — 12 Comments

अँधेरे ...

अँधेरे ...

किसने

स्वर दे दिए

रजनी तुम्हें

तुम तो

वाणीहीन थी

मूक तम को

किसने स्वरदान दे दिया

शून्यता को बींधते हुए

कुछ स्वर तो हैं

मगर

अस्पष्ट से

क्षण

तम के परिधान में

सुप्त से प्रतीत होते हैं

भाव

एकांत के दास हैं

शायद

तुम

इस तम की

वाणीहीनता का कारण हो

पर हाँ

ये भी सच है कि

तुम ही इस का

निवारण भी हो

दे दो प्राण

इन एकांत

अँधेरे को

छू लो इन्हें…

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Added by Sushil Sarna on May 17, 2017 at 5:18pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - हम चाह कर ख़ुदा की इबादत न कर सके ( गिरिराज भंडारी )

221  2121  1221 212

हो चाह भी, तो कोई ये हिम्मत न कर सके

तेरी जफ़ा की कोई शिकायत न कर सके

 

तुम क़त्ल करके चौक में लटका दो ज़िस्म को

ता फिर कोई  भी शौक़ ए बगावत न कर सके

 

हाल ए तबाही देख तेरी बारगाह की  

हम जायें बार बार ये हसरत न कर सके

बारगाह - दरबार

मैंने ग़लत कहा जिसे, हर हाल हो ग़लत

तुम देखना ! कोई भी हिमायत न कर सके

 

बन्दे जो कारनामे तेरे नाम से किये

हम चाह कर ख़ुदा की इबादत न कर…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on May 17, 2017 at 7:24am — 27 Comments

ग़ज़ल नूर की-मैं पहले-पहल शौक़ से लाया गया दिल में

22 11 22 11 22 11 22

.

मैं पहले-पहल शौक़ से लाया गया दिल में

फ़िर नाज़ से कुछ रोज़ बसाया गया दिल में.

.

वो ख़त तो बहुत बाद में शोलों का हुआ था,

तिल तिल के उसे पहले जलाया गया दिल में.

.

हालाँकि मुहब्बत वो मुकम्मल न हो पाई 

शिद्दत से बहुत जिस को निभाया गया दिल में.

.

अंजाम पता है हमें कुछ और है फिर भी,  

हीरो को हिरोइन से मिलाया गया दिल में.   

.

हम सच में तेरी राह में कलियाँ क्या बिछाते

पलकों को मगर सच में बिछाया गया…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 16, 2017 at 7:30pm — 22 Comments

रेत पर फूल खिलाने आये (ग़ज़ल)

2122 1122 22



रेत पर फूल खिलाने आये

दश्त में कितने दीवाने आये



मिल गया राह में बचपन का यार

याद फिर गुज़रे ज़माने आये



धूप के पंख निकल आये जब

कुछ शजर जाल बिछाने आये



एक दिन बेखुदी जो ले डूबी

तब मेरे होश ठिकाने आये



वक़्त-बेवक्त भड़क कर आँसू

ग़म की सरकार गिराने आये



नाम लिक्खा था किसी का उनपर

किसी के हिस्से में दाने आये



दिल का दरवाज़ा खुला ही रक्खो

किस घड़ी कौन न जाने आये



आया है हिज्र का… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on May 15, 2017 at 9:55pm — 15 Comments

स्वप्न साधना ....

स्वप्न साधना ....



निस्सीम प्रीत के

मधुपलों में

हो समर्पित

चिर सुख की

मिलन वेला में

खो गयी मैं

और हार के

स्वयं को स्वयं से

अमर जीत

हो गयी मैं



करती रही

क्षण क्षण संचित

एकांत वास में

अपने प्रिय के

प्रीतपाश का



विस्मृत कर

विभावरी के

अंतकाल को

श्वास स्पंदन

की मिलन गंध को

विभावरी के

शेष पलों में

जीती रही मैं



शून्य हुआ

तुम बिन हर पल

श्वास मेरी… Continue

Added by Sushil Sarna on May 15, 2017 at 7:23pm — 9 Comments

ड्रामा और हकीकत(लघुकथा)

गेट के सामने भीड़ इकठ्ठी हो रही है, कुछ लोग क्रोध से भर कार्यालय के अंदर जाने की कोशिश कर रहे हैं । द्वारपाल भीड़ को रोकने की कोशिश में नकाम हो रहा है।

प्रेस अपने वीडियो कैमरे के साथ कार्यालय तक पहुँच गई है, और पत्रकार कई तरह के सवाल पुछ रहे हैं जैसे “वार्ड नं ३ में होने वाली मौत के बारे आप क्या कहना चाहेंगा। आप बताएँ मौत कि लिए जिम्मेदार चिकित्सक पर क्या एकशन लिया गया है।“

"आप कैसे कह सकते हैं कि मौत के लिए चिकित्सक ही जिम्मेदार है ?" बड़े टेबल की दुसरी तरफ़ बैठे साहिब ने कहा। मैने…

Continue

Added by मोहन बेगोवाल on May 15, 2017 at 4:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल

*221 1221 1221 122



-------------



सबसे न बताओ के परेशान यही है ।

आशिक़ हूँ यकीनन मेरी पहचान यही है ।।



यूँ ही न् गले मिल तू जरा सोच समझ ले ।

इस शह्र के हालात पे फरमान यही है ।।



कहने लगी है आज से मुझको भी सरेआम ।

ठहरा है जो मुद्दत से वो मेहमान यही है ।।



बर्बाद गुलिस्तां को सितम गर ने किया जब।

लोगो ने कहा प्यार का तूफ़ान यही है ।



अक्सर ही नकाबों में छुपाते हैं ये चेहरा ।

बैठा जो तेरे हुस्न पे दरबान यही है… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on May 15, 2017 at 1:03pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - जाने किस किस से तेरी अनबन हो ( गिरिराज भंडारी )

2122   1212   22 /112

मेरी मदहोशियाँ भी ले जाना

मेरी हुश्यारियाँ भी ले जाना

 

इक ख़ला रूह को अता कर के

आज तन्हाइयाँ भी ले जाना 

 

जाने किस किस से तेरी अनबन हो

थोड़ी खामोशियाँ भी ले जाना

 

दिल को दुश्वारियाँ सुहायें गर

मुझसे तब्दीलियाँ भी ले जाना

 

कामयाबी न सर पे चढ़ जाये

मेरी नाकामामियाँ भी ले जाना

 

राहें यादों की रोक लूँ पहले

फिर तेरी चिठ्ठियाँ भी ले जाना

 

बे…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on May 15, 2017 at 10:19am — 23 Comments

एक हांडी दो पेट(लघुकथा)

एक हांडी दो पेट(लघुकथा)

हाई स्कूल के बाद, उसके आगे न पढ़ने के ऐलान करने पर माँ ने जोर देते हुए कहा,"बेटा!बिना पढ़ाई के आज कोई इज्जत नहीं है।तुझे यह कितनी बार समझाऊँ?"

पिता ने जोड़ा,"ठीक कह रही है तेरी माँ।"

वह झल्ला कर बोली,"माँ,बापू मेरे बस का नहीं है पढ़ना।ज्यादा धक्का ना करो।क्या कर लूँगी पढ़ के मैं?"

पिता बोले,"पढ़-लिख जावेगी तो अपने पैरों पर खड़ी हो सकेगी।किसी की तरफ देखना न पड़ेगा।जिंदगी में तेरे काम आवेगी पढ़ाई।"

"अच्छा!",उसने मुँह बनाया।

"बेटा!मैं ना पढ़… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on May 14, 2017 at 8:00pm — 18 Comments

ग़ज़ल....रूप लम्हों में बदलती ज़िन्दगी का क्या करूँ

2122 2122 2122 212

रूप लम्हों में बदलती ज़िन्दगी का क्या करूँ

हौसलों का क्या करूँ चीने जबीं का क्या करूँ



रंग लाती ही नहीं अश्कों दफ़न की कोशिशें

आँख में आती नज़र रंजो ग़मी का क्या करूँ



​​रो रही है रात गुमसुम चाँद तारे मौन है

आग अंतस में लगाये चाँदनी का क्या करूँ



ओढ़ चादर कोहरे की कपकपाते होंसले

हर कदम पे थरथराते आदमी का क्या करूँ



हों इरादे आसमां तो जुगनुओं से रोशनी

आप घर खुद ही जलाये रोशनी का क्या करूँ



गुनगुनायें… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 14, 2017 at 11:52am — 18 Comments

गजल(आइये,आज का चलन.....)

212 212 212 212

^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^

आइये,आज का जो चलन,देखिये,

सच हुआ झूठ का जो कथन,देखिये।1



मैं सही,वह गलत,घोषणा हो रही,

जिंस बन बिक रहे वे,रटन देखिये।2



देख लें सूट-बूटी वदन आज कल

फट गयी जेब चमके बटन देखिये।3



बेतरह ढूँढ़ते आपकी गलतियाँ

ढूँढ़ते आप, फटता गगन देखिये।4



नेमतें खुद गिनाते , हुए मौन कब?

लग रहा, बढ़ गया है वजन, देखिये।5



चाँद पर थूकना है मुनासिब कहीं?

दाग लगता नहीं क्या? फलन… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 14, 2017 at 8:00am — 14 Comments

भगौड़ों की कतार में(लघुकथा) राहिला

एक पन्द्रह, सोलह साल का लड़का, जिसका चेहरा, जुबान और आँखे बाहर निकलने के कारण विकृत हो चुका था

"लीजिये !,एक और भगौड़ा फांसी पर लटक कर चला आया है।"मृत्युलोक का लेखा -जोखा देखने वाले से स्वर्ग के दरोगा ने कहा।

"तो ले जाओ इसे भी और नर्क में डाल दो।जितनी जिंदगी लिखी थी।उतनी उम्र तक फांसी पर बराबर लटकाते रहो।और साथ ही इसके नीचे हड्डी पिघला देने वाली आग भी जला दी जाए ।"

"लेकिन इतनी सख्त दोहरी सज़ा..., क्यों?"दरोगा ,बालक की कम उम्र देख कर उसके लिए विचलित हो उठा।

"हाँ..!दोहरी… Continue

Added by Rahila on May 13, 2017 at 3:47pm — 13 Comments

ग़ज़ल----(कब वो मेरे दिल से निकला था)

ग़ज़ल

---------

(फअल-फऊलन-फेलुन-फेलुन )

सिर्फ़ वो महफ़िल से निकला था |

कब वो मेरे दिल से निकला था |

दिलबर के दीदार का मंज़र

चश्म से मुश्किल से निकला था |

रास्ता मेरी मंज़िल का भी

उनकी ही मंज़िल से निकला था |

जिसने बचाया बद नज़रों से

वो जादू तिल से निकला था |

हरफे निदा जो बना अदावत

ज़ह्ने मुक़ाबिल से निकला था |

आ ही गया वो फिर मक़्तल में

बच के जो क़ातिल से निकला था…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on May 13, 2017 at 12:44pm — 16 Comments

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