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स्त्री सी मिस्ट्री (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

कुछ तो नया मिल जाए, अपना कुछ रूप-रंग बदल जाये, किसी तरह तो पागल-दीवानों को संतुष्ट किया जाये। इसी सोच के साथ वे सब आज फिर इंतज़ार में थीं, किसी नये अवतार में ढलने के लिए। एक-दूसरे के हालात का जायज़ा लेते हुए उनके बीच विचार विमर्श चल रहा था।

"इन लोगों को तो बस भाषण देना या राग अलापना आता है, बस!"

"करते वही हैं, जो फ़ैशन में है और जो विज्ञापनों में दिखाया, सिखाया जाता है!"

समूह में से दो क़लमों के संवाद सुनकर तीसरी ने कहा -"देशी तन में हमें विदेशी तकनीक के चोले पहनने पड़ते हैं। नई…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 27, 2017 at 1:00am — No Comments

खेल दिल का अजीब होता है.....संतोष

फ़ाइलातून मफ़ाइलुन फेलुन

खेल दिल का अजीब होता है
कौन किसके क़रीब होता है

प्यार मिलता,किसी को रुसवाई
अपना अपना नसीब होता है

काम आए बुरे समय में जो
वो ही सच्चा हबीब होता है

प्यार है जिसके पास वो इंसां
इस जहाँ में ग़रीब होता है

राज़ जिसको बता दिया दिल का
वो ही मेरा रक़ीब होता है
#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by santosh khirwadkar on October 26, 2017 at 4:59pm — 12 Comments

लघुकथा - क़लम की ताक़त –

लघुकथा - क़लम की ताक़त –

 देश के मशहूर लेखक श्रीधर को सरकार की ओर से कुछ विशेष लेखन कार्य हेतु निमंत्रण पत्र आया। चूँकि सरकारी मामला था अतः श्रीधर उसकी अवहेलना नहीं कर सके और दरबार में हाज़िर हो गये।

सरकार के प्रधान ने श्रीधर से एकांत में चर्चा की,

"श्रीधर जी, हम चाहते हैं कि देश के समस्त नामचींन समाचार पत्र और  पत्रिकाओं में आप हमारे बारे में लिखें। हमारी उपलब्धियों का बखान करें"।

"सर जी, यह तो बहुत मामूली कार्य है। इसे तो कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा पत्रकार कर…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 26, 2017 at 12:00pm — 17 Comments

ग़ज़ल - इश्क में जार जार रोते हैं

फाइलातुन मफाइलुन फैलुन

2122 1212 22



रात दिन बार बार रोते हैं।

इश्क में जार जार रोते हैं।



जब नशे में थे हम मज़े में थे,

जब से उतरा खुमार रोते हैं।



प्यार की अब पतंग नहीं उड़ती,

ठप्प है कारोबार रोते हैं।



आप से क्या मियाँ बताये हम

दिल हो जब बेकरार रोते हैं।



जब मैं रोता हूँ साथ में मेरे

सबके सब दोस्त यार रोते हैं।



वक्त बेवक्त उसके हाथों से,

जब भी पड़ती है मार रोते हैं।



अपने अपने सुभाव के… Continue

Added by Ram Awadh VIshwakarma on October 26, 2017 at 5:50am — 17 Comments

कटाक्षिकाएँ

(1) घपला !
घोटाला !
सुर्खियाँ !
मीडिया !
जाँच आयोग !
पुन: जाँच आयोग !
परिणाम -
शून्य ! शून्य ! शून्य !!
(2) इन दिनों मैं
एक अजीबों गरीब
बीमारी का शिकार हूँ
लक्षण यह है कि -
समाजों में रहने और
इंसानों से डरने लगा हूँ ।
(3) हत्या ! लूट !!
बलात्कार ! बलवा !!
मुक़द्दमा !
तारीख़ें !
सज़ा !
जेलों में सुविधा ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on October 25, 2017 at 11:40pm — 12 Comments

रंग

२१२२ १२१२ २२

फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ैलुन

******************************

रंग ख़ुशियों के कल बदलते ही,

ग़म ने थामा मुझे फिसलते ही,

मैं जो सूरज के ख़्वाब लिखती थी,

ढल गयी हूँ मैं शाम ढलते ही,

राह सच की बहुत ही मुश्किल है,

पाँव थकने लगे हैं चलते ही

वो मुहब्बत पे ख़ाक डाल गया

बुझ गया इक चराग़ जलते ही,

ख़्वाब नाज़ुक हैं काँच के जैसे,

टूट जाते हैं आँख मलते ही…

Continue

Added by Anita Maurya on October 25, 2017 at 7:27pm — 10 Comments

दीवाली (सरसी छन्द)

दीवाली (सरसी छन्द)





दिल से दिल के तार मिलाएं, दीवाली के नाम

खाएं और खिलाएं सबको,दें अच्छा पैगाम



एक दीप सा बन जीवन में, करें सदा उल्लास

मन मंदिर में ज्ञानदीप से,नित ही करें प्रकाश



झूम झूमकर खुशी मनाएं,बैठें सबके संग

कर्म सुगम पथ सब अपनाएं,सीख हुनर औ ढंग



बोलें मीठी वाणी सबसे,करें नहीं विद्वेष

दुनिया में है सबसे न्यारा,प्यारा भारत देश



एक बनेंगे नेक बनेंगे,ऊँचा होगा नाम

सुन्दर समाज अपना होगा,नेक करेंगे… Continue

Added by डॉ छोटेलाल सिंह on October 25, 2017 at 3:31pm — 9 Comments

बशीर बद्र साहब की जमीन पर एक तरही ग़ज़ल

अरकान-: मफ़ाइलुन फ़्इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन



नया ज़माना नया आफ़ताब दे जाओ

मिटा दे जुर्म जो वो इन्क़िलाब दे जाओ



हज़ार बार कहा है जवाब दे जाओ,

मैं कितनी बार लुटा हूँ हिसाब दे जाओ||



मुझे पसंद नही मरना इश्क़ में यारो,

मुझे है शौक़ नशे का शराब दे जाओ||



वो कह रहे हैं खड़े होके बाम पर मुझ से,

तमाशबीन बहुत हैं नक़ाब दे जाओ ||



करम करो ये मेरे हाल पर चले जाना

*उदास रात है कोई तो ख़्वाब दे जाओ*||



अगर जगाना है सोए हुओं को ऐ… Continue

Added by नाथ सोनांचली on October 25, 2017 at 1:31pm — 41 Comments

ग़ज़ल -वज़ीरों में हुआ आज़म, बना वह अब सिकंदर है

काफिया : अर ;रदीफ़ : है

बह्र ; १२२२  १२२२  १२२२  १२२२

वज़ीरों में हुआ आज़म, बना वह अब सिकंदर है

विपक्षी मौन, जनता में खमोशी, सिर्फ डरकर है |

समय बदला, जमाने संग सब इंसान भी बदले

दया माया सभी गायब, कहाँ मानव? ये’ पत्थर हैं |

लिया चन्दा जो’ नेता अब वही तो है अरब धनपति 

जमाकर जल नदी नाले, बना इक गूढ़ सागर है |

ज़माना बदला’ शासन बदला’ बदली रात दिन अविराम

गरीबो के सभी युग काल में अपमान मुकद्दर है…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on October 25, 2017 at 11:00am — 8 Comments

ख़त हमारे अगर जलाता है ; ग़ज़ल नूर की

२१२२/ १२१२/ २२ (११२)

ख़त हमारे अगर जलाता है

राख दुनिया को क्यूँ दिखाता है.

.

हम को उम्मीद है तो ग़ैरों से,

कौन अपनों के काम आता है?

.

सुन रखी होगी आग जंगल की

क्यूँ शरर को हवा दिखाता है.

.

शम्स मुझ सा शराबी है शायद 

शाम ढलते ही डूब जाता है.

.

ज़र्द चेहरा है बाल बिखरे हैं

इस तरह कौन दिल लगाता है.

.

देख! दुनिया का कुछ नहीं होगा

ख्वाहमखाह इस में सर खपाता है.

.

इस पे चलता है रब्त का धंधा

कौन क्या…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on October 24, 2017 at 1:00pm — 34 Comments

हवा में - डॉo विजय शंकर

हमने एक मकान बनाया ,
सबसे पहले
छत को बनाया ,
चढ़ कर उस पर
उछले-कूदे ,
खूब चिल्लाये ,
नाचे- गाये ,
देख आसमान ,
खूब इतराये ,
लगा , लपक कर
छू लेंगें ,
मुठ्ठी में नभ कर लेंगें ,
और जब नीचे झाँका , देखा ,
अचानक तब घबराये ,
हा , बुनियाद ,
कहाँ छोड़ आये।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on October 24, 2017 at 10:29am — 21 Comments

जिन्हें आदत पड़ी हर बात में आँसू बहाने क़ई (ग़ज़ल)

अरकान-: मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन



जिन्हें आदत पड़ी हर बात में आँसू बहाने की,

तमन्ना वो न पालें फिर किसी से दिल लगाने की



सर-ए-महफ़िल कभी पर्दा नहीं करता था वो ज़ालिम

तो फिर अब क्या ज़रूरत पड़ गई है मुँह छुपाने की



लिखूंगा बात जो सच हो बिना डर के ज़माने में,

यहीं इक शर्त थी ख़ुद से कलम अपनी उठाने की



ख़बर अपनी नहीं रहती मुझे, हालात ऐसे हैं

खबर क्यूँ पूछते हो फिर मियाँ सारे जमाने की



बना ख़ुद रास्ता अपना हुनर है तेरे हाथों… Continue

Added by नाथ सोनांचली on October 24, 2017 at 5:47am — 20 Comments

याद आ जाती है फिर उलझी कहानी आपकी

2122 2122 2122 212

जब कभी भी देखता हूँ वो निशानी आपकी ।

याद आ जाती है फिर उलझी कहानी आपकी ।।



आज मुद्दत बाद ढूढा जब किताबों में बहुत ।

मिल गयी तस्वीर मुझको वह पुरानी आपकी।।



बेसबब इनकार कर देना मुहब्बत को मेरे ।

कर गई घायल मुझे वो सच बयानी आपकी ।।



याद है वह शेर मुझको जो लिखा था इश्क़ में ।।

फिर ग़ज़ल होती गई पूरी जवानी आपकी ।।



इक शरारत हो गई थी जब मेरे जज़्बात से ।

हो गईं आँखें हया से पानी पानी आपकी ।।



कुछ अना से कुछ… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 24, 2017 at 12:16am — 16 Comments

कविता: जो खुद को सेकुलर नहीं मानते उनके लिए

बाहर हैं तो अभी सीधा घर जाइये

घर जाकर टी.वी. में आग लगाइये

सभी जाति -धर्म के लोग दिखाई देगें

फिल्म - सीरियल पर नजर दौड़ाइये

बच्चों को उस स्कूल में डालिये

जहां आपकी जाति के शिक्षक होने चाहिये

सामान हर दुकान से मत खरीदिये

दुकान भी आपकी जाति धर्म की होनी चाहिए

किस धर्म के आदमी ने बनाया है ये सामान ?

अपनी जाति के दुकानदार से पुछवाईये

आप सेकुलर नहीं जो किसी के भी हाथ का खालें

इसलिए कुछ दिन…

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Added by जयति जैन "नूतन" on October 23, 2017 at 11:00pm — 9 Comments

पहनावा (कुण्डलियां)

पहनावा ही बोलता, लोगों का व्यक्तित्व ।
वस्त्रों के हर तंतु में, है वैचारिक स्वरितत्व ।।
है वैचारिक स्वरितत्व, भेद मन का जो खोले ।
नग्न रहे जब सोच, देह का लज्जा बोले ।
फैशन का यह फेर, नग्नता का है लावा ।
आजादी के नाम, युवा का यह पहनावा ।।
.............................................
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on October 23, 2017 at 11:00pm — 4 Comments

सुख की एक लाश ...

सुख की एक लाश ...

एक अंतराल के बाद

विस्मृति भंग हुई

तो चेतना

सूनी आँखों से

उबलते लावों में

परिवर्तित हो

बह निकली

व्याकुलता के कुंड में

प्रश्नों की ज्वाला में तप्ती

असंख्य अभिलाषाओं को समेटे

जीवन के अंतिम क्षितिज पर

ज़िंदा थी

एक लाश

सुख की



छिल गए

भरे हुए

घाव सभी

जब स्मृति जल ने

अपने खारेपन से

उनपर नमक छोड़ दिया

जलती रही देर तक

मात हो चुकी बाज़ी की

अवचेतन में सोयी…

Continue

Added by Sushil Sarna on October 23, 2017 at 8:16pm — 10 Comments

जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोन:[कालिदास कृत ‘मेघदूत’ की कथा-वस्तु , तीसरा और अंतिम भाग ] - डॉ० गोपाल नारायण श्रीवास्तव

 महाकवि कालिदास ने मेघ का मार्ग अधिकाधिक प्रशस्त करने के ब्याज से प्रकृति के बड़े ही सूक्ष्म और मनोरम चित्र खींचे है, इन वर्णनों में कवि की उर्वर कल्पना के चूडांत निदर्शन विद्यमान है  जैसे - हिमालय से उतरती गंगा के हिम-मार्ग में जंगली हवा चलने पर देवदारु के तनों से उत्पन्न अग्नि की चिंगारियों से चौरी गायों के झुलस गए पुच्छ-बाल और झर-झर जलते वनों का ताप शमन करने हेतु यक्ष द्वारा मेघ को यह सम्मति देना कि वह अपनी असंख्य जलधाराओं से वन और जीवों का संताप हरे .

मेघ को पथ निर्देश करता यक्ष…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 23, 2017 at 12:20pm — 4 Comments

भुजंगप्रयात छंद (प्रथम प्रयास)

122 122 122 122

जहाँ ये दिलों की दगा का अखाड़ा,
किसी ने मिलाया किसी ने पछाड़ा;
यहाँ प्यार है बेसहारा बगीचा,
किसी ने बसाया किसी ने उजाड़ा;

.
मौलिक और अप्रकाशित

Added by Ramkunwar Choudhary on October 23, 2017 at 9:30am — 10 Comments

ग़ज़ल - इश्क में हो खुमार कुछ तो सही

बह्र - फाइलातुन मफाइलुन फैलुन

2122 1212 112 / 22

इश्क में हो खुमार कुछ तो सही।

उसमें आये निखार कुछ तो सही।



दर्देदिल का मज़ा है तब असली,

तीर हो दिल के पार कुछ तो सही।



हो भले झूठ मूठ का लेकिन,

उनसे हो प्यार वार कुछ तो सही।



आज फिर याद उनकी आई है,

दिल हुआ बेकरार कुछ तो सही।



बेवफाई हो जिसकी रग रग में,

वो भी हो शर्मसार कुछ तो सही।



जिन्दगी सौंप दूँ उसे लेकिन,

उसपे हो ऐतबार कुछ तो सही।



इश्क का भूत… Continue

Added by Ram Awadh VIshwakarma on October 23, 2017 at 5:51am — 8 Comments

दीवाली (कामरूप छन्द, एक प्रयास)

दीपावली पर, ज्योत घर घर, अलौकिक सृंगार

वातावरण में, प्रभु चरण में, भक्ति का संचार

सब लोग पुलकित, बाल हर्षित, बाँटते उपहार

लड़ियाँ लगाते, सब सजाते, स्वर्ग सा घर द्वार



हर घर अटारी, खेत क्यारी, लौ दिखे चहुँओर

सारे नगर में, हर डगर में, पटाखों का शोर

दीपक जले जब, तब मिले सब, धरा औ आकाश

सद्भाव सुरभित, तन सुशोभित, हो कलुष का नाश



मौसम गुलाबी, दिल नवाबी, औ अमावस रात

अद्भुत समागम, दीप माध्यम, दे तमस को मात

जगमग सितारे, आज सारे, अचम्भित… Continue

Added by नाथ सोनांचली on October 23, 2017 at 5:42am — 9 Comments

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