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पापा तुम्हारी याद में

जीवन की पतंग

पापा थे डोर

उड़ान हरदम

आकाश की ओर

पापा सूरज की किरण

प्यार का सागर

दुःख के हर कोने में

खड़ा उनको पाया

छोटी ऊँगली पकड़

चलना मुझको सिखलाया

हर उलझन को पापा

तुमने ही सुलझाया

हर मुश्किल में पापा

प्यार हम पर बरसाया

मेरे हर आंसू ने

तुम्हारी आँखों को भिगोया

मेरे कमजोर पलों में

मेरा विश्वास बढ़ाया

तुम से बढ़कर पापा

प्यार न कोई पाया

प्यार न कोई पाया।

मौलिक एवं…

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Added by Neelam Upadhyaya on June 17, 2018 at 6:05pm — 15 Comments

कविता--कश्मीर अभी ज़िंदा है भाग-1



कश्मीर अभी ज़िंदा है

झेलम के ख़ून में

केसर के रक्त में नहाया

बेवाओं की चीख पुकार में

दहााड़ेंं मारती माँओं में

पत्थरबाज़ी में

कश्मीर अभी ज़िंदा है भटके नौजवानों में

कश्मीर अभी ज़िंदा है शहीदों के जनाज़ोंं में 

डरे सहमे शिकारों में

ख़ूूून से सनी पतवारों में

दया के लिए भीख माँगते हाथों में

धमकी भरे पत्रों में

हैण्ड ग्रेनेड में

मोर्टार और एके फोर्टी सेवन में

असंख्य हथियारों के ज़खीरों में

बरामद पाकिस्तानी हथियारों में…

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Added by Mohammed Arif on June 17, 2018 at 8:30am — 16 Comments

ग़ज़ल .....

22  22  22  22  

गाता जाए एक दिवाना

दुनिया यारो पागलखाना

परदेश बनाया घर लेकिन

घर मे कम है एक सयाना

इससे आगे सोच ना पाऊं

बीबी बच्चे और ठिकाना

केक खिलाया साल बढ़ाए

भूल गया पर उम्र घटाना

एक शिगूफा छोड़ेगा फिर

अबके राजा भौत सयाना

मौलिक व अप्रकाशित

Added by gumnaam pithoragarhi on June 16, 2018 at 5:52pm — 10 Comments

ग़ज़ल (न मुँह को फेर के यूं आप जाएं ईद के दिन)

(मफाइलुन _फ इलातुन_मफाइलुन_फ इलुन)

न मुँह को फेर के यूं आप जाएं ईद के दिन |

मेरे गले से  लगें   या लगाएँ ईद के दिन |

अकेले हम ख़ुशी कैसे मनाएँ ईद के दिन |

ख़ुदा क़सम वो बहुत याद आएँ ईद के दिन |

जो पिछले साल थाशामिल हमारी खुशियों में

उसी हसीन की यादें सताएँ ईद के दिन |

गरज़ है क्या भला हम साया ग़ैर मुस्लिम है

उसे बुलाके सिवइयाँ खिलाएँ ईद के दिन |

ख़ुदा ने अर्श से भेजा है तुहफा फरहत का

न दिल…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on June 15, 2018 at 8:30pm — 17 Comments

बरसात ....

बरसात ....

मेघों की गर्जना

चपला की अटखेलियां

फुहारों में भीगी तेज हवाएँ

वातायन के पटों का शोर

करवटों की रात

लो फिर आ गई

वस्ल की यादें लिए

फिर

आज बरसात

वो चेहरे से उसका

बूंदे हटाना

लटें सुलझाना

हौले से मुस्कुराना

सच कहाँ भूलेगी

वो शर्मीली सी बात

कि याद ले आई

फिर

आज बरसात

बारिश की बूंदों की

अजब सी अगन

स्पर्शों की आहट से

घबराया मन

न और हां की हो गयी…

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Added by Sushil Sarna on June 15, 2018 at 7:19pm — 9 Comments

तुम्हारे स्पर्श से....

मैं संग चल दी उनके,

मेरा मन यहीं रह गया...

उन्होंने दिखाये होंगे हजारों ख्वाब,

पर इन आँखों में रौशनी कहाँ थी !!

कितने ही गीत सुनाये होंगे उन्होंने,

पर इन कानों के पट तो बंद हो चुके थे !!

उनके सबालों का,

जबाब भी ना दे पायी थी मैं....

क्योंकी इन होठों पे, तुम्हारा ही नाम रखा था!!

कितना आक्रोश था उनके ह्रदय में,

जब उन्होंने,

मेरे केशों को पकड़कर खींचा था...

और मैं पत्थर सी हो गयी थी,

किसी भी आघात की पीड़ा ना हुई…

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Added by रक्षिता सिंह on June 15, 2018 at 5:12pm — 10 Comments

चलती का नाम औपचारिकता (लघुकथा)

"ठीक है, तुम भी मेरी उपेक्षा कर आगे बढ़ जाओ, मुझे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता! बहुत सब्र है मुझमें!" सुबह की चहलक़दमी करते एक तंदुरुस्त आदमी से पतझड़ से गुज़रे सूखे दरख़्त ने कहा।



"पर उसमें भी अपने अन्य साथियों की तरह ज़रा भी सब्र नहीं है! क्या फ़ायदा उससे कुछ कहने से? उसे भी इस काम के बाद रोज़ाना की तरह दूसरे काम भी तो पूरे करना है न!" दूसरे साथी पेड़ ने उस से कहा।



"सही कहा तुमने। आज का ख़ुुुदग़र्ज़ आदमी धन-दौलत, फैशन और तरक़्क़ी की होड़ में न तो कोई रिश्ते सही तरह से निभा पा रहा है, न ही…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 15, 2018 at 9:50am — 8 Comments

पतझड़ -  लघुकथा –

पतझड़ -  लघुकथा –

केशव ने जैसे ही अपने घर के बाहर लगे पेड़ के नीचे से अपना साईकिल रिक्शा उठाया, उसके पड़ोसी रहमान ने उसका हाथ पकड़ लिया,

"यह क्या कर रहे हो केशव? कल तुम्हारे पिता का देहांत हुआ है और आज तुम रिक्शा लेकर काम पर चल दिये"?

"भाई, मेरे रिक्शा ना चलाने से जाने वाला  तो वापस नहीं आयेगा। लेकिन भूख प्यास से मेरे बच्चे भी मेरे पिता की तरह मुरझा जायेंगे"|

" हम लोग क्या मर गये हैं? इतने बेगैरत नहीं कि दो चार दिन अपने पड़ोसी के बच्चों को खाना भी ना दे…

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Added by TEJ VEER SINGH on June 14, 2018 at 7:08pm — 18 Comments

जो पले हैं उसी छाया में |

माता  की ममता की तुलना  , कभी कोई कर सकता नहीं |
जग में जो खुशी माँ से मिले  ,  कोई और  दे सकता नहीं |
हर कोई माँ से ही आया ,        मां बिना कोई आया नहीं |
ये ज़िंदगी जो  माँ से मिली  , कोई   कर्ज  भर पाया नहीं |
प्रसव में  जो पीड़ा   माँ सहे , पिता उसे कहाँ बाँट पाये |
सटा कर रखे जो सीने से ,  ये मजा शिशु को  कहाँ आये | 
अपने गीले में…
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Added by Shyam Narain Verma on June 14, 2018 at 3:51pm — No Comments

हाइकू

झरता रहा

माँ के आशीर्वाद सा

हरसिंगार

 

उषा की लाली

रेशम का आँचल

वात्सल्य माँ का

. 

पुलक तन

शाश्वत है बंधन

नमन मन

  

स्नेहिल स्पर्श

वात्सल्य का कंबल

संबल मन

 …

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on June 14, 2018 at 12:30pm — 10 Comments

कुछ क्षणिकाएं :

कुछ क्षणिकाएं :

शर्मिन्दा हो गई

कुर्सी

बैठ गया

एक

नंगा इंसान

चुनावी साल में

वादों की गठरी लिए

.....................

शरमा गया

इंद्रधनुष

देखकर

धरा पर

इतनी

सफेदपोश

गिरगिटों को

..........................

सफ़ेद भिखारी

मांग रहे

भीख

छोटे भिखारी से

दिखा के

आश्वासनों की

चुपड़ी रोटी

.......................

आ गया

फिर से सावन

टरटराने लगे हैं…

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Added by Sushil Sarna on June 13, 2018 at 6:46pm — 5 Comments

जलियांवाला बाग़ (लघुकथा)

‘‘फ़ायर!’’ जनरल के कहते ही सैकड़ों बन्दूकें गरजने लगीं। उस जंगल में आदिवासी चारों तरफ़ से घिर चुके थे। उनकी लाशें ऐसे गिर रही थीं जैसे ताश के पत्ते। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या जवान, कोई भी ऐसा नहीं नहीं था जो बच सका हो। कुछ ने पेड़ों के पीछे छिपने की कोशिश की तो कुछ ने पोखर के अन्दर मगर बचा कोई भी नहीं। देखते ही देखते हरा-भरा जंगल लाल हो गया।

‘‘आगे बढ़ो!’’ जनरल ने आदेश दिया। सेना लाशों के बीच से होते हुए जंगल के भीतर बढ़ने लगी। वहाँ कोई भी ज़िन्दा नज़र नहीं आ रहा था सिवाय उस छोटी सी…

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Added by Mahendra Kumar on June 13, 2018 at 12:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल _तक़दीर आज़माने की ज़हमत न कीजिए

(मफऊल _ फाइलात _ मफाईल _फाइलुन)

तक़दीर आज़माने की ज़हमत न कीजिए |

उस बे वफ़ा को पाने की हसरत न कीजिए |

बढ़ने लगी हैं नफरतें लोगों के दरमियाँ

मज़हब की आड़ ले के सियासत न कीजिए |

जलवे किसी हसीन के आया हूँ देख कर

महफ़िल में आज ज़िक्रे कियामत न कीजिए |

आवाज़ तो उठाइए हक़ के लिए मगर

इसके लिए वतन में बग़ावत न कीजिए |

बैठा है चोट खाके हसीनों से दिल पे वो

जो कह रहा था मुझ से मुहब्बत न कीजिए…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on June 12, 2018 at 10:30pm — 19 Comments

जरा धीरे चलो

जिन्दगी थोड़ा ठहर जाओ
जरा धीरे चलो
तेज इस रफ्तार से 
घात से प्रतिघात से 
वक्त रहते , सम्भल जाओ
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -
कामना के ज्वार में
मान के अधिभार में
डूबने से बच , उबर जाओ
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -
शब्दाडम्बरों के
उत्तरों प्रत्युत्तरों के
जाल से बच कर , निकल जाओ 
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -

(मौलिक एवम अप्रकाशित)

Added by Usha Awasthi on June 12, 2018 at 10:27pm — 11 Comments

गजल- फिर कोई मीठी शरारत हो गई है

मापनी - 2122 2122 2122

 

आपसे इतनी मुहब्बत हो गई है

लोग कहते हैं कि आफत हो गई है

 

नींद मेरी हो न पायी थी मुकम्मल

फिर कोई मीठी शरारत हो गई है

 

ढूँढता है रोज मिलने का बहाना…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on June 12, 2018 at 5:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल...पिछले कुछ दिनों से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन

हूँ बहुत हैरान पिछले कुछ दिनों से

ज़ीस्त है हलकान पिछले कुछ दिनों से

चाँद भी है आजकल कुछ खोया खोया

रातें हैं वीरान पिछले कुछ दिनों से

आदमी हूँ आदमी के काम आऊँ

है यही अरमान पिछले कुछ दिनों से

कौड़ियों के भाव बिकती हैं अनाएं

मर गया ईमान पिछले कुछ दिनों से

जोश में है भीड़ 'ब्रज' आक्रोश भी है

बस नहीं है जान पिछले कुछ दिनों से

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

बृजेश कुमार…

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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 12, 2018 at 5:00pm — 13 Comments

लालटेन वाली (लघुकथा)

विदेश से लौटे मांगीलाल की मांग पर चांदनी रौशनी में खुली हवा में उन्हें गांव की सड़क पर सैर कराई गई बैलगाड़ी में एक लालटेन लटका कर, जो उनके छात्र जीवन की निशानी थी। बैलगाड़ी चालक बब्बा जी अतीत की बातें सुनाकर छात्र रूपी मांगीलाल की तारीफ़ों के पुल बांधते हुए उनके दिलचस्प सवालों के जवाब देते जा रहे थे।



"बड़ा मज़ा आया बेलगाड़ी में घूम कर!" सिगरेट का कश लेते हुए गांव की कुछ अल्हड़ नवयौवनाओं को घूरते हुए मांगीलाल ने अपनी अगली मांग इशारों में ज़ाहिर कर दी!



"बब्बा ज़रा लालटेन उस तरफ़…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on June 12, 2018 at 2:00am — 5 Comments

ताहिर तामीर

रोशनी का कोई  सुराख़ न सही

बेरुखी ही प्यार का अंदाज़ सही

कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं

यह माना कि जिगर में तुम्हारे

कोई तीखी  ख़राश है आज

तल्खी  है, कसक  है  बहुत

है  कशमकश  भी  बेशुमार

इस  पर  भी  परीशां  न  हो

खालीपन  को  तुम

बहरहाल  खाली  न  समझो

आएँगे लम्हें जब कलम से तुम्हारी                        

अश्कों  के  मोती  गिर-गिर  कर

किसी गज़ल के अश’आर बनेंगे

तब  तरन्नुम  से  पढ़ना  उनको

लाज़िमी है…

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Added by vijay nikore on June 12, 2018 at 1:30am — 20 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22/112/211
कुछ नहीं सूझता कई दिन से
जाने क्या हो रहा कई दिन से?

है अलग ये जुबाँ निगाहें अलग
क्यों नहीं राबता कई दिन से।

हो लबों पे हँसी भले कितनी
मन रहा डगमगा कई दिन से।

जल रहा दिल कोई सही में कहीं
गर्म लगती हवा कई दिन से।

खुद पे खुद का नहीं रहा काबू
यूँ चढ़ा है नशा, कई दिन से।

मौलिक अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on June 11, 2018 at 11:00pm — 13 Comments

नजीब (लघुकथा)

और प्रधानमंत्री जी गायब हो गये। ‘‘क्या? प्रधानमंत्री जी गायब हो गये? यह कैसे हो सकता है?’’ हर किसी के जे़हन में यही सवाल था।

उस दिन जब रसोई में प्रधानमंत्री जी बच्चों के लिए पापड़ तल रहे थे तो पापड़ तलते-तलते न जाने कहाँ अचानक गायब हो गये। जैसे ही यह ख़बर न्यूज़ चैनल्स पर फ़्लैश हुई तो सारा देश सकते में आ गया।

‘‘हम लोग जी जान से लगे हैं और बहुत जल्द ही प्रधानमंत्री जी का पता लगा लेंगे। आप लोग निश्चिन्त रहिए।’’ जाँच समिति के प्रमुख ने देश को आश्वस्त करते हुए…

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Added by Mahendra Kumar on June 11, 2018 at 6:30pm — 4 Comments

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