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हौं पंडितन केर पछलगा *उपन्यास का एक अंश )

चौदहवीं की रात I निशीथ का समय I चाँद अपने पूरे शबाब पर I जायस के कजियाना मोहल्ले में एक छोटे से घर की छत पर गोंदरी बिछाए वही लम्बी सी पतली लडकी लेटी थी I उसकी सपनीली आँखों से नींद आज गायब थी I उसकी आँखों के सामने मुहम्मद का भोला किंतु खूबसूरत चेहरा बार-बार घूम जाता I कभी-कभी ऐसी नाटकीय घटनायें हो जाती हैं कि हम बेक़सूर होकर भी दूसरे की निगाहों में कसूरवार हो जाते हैं I उस लड़के ने मुझे उस हंगामे से बचाया I मेरा हाथ थामा I मुझे पानी से निकाला I हाथ थामने के मुहावरे का अर्थ सोचकर उसे उस सन्नाटे…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 29, 2018 at 10:02pm — 2 Comments

इस तरह जिन्दगी तमाम करें

इस तरह जिन्दगी तमाम करें
लोग आ कर हमें सलाम करें
झूठ का अब न एहतराम करें
इस तरह का भी इंतिजाम करें
तू वना खुद को इस तरह शीशा
देख चेहरा सभी सलाम करें
इस तरह वख्श बन्दगी दाता
सुबह से शाम राम-राम करें
आप के हाथ अब नहीं बाजी
आप अब और कोई काम करें
आज तौफिक दे खुदा सबको
देश पर जां लुटा के नाम करें
देख नफरत उदास है “तन्हा”
आस्तां में कहीं कयाम करें
मुनीश “तन्हा”
मौलिक व् अप्रकाशित

Added by munish tanha on November 29, 2018 at 9:30pm — 2 Comments

इश्क़  अजब  है, तोहमत  लेकर आया हूँ।

22 22 22 22 22 2

इश्क़  अजब  है, तोहमत  लेकर आया हूँ।

और  लगता  है , शुहरत  लेकर  आया हूँ।



बदहाली   में   भी   सालिम   ईमान  रहा,

मैं  दोज़ख़  से   जन्नत   लेकर   आया  हूँ।



मिट्टी,  पानी,   कूज़ागर   की   फ़नकारी,

और  इक  धुंधली  सूरत  लेकर  आया हूँ।



कितने रिश्ते, कितने नुस्ख़े, कितना प्यार,

मैं   दादी  की   वसीयत  लेकर  आया  हूँ।



आज 'गली क़ासिम'  से होकर गुज़रा था,

साथ  में   थोड़ी  जन्नत   लेकर  आया  हूँ।…



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Added by रोहिताश्व मिश्रा on November 29, 2018 at 4:30pm — 3 Comments

कुछ क्षणिकाएं जीवन पर :

कुछ क्षणिकाएं जीवन पर :

लो

आज मैं बड़ा हो गया

अपनी नेम प्लेट

लगाकर

बूढ़ी नेमप्लेट

हटा कर

.................

ज़िंदगी

हार गयी

ज़िंदगी से

खून से

खून की दरिंदगी से

..............................

असंभव को

संभव कर दिया

ज़िंदगी को

मरघट की

राह बता कर

............................

वृद्धाश्रम में

माँ -बाप को छोड़

बड़ा उपकार किया

संतान ने

दूध का क़र्ज़

उतार…

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Added by Sushil Sarna on November 29, 2018 at 3:04pm — 10 Comments

नवगीत:रैली, थैली, भीड़-भड़क्का सजी हुई चौपाल

एक नवगीत 

समीक्षा का हार्दिक स्वागत 

रैली, थैली, भीड़-भड़क्का, 

सजी हुई चौपाल



तंदूरी रोटी के सँग है,

तड़के वाली दाल

गली-गली में तवा गर्म है,

लोग पराँठे सेक रहे 

जन गण के दरवाजे जाकर,

नेता घुटने टेक रहे

पाँच साल के बाद सियासत,

दिखा रही निज चाल

वादों की तस्वीरें…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on November 29, 2018 at 1:00pm — 4 Comments

गज़ल -11( बज गई है डुगडुगी बस अब तमाशा देखिये)

2122 2122 2122 212

बज गई है डुगडुगी बस अब तमाशा देखिये

अब यहाँ फूटेगा बातों का बताशा देखिये//१

संग नेता के कुलाचें भर रही जो भीड़ ये

घर पहुंचकर इसके जीवन की हताशा देखिये //२

हर गली हर मोड़ पे भूखों की लंबी फ़ौज़ है…

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Added by क़मर जौनपुरी on November 28, 2018 at 8:00pm — 12 Comments

परिंदा जो गिरा, गिर कर उठा है-गजल

1222 1222 122

न जाने क्या हुई हमसे ख़ता है

हमारा यार जो हमसे खफ़ा है।

यूँ ही बदनाम हाकिम को हैं करते

यहाँ प्यादा भी जब जालिम बड़ा है।

जरा सींचो भरोसा तुम जड़ों में

शज़र रिश्तों का इन पर ही खड़ा है।

उसी ने छू लिया है आसमाँ को

परिंदा जो गिरा, गिर कर उठा है।

नहीं हमदर्द होता आदमी जो

सहारा गलतियों में दे रहा है।

अमा की रात में महताब आया

तुम आये तो हमे ऐसा लगा है।

मौलिक…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 28, 2018 at 6:30pm — 10 Comments

गज़ल - 10 ( मौत से एक बार भागा था/ मौत का रोज़ ही शिकार हुआ)



2122 1212 22/112

जब से हमदम सिपहसलार हुआ

सबसे ज़्यादा हमीं पे वार हुआ//1

मौत से एक बार भागा जो

मौत का रोज़ ही शिकार हुआ //2

दिल के आँगन में चाँद उतरा जब

दिल का आँगन सदाबहार हुआ//3

आज फिर आग में जली दुल्हन

आज फिर हिन्द शर्मसार हुआ//4

मैं तो खुद ही मिटा मुहब्बत में

कौन कहता है मैं शिकार हुआ// 5

दूर इक बर्फ की शिला था मैं

तेरे छूने से आबशार हुआ//6

बेक़रारी भले मिली…

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Added by क़मर जौनपुरी on November 28, 2018 at 1:00am — 2 Comments

मेरा क़ातिल तो मेरा रहनुमा है

1222 1222 122



खतों का चल रहा जो सिलसिला है ।

मेरी उल्फ़त की शायद इब्तिदा है ।।

यहाँ खामोशियों में शोर जिंदा ।

गमे इज़हार पर पहरा लगा है ।।

छुपा बैठे वो दिल की आग कैसे।

धुंआ घर से जहाँ शब भर उठा है ।।

नही समझा तुझे ऐ जिंदगी मैं ।

तू कोई जश्न है या हादसा है ।।

मिला है बावफा वह शख़्स मुझको ।

कहा जिसको गया था बेवफा है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on November 27, 2018 at 10:00pm — 4 Comments

चुनौती दे डाली,,,,,,

चुनौती दे डाली ....



खिड़कियों के पर्दों ने

रोशनी के प्रभुत्व को

चुनौती दे डाली

जुगनुओं की चमक ने

अंधेरों के प्रभुत्व को

चुनौती दे डाली

अंतस की पीड़ा ने

आँखों के सैलाबों को

चुनौती दे डाली,........

विरह के अभयारण्य ने

स्मृतियों के भंडारण को

चुनौती दे डाली

बिस्तर की सलवटों ने

क्षणों की चाल को

चुनौती दे डाली

जीत के आसमान को

हार की ज़मीन ने

चुनौती दे…

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Added by Sushil Sarna on November 27, 2018 at 7:28pm — 6 Comments

मुस्कराहट आप से है -ग़ज़ल

मापनी २१२२ २१२२ २१२२ २१२ 

द्वार पर जो दिख रही सारी सजावट आप से है

आज अधरों पर हमारे मुस्कुराहट आप से है  

 

आपकी आमद से मौसम हो गया कितना सुहाना

जो हुई महसूस गरमी में तरावट आप से है

 

यूँ तो मेरी जिन्दगी…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on November 27, 2018 at 9:08am — 9 Comments

टूटा पत्ता दरख़्त का हूँ मैं

ग़ज़ल

इक ठिकाना तलाशता हूँ मैं ।

टूटा पत्ता दरख़्त का हूँ मैं ।।

कुछ तो मुझको पढा करो यारो ।

वक्त का एक फ़लसफ़ा हूँ मैं ।।

हैसियत पूछते हैं क्यूं साहब ।

बेख़ुदी में बहुत लुटा हूँ मैं ।।

इश्क़ की बात आप मत करिए ।

रफ़्ता रफ़्ता सँभल चुका हूँ मैं ।।

चाँद इक दिन उतर के आएगा ।

एक मुद्दत से जागता हूँ मैं ।।

खेलिए मुझसे पर सँभल के जरा।

इक खिलौना सा…

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Added by Naveen Mani Tripathi on November 26, 2018 at 11:33pm — 10 Comments

कविता - कौओं के पितृ स्थान

कौए अब अपने पितृ स्थान के लिए

स्कूल के बच्चों के हिस्से में आई

अनुदान राशि को हड़प ले गये ।

और अपनी श्रद्धा प्रकट करने के लिए

राजनीति को यूँ अपनाया

कि विधायक, सरपंच मजबूर हैं

सरकारी सहायता को पितृों तक भेजने के लिए ।

अन्य पक्षियों को छोड़कर

केवल कौओं की वोटो की गिनती

के मायने जियादा हैं ।



शेर भी लाचार हैं

वे अब शिकार नहीं करते

वे शिकार हो जाते हैं ।

शेरों को हमेशा

कौओं ने सरकश में नचवाया…

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Added by सूबे सिंह सुजान on November 26, 2018 at 11:00pm — 6 Comments

नया विकल्प ...

नया विकल्प ...

हंसी आती है

जब देखता हूँ

रात को दिन कहने वाले लोग

जुगनुओं की तलाश में

भटकते हैं

हंसी आती है

जब लोग नेता और अभिनेता की तासीर को

अलग-अलग मानते हैं

उनकी जीत के बाद

स्वयं हार जाते हैं

हंसी आती है

उन लोगों पर

जो मात्र हाथों में

किसी पार्टी का परचम उठाकर

स्वयं का अस्तित्व भूल जाते हैं

भूल जाते हैं कि वो

मात्र शोर का माध्यम हैं,

और कुछ नहीं

हंसी आती है…

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Added by Sushil Sarna on November 26, 2018 at 6:45pm — 3 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ७४

२१२२ ११२२ ११२२ २२/ १२२

मैं हूँ साजिद, मेरा मस्जूद मगर जाने ना

घर में साकिन हैं कई, सबको तो घर जाने ना //१

ख़ुद ही पोशीदा है तू ख़ल्क़ में तो क्या शिकवा

कोई क्या आए तेरे दर पे अगर जाने ना //२

दोनों टकराती हैं हर रोज़ सरे बामे उफ़ुक़

मोजिज़ा है कि कभी शब को सहर जाने ना //३

ये अलग बात है तू मुझपे नज़र फ़रमा नहीं

वरना क्या बात है जो तेरी नज़र जाने ना //४

तू मुदावा है मेरे गम का तुझे क्या मालूम

बात यूँ है कि…

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Added by राज़ नवादवी on November 26, 2018 at 12:04pm — 11 Comments

सुना ठीक है सिरफिरा आदमी हूँ- ग़ज़ल

122 122 122 122

सुना ठीक है सिरफिरा आदमी हूँ

उसूलों का पाला हुआ आदमी हूँ।

हमेशा ही जिसने सही बेवफ़ाई

जमाने में वो बावफ़ा आदमी हूँ।

कि मौजें मुझे दूर खुद से करेंगी

अभी मैं भँवर में फँसा आदमी हूँ।

डिगायेगी कैसे मुझे कोई आफ़त

मैं चट्टान जैसा खड़ा आदमी हूँ।

रहा साथ जिसके जरूरत में अक्सर

कहा है उसी ने बुरा आदमी…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 26, 2018 at 10:00am — 9 Comments

वह धरती कब की छूट गयी

जहाँ सपने थे

लोग अपने थे

वह धरती कब की छूट गयी

भीड़ थी पर ठावँ थी

धूप थी संग छावं थी

वह धरती कब की छूट गयी

जनक थे जननी थी

बसेरा था रहनी थी

वह धरती कब की छूट गयी

जो छूट गये

जो रूठ गये

वही आस पास है

यह कैसे एहसास है ?

.

मौलिक व अप्रकाशित"

Added by amita tiwari on November 25, 2018 at 8:30pm — 3 Comments

माँ शारदा का वरदान है प्यार

माँ शारदा का वरदान  है प्यार

[ श्री रामकृष्ण अस्पताल सेवाश्रम, कंखल (उत्तरखंड, भारत) से ]

ऐसी ही ...  प्रिय

लेटी रहो न मेरे घुटने पर सर टेके

भावनायों के निर्जन समुद्र तट पर आज

बहें हैं आँसू बहुत मध्य-रात्रि के अंधेरे में

कभी अनेपक्षित बह्ते कभी रुक्ते-रुकते

पहले इससे कि तुम्हारा  एक और आँसू

मेरे अस्तित्व पर टपक कर मुझको

नि:स्तब्ध,…

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Added by vijay nikore on November 25, 2018 at 7:16pm — 8 Comments

अपना तो फर्ज एक है तदबीर कर गुजर - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर" ( गजल )

221   2121   1221   212 

तुमको खबर है खूब खतावार कौन है

दो सोच कर सजाएँ गुनहगार कौन है।१।



यारो सिवा वो बात के करता ही कुछ नहीं

हाकिम से इसके बाद भी बे-ज़ार कौन है।२।



हम तो रहे जहीन कि जिस्मों पे मर मिटे

पहली नज़र का बोल तेरा प्यार कौन है।३।



सबसे बड़ा सबूत है मुंसिफ का फैसला

खाके कसम वफा की वफादार कौन है।४।



अपना तो फर्ज एक है तदबीर कर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 25, 2018 at 1:14pm — 6 Comments

गज़ल -9 (मां जिधर भी नज़र उठाती है, वो ज़मीं हँसती मुस्कुराती है)

2122 1212 22/112



माँ

***

माँ जिधर भी नज़र उठाती है

वो ज़मीं हँसती मुस्कुराती है//१

हर बला दूर ही ठहर जाए

माँ उसे डांट जब लगाती है //२

माँ के कदमों से दूर जाए जो

ज़िन्दगी फिर उसे रुलाती है //३

पास जब मौत आए बच्चों के

तब तो माँ जां पे खेल जाती है //४

जब कभी भूल हमसे हो जाए

माँ ही दामन में तब छुपाती है //५

भूख के साये में न हों बच्चे

खुद को माँ धूप में सुखाती है…

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Added by क़मर जौनपुरी on November 25, 2018 at 1:08pm — 7 Comments

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