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ग़ज़ल - गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

              ग़ज़ल 

गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

अब सुने कौन गणतंत्र की सिसकियाँ

इसलिए आज दुर्दिन पड़ा देखना

हम रहे करते बस गल्तियाँ गल्तियाँ

चील चिड़ियाँ सभी खत्म होने लगीं

बस रही हर जगह बस्तियाँ बस्तियाँ

पशु पक्षी जितने थे, उतने वाहन हुए

भावना खत्म करती हैं तकनीकियाँ

कम दिनों के लिए होते हैं वलवले

शांत हो जाएंगी कल यही आँधियाँ

अब न इंसानियत की हवा लग…

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Added by सूबे सिंह सुजान on January 24, 2019 at 9:32pm — 7 Comments

अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर - एक कुण्डलिया छंद -

बेटी से परिवार है, बेटी से संसार।
बेटी है माता-बहिन, बेटी ही है प्यार।।
बेटी ही है प्यार, यही लछमी कहलाती।
वहीं बनाती स्वर्ग,जहाँ ये जिस घर जाती।।
सदा निभाती फर्ज, न होने देती हेटी।
पीहर सँग ससुराल, सदा महकाती बेटी।।
(मौलिक व आप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**

Added by Hariom Shrivastava on January 24, 2019 at 8:11pm — 2 Comments

किसी रिश्ते में हों गर तल्ख़ियाँ हरगिज़ नहीं बेहतर   (१७ )

किसी रिश्ते में हों गर तल्ख़ियाँ हरगिज़ नहीं बेहतर 

शजर पर गर हैं सूखी पत्तियाँ हरगिज़ नहीं बेहतर 

**

बसाने को बसा लो ज़ुर्म की अपनी हसीं दुनिया

मगर बदनाम जो हों बस्तियाँ हरगिज़ नहीं बेहतर 

***

नुमाइश कर रहे हो जिस्म की अच्छी नज़र चाहो

हुज़ूर ऐसी कभी ख़ुशफ़हमियाँ हरगिज़ नहीं बेहतर 

***

मुसीबत, मुश्किलें, आफ़ात, चिंता और ग़म भी संग

घरोंदे में घुसी ये मकड़ियाँ हरगिज़ नहीं बेहतर 

***

नहीं फ़र्ज़न्द को हासिल अगर कुछ काम थोड़े दिन  

मिलें  उसको…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 24, 2019 at 12:00pm — 12 Comments

गज़ल ( इश्क़ उम्मीद है)

2122, 1122, 1122, 22/112

सुर्ख़रू शोख़ बहारों सा चहक जाओगे

इश्क़ के बाग़ में आओ तो गमक जाओगे

गर इरादे हुए हैं बर्फ़ से ख़ामोश तो क्या

गर्मी-ए-इश्क़ में आ जाओ दहक जाओगे

इश्क़ की ताब का अंदाज़ा भला है तुमको

इसकी ज़द में ही फ़क़त आओ लहक जाओगे

रौनक-ए-इश्क़ की ताक़त को न ललकारो तुम

ख़ूब ज़ाहिद हो मगर तुम भी बहक जाओगे

इश्क़ ख़ुश्बू है इसे बांधने की ज़िद न करो

इसमें घुल जाओ तो दुनिया में महक जाओगे

इश्क़ के रंग व…

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Added by क़मर जौनपुरी on January 23, 2019 at 5:30pm — 7 Comments

तुम्हारी अगुवानी में

तुम्हारी अगुवानी में.... 

ज़रा ठहरो

मुझे पहले

तुम्हारी अगुवानी में

इन कमरों की बंद खिड़कियों को

खोल लेने दो

जब से तुम गए हो

हवा ने भी आना छोड़ दिया

अब तुम आये हो तो

साँसों को

ज़िंदगी का मतलब

समझ आया है

ज़रा ठहरो

पहले मुझे

तुम्हारी अगुवानी में

मन की दीवारों से

सारी उलझनों के जाले

उतार लेने दो

ताकि तुम्हें

बाहर जैसी खुली हवा का

अहसास दिला सकूं

इन घर की दीवारों…

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Added by Sushil Sarna on January 23, 2019 at 2:06pm — 6 Comments

ग़ज़ल गांव

2122 2122 2122

.
गांव भी अब तो शहर बनने लगा है
प्यार औ सद्भाव भी घटने लगा है

खुल गई है खूब शिक्षा की दुकानें
ज्ञान भी अब दाम पर बिकने लगा है

हो गये है लोग बैरी अब यहां भी
खून सड़कों पर बहुत बहने लगा है

गांव के हर मोड़ पर टकराव है अब
खेत औ खलियान तक जलने लगा है

सोच ’‘मेठानी‘’ हुआ है, क्या यहां पर
जो कभी बोया वही उगने लगा है


( मौलिक एवं अप्रकाशित )
- दयाराम मेठानी

Added by Dayaram Methani on January 23, 2019 at 12:00pm — 21 Comments

गज़ल - दिगंबर नासवा

मखमली से फूल नाज़ुक पत्तियों को रख दिया

शाम होते ही दरीचे पर दियों को रख दिया

 

लौट के आया तो टूटी चूड़ियों को रख दिया

वक़्त ने कुछ अनकही मजबूरियों को रख दिया

 

आंसुओं से तर-बतर तकिये रहे चुप देर तक  

सलवटों ने चीखती खामोशियों को रख दिया

 

छोड़ना था गाँव जब रोज़ी कमाने के लिए

माँ ने बचपन में सुनाई लोरियों को रख दिया 

 

भीड़ में लोगों की दिन भर हँस के बतियाती रही 

रास्ते पर कब न जाने सिसकियों को रख…

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Added by दिगंबर नासवा on January 23, 2019 at 9:30am — 13 Comments

कुछ हाइकु (23 जनवरी तिथि पर)

कुछ हाइकु :



1-

तेजस्वी नेता

ख़ून दो, आज़ादी लो

सदी-आह्वान

2-

नेताजी बोस

तेईस जनवरी

क्रांति उद्भव

3-

सच्चाई, फ़र्ज़

जीवन-बलिदान

बोस-आह्वान

4-

शहीद-मौत

स्वतंत्रता-मार्ग

इच्छा-शक्ति से

5-

शक्ति-संचार

असली राष्ट्रवाद

बोस-चिंतन

6-



नेताजी बोस

सैनिक आध्यात्मिक

भक्ति…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 22, 2019 at 8:06pm — 4 Comments

गद्दार बन गये जो ढब आदर किया गया - गजल

२२१/२१२१/ २२२/१२१२



पाषाण पूजने को जब अन्दर किया गया

हर एक देवता को तब पत्थर किया गया।१।



उनके वतन से थी अधिक कुर्सी निगाह में

दूश्मन को इसके वास्ते सहचर किया गया।२।



यूँ  तो  चुनाव  जीतने  बातें  विकास  की

पर हाल देश का सदा कमतर किया गया।३।



शासक कमीन दे गये हमको वफा का दंड

गद्दार बन गये  जो  ढब  आदर किया गया।४।



जन की भलाई में बहुत करना था काम…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 22, 2019 at 8:05pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक रदीफ़ पर दो ग़ज़लें "छत पर " (गज़ल राज )

१.हास्य 

उठाई है़ किसने ये दीवार छत पर 

अब आएगा कैसे  मेरा यार छत पर 



अगर उसके वालिद  का ये काम होगा 

बिछा दूँगा बिजली का मैं तार छत पर



बताकर तू पढ़ती  ख़बर नौकरी की  

चली आना लेकर तू अख़बार छत पर



सुखाने को पापड़ या चटनी मुरब्बा 

करा मुझको अपना तू दीदार छत पर



गया उसके घर पे जो छुपते छुपाते 

बहुत ही कुटा मैं पड़ी मार छत पर



न तारे दिखे फ़िर  हुआ चाँद ग़ायब 

सुनी हड्डियों की जो झंकार छत पर…

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Added by rajesh kumari on January 22, 2019 at 11:45am — 13 Comments

एक ग़ज़ल मनोज अहसास

कहते हैं देख लेता है नजरों के पार तू

मेरी तरफ भी देख जरा एक बार तू

हर बार मान लेता हूं तेरी रजा को मैं

हर बार तोड़ता है मेरा एतबार तू

करने से मेरे कुछ नहीं होना अगर तो

अहसासे बेनियाजी दे मुझ में उतार तू

सूनी पड़ी है तेरे बिना दिल की महफिलें

दो पल तो इस दयार में आकर गुजार तू

मेरी रगों में भर गई है कितनी उलझनें

है थोड़ा सा चैन दे भी दे मुझको उधार तू

मेरी पुकार में नहीं है असलियत कोई

या फिर…

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Added by मनोज अहसास on January 21, 2019 at 10:05pm — 4 Comments

ग़ज़ल

1212     1122     1212      22

क़ज़ा के वास्ते ये इंतिज़ाम किसका है ।

तेरे  दयार  में  जीना  हराम किसका  है ।।

उसे है ख़ास ज़रूरत  जरा पता करिए ।

बड़े  सलीके  से  आया  सलाम किसका  है ।।

दिखे हैं रिन्द बहुत तिश्नगी के साथ वहाँ ।

कोई बताए गली में मुकाम किसका है ।।

है जीतना तो ख़यालात ऐब…

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Added by Naveen Mani Tripathi on January 21, 2019 at 8:30pm — 3 Comments

तीन क्षणिकाएं :

तीन क्षणिकाएं :

बन जाती हैं

बूँदें

घास पर

ओस की

जब कभी

रोता है मयंक

कौमुदी के वियोग में

.............................

एक भारहीन अतीत

हृदय कलश में

पिउनी पुष्प सा

सुवासित होता रहा

मैं

देर तक

समर्पित रही

अधर तटों के

क्षितिज पर

.........................

जीत दम्भ की

प्राचीर को तोड़ते

जब

दोनों हार गए

तो

प्रचीर भी

हार गई

जीत की

स्वीकार पलों…

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Added by Sushil Sarna on January 21, 2019 at 7:13pm — 4 Comments

'गठरी, छतरियां और वह' (लघुकथा)

वह नंगा हो चुका था। फिर भी इतरा रहा था। घमंड का भूत अब भी सवार था।

"आयेगा.. वह आयेगा, मेरी ही छत्रछाया में!" विदेशी धरती, देशी राजनीति, देशी-विदेशी उद्योग-जगत और देशी-विदेशी ग्लैमर-जगत की छतरियां बारी-बारी से अपने अनुभव आधारित दावे पेश करने लगीं।

"तुम सबने इसे नंगा तो कर ही दिया है! न ईमान रहा इसके पास, न ही धर्म! तन अंदर से खोखला कर लिया है इसने और मन.. मन का धन कर रहा है इसका!" उसके तन को सहारा देती रीढ़ की हड्डी के ऊपरी यानि कंधों वाले भाग पर बोझिल गठरी ने…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 20, 2019 at 11:00pm — 6 Comments

बने हमसफ़र तेरी ज़ीस्त में कोई मेहरबाँ वो तलाश कर (१६)

11212 *4

बने हमसफ़र तेरी ज़ीस्त में कोई मेहरबाँ वो तलाश कर

जो हयात भर तेरा साथ दे कोई जान-ए-जाँ वो तलाश कर

***

तेरे सुर में सुर जो मिला सके तेरे ग़म में साथ निभा सके

तेरे संग ख़ुशियाँ मना सके कोई हमज़बाँ वो तलाश कर

***

कहीं डूब जाये न दरमियाँ कभी सुन के बह्र की धमकियाँ

चले नाव ठीक से ज़ीस्त की कोई बादबाँ वो तलाश कर

***

भला लुत्फ़ क्या मिले प्यार में नहीं गर अना रहे यार में

जो अदा से जानता रूठना कोई सरगिराँ वो तलाश कर

***

ये…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 20, 2019 at 3:00pm — 2 Comments

वही उग आऊंगा मैं भी , अनाजों की तरह ..

बह्र 

1222-1222-1222-12

चलो हमदर्द बन जाओ, ख़यालों की तरह।।

कोई खुश्बू ही बिखराओ गुलाबों की तरह।।

बहुत थक सा गया हूँ जिंदगी से खेल कर।

कजा आगोश में भर लो दुशालों की तरह।।

मुझे बंजर में नफरत से कहीं भी फेंक दो।

वही उग आऊंगा मैं भी, अनाजों की तरहा।।

मुझे पढ़ना अगर चाहो तो पढ़ लेना यूँ ही ।

हुँ यू के जी के बस्ते में, किताबों की तरह।।



मेरी तुलना न कर उल्फ़त, गुलों की बस्ती' से।

मैं काफिर मैकदे में…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on January 20, 2019 at 7:00am — 1 Comment

एक ग़ज़ल मनोज अहसास

एक ताज़ा ग़ज़ल

1222    1222     1222    1222

उदासी घिर के आई है चलो फिर कुछ नया कह दें

पलक को बेवफा कह दें या पैसे को खुदा कह दें

यहाँ से टूट कर जुड़ना नहीं मुमकिन मगर फिर भी

चलो एक बार फिर से आंसुओं को अलविदा कह दें

समंदर सी बड़ी नाकामियां है सामने अपने

ये सोचा है कि अपना नाम मिट्टी पर लिखा कह दें

तुम्हारे आने की उम्मीद की भी क्या जरूरत है

हमें ही लोग शायद कुछ दिनों में जा चुका कह दें

ये धड़कन…

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Added by मनोज अहसास on January 19, 2019 at 10:39pm — 4 Comments

गज़ल

122 122 122 122

ग़ज़ल

****

है दुनिया में कितनी रवानी न पूछो

महकती है कितनी कहानी न पूछो

इसे चाँद के पार जाना था मिलने

कहाँ रह गई ज़िंदगानी न पूछो

रहा दर बदर आशिक़ी का मैं मारा

गई बीत कैसे जवानी न पूछो

तेरे इश्क़ में मैंने गोता लगाया

मिली मुझको क्या क्या निशानी न पूछो

मुहब्बत की रस्में निभाते निभाते

रहा चश्म में कितना पानी न पूछो

कभी ग़म के बादल कभी सर्द आहें

पड़ीं कितनी बातें भुलानी न…

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Added by क़मर जौनपुरी on January 19, 2019 at 4:07pm — 8 Comments

एक बोझ भरी गठरी: लघुकथा

एक तो पिछला कर्ज ही अभी तक माफ नहीं हुआ था उस पर इस बार फिर फसल के चौपट होने और साहूकार के ब्याज की दोहरी मार उसके लिए असहनीय थी, घर में सभी को कुपोषण और बीमारी ने घेर रखा था। इस बार ना तो मदद को सरकार थी, ना ही लोग।

आखिरकार उसने शहर जाकर मजदूरी या कुछ और कर कमाने का फैसला लिया और जब वह लगभग नग्न बदन, एक बोझ भरी गठरी जिसमें कुछ सुखी रोटी और प्याज थी, लेकर , शहर के चौराहे नुमा पुल पर पहुंचा तो उसने पाया की उसके लिए सभी रास्ते बंद हैं और अवसाद ग्रस्त होकर उसने उसी पुल से नीचे…

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Added by Hari Prakash Dubey on January 19, 2019 at 12:30pm — 3 Comments

झूठ फैलाते हैं अक़्सर जो तक़ारीर के साथ (१५)

(२१२२ ११२२ ११२२ २२/११२ )

झूठ फैलाते हैं अक़्सर जो तक़ारीर के साथ

खेल करते हैं वतन की नई तामीर के साथ 

***

ख़्वाब देखोगे न तो खाक़ मुकम्मल होंगे 

ये तो पैवस्त* हुआ करते हैं ताबीर के साथ 

***

जो बना सकते नहीं चन्द निशानात कभी 

हैफ़* क्या हश्र करेंगे वही तस्वीर के साथ 

***

ग़म भी हमराह ख़ुशी के नहीं रहते,जैसे

कोई शमशीर कहाँ रहती है शमशीर के…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 19, 2019 at 2:30am — 8 Comments

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