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अफ़सुर्दा सा लम्हा ....



अफ़सुर्दा सा लम्हा ....

अफ़सुर्दा से लम्हों में

लफ़्ज़ भी उदास हो जाते हैं

बीते हुए लम्हों की लाशें

अपने शानों पर लिए लिए

चीखते हैं

मगर खामोशी की क़बा में

उनकी आवाज़ें

घुट के रह जाती हैं

रोज़ो-शब्

उनके ख़्यालों से

गुफ़्तगू होती है

लफ़्ज़ कसमसाते हैं

चश्म नम होती है

सैलाब लफ़्ज़ों का

हर तरफ है लेकिन

दर्द को तसल्ली

कहाँ होती है



लफ़्ज़ों के शह्र में

अफसानों की…

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Added by Sushil Sarna on August 27, 2018 at 1:30pm — 5 Comments

कोई देकर गया था इक खुशी यारो - गजल (लक्ष्मण धामी "मुसाफिर" )

१२२२/१२२२/१२२२

मुहब्बत भी कहानी हो गयी हमसे

बहुत बद ये जवानी हो गयी हमसे।१।



कोई देकर गया था इक खुशी यारो

कहीं गुम वो निशानी हो गयी हमसे।२।



जमाना सारा ही  दुश्मन हुआ है यूँ

जरा सी सच बयानी हो गयी हमसे।३।



कसक सी दिल में उठ्ठी है कहीं यारो

किसी से बद जबानी हो गयी हमसे।४।



भला यूँ कम कहाँ हम थे मगर अब तो

ये दुनिया  भी  सयानी  हो …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 27, 2018 at 9:55am — 10 Comments

रिश्तों की डोर [लघुकथा]

दरवाजे की घंटी सुन,  दरवाजा मेड शीला ने  खोला तो अपरिचित समझ मुझे आवाज लगाने पर मैं देखने गई तो सामने सलिल भैया और शालिनी भाभी को  देख हतप्रद रह गई.मुझे इस तरह देख,भैया कहने लगे- 'भूल गई क्या ?मैं तुम्हारा भाई .......

मैं अपने को संभालते हुए ,उन्हें  इशारे से अंदर आने को कह,कहने लगी- 'अरे नहीं भैया,आपको अचानक इतने सालो बाद देखा ....बस और कुछ नहीं।'

भाभी मेरी मनोस्थिति  समझ भैया को डाटने वाले लहजे में कहा - 'अब ,उसे झिलाना छोडो'।और मुझे रसोई में ले जाकर खाना बनाने में हाथ बटाँने…

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Added by babitagupta on August 26, 2018 at 9:42pm — 8 Comments

"फीका तिलक, मीठी राखियां" (लघुकथा)

"आज सही मौका है इसे सबक़ सिखाने का! बड़ा आया राखी बंधवाने वाला हमारी बिरादरी की लड़की से!"

"हां, ये वही तो है न 'याक़ूब', जो कल तेरी गाय के बछड़े की पूंछ पकड़ कर मज़े ले रहा था अपने दोस्तों के बीच! .. मारो साले को एक शॉट इसी खिलौना बंदूक से! .. और मैं फैंकता हूं ये पत्थर! आज यह राखी न बंधवा पाये अपनी पड़ोसन सविता से!"

निशाने साध कर दोनों ने याक़ूब पर वार किये ही थे कि तभी पास के मंदिर से घंटी की आवाज़ें और एक मस्जिद से अज़ान सुनाई दी! उन दोनों दोस्तों के क़दम वहीं थम गये। कुछ पल बाद देखा तो…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 26, 2018 at 6:31pm — 7 Comments

राखी पर कुछ कुण्डलिया

कच्चे धागों से जुड़ा, रक्षाबंधन पर्व

बहना बाँधे डोर जब, भैया करता गर्व

भैया करता गर्व, नेग बहना को देकर

प्रण जीवन रक्षार्थ, वचन खुश बहना लेकर

रेशम बाँधे प्रीत, सनातन रिश्ते सच्चे

बाँटे खुशी अपार, भले हैं धागे कच्चे।1।

सावन में बदरा घिरे, बहने लगी बयार

प्यार बाँटने आ गया, राखी का त्योहार

राखी का त्योहार, सजीं चहुओर दुकानें

ट्रांजिस्टर पर खूब, बजें राखी के गाने

जात धर्म से दूर, भाव है कितना पावन

बँधे स्नेह की डोर, मास आये…

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Added by नाथ सोनांचली on August 26, 2018 at 1:00pm — 19 Comments

राखी के पावन त्यौहार पर कुछ दोहे

राखी के पावन त्यौहार पर कुछ दोहे :



राखी का त्यौहार है, बहना की मनुहार।

इक -इक धागा प्यार का, रिश्तों का उपहार।।



'भाई बहना से सदा', माँगे उसका प्यार।

राखी पावन प्रेम के ,बंधन का आधार।।



बाँध जरा तू हाथ पर, बहना अपना प्यार।

दूँगा तुझको आज वो, जो मांगे उपहार।।

राखी है इस हाथ पर, बहना तेरी शान।

तेरे पावन प्यार पर, मुझको है अभिमान।।



सावन में सावन बहे, आँखों से सौ बार।

राखी पर परदेस से,'बहना भेजे…

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Added by Sushil Sarna on August 26, 2018 at 1:00pm — 13 Comments

राखी

राखी

राखी धागा प्रेम का, कर लेना स्वीकार

केवल ये धागा नहीं,जनम जनम का प्यार ll

बहना तेरी खुश रहे,ऐसा करना काम

मान धर्म रखना सभी, होवे ना बदनाम ll

रिश्ता ये अनमोल है,समझो इसका मोल

पावन रिश्ते को कभी, पैसे से ना तोल ll

प्रेम झलकता एक दिन,फिर करते तकरार

दुख सहती बहना अगर, ये कैसा है प्यार ll

दिल से बहना को सभी, देना स्नेह दुलार

याद करे बहना कभी,मत करना इनकार…

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Added by डॉ छोटेलाल सिंह on August 26, 2018 at 12:38pm — 10 Comments

"ऊपरवाले, नीचेवाले" (लघुकथा)

"अब हमसें और न हो पेहे! दो-दो बोरे गेहूं तुम दोनों भाइयों और दो बोरे तुमाई बहना को भिजवा दये हते! अब मुंह फाड़के फिर आ गये गांव घूमवे के बहाने!"

"जे मत भूलो कि हमने अपने हिस्से के बड़े-बड़े बढ़िया खेत तुमें सस्ते में बेच दये हते! फसलों के ह़िस्से बिना मांगे हमें मिलते रहना चईये न! बड़े भाई हैं हम तुमाये; तुमाओ परिवार अकेले इते मजे करत रेहे का!"

"कौन ने कई हती कि अगल-बगल के शहरन में बस जाओ! पैसों से तो तुम औरन के मज़े हो रये हैं! हमारी मिहनत और हालात तुम कभऊं न समझ पेहो! सारी फसल तुम…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 26, 2018 at 12:00pm — 4 Comments

"वो रात फिर कभी नहीं आयेगी!" (लघुकथा)

भारी बारिश हो रही थी। बगीचे की टीन-शेड के नीचे बच्चे भीगे मौसम के साथ झूले के मज़े ले रहे थे। गरम पकोड़ों का लुत्फ़ लेते हुए उनके अब्बूजान अपने पुराने से अज़ीज़ ट्रांजिस्टर पर मुल्क की चुनावी राजनीतिक हलचलों, बाढ़ों के क़हर और तबाहियों के गरम समाचार सुन रहे थे । बच्चों की अम्मीजान भी समाचारों को झेल रहीं थीं। तभी बड़ी बेटी बोली - "अब्बू! ख़ुदा न करे! अगर नेताओं और अंग्रेज़ों के 'रिमोट कंट्रोल' से '1947 की रात' जबरन दुबारा रिपीट की गई और मुसलमानों को अलग किसी हिस्से में हांका गया, तो आप कहां तशरीफ़ ले…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 26, 2018 at 5:00am — 4 Comments

एक रंग है खून

हिन्दू - मुस्लिम का कहें, एक रंग है खून.

हिन्दू हिन्दू में फरक, क्यों करता कानून.

सबके दो हैं हाथ, पाँव भी सबके दो हैं.

नाक सभी के एक, सूँघते जिससे वो हैं.

नयन जिसे भी मिले,जगत के दर्शन करता.

कान और मुँह से, सुनता - वर्णन करता.

सात दिन मिले सभी को, हफ्ते में एक समान.

विद्यालय में गुरु सभी को, देता ज्ञान समान.

अन्न नहीं करता देने में, ताकत कोई भेद.

मनु के पुत्र सभी मनुष्य हैं, कहते सारे वेद.

सूरज सबके लिए चमकता, सबको राह दिखाता.

श्वांस सभी पवन से…

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Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on August 26, 2018 at 1:45am — 5 Comments

जिसे भी दिल मे बसाया वो चीर कर के गया--

1212 1122 1212 112

मैं किसका नाम गिनाऊँ जो पीर भर केे गया
जिसे भी दिल मे बसाया वो चीर कर के गया
किसी दीवार पे टाँगा हुआ आईना हूँ
निगाह जिसने मिलाई वही सँवर के गया
मेरी कथा भी किसी फल भरे शजर सी है
उसी ने चोट दी जो छाँव मेंं ठहर के गया
भला क्यूँ जाग रहा हूँ मैं रोज़ रातों से
न पूछियेगा कभी कौन नींद हर के गया
ग़ुरूर क्यूँ न करे खुद पे जबकि पंकज से
मिला है जो भी…
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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 26, 2018 at 1:00am — 15 Comments

ग़ज़ल (हर धड़कन पर इक आहट)

हर धड़कन पर इक आहट,
सोचूँ तो हो घबराहट..

यारों उससे पूंछो तो,
क्यूँ है मुझसे उकताहट..

लहजा उसका है शीरीं,
आँखें उसकी कड़वाहट..

मुझसे इतनी दूरी क्यूँ,
हर लम्हा है झुंझलाहट..

उससे हाले दिल कह कर,
देखी उसकी तिर्याहट..!!

मौलिक एवं अप्रकाशित।

Added by Zohaib Ambar on August 25, 2018 at 8:31pm — 3 Comments

तृप्ति ....

तृप्ति ....

मेरा कहाँ था
वो पल
जो बीत गया
वक्त के साथ
तुम्हारा आकर्षण भी
रीत गया
यादों के धागों पर
मिलते रहे
अतृप्त तृप्ति की
अव्यक्त अभियक्ति के साथ
कहीं तुम
कहीं हम

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on August 25, 2018 at 1:20pm — 5 Comments

अनुसरण- लघुकथा –

अनुसरण- लघुकथा –

माँ भारती अपनी संध्याकालीन पूजा अर्चना से निवृत होकर जैसे ही प्रांगण में आयीं। उन्होंने देखा कि उनके बच्चे दो गुट में बंटे हुए एक दूसरे पर तमंचों से गोलियाँ दाग रहे थे। एक गुट हर हर महादेव के जयकारे लगा रहा था और दूसरा गुट अल्ला हो अकबर के नारे लगा रहा था। माँ भारती स्तब्ध रह गयीं।

उन्होंने तुरंत बच्चों को रोका,"बच्चो, यह क्या कर रहे हो तुम लोग"?

"माँ, हम लोग हिंदू मुसलमान खेल रहे हैं"।

"पर यह खेल कौन सा है"?

"यह हिंदू मुस्लिम दंगा…

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Added by TEJ VEER SINGH on August 25, 2018 at 12:08pm — 8 Comments

निकलेगा आफ़ताब इसी आसमान से (ग़ज़ल)

221   2121  1221  212

क़ीमत ज़बान की है जहाँ बढ़के जान से

है वास्ता हमारा उसी ख़ानदान से

चढ़ना है गर शिखर पे, रखो पाँव ध्यान से

खाई में जा गिरोगे जो फिसले ढलान से

पल - पल झुलस रही है ज़मीं तापमान से

मुकरे हैं सारे अब्र अब अपनी ज़बान से

काली घटाएँ रास्ता रोकेंगी कब तलक?

निकलेगा आफ़ताब इसी आसमान से

ये दौलतों के ढेर मुबारक तुम्हीं को हों

हम जी रहे हैं अपनी फ़क़ीरी में शान से

क्या-क्या न हमसे छीन…

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Added by जयनित कुमार मेहता on August 25, 2018 at 11:03am — 8 Comments

गजल -सब कुछ तो है सच्चाई में

मस्त हुए वे प्रभुताई में

देश झुलसता महँगाई में

 

घास तलक उगना हो मुश्किल

क्या रक्खा उस ऊँचाई में

 

फटी…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on August 25, 2018 at 10:00am — 6 Comments

सुनो, नारी कभी नग्न नहीं होती है और सुनो, नारी कभी नहीं रोती है

सुनो, नारी कभी नग्न नहीं होती है

और सुनो, नारी कभी नहीं रोती है

नारी कभी नग्न नहीं होती

नग्न होती हैं ;

हमारी मातायें,

हमारी बहनें,

हमारी पत्नी,

हमारी बेटियां,

हमारी पुत्र-वधुयें,

हमारी विवशताएं

नारी कभी नहीं रोती है-

रोती हैं ;

हमारी मातायें,

हमारी बहनें,

हमारी पत्नी,

हमारी बेटियां,

हमारी पुत्र-वधुयें,

हमारी विवशताएं

फिर…

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Added by SudhenduOjha on August 24, 2018 at 6:30pm — 9 Comments

मिश्रित दोहे :

मिश्रित दोहे :

कड़वे बोलों से सदा, अपने होते दूर।

मीठी वाणी से बढ़ें, नज़दीकियाँ हुज़ूर।।

भानु किरण में काँच भी, हीरे से बन जाय।

हीरा तो अपनी चमक, तम में ही दिखलाय।।

घडी-घड़ी क्यों देखता, जीव घडी की चाल।

घड़ी गर्भ में ही छुपा, उसका अंतिम काल।।

हंस भेस में आजकल, कौआ बांटे ज्ञान।

पीतल सोना एक सा, कैसे हो पहचान।।

राखी का त्यौहार है बहना की मनुहार।

इक -इक धागे में बहिन, बाँधे अपना…

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Added by Sushil Sarna on August 24, 2018 at 4:15pm — 4 Comments

जीवन की धमाचौकड़ी

जीवन की धमाचौकड़ी में वो अस्त-व्यस्त था।

मिलता तो था सभी से मगर ज़्यादा व्यस्त था।।

 

हर चंद कोशिशें थीं  कि दीदार-ए-यार  हो।

पहरा मगर महल में बहुत ज़्यादा सख्त था।।

 

कहने को गर हैं भाई फिर मैदान-ए-जंग में।

गिरता था ज़मीन पे वो फिर किसका रक्त था।।

 

गर सब हैं बेगुनाह तो चल अब तू ही दे बता।

खंज़र मेरे शरीर में वो किसका पेवस्त था।।

 

जिससे भी जुड़ा रिश्ते में वो बंधता चला गया।

बस उसका ही मिजाज थोड़ा ज़्यादा…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on August 24, 2018 at 3:00pm — 1 Comment

वो बेबसी का कहर देखते हैं

वो बेबसी का
कहर देखते हैं
हम भी अपना
शहर देखते हैं

उतर गया है
पानी सैलाब का
मिट्टी से सना
घर देखते हैं

शर्म, हया, अना
कहाँ बची है
झुक के सभी
दीवारो-दर देखते हैं

घोल दी गई कुछ
इस तरह मिठास
ज़ुबाँ में ज़हर का
असर देखते हैं

इस उम्र न आओगे
लौट कर यहाँ
हम न जाने किसकी
डगर देखते हैं

मौलिक एवम अप्रकाशित
सुधेन्दु ओझा

Added by SudhenduOjha on August 24, 2018 at 12:20pm — 1 Comment

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