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कविता दिवस के दोहे

कविता कोरी कल्पना, कविता मन का रूप

कविता को कवि ले गया, जहाँ न पहुँचे धूप।१।



किसी फूल की पंखुड़ी, किसी कली का गाल

कविता  रंगत  प्यार की, नहीं शब्द  का जाल।२।



आँचल में रचती रही, सुख दुख कविता रोज

पड़ी जरूरत जब कभी, भरती सब में ओज।२।



भूखों की ले भूख जब, दुखियों की ले पीर

कविता सबकी तब भरे, आँखों में बस नीर।४।



युगयुग से भाये नहीं, कविता को अनुबंध

हवा  सरीखी  ये बहे, लिए  अनौखी  गंध।५।



कविता सुख की थाल तो, है…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 21, 2018 at 3:30pm — 12 Comments

लघुकथा--कठपुतली

एक राजनेता से पूछा -" आप तीखी बयानबाज़ी या शोला बयानी क्यों करते हैं ? इससे दूसरे वर्गों की भावनाएँ आहत है । देश का माहौल ख़राब होता है । अपनी ज़बान पर थोड़ा ताला क्यों नहीं लगाते ?"
राजनेता -" ज़बान पर ताला या नियंत्रण नहीं लगा सकता । मेरे हाथों में नहीं है ।"
मैंने पलटवार करते हुए पूछा -" फिर किसके हाथों में है ?"
" पार्टी आला कमान के ।" कुतिलता से मुस्कुराते हुए चल दिए ।

मौलिक एवं अप्रकाशित। ।

Added by Mohammed Arif on March 21, 2018 at 10:30am — 14 Comments

ग़ज़ल

22 22 22 22 22 2

पहले जैसी चेहरों पर मुस्कान कहाँ ।

बदला जब परिवेश वही इंसान कहाँ ।।

लोकतन्त्र में जात पात का विष पीकर।

जीना भारत मे है अब आसान कहाँ ।।

लूट गया है फिर कोई उसकी इज्जत ।

नेताओं का जनता पर है ध्यान कहाँ ।।

भूंख मौत तक ले आती जब इंसा को ।

बच पाता है उसमें तब ईमान कहाँ ।।

भा जाता है जिसको पिजरे का जीवन ।

उस तोते के हिस्से में सम्मान कहाँ ।।

दिल की खबरें अक्सर उसको…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 20, 2018 at 9:16pm — 7 Comments

शुतरमुर्ग(लघुकथा )

तीसरे माले पर वो करवट बदलते हैं तो खटिया चर्र-चर्र बोलती है |अंगोछा उठाकर पहले पसीना पोंछते है फिर उस से हवा करने लगते हैं |

“साsला पंखा भी ---“ बड़बड़ा कर बैठ जाते हैं और एक साँस में बोतल का शेष पानी गटक जाते हैं

“अब क्या ? अभी तो पूरी रात है |”

भिनभिनाते मच्छर को तड़ाक से मसल देते हैं |

दूसरे माले का टी.वी. सुनाई देता है – “तू मेरा मैं तेरी जाने सारा हिंदुस्तान |”

“बुढ़िया को क्या पड़ी थी पहले जाने की ---“

गला फिर सूखने लगा तो जोर–जोर से खाँसना…

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Added by somesh kumar on March 20, 2018 at 8:00pm — 9 Comments

क्या बताएं कि हमसे वह क्या ले गई

212 212 212 212

क्या बताऊँ कि वह हम से क्या ले गई ।

इक नज़र प्यार की बेवफ़ा ले गई ।।

इस तरह से अदाएं मचलने लगीं ।

तिश्नगी रूह तक वह जगा ले गई ।।



जब भी निकले हैं अल्फाज दिल से कभी ।

वह मुहब्बत ग़ज़ल में निभा ले गई ।।

एक दीवानगी सी हुई उनको तब ।

जब भी खुशबू तुम्हारी सबा ले गई ।।

बेकरारी में गुजरेंगी रातें वहां ।

तू मेरे इश्क़ का तजरिबा ले गयी ।।

एक दीवानगी सी हुई उनको तब ।

जब भी खुशबू तुम्हारी सबा ले…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 20, 2018 at 7:52pm — 5 Comments

रब से ....

रब से ....

वो लम्हा

कितना हसीं था

जब तुमने

हाथ उठा कर

मुझे

रब से माँगा था

मेरा

हर ख़्वाब

महक गया था

जब मैंने

अपनी आरज़ू को

तुम्हारी दुआओं में

महफ़ूज़ देखा था

मेरी बयाज़ें

जिनमें

हर लफ़्ज़

मेरी

तन्हाईयों से

सरगोशियों की दास्तान था

उन्हीं सरगोशियों की आग़ोश में

बेसुध सोया

मेरी उल्फ़त का

इक

अनदेखा अरमान था

सच

उस लम्हा

तुम मुझे…

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Added by Sushil Sarna on March 20, 2018 at 7:00pm — 7 Comments

इक तेरी तस्वीर और अंतिम तिरा वो फैसला..

बह्र 2122-2122-2122-212

.

दे रहा है ज़िस्म को जो दर कदम पर इक सिला।।

इक तेरी तस्वीर और अंतिम तिरा वो फैसला।।

खंडरों की शानों शौक़त दिन ब दिन बेहतर हुई।

जैसे पतझड़ कह रहा हो लौट मुझको मय पिला।।

बढ़ रहा हूँ कुछ कदम, हूँ कुछ कदम ठहरा हुआ।

   बाद तेरे टूटने जुड़ने लगा है हौसला।।

ना कभी ओझल हुआ था,ना ही ओझल हो कभी।

इसमें है अहसासे उलफत ,इश्क का जो भी मिला।।

चल चलें कुछ दूर पैदल, दो कदम मंजिल बची ।

दो कदम…

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Added by amod shrivastav (bindouri) on March 20, 2018 at 6:30pm — 8 Comments

गज़ल

212 212 212 212

शाख़ से टूट कर उड़ते पत्ते रहे ।

कुछ शजर जुल्म तूफाँ का सहते रहे ।।

घर हमारा रकीबों ने लूटा बहुत ।

और वह आईने में सँवरते रहे ।।

था तबस्सुम का अंदाज ही इस तरह ।

लोग कूंचे से उनके निकलते रहे ।।

देखकर जुल्फ को होश क्यों खो दिया ।

आपके तो इरादे बहकते रहे ।।

दिल लगाने से पहले तेरे हुस्न को ।

जागकर रात भर हम भी पढ़ते रहे ।।

यह मुहब्बत नहीं और क्या थी सनम ।

लफ्ज़ खामोश थे बात करते रहे ।।

कैसे कह दूं कि मुझसे…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 20, 2018 at 3:30pm — 2 Comments

हुस्न पर पर्दा रहा

2212 2212 2212 2212

ऐ चाँद अपनी बज़्म में तू रातभर छुपता रहा ।।

आखिर ख़ता क्या थी मेरी जो हुस्न पर पर्दा रहा ।।

कुछ आरजूएं थीं मेरी कुछ थी नफ़ासत हुस्न में ।

वो आशिकी का दौर था चेहरा कोई जँचता रहा ।।

मासूमियत पर दिल लुटा बैठा जो अपना फ़ख्र से ।

उस आदमी को देखिए अक्सर यहाँ तन्हा रहा ।।

रुकता नहीं है ये ज़माना लोग आगे बढ़ गए ।

मैं कुछ खयालातों को लेकर अब तलक ठहरा रहा ।।

था मुन्तजिर मैं आपके वादे को…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 20, 2018 at 3:00pm — 5 Comments

युद्ध और साम्राज्य 2

पुराने ज़माने की बात है ।

        दो पङोसी देशों मे आपस सहयोग बढने लगा था । कहते हैं कि जब सहयोग बढता है तो परस्पर विश्वास जनम लेता है और विश्वास से प्रेम । प्रेम से मेल जोल बढता है और मेलजोल से खुशहाली आती है । लेकिन खुशहाल प्रजा भलीभांति शासित नही होती । क्योंकि खुशहाल व्यक्ति सम्पन्न होता है और समपन्न ही शक्तिशाली । फिर शक्तिशाली तो शासन ही करता है , उसे शासित नही किया जा सकता । गडरिया तो भेड़ों  के झुंड को ही चराता है , कभी शेरों के झुंड को चराते किसी को देखा गया है क्या ?…

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Added by Mirza Hafiz Baig on March 20, 2018 at 1:00pm — 6 Comments

युद्ध और साम्राज्य

एक राजा के राज्य मे जब प्रजा का असंतोष चरम पर पहुंच गया और साम्राज्य की रक्षा करना असंभव लगने लगा तो वह जंगल मे महात्मा की शरण मे जा पहुंचा ।

       "महात्मा ! विकट परिस्थिति है । उपाय बताएं ।" राजा ने हाथ जोङकर महात्मा से विनती की ।

       "उपाय तो आसान है राजन ।" महात्मा ने कहा "तेरे राज्य की कौनसी सीमा सबसे ज्यादा अशांत है ?"

       "कोई नही ! मेरे तो सभी पङोसी राजाओं से मधुर संबंध है । इससे बाहरी आक्रमण से देश सुरक्षित रहता है ।" राजा ने उत्तर दिया ।

      …

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Added by Mirza Hafiz Baig on March 20, 2018 at 1:00pm — 9 Comments

बेबस-स्वर

बेबस-स्वर

जीवन  के  अन्त  में

चित्त के  नेपथ्य  में

सृजन की थकन

बेहद उदास

मैं सोच रहा

तुम्हारा असीम विश्वास

आत्मा की…

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Added by vijay nikore on March 20, 2018 at 1:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल - जरा-सा छुआ था हवाओं ने,  कि नदी की देह सिहर गयी - अजय तिवारी

मुतफाइलुन   मुतफाइलुन    मुतफाइलुन   मुतफाइलुन

11212         11212          11212         11212

जरा-सा छुआ था हवाओं ने,  कि नदी की देह सिहर गयी

तभी धूप सुब्ह की गुनगुनी,   उन्हीं सिहरनों पे उतर गयी

 

खिली सरसों फिर से कछार में, भरे रंग फिर से बहार में

घुली खुश्बू फिर से बयार में, कोई टीस फिर से उभर गयी   

 

उसी एक पल में ही जी लिए, उसी एक पल में ही मर गए

वही एक पल मेरी सांस में,  तेरी सांस जब थी ठहर गयी

 

जमी…

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Added by Ajay Tiwari on March 20, 2018 at 12:28pm — 9 Comments

वो चाँद, सितारे कहाँ गए- गजल

मापनी 221 2121 1221  212

 

आँगन, वो’ छत, वो’ चाँद, सितारे कहाँ गए.

वो दिल की’ हसरतों के’ शरारे कहाँ गए.

 

निश्छल सरल वो’ प्रेम के’ किस्से पले जहाँ,

पनघट, नदी  वो’ झील किनारे  कहाँ गए.

 

आये थे’ जिन्दगी में दिखाने…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on March 20, 2018 at 9:13am — 16 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : गौरैया

20 मार्च "विश्व गौरैया दिवस" पर विशेष 

याद आ रही है...

करीने से बँधी चोटियाँ

आँगन में खेलती बेटियाँ

गुड्डा-गुड़िया, गोटी-चिप्पी,

आइ-स्पाइस, छुआ-छुई

चंदा-चूड़ी, लँगड़ी-बिच्छी

 

याद आ रहा…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 20, 2018 at 9:00am — 29 Comments

'मासूम पे इल्ज़ाम लगाना ही नहीं था'

मफ़ऊल मफ़ाईल मफ़ाईल फ़ऊलुम

सोई हुई ख़्वाहिश को जगाना ही नहीं था

ख़्वाबों में मेरे आपको आना ही नहीं था

बाग़ी है अगर तुझ से तो अब कैसी शिकायत

औलाद का हक़ तुझको दबाना ही नहीं था

वो होके पशेमान यही बोल रहे हैं

मासूम पे इल्ज़ाम लगाना ही नहीं था

सब,झूट यही कह के यहाँ बोल रहे थे

सच बोलने वालों का ज़माना ही नहीं था

बहरों की ये बस्ती है "समर" जान गये थे

फिर तुमको यहाँ शोर…

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Added by Samar kabeer on March 19, 2018 at 2:00pm — 37 Comments

धूप का विस्तार लगाकर सो गए - सलीम रज़ा रीवा

2122 2122 212

धूप का विस्तार लगाकर सो गए

छांव सिरहाने दबाकर सो गए

oo

ज़िंदगी से थक-थका कर सो गए

वो चराग़--जाँ बुझा कर सो गए

oo

गुफ़्तगू की दिल मे ख़्वाहिश थी मगर

वो मेरे ख़्वाबों में आकर  सो गए

oo

तंग थी चादर तो हमने यूँ किया

पांव सीने से लगाकर सो गए

oo

उनकी नींदों पर निछावर मेरे ख़ाब

जो ज़माने को जगाकर सो गए

oo

बे-कसी में…

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Added by SALIM RAZA REWA on March 18, 2018 at 11:00pm — 19 Comments

घुटनें एवं छड़ी(कहानी )

रामदीन |” अख़बार एक तरफ रखते हुए और चाय का घूंट भरते  हुए पासवान बाबू ने आवाज़ लगाई

“जी बाबू जी |”

“मन बहुत भारी हो रहा है |दीपावली गुजरे भी छह महीने हो गए | सोचता हूँ दोनों बेटे बहुओं से मिल लिया जाए|---- ज़िन्दगी का क्या भरोसा !”

“ऐसा क्यों कहते हैं बाबूजी !हम तो रोज़ रामजी से यही प्रार्थना करते हैं की बाबूजी को लंबा और सुखी जीवन दे |”

“ये दुआ नहीं मुसीबत है |बुढ़ापा ---अकेलापन----तेरे माई जिंदा थी तब अलग बात थी पर अब ---“ वो गहरी साँस भरते हुए कहते हैं

“हम क्या…

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Added by somesh kumar on March 18, 2018 at 11:00pm — 8 Comments

एक गीत/ सतविंद्र कुमार राणा

यह वर्ष नया मंगलमय हो

कोंपल फूटी है तरुवर पर

नव पल्लव का निर्माण हुआ

टेसू की लाली उभरी है

पुलकित हर तन, हर प्राण हुआ

हर मन से बाहर हर भय हो

यह वर्ष नया मंगलमय हो।

गेंहूँ बाली पूरी होकर

अब लहर लहर लहराती है

सरसों पर पीला रंग चढ़ा

भवरों को यह ललचाती है

भँवरों के गीतों-सी लय हो

यह वर्ष नया मंगलमय हो।

जाड़े को विदा किया हमने

गर्मी को दिया बुलावा है

हर चीज नई-सी लगती है

जब साल नया यह आया…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on March 18, 2018 at 8:50am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
वो फ़कत मुझको वहाँ का पासबाँ समझा किया (ग़ज़ल राज )

२१२२ २१२२ २१२२ २१२

वो मेरी खामोशियों को हाँ म हाँ समझा किया

मुझको धरती  और खुद को आसमाँ समझा किया

पहना जब तक सादगी और शर्म का मैंने लिबास

ये ज़माना यार  मुझको नातवाँ समझा किया

उस कहानी के सभी किरदार उसको थे अज़ीज़

बस मेरे किरदार को ही रायगाँ समझा किया

जिस्म मेरा रूह मेरी जिस चमन पर थी निसार

वो फ़कत मुझको वहाँ का पासबाँ समझा किया

जिसकी दीवारों में माज़ी सांस लेता था कभी 

यादों से भरपूर घर को वो…

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Added by rajesh kumari on March 17, 2018 at 2:30pm — 18 Comments

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