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"फागुन की पूनम"/ अर्पणा शर्मा

आई फागुन की पूनम,

बरसाये शीतलता मेरे आँगन,

स्वच्छ अंबर,

चमकीला तारामंड़ल,

झिलमिल-झिलमिल,

शुभ्र-धवल,

आई फागुन की पूनम,



बसंती मदमस्त पवन,

दे हिलोंरें मंद-मंद,

पलाश, सेमल दहकाएं अगन,

मस्ती में बौराए,

उत्साहित सर्वजन,

ढ़ोल, मंजीरे, नगाड़़े,

टोलियाँ करें फाग गायन,

आई फागुन की पूनम,



होली दहन को है सजाई,

ले गोद प्रहलाद को,

होलिका थी इसमें समाई,

असत्य की भावना राख हुई,

सत्य पर कोई आँच न… Continue

Added by Arpana Sharma on March 9, 2017 at 3:04pm — 2 Comments

विश्व महिला दिवस - लघुकथा –

विश्व महिला दिवस    -       लघुकथा    –

सुक्कू बाई आज फिर लेट हो गयी थी इसलिये डरते डरते मिसेज सिन्हा के घर में घुसी। सारा घर साफ़ सुथरा दिख रहा था। रसोईघर में सब वर्तन धुले हुए करीने से लगे थे। बाथरूम में देखा मैले कपड़ों का ढेर भी गायब था। लॉन में गयी तो देखा  बाहर धुले कपड़े सूख रहे थे । उसने सोचा कि उसके रोज रोज लेट आने और नागा करने से परेशान होकर मैम साब ने दूसरी बाई रख ली।

मैम साब पूजा घर में थी। मैम साब बाहर निकली और सीधे रसोईघर में चली गयीं। थोड़ी देर बाद ट्रे में चाय और…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 9, 2017 at 1:02pm — 8 Comments

कविता - " क्यूँ किया तूने "

आशिक़ तू आशिक़ी से पहले, करना ज़रूर गौर,

इश्क़ की राह मे आया है नया दौर,

हाथो मे हाथ लिए निकले तो थे,

हमराह बनकर भी तू, चला गया कहीं और.

क्यूँ किया तूने, ये तू क्या कर गई,

बिना कुछ किए ही मेरी जान ले गई....

लफ़्ज़ों की एहमियत को, तू ना समझ पाया,

जाने के बाद मेरे, मैं तुझे याद आया,

की थी क्या ख़ाता मैने, जो तूने था मुंह मोड़ा,

काँच से भी बदतर, तूने दिल मेरा है तोड़ा.

क्यूँ किया तूने, ये तू क्या कर गई,

बिना कुछ किए ही मेरी जान ले…

Continue

Added by M Vijish kumar on March 9, 2017 at 10:00am — 2 Comments

एक ख़तरनाक आतंकवादी

ढूँढो किसी मुफ़लिस को

ग़ुमनाम तंग गलियों से

और फिर मुफ़ीद जगह पर

कर दो एनकाउण्टर

मगर आहिस्ते से

इतने आहिस्ते

कि चल सके पूरे दिन

दहशत का लाइव शो

इस बात को ध्यान में रखते हुए

कि उसे करना है घोषित

भोर की पहली किरण से ही

एक ख़तरनाक आतंकवादी

और फिर रख देना है

उसकी लाश के पास

एक झण्डा

कुछ किताबें

नक़्शे और नोट

व थोड़े से हथियार

जिससे ये डर पुख़्ता होकर

बदल जाए मज़हबी वोटों में

और बना दे अपनी… Continue

Added by Mahendra Kumar on March 8, 2017 at 8:30pm — 14 Comments

अभी शे'र हमने सुनाया कहाँ है (ग़ज़ल)

122   122   122   122

है हर सू फ़क़त धूप,साया कहाँ है?

ये आख़िर मुझे इश्क़ लाया कहाँ है!

अमीरी को अपनी दिखाया कहाँ है?

तुम्हें शह्र-ए-दिल ये घुमाया कहाँ है?

अभी सहरा में एक दरिया बहेगा

अभी क़ह्र अश्क़ों ने ढाया कहाँ है?

अभी देखिएगा अँधेरों की हालत

उफ़ुक़ पर अभी शम्स आया कहाँ…

Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on March 8, 2017 at 3:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल (चढ़ी है एक धुन मन में पढ़ेंगे जो भी हो जाए)

1222 1222 1222 1222



चढ़ी है एक धुन मन में पढ़ेंगे जो भी हो जाए,

बड़े अब इस जहाँ में हम बनेंगे जो भी हो जाए।



कोई कमजोर ना समझे नहीं हम कम किसी से हैं,

सफलता की बुलन्दी पे चढ़ेंगे जो भी हो जाए।



हमारे दरमियाँ जो भेद कुदरत का बड़ा गहरा,

बराबर उसको करने में लगेंगे जो भी हो जाए।



बहुत देखा हिक़ारत से न देखो और अब आगे,

नहीं हक जो मिला लेके रहेंगे जो भी हो जाए।



जमीं हो आसमां चाहे समंदर हो या पर्वत हो,

मिला कदमों को तुम से हम… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on March 8, 2017 at 10:30am — 10 Comments

नारी (नवीन कुमार जैन)

स्नेह की धारा है वह, है वात्सल्य की मूर्ति

वीरुध वही,वन वही, कालिका की वो पूर्ति

राष्ट्र , समाज और परिवार को वो समर्पित

स्व - पर, हित को करती प्राण भी अर्पित

वाणी वही, गिरिजा वही, है दामिनी भी वह

कल्पना वो, प्रतिभा वही है कामिनी भी वह

किरन है वह, है सुभद्रा , है महादेवी भी वह

सृजक है वो समाज की समाजसेवी भी वह

है मदर टेरेसा, ऐनी बेसेन्ट, यशोदा भी वह

है अनैतिक समर में संघर्षरत,योद्धा भी वह

बोझ नहीं है , अबला नहीं, न द्वितीय है वह

वह धरा पर…

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Added by Naveen kumar jain on March 8, 2017 at 8:30am — 12 Comments

नारी ( सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' )

नारी तुम! सुकुमार कुमुदुनी

सौम्य स्नेह औ प्रेम प्रदाता ||

धरती पर हो शक्ति स्वरूपा

तुम रण चंडी भाग्य विधाता ||



संस्कारों की शाला तुम हो

तुम लक्ष्मी सावित्री सीता |

निर्वाहिनी सत्कर्म की तुम

तुम्ही वेद कुरान औ गीता ||



सह कर असह्य प्रसव वेदना

तुम लाल धरा पर लाती हो |

तुम हो धात्री अखिल जगत की

तुम्ही सृष्टि सृजन बढाती हो ||



हे रूपवती हे कमनीया

ईश्वर की तुम अद्भुत रचना ||

तलवार धरो जब कर में तो

मुश्किल…

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Added by नाथ सोनांचली on March 8, 2017 at 8:30am — 12 Comments

ग़ज़ल: कैसे कह दूँ मैं अलविदा तुझसे

2122 1212 22

कैसे कह दूँ मैं अलविदा तुझसे ।

चैन आया है हर दफ़ा तुझसे ।।



इक सुलगती हुई सी खामोसी ।

इक फ़साना लिखा मिला तुझसे ।।



वो इशारा था आँख का तेरे ।

दिल था पागल छला गया तुझसे ।।



भूल जाती मेरा तसव्वुर भी ।

क्यूँ हुई रात भर दुआ तुझसे ।।



बेखुदी में जो इश्क कर बैठा ।

उम्र भर बस वही जला तुझसे ।।



कर लूँ कैसे यकीन वादों पर ।

कोई वादा कहाँ निभा तुझसे ।।



कुछ रक़ीबों से गुफ्तगूं करके ।

तीर वाज़िब…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on March 7, 2017 at 11:00pm — 6 Comments

पावन हो …….

पावन हो …….



सुना था

मतलब के लिए

जमीनों और घरों के

बंटवारे हो जाते हैं

इस धन लोलुप दुनिया में

जीते जी

जिन्दा रिश्तों के

बंटवारे हो जाते हैं

अपने स्वार्थ के लिए

इंसान के जहाँ में

इंसानों के बंटवारे हो जाते हैं

मगर ये क्या

आज अखबार के

एक कालम ने

दिल को द्रवित कर दिया

अपने को श्रवण कुमार

साबित करने के लिए

अपने मृत जन्म दाता को

श्रद्धान्जली देने के लिए

अखबार में अलग अलग विज्ञापन दे दिये…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 7, 2017 at 9:08pm — 10 Comments

गजल(पूछते लोग सब.....)

212 212 212 212
 लोग सब पूछते,  हम कहाँ जा रहे
आ गये दिन भले या अभी आ रहे।2

कौन क्या कह गया याद अब है कहाँ
रेवड़ी देखकर खूब ललचा रहे।2

कुल जमा देखिये बादलों की कला
हर बरस बूँद में खार बरसा रहे।3

रात के हाथ से बुझ गयीं बत्तियाँ
बोलते भी जरा कौन दिन ला रहे।4

जोर से पीटते ढ़ोर सब ढ़ोल हैं
कोकिला चुप हुई काग बस गा रहे।5
मौलिक व अप्रकाशित@

Added by Manan Kumar singh on March 7, 2017 at 8:00pm — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -ये किसका दर्द रूह में मेरी समा गया - ( गिरिराज )

221   2121   1221   212

मंज़र न जाने कौन उसे क्या दिखा गया

या आइना था, जो उसे पत्थर बना गया

 

तू भी तवाफ ए दश्त में चलता, ऐ शह’र ! तो   

कहता यही, सुकून मेरे दिल को आ गया

 

हँसने की कोशिशों से निकल आये अश्क़ क्यूँ

ये किसका दर्द रूह में मेरी समा गया

 

गिनते रहे वो रोटियाँ थाली में डाल कर

भूखा उसी समय ही जाँ अपनी लुटा गया

 

लाठी नुमा रहा था जो अंधे के साथ साथ    

पत्थर समझ के राह का, कोई हटा…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on March 7, 2017 at 12:54pm — 20 Comments

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)

थोड़ा आगे आने दो ,
मौक़ा उनको पाने दो ।


देखो, भटके फिरते हैं ,
उनको भी समझाने दो ।


कब तक सहना पाबंदी ,
दौर नया दिखलाने दो ।


सबको राहत मिल जाये ,
मौसम ऐसा आने दो ।


फिक्र करो मत दुनिया की ,
छोड़ो यारो जाने दो ।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Mohammed Arif on March 7, 2017 at 11:30am — 22 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
किसे ये सब समझाऊँ .... स्त्री की ज़िंदगी का एक पहलू // डॉ० प्राची

रात सिसकती सुबह सुलगती, है जीवन का लेख

दर्द भरा सागर आँखों में, कौन सका है देख ?

कहाँ मैं अश्रु बहाऊँ ?

किसे मैं व्यथा सुनाऊँ ?



बेटी थी जिस घर की उसने छीन लिए अधिकार

हक़ माँगा तो रिश्तों में पहुँचेगी बड़ी दरार !

क्या बोलूँ ? किससे बोलूँ ? समझेगा मुझको कौन ?

अपने हक़ की बात करूँ या रह जाऊँ फिर मौन ?

कौन सा क़दम उठाऊँ ?

कभी ये समझ न पाऊँ !!!



कठपुतली सा नाच नचाती है मुझको ससुराल

घर की लक्ष्मी का दासी से भी बद्तर है हाल,

जितना… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 7, 2017 at 9:00am — 12 Comments

इश्क की दास्ताँ यह छुपानी नही (गजल)

बहर:- 212-212-212-212



फर्ज के वास्ते बद-जुबानी नही ।

फर्ज वो राह है जिसके मानी नही ।।



हिज्र से बढ़के कोई कहानी नही।।

इश्क की दास्ताँ यह,छुपानी नही ।।



रूठ कर आप ने ही तो रुसवा किया।

आप ने ही मेरी बात मानी नही।।



शोर-ओ- गुल मे बसर हो गई जिंदगी ।

यूं लगे हम ने पाई जवानी नही।।



उम्र का हर तजुर्बा गरल दे रहा ।

इतना जहरीला अश्को का पानी नही ।।



जानलेवा रहा जिंदगी का सफ़र ।

हर कदम मौत है जिंदगानी… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 7, 2017 at 8:00am — 10 Comments

ग़ज़ल अब्रे जहराब से बरसा है ये कैसा पानी

वज़्न - 2122 1122 1122 22/112



अब्रे जहराब से बरसा है ये कैसा पानी ।

भर गया मुल्क की आँखों में हया का पानी ।।



मिट ही जाए न कहीं शाख जे एन यू की अब ।

आइये साफ़ करें मिल के ये गन्दा पानी।।



मन्नतें उन की हैं हो जाएं वतन के टुकड़े ।

सर के ऊपर से निकल जाए न खारा पानी ।।



कुछ हैं जयचन्द सुख़नवर जो खुशामद में लगे ।

बेच बैठे हैं जो इमानो कलम का पानी ।।



आलिमों का है ये तालीम ख़ता कौन कहे ।

ख़ास साजिश के तहत हद से गुजारा पानी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on March 6, 2017 at 10:30pm — 8 Comments

लौकी (लघुकथा)

‘‘ अरे, सेठजी ! नमस्कार। अच्छा हुआ आप यहीं सब्जी बाजार में मिल गए, मैं तो आपके ही घर जा रहा था। समाचार यह है कि महाराज जी पधारे हैं, उनका कहना है कि इस एरिया में अहिंसा मंदिर का निर्माण कराना है जिसमें आपका सहयोग... ..।‘‘

‘‘ जी बिलकुल ! मेरी ओर से ग्यारह हजार , शाम को आपके पास पहुॅंचा दूॅंगा।‘‘

यह सुनकर, सब्जी का थैला टाॅंगे सेठजी के शिष्यनुमा नौकर से न रहा गया वह बोला,

‘‘सेठजी ! अभी आपने सब्जी की दूकान पर लौकी लेते समय लम्बी बहस के बाद, पूरे बाजार में बीस रुपये प्रति किलो…

Continue

Added by Dr T R Sukul on March 6, 2017 at 10:00pm — 12 Comments

क्षितिज (कविता )

ढूंढ रहा है आज क्षितिज तुम्हें

हाँ वही जो परेशान तुम्हें किया करता था

तुम्हें प्यार करते देख किसीको

अपने आँसूं बहाया करता था



नदी किनारे से अक़्सर देखा करता था

देख कर तुमको वो मुस्कुरा देता था

बादलों से शरारत करने को कहता था

फिर उनमें अपने को छिपा लेता था ।



तुम फिर उसकी तलाश में खो जाती थीं

अटखेलियां करते हुए बादलों से

जब उसका तुम पता पूछा करती थीं

चुपके से वो आड़ से तुम्हें देख लेता था ।



हो तुम दीवानी उसकी जानता है जग… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on March 6, 2017 at 7:06pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दुर्मिल सवैया ‘फाग बयार’

११२  ११२  ११२  ११२  ११२  ११२  ११२  ११२

भँवरे कलियाँ तरु  झूम उठें जब फाग बयार करे बतियाँ|

दिन रैन कहाँ फिर चैन पड़े कतरा- कतरा कटती रतियाँ|

कविता, वनिता, सविता, सरिता ढक के मुखड़ा छुपती फिरती|

जब रंग अबीर लिए कर में निकले किसना धड़के छतियाँ|…

Continue

Added by rajesh kumari on March 6, 2017 at 3:19pm — 18 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
हिस्सेदारी आज हमारी बिल्कुल सेम टु सेम .....अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष /डॉ० प्राची

नया रंग, तस्वीर नयी है, आज नया है फ़्रेम

हिस्सेदारी आज हमारी बिल्कुल सेम टु सेम



बड़े-बड़े कामों को झटपट देती हूँ अंजाम

अपनी क़ाबिलियत से मैं छूती हूँ नये मुक़ाम,

सैटेलाइट लाउंचिंग हो या हो अंतरिक्ष अभियान

फ़ाइटर जैट पायलट हो या हो दंगल का मैदान,



जीवन के हर इक पहलू में आज कमाया नेम

हिस्सेदारी...



मैं सूरज से आँख मिला कर जब करती हूँ बात

हर डर को, हर बंधन को तब-तब देती हूँ मात,

जब आवाज़ उठा कर पाया ख़ुद अपना सम्मान

सच्ची… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 6, 2017 at 12:21pm — 9 Comments

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