For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,163)

आओ मिलकर दीप जलायें

आओ मिलकर दीप जलायें

अंधकार को दूर भगायें

जगमग जगमग हर घर करना

अन्धकार है सबका हरना

अम्बर से धरती पर तारे

साथ चाँद को नीचे लायें 

अंतर्मन का तमस हरेंगे

कलुषित मन में प्रेम भरेंगे

द्वेष,बुराई और वासना

मिलकर सारे दूर हटायें

उत्सव है यह दीवाली का

सुख समृद्धि और खुशहाली का

भेदभाव आपस के भूलें

मन में शांति दीप जलायें

दीपों की पंक्तियाँ जगाई

धरती अपनी है चमकाई

सद्ज्ञान के दीप…

Continue

Added by Sarita Bhatia on October 23, 2014 at 10:29pm — 4 Comments

ग़ज़ल (अय्यूब खान "बिस्मिल")

कर दिया आम मिरे इश्क़ का चर्चा देखो

देखो ज़ालिम कि मुहब्बत का तरीक़ा देखो

याद करना कि मिरे दर्द कि शिद्दत क्या थी

खुद को ज़र्रों में कभी तुम जो बिखरता देखो

खूं तमन्ना का मुसलसल यहाँ बहता है अब

मेरी आँखों में है इक दर्द का दरिया देखो

यूँ सुना है कि वो नादिम है जफ़ा पे अपनी

उसके चेहरे पे जफाओं का पसीना देखो

अपने हाथों से सजाके में करूँगा रुखसत

कर लिया है मेने पत्थर का कलेजा देखो

ये हिना सुर्ख ज़रा…

Continue

Added by Ayub Khan "BismiL" on October 23, 2014 at 3:00pm — 7 Comments

लक्ष्मी पूजन (लघुकथा)

एक पल की देरी किये बिना वो तेज़ क़दमों से बड़े-बड़े डग भरती हुई लक्ष्मी मंदिर में पूजा करने चली गयी| रास्ते में एक छोटी सी जिंदा बच्ची कचरे के डिब्बे में जो देख ली थी - शायद सात-आठ दिन पहले ही जन्मी थी|

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on October 22, 2014 at 11:56pm — No Comments

इस दीपावली एक ऐसा दीप जलायें - डॉo विजय शंकर

आओ इस दीपावली

एक ऐसा दीप जलायें

भटके हुए रहनुमाओं को

सही रास्ता दिखायें।

आओ इस दीपावली एक ……

वो जो अन्धकार को

अन्धकार से मिटाने

का दम भरते हैं,

दूसरों के लिए उठाया

हर कदम अन्धकार की

ओर ही रखते हैं ,उन्हें

दीप-ज्योति कुछ यूँ दिखायें ,

कभी दूसरों के लिये भी

रौशनी में चलना सिखायें।

आओ इस दीपावली एक ……



उनकी दीवाली शुभ हो ,

हमारी दीवाली शुभ हो ,

इस बार सबकी दीवाली

शुभ- और - शुभ बनायें।

आओ इस दीपावली… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on October 22, 2014 at 6:54pm — 8 Comments

आओ मिल कर दिए जलाएं

आओ मिल कर दिए जलाएं,

आओ मिल कर दिए जलाएं।

भारत को तमलीन जगत में,

ज्योतिर्मय पुनः बनायें।।

 

आओ मिल कर करें सभी प्रण,

भारत के हित हों अर्पण।

अपने जीवन के कुछ क्षण,

भारत को स्वच्छ बनायें।।

 

आओ मिल कर दिए जलाएं,

आओ मिल कर दिए जलाएं।।

 

आओ मिल कर लड़ें एक रण,

अपने भीतर का रावण।

कभी स्वांस नहीं ले पाये,

हम भ्रष्टाचार मिटायें।।

 

आओ मिल कर दिए जलाएं,

आओ मिल कर दिए…

Continue

Added by Aditya Kumar on October 22, 2014 at 1:48pm — 3 Comments

एक ग़ज़ल आपके हवाले

उल्टा सीधा बोल रही है दुनिया मेरे बारे में,

अखबारों ने छापा क्या कुछ, पढना मेरे बारे में.  

.

इस दुनिया में मिल न सकेंगे अगली बार मिलेंगे हम,

अर्श को जो भी अर्ज़ी भेजो, लिखना मेरे बारे में.

.

उनकी ज़ात से वाक़िफ़ हूँ, वो बाज़ नहीं आने वाले,

सर पर लेकर घूम रहे हैं फ़ित्ना मेरे बारे में.     

.

अपने दिल में एक दीया तुम मेरे नाम जला रखना, 

आँधी जाने सोच रही है क्या क्या मेरे बारे में.

.

मज्लिस से बाहर कर बैठे, उनकी जान में जाँ…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on October 22, 2014 at 1:00pm — 14 Comments

आशा का मै दीप जलाऊँ

पुष्य नक्षत्र की शुभ बेला में, श्री लक्ष्मी का अवतार हुआ

महक फैलाती आई कमला, तो गुरु नक्षत्र भी धन्य हुआ|

 

दाता भी है रिद्धि सिद्दी के, सुख सम्रद्धि जो लेकर आये  

माँ शारदे भी संग बैठी, ज्ञान पिपासू प्यास बुझायें |

  

बरकत करती धन वैभव की, जो धन धान्य से घर भरदें

दीपो का त्यौहार मनाते, आँगन माँड़ रँगोली सज दे |

 

घर लक्ष्मी प्रसन्न जब रहती, तब लक्ष्मी का वरदान मिले

बिन गणपति और ज्ञानेश्वरी, फिर उल्लू ही साक्षात् मिले…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 22, 2014 at 12:00pm — No Comments

दिये (लघुकथा)

ये दिये क्या भाव हैं अम्मा ?" गाडी में बैठी सभ्रांत महिला ने दीपक बेचने वाली बुढ़िया से पूछा I  
"50 रुपये के 100 हैं बिटिया I" बुढ़िया ने उत्तर दिया I
"हे भगवान् ! इतने महेंगे ? अम्मा तुम तो लूट रही हो I"
"एक बात का जवाब दो बेटी, ये महंगाई क्या सिर्फ अमीरों के लिए ही है, हम गरीबों के लिए नहीं ?"

मौलिक एवं अप्रकाशित

आलोक मित्तल

मथुरा

Added by Alok Mittal on October 22, 2014 at 12:00pm — 9 Comments

शिकायत हम करें किससे बता दो जिन्‍दगी मुझको

किया जो प्‍यार का वादा न जाने क्‍यों भुलाती है

अँधेरी रात में हमको नहीं राहें दिखाती है



छलक जाती न जाने क्‍यों कभी भी आँख ये मेरी

न जाती याद उसकी है मुझे हर पल रूलाती है



उसे दिल में बसाने की लिये चाहत मरेंगे क्‍या

बने अंजान वो यारो हमें पागल बताती है



मिले जब वो कभी हमसे बताये हाल दिल का क्‍या

न रहता होश अपना  जब हमें नगमे सुनाती है l



शिकायत हम करें किससे बता दो जिन्‍दगी मुझको

बसी जो दिल में मेरे क्‍यों वही हमको सताती है



अखंड…

Continue

Added by Akhand Gahmari on October 21, 2014 at 8:53pm — No Comments

उत्तर जहां से अब ..

हाय राम क्या करे जी कोई ...जवाब चाहिए

उत्तर जहां से अब तो कुछ लाजवाब चाहिए

लौकी आलू भिण्डी टमाटर लड़ते  हैं  बाजार में

इस दिवाली  हमको  ही इक खिताब चाहिए

पटाखों फुलझड़ी को देख बच्चे मचल रहे हैं

टूटी आस लिए वो पूछें कितने बेताब चाहिए

मजबूरियों में निःशब्द बाप आंसू बहा रहे हैं

फीकी जेब तेज हाट में माथों पर आब चाहिए

लड्डू बर्फ़ी रसगुल्ला हमसे यूँ  अब दूर हुए

मिश्री घोलें रिश्तों में मिठास बेहिसाब…

Continue

Added by anand murthy on October 21, 2014 at 5:00pm — No Comments

दिल्ली चीखती है

किसी की सरफ़रोशी चीखती है

वतन की आज मिट्टी चीखती है



हक़ीक़त से तो मैं नज़रें चुरा लूँ

मगर ख़्वाबों में दिल्ली चीखती है



हुकूमत कब तलक ग़ाफिल रहेगी

कोई गुमनाम बस्ती चीखती है



भुला पाती नहीं लख्ते-जिगर को

कि रातों में भी अम्मी चीखती है



बहारों ने चमन लूटा है ऐसे

मेरे आंगन में तितली चीखती है



गरीबी आज भी भूखी ही सोई

मेरी थाली में रोटी चीखती है



महज़ अल्फ़ाज़ मत समझो इन्हें तुम

हरेक पन्ने पे स्याही चीखती…

Continue

Added by Samir Parimal on October 21, 2014 at 4:30pm — 13 Comments

लघुकथा - उपकार

वह रात भर छटपटाता रहता, रटी रटाई बातोँ के सिवाय वह कुछ और बोल भी तो नही सकता था । लेकिन पिंजरें के अन्दर ही सही उसे कभी भी भूखा नही रहना पडा था । उसने सोचा, मेरा मालिक भीखू जैसे भो हो, पर मेरा पसंदीदा आहार जुटाता है, और हर तरह से अब तक मेरी हिफाजत करता  है । बन्धन मे पडना मेरा प्रारब्ध है और बिकना मेरी क्रूर नियति है । फिर भी मै अब तक जिंदा हूँ, कितना प्यार करता है भीखू  मुझे ! वो गरीब है पर फिर भी उसका व्यवहार उत्तम रहा है । भीखू ने सदा मुझे दोस्त समझा है, इसी कारण मेरे दिल मे भी उसके लिए…

Continue

Added by Bipul Sijapati on October 21, 2014 at 11:00am — 7 Comments

छँट गये अँधेरे

दीप जले हैं जब-जब

छँट गये अँधेरे।

अवसर की चौखट पर

खुशियाँ सदा मनाएँ

बुझी हुई आशाओं के

नवदीप जलाएँ

हाथ धरे बैठे

ढहते हैं स्वर्ण घरौंदे

सौरभ के पदचिह्नों पर

जीवन महकाएँ

क़दम बढ़े हैं जब-जब

छँट गये अँधेरे।

कलघोषों के बीच

आहुति देते जाएँ

यज्ञ रहे प्रज्‍ज्‍वलित

सिद्ध हों सभी ॠचाएँ

पथभ्रष्टों की प्रगति के

प्रतिमान छलावे

कर्मक्षेत्र में जगती रहतीं

सभी…

Continue

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on October 21, 2014 at 10:47am — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं (गीत) // -- सौरभ

१२१२ ११२२ १२१२ २२

सहज लगाव हृदय में हिलोड़ जाते हैं ।

अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं ॥



किसी उदास की पीड़ा सजल हृदय में ले

निशा निराश हुई, चुप वृथा पड़ी-सी थी

तथा निग़ाह कहीं दूर व्योम में उलझी…

Continue

Added by Saurabh Pandey on October 21, 2014 at 5:30am — 20 Comments

खिलौना (लघुकथा)

'माँ क्या दूल्हा बाजार में बिकता है? जिसे दहेज देकर खरीदने के लिए तू पेसे जोड़ रही है ।'
' मगर बेटा में तो तेरे लिए ...'
'माँ मुझे पति चाहिए कोई दहेज लेकर बिका हुआ खिलौना नही ।'


मोलिक व अप्रकाशित
किशन 21-10-14

Added by किशन कुमार "आजाद" on October 20, 2014 at 10:50pm — 3 Comments

बोलती बंदिशे

“तू लड़की होकर भी हमेशा गली में लड़कों के साथ खेलती रहती है, ये बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता |“

पड़ोसी अंकल ने रितिका को समझाते हुए कहा |

“हाँ अंकल जी !  मगर ये तो अच्छा लगता होगा न कि लड़के हमें देखकर छींटाकशी करें,  और हमें चुप रहने और घर में रहने की नसीहत दी जाए ?”

अंकल जी चुपचाप बेटे को लेकर घर में चले गए |

.

सोमेश कुमार (मौलिक एवं अप्रकाशित )

 

Added by somesh kumar on October 20, 2014 at 10:30pm — 1 Comment

गजल : बाजी मोहब्बत की हारे हुए

ख्वाब   हरगिज   न  पूरे  हमारे  हुये  I

हम तो बाजी मुहब्बत की हारे हुये II

 

दोस्त    हमको   भुलावा   ही    देते रहे

वक्त जब आ  पड़ा तो  किनारे हुये I

 

माफ़ जबसे    हमारी   खता   हर   हुई

हमने समझा कि गर्दिश में तार  हुये I

 

उनका नजरे चुराने  का  ढब देखिये

कैसे-कैसे   गजब   के   इशारे   हुये I

  

इश्क नजरो में जब से नुमायाँ हुआ

कितने दिलकश जहाँ के नज़ारे हुये I

 

हुस्न अपनी   खनक    में…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 20, 2014 at 6:00pm — 4 Comments

लघुकथा : कीमत

वो लगातार स्टैंड पे टंगी बोतल से गिरती दवा की एक एक बूँद को गौर से देख रहा था ! नर्स ने काफी देर उसे ऐसा करते देखा तो उसके पास आकर पूछ बैठी !


"इन बूंदों को गिन रहे हैं क्या आप ? लगता है पर बूँद प्राइस निकालेंगे !"

"नहीं ,माँ के शरीर में जा रही है इसलिये दुआ मिला रहा हूँ !"

( मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by Neeles Sharma on October 20, 2014 at 6:00pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
लक्ष्मी (लघु कथा ‘राज’)

“माँ वो कोठी वाली मैडम हर दीवाली पर लक्ष्मी जी के पैर बनाती हैं तू क्यूँ नहीं बनाती? इसी लिए हमारे घर लक्ष्मी नहीं आती क्या?”रिक्कू ने बड़े भोलेपन से पूछा|

”बेटा, हमारे घर भी एक बार लक्ष्मी आई थी पर तेरे बापू ने दारु के लिए उसे बेच दिया अब वो कभी नहीं आएगी”|

.

(मौलिक एवं अप्रकाशित ) 

Added by rajesh kumari on October 20, 2014 at 3:30pm — 12 Comments

एक तरही ग़ज़ल....

हमेशा दौड़ में पिछड़ा रहा हूँ

मगर चिन्तन में मैं कछुआ रहा हूँ

खिलौना मैं नहीं जो खेल लोगे

हूँ इंसा मैं  भी ये  समझा रहा हूँ

सितम ढाओं, गुमां कर लो जी भर के

ये मत कहना कि मैं पछता रहा हूँ

मैं मुफ़लिस ही सही कोई नहीं गम

हमेशा दिल से ही सच्चा रहा हूँ

तेरी तस्वीर पलकों में सजा के

तेरी  यादों से दिल बहला रहा हूँ 

मौलिक व् अप्रकाशित 

Added by MAHIMA SHREE on October 20, 2014 at 10:00am — 5 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी, आपने प्रस्तुति के माध्यम से प्रदत्त चित्र को पूरी तरह से शाब्दिक किया है…"
20 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, आपकी प्रस्तुति का हार्दिक धन्यवाद  परन्तु, रचना सोलह मात्राओं खे चरण…"
36 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण भाईजी, चौपाई छंद में आपने प्रदत्त चित्र को उपयुक्त शब्द दिये हैं. सुगढ़ रचना के…"
46 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार। तुकांतता के दोष में…"
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अखिलेश जी, सादर अभिवादन। चौपाइयों पर उपस्थिति, स्नेह और मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। आपकी…"
1 hour ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"हार्दिक धन्यवाद आभार आपका लक्ष्मण भाईजी"
2 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"हार्दिक धन्यवाद लक्ष्मण भाई "
2 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी आदरणीय अशोक भाईजी  चौपाई में चित्र का  सम्पूर्ण  चित्रण हुआ है।…"
2 hours ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"चप्पल उसकी सिली न जाती। बिन चप्पल के वह रह जाती।।....वाह ! वाह ! प्रदत्त चित्र की आत्मा का भाव आपने…"
4 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय लक्ष्मण भाईजी चित्र को विस्तार से छंद बद्ध करने के लिए हार्दिक बधाई । कुछ त्रुटियाँ मेरी नजर…"
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त चित्र को साकार करती बहुत सुंदर चौपाइयाँ हुई हैं। बहुत बहुत…"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 176 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अखिलेश जी, यह संशोधित छंद और भी उत्तम हुए हैं। यह पूर्ण रूप से चित्र को संतुलित कर रहे हैं।…"
7 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service