1222 1222 1222 1222
न जीवन राख कर लेना किसी की डाह में यारो
हमेशा सुख सभी का हो तुम्हारी चाह में यारो।1।
विचारों की गहनता हो न हो व्यवहार उथला ये
सुना मोती ही मिलते हैं समुद की थाह में यारो ।2।
वही वंशज है सूरज का बुजुर्गों ने कहा है सच
जलाए दीप जिसने भी तिमिर की राह में यारो ।3।
किसी को देके पीड़ा तुम न उसकी आह ले लेना
न जाने कैसी ज्वाला हो किसी की आह में यारो।4।
गगन के स्वप्न तो देखो धरा लेकिन न त्यागो तुम
हवा में…
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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 5, 2017 at 4:02pm —
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212 212 212 212
पूछिये मत यहां गमज़दा कौन है ।
पूछिये मुद्दतों से हँसा कौन है ।।
वो तग़ाफ़ुल में रस्में अदा कर गया ।
कुछ खबर ही नहीं लापता कौन है ।
घर बुलाकर सनम ने बयां कर दिया ।
आप आ ही गये तो ख़फ़ा कौन है ।।
इस तरह कोई बदला है लहजा कहाँ ।
आपके साथ में रहनुमा कौन है ।।
आज तो बस सँवरने की हद हो गई ।
यह बता दीजिए आईना कौन है ।।
अश्क़ आंखों से छलका तो कहने लगे ।
ढल गई उम्र अब पूंछता कौन है ।।
यूँ भटकता…
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Added by Naveen Mani Tripathi on September 5, 2017 at 3:17pm —
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प्रेम-पचीसी--भाग-3 (प्रीत-पगे दोहे)
दाँत दुखे तो पाड़ दूँ, आँख दुखे दूँ फोड़ ।
घायल मन की पीर का, पास पिया के तोड़ ।। ...1
झाल बदन में उठ रही, जबसे लागी लाग ।
सावन बरसे नैन से, बुझे न फिर भी आग ।। ...2
होना था सो हो गया, अब तो करो उपाय ।
बाहर-भीतर आग है, पीड़ा सही न जाय ।। ...3
रोग लगा सो लग गया, छोड़ो सोच-विचार ।
अंग-अंग काटो भले, ढूँढ़ों कुछ उपचार ।। ...4
ज्यों-ज्यों करती हूँ दवा, त्यों-त्यों बढ़ता रोग ।
बैद बनो तुम साँवरे, कब…
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Added by khursheed khairadi on September 5, 2017 at 12:53pm —
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"बेटा !बात हमारी गैरहाजिरी में उसे घर लाने की है।"
"तो मैं क्या करती अम्मी?आप ही बताएं ।उसे इस हाल में छोड़ा जा सकता था क्या?शुभम और रोहित से बोला था मैनें इसे एक दिन के लिए अपने घर पर रख लें, लेकिन उनके पास भी अपनी वाजिब वजहें थीं"
"ये सब मैं नहीं जानती शमा!तुम्हारे अब्बू को जब पता लगेगा की हमारी गैरहाजिरी में तुमने... "
"तो क्या गलत किया अम्मी?"
वह माँ की बात बीच में काट कर बोली।
"एक भी दिन का नागा ना करने वाला लड़का, चार दिन से ना स्कूल आया ना ट्यूशन।तब कहीं जाकर…
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Added by Rahila on September 5, 2017 at 12:29pm —
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हे महान पूर्वजों गर्व करो
हम निखार रहे हैं
वो तमाम सम्पदा
जो सौंपी थी तुमने, हमें बिरासत में...
बहुत घने हो गए थे जंगल
खो जाते थे बेश- कीमती हांथी दांत
गल जाती थी शेर की खाल
हो जाता था सदैव
तुम्हारी सम्पदा का नुक्सान,
सहन नहीं होता था ये हमसे
इसलिए मार दिए हमने हांथी और शेर
काट दिए जंगल,
बना लिए सोफे, बेड, ड्रेसिंग टेबल और मकान,
इनपे बैठे , लेटे अपना चेहरा जब भी संवारते हैं
मकान में सजे हांथी दांत और शेर की खाल ,
पूरी…
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Added by Dr Ashutosh Mishra on September 5, 2017 at 11:47am —
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बाढ़ ने फिर बाँध तोड़े
लुट गया घरबार फिर से
जो संभाले थे बरस भर
टिक न पाए एक भी क्षण
देखते ही देखते सब
ढह गया कुछ बचा ना अब
त्रासदी हर साल की है
क्या कहानी हाल की है?
क्यों नहीं हम जागते हैं?
व्यर्थ ही बस भागते हैं।
क्यों नहीं निस्तार करते
नदियों का विस्तार करते?
पथ कोई हो जिसमें चल के
प्राणदा खुद को संभाले।
हम बनाते घर सभी हैं
सोचते क्या पर कभी हैं?
नदी में…
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Added by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on September 4, 2017 at 3:46pm —
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ख़ुद से हो जाएगी नफरत मुझे मालूम न था
है अजब चीज़ मुहब्बत, मुझे मालूम न था ||
गम से हो जायेगी उल्फ़त मुझे मालूम न था
ऐसी होगी मेरी क़िस्मत मुझे मालूम न था ||
दूध में कोई नहाये कोई भूखा ही रहे
ऐसे होती है सियासत मुझे मालूम न था ||
ख़्वाब में रोज़ ही मिलते थे मग़र, यार मेरे
ख़्वाब होगा ये हक़ीक़त मुझे मालूम न था ||
वहम इक पाल लिया था मेरे दिल ने यूँ ही
थी उसे हँसने की आदत मुझे मालूम न था ||
यार कहता था ग़ज़ल वक़्त…
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Added by नाथ सोनांचली on September 4, 2017 at 1:44pm —
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22 22 22 22
मैंने दिल की बात कही है
उनको लगती खूब खरी है।1
मंदिर-मंदिर भटके हैं सब
बाबाओं की धूम मची है।2
दाढ़ी ने है नाच नचाया
जब-जब लक्ष्मी हाथ लगी है।3
कितने डेरे उजड़े अबतक
डेरों की सरकार चली है।4
भूखे-नंगे बढ़ते जाते
भक्तों की बारात सजी है।5
चुनकर जाते जो संसद में
लगता उनकी साँस टँगी है।6
निर्वाचक ऊँघते, परते हैं
जात-धरम की खाट पड़ी है।7
न्याय बड़ा डंडाधारी है
ले-देकर यह आस…
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Added by Manan Kumar singh on September 3, 2017 at 5:57pm —
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बस खचाखच भरी हुई थी। चुकि मैं पहले आ गया था, इसलिए मुझे सीट मिल गयी थी, बावजूद इसके भीड़ का असर मुझ पर भी हो रहा था।
यकायक मेरी नजर एक ऐसे शख्स पर गयी, जो मुझे बचपन के दिनों में गणित पढ़ाया करते थे। वे भी बस में खड़े खड़े भीड़ के दबाव को झेल रहे थे। लगभग 30 साल पहले, एक हृष्ट पुष्ट युवा को आज एक कमजोर असहाय बुजुर्ग के रूप में देखकर पहले पहचानने में थोड़ी असहजता हुई पर ध्यान से देखने पर मैं उन्हें भली भांति पहचान गया ।
मैं उठा और प्रणाम कर अपनी सीट पर उन्हें बैठने का आग्रह…
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Added by नाथ सोनांचली on September 3, 2017 at 2:00pm —
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बह्र : 221/2121/1221/212
इस दोस्ती के बीच तिजारत कहाँ कहाँ
तुमने लगायी है मेरी कीमत कहाँ कहाँ
तुम मुझ से कह रहे हो कि मैं होश में रहूँ
नासेह दे रहे हो नसीहत कहाँ कहाँ
सब कुछ हमें ख़बर है नुमाइश के दौर में
करता है कौन कितनी सियासत कहाँ कहाँ
हैं आप जो ख़ुदा तो मुझे पूछना है ये
पहुँची है मुफ़लिसों की इबादत कहाँ कहाँ
गंगा में ले के जाइए और फेंक आइए
ढोते फिरेंगे आप मुहब्बत कहाँ कहाँ
तुम पूछ तो रहे हो मगर क्या…
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Added by Mahendra Kumar on September 3, 2017 at 12:39pm —
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'पार्टियां अभी बाक़ी हैं !' (लघुकथा) :
एक दफ़्तर में त्योहार के अवकाश के बाद समोसे-कचौड़ी-आहार-रूपेण बधाईयों का दौर या 'दौरा सा' चला। सब अपने काम फिर से शुरू करने ही वाले थे कि उनमें से एक ने दूसरे से कहा- "कल तो तूने बधाई तक नहीं दी मेरे त्योहार पर! सोशल मीडिया पर मेरे धर्म और रीति-रिवाज़ों की जम कर खिल्ली उड़ा रहा था! उससे तेरे को कोई मेडल या अवार्ड मिल गया क्या?"
"तेरे को मिल गया क्या उन रीति-रिवाज़ों को दोहरा-दोहरा कर?" दूसरे ने कहा।
"तुझे तेरी कट्टरपंथी और पोंगापंथी से…
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Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 3, 2017 at 10:10am —
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2122 1212 22/(112)
साथी उससे कोई खरा न हुआ
साथ गम ने दिया जुदा न हुआ
रोकती बस रही रज़ा तेरी
हमने चाहा बुरा,बुरा न हुआ
छल कपट से रहा कमाता जिसे
जऱ यूँ ही बह गया तेरा न हुआ
बस बनावट भरा लगा रिश्ता
जिसमें कोई कभी खफ़ा न हुआ
डोर दिल की बँधी रही जिससे
दूर है वह मग़र जुदा न हुआ
जिंदगी को सही समझ न सके
मुश्किलों से जो सामना न हुआ
बंद आँखों ने जो किया दीदार
आँखें खोली वो देखना न…
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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 3, 2017 at 8:00am —
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2122 1212 22
दर्द से जिसका राब्ता न हुआ
ज़ीस्त में उसकी कुछ नया न हुआ
हाल-ए-दिल उसने भी नहीं पूछा
और मेरा भी हौसला न हुआ
आरज़ू थी बहुत, मनाऊँ उसे
उफ़! मगर वो कभी ख़फ़ा न हुआ
तब तलक ख़ुद से मिल नहीं पाया
जब तलक ख़ुद से गुमशुदा न हुआ
सिर्फ़ इक पल की थी वो क़ैद-ए-नज़र
जाने क्यों उम्र-भर रिहा न हुआ
मुझसे छूटी नहीं ख़ुलूस-ओ-वफ़ा
आदमी मैं कभी बड़ा न हुआ
अपनी ख़ुशबू ख़ला में छोड़ के "जय"
दूर होकर भी वो जुदा…
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Added by जयनित कुमार मेहता on September 2, 2017 at 10:36pm —
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प्रेम-पचीसी--भाग 2 (प्रीत-पगे दोहे)
कौन रसायन बह रहा, रग-रग फैली आग ।
स्त्राव हुआ किस ग्रन्थि से, धड़कन गाए राग ।। ...1
दर्पण देखूँ सौ दफ़ा, फिर-फिर बाँछूँ बाल ।
सूरत अपनी देखकर, गाल हुए हैं लाल ।। ...2
मैं मछली सी हो गयी, सागर तेरा ध्यान ।
बाहर निकसूँ तो चली, जाए मेरी जान ।। ... 3
जित देखूँ उत साँवरे, दिखे तिहारा रूप ।
अंधी होकर प्रेम में, पाए नैन अनूप ।। ...4
लज़्ज़त तेरी दीद की, याद मुझे है यार ।
दीदों से आँसू नहीं, टपक…
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Added by khursheed khairadi on September 2, 2017 at 6:03am —
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221 2121 1221 212
आ जाइये हुजूर जरा फिर हिजाब में ।
लगती बुरी नजर है यहां माहताब में ।।
बच्चों की लाश पर है तमाशा जनाब का ।
औलाद खो रहे किसी खानाखराब में ।।
अंदाज आपके हैं बदलते अना के साथ ।
शायद कोई नशा है यहां इंकलाब में ।।
सत्ता मिली जो आपको चलने लगे हैं दौर ।
डूबे मिले हैं आप भी महंगी शराब में ।।
खामोशियों के बीच जफा फिर जवाँ हुई ।
आंखों ने अर्ज कर दिया लुब्बे लुआब में ।।
यूँ ही किया था जुर्म वो दौलत…
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Added by Naveen Mani Tripathi on September 1, 2017 at 11:06pm —
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2122/2122/2122/212
आज ढ़लती धूप सी हैं दादी नानी फिर कहाँ
तिफ़्ल सुनले चाँद परियों की कहानी फिर कहाँ
घर घरोंदे गुड्डे गुडिया राजा रानी फिर कहाँ
कश्तियाँ कागज की ये बारिश का पानी फिर कहाँ
छोड़ ये टीवी मोबाइल दौड़कर तितली पकड़
बचपना जी भरके जी ऐसी रवानी फिर कहाँ
पेड़ों की शाखें हैं सूनी खेल के मैदान चुप
जूझना हालात से सीखे जवानी फिर कहाँ
माँ के आंचल से पिता के कांधे तक फैली थी जो
बचपने की वो हुकूमत हुक्मरानी फिर…
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Added by Gajendra shrotriya on September 1, 2017 at 9:11pm —
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कैसी ये बदहाली है ,
हर इंसान सवाली है ।
सूखे-सूखे होंठ सभी ,
उस चहरे पे लाली है ।
कौन ग़मों से बच पाया ,
सबने पीड़ा पाली है ।
जब से कूच कर गई माँ ,
घर भी खाली-खाली है ।
सब समझे हैं सभ्य उसे ,
गुंडा और मवाली है ।
ख़ुशियाँ रूठी बैठी है ,
ग़ुर्बत में दीवाली है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।
Added by Mohammed Arif on September 1, 2017 at 5:37pm —
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२१२२,१२१२,२२ (११२)
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दिल ने थोड़ा मलाल रक्खा है
तेरी यादों को पाल रक्खा है.
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रोज़ मरता हूँ..और मरता हूँ
फिर भी ख़ुद को सँभाल रक्खा है.
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यूँ तो अंजाम जानता हूँ मगर
एक सिक्का उछाल रक्खा है.
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मैं तेरी शोख़ियाँ पकड़ लूँगा
मैंने आँखों में जाल रक्खा है.
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तेरे मिलने तलक जुदाई का
फ़ैसला मैंने टाल रक्खा है.
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ख़ूब पीता हूँ..छक के पीता हूँ
ख़ुद का कितना ख़याल रक्खा है.
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और सारा कुसूर अँधेरे का…
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Added by Nilesh Shevgaonkar on September 1, 2017 at 11:36am —
30 Comments
22 22 22 22
ताप मसीहे हरने आते
प्यार दिलों में भरने आते।1
फूल टपकते झोली-झोली
बेमौसम वे मरने आते।2
पाँव पखाड़ेंगे बाबा के
नेता जी बस धरने आते।3
पाँच बरस अहिवात बनें बस
नेता नर को वरने आते।4
सूखी प्यासी रहती धरती
बादल प्लावित करने आते।5
हार गये जो दाँव जुआरी
जन-मंडल में तरने आते।6
बिन पानी के जो बदरा,वे
बेमतलब के टरने आते।7
@मौलिक व अप्रकाशित
Added by Manan Kumar singh on September 1, 2017 at 10:00am —
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३१ अगस्त... प्रिय अमृता प्रीतम जी का पावन जन्म-दिवस। बहुत ही याद आई, मेरे खयालों में तैरती बीते सालों की हवा लौट आई।
सन १९६४ ... अमृता प्रीतम जी और मैं अभी कुछ ही दिन पहले मिले थे। तत्पश्चात टेलिफ़ोन पर उनसे बात हुई तो कुछ दार्श्निक सोच में थीं। बात बदलते हुए मौसम से ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव पर, और फिर झरने पर... जहाँ पानी नीचे गिरता है, गिर कर ऊपर नहीं उठता। जानते हुए कि वह उस दिन तमस-भाव में थीं, मैं उनकी…
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Added by vijay nikore on September 1, 2017 at 5:52am —
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