Added by VIRENDER VEER MEHTA on July 2, 2015 at 8:43am — 20 Comments
1222 1222 1222 1222
मुहब्बत कब छिपी है चिलमनों की ओट जाने से
नज़र की शर्म कह देगी तुम्हारा सच जमाने से
अरूजी इल्म में उलझे नहीं, बस शादमाँ वो हैं
हमे फुरसत नहीं मिलती कभी मिसरे मिलाने से
उदासी किस क़दर दिल में बसी है क्या कहें यारों
बस अश्कों का बहा दर्या है दिल के आशियाने से
अकड़ने से बढ़ा हो क़द , मिसाल ऐसी नहीं, लेकिन
झुके हैं बारहा लेकिन किसी के सर झुकाने से
कभी ये भी …
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on July 2, 2015 at 8:30am — 23 Comments
2122 2122 2122 212
मुस्कुराकर मौत जितनी पास आयी दोस्तो
ये न भूलो, ज़िन्दगी भी थी बुलाई दोस्तो
बेवफाई जाने कैसे उन दिलों को भा गई
हमने मर मर के वफा जिनको सिखाई दोस्तो
धूप फिर से डर के पीछे हट गई है, पर यहाँ
जुगनुओं की अब भी जारी है लड़ाई दोस्तो
कल की तूफानी हवा में जो दुबक के थे छिपे
आज देते दिख रहे हैं वे सफाई दोस्तो
आईना सीरत हूँ मैं, जब उनपे ज़ाहिर हो गया
यक-ब-यक दिखने लगी मुझमें बुराई…
Added by गिरिराज भंडारी on July 2, 2015 at 8:30am — 28 Comments
"साहब ये देखिये लहलहाता खेत, दो साल पहले यहाँ बंजर जमीन थी, हम लोग जब इसे उपजाऊ बना सकते हैं तो आसपास की सारी ज़मीन क्यों नहीं?"
"बिलकुल ठीक है, इस गाँव के लिये जितने भी रुपयों का आपने प्रस्ताव भेजा है, वो मंजूर किया जाता है|"
खेत के एक कोने में हरी चुपचाप खड़ा था, उस अकेले की दो साल की मेहनत के बाद कम से कम चौधरी जी तो गुमनामी के अँधेरे से बाहर आये, जिनका पूरा परिवार अब…
ContinueAdded by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 1, 2015 at 11:22pm — 13 Comments
२१२२ २२१२ २१२२ २२
अब जो जायेंगे उस गली तो सबा छेड़ेगी
वारे उल्फ़त! मुझको मेरी ही वफ़ा छेड़ेगी
..
जिसको आँखों में भरके फिरते थे हम इतराते
हाय जालिम तेरी कसम वो अदा छेड़ेगी
..
जो गुजरते हर एक दर पे थी हमने मांगी
राह में मिलके मुझसे वो हर दुआ छेड़ेगी
..
वो जो बातें ख्यालों की ही रह गई बस होकर
बेसबब बेवख्त आ मुद्दा बारहा छेड़ेगी
..
सुनते ही जिसको तुम चले आते थे दौड़े
हाँ…
ContinueAdded by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 1, 2015 at 6:00pm — 25 Comments
सोनाली हर बार यानि पिछले आठ वर्षों से अपना जन्म -दिन , घर के पास के पार्क में खेलने वालों बच्चों के साथ ही मनाती है। उनके लिए बहुत सारी चोकलेट खरीद कर उनमे बाँट देती है।आज भी वह पार्क की और ही जा रही है।उसे देखते ही बच्चे दौड़ कर पास आ गए।और वह ...! जितने बच्चे उसकी बाँहों में आ सकते थे , भर लिया। फिर खड़ी हो कर चोकलेट का डिब्बा खोला और सब के आगे कर दिया।बच्चे जन्म-दिन की बधाई देते हुए चोकलेट लेकर खाने लगे।
" एक बच्चा इधर भी है , उसे भी चोकलेट मिलेगी क्या ...?" सोनाली के पीछे से…
ContinueAdded by upasna siag on July 1, 2015 at 5:30pm — 9 Comments
तरही ग़ज़ल
2122 1122 1122 22
ये तबाही भरे मंजर नहीं देखे जाते
आँखों में गम के समंदर नहीं देखे जाते
फलसफा इश्क का मैं आज तुम्हे समझा दूं
इश्क में रहजन-ओ –रहवर नहीं देखे जाते
एक मुफलिस की ग़ज़ल सुनके बज्म झूम उठी
रुतवे महफ़िल में सुखनवर नहीं देखे जाते
इक सदी होने को आयी हमें आज़ाद हुए
मुझसे हैं लोग जो बेघर नहीं देखे जाते
रिंद गर सच्चा तू होता तो खुद समझ लेता
खाली क्यूँ मुझसे ये सागर नहीं देखे जाते
खेलती थी…
ContinueAdded by Dr Ashutosh Mishra on July 1, 2015 at 4:44pm — 18 Comments
२२ २२ २२ २२
कहीं पे' ठण्डी' बयार जिन्दगी ।
कहीं लगे अंगार जिन्दगी ।।
पतझड और बहार जिन्दगी ।
सुख दुख का व्यापार जिन्दगी ।।
जाने कितने रंग से' खेलें।
होली का त्यौहार जिन्दगी ।।
नानी माँ की गोद में' है तो।
इमली,आम,अचार जिन्दगी ।।
इश्क के' मारों से जो पूछा।
दिलबर का दीदार जिन्दगी ।।
उनके होंटों के साहिल पर।
फूलों सी रसदार जिन्दगी ।।
कौन समझ पाया है इसको।
उलझन का संसार जिन्दगी ।।…
Added by Rahul Dangi Panchal on July 1, 2015 at 2:00pm — 18 Comments
Added by मनोज अहसास on July 1, 2015 at 1:45pm — 13 Comments
समुद्र में मिलती नदी ने समुद्र से कहा, "बहुत खुश हूँ आज, सीमित असीम में समा रही है, कोई सीमा का बंधन नहीं..."
समुद्र चुप रहा|
उस चुप्पी को देख तट और तलहटी दोनों मुस्कुरा उठे|
(मौलिक और अप्रकाशित)
Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 1, 2015 at 12:30pm — 12 Comments
Added by Pari M Shlok on July 1, 2015 at 12:16pm — 22 Comments
२१२ १२२ २
गली गली बुहारूँ क्या?
नालियाँ निथारूँ क्या ?
काम छोड़ कर अब मैं
रास्ता निहारूँ क्या?
आसमां से उतरे हो
आरती उतारूँ क्या?
धूल लग गई शायद
पाँव भी पखारूँ क्या?
देखना है चेह्रा अब
आईना सँवारूँ क्या?
लाए कुछ नए जुमले
शब्द मैं सुधारूँ क्या?
धूप लग रही क्या जी
अब्र को पुकारूँ क्या?
वोट मांगने आये
पांच…
ContinueAdded by rajesh kumari on July 1, 2015 at 12:00pm — 27 Comments
“दोनो पैरों के अँगूठों में बन्धी रस्सी भी खोल दो, चिता पर कोई भी गाँठ या बन्धन नहीं होता..”
“चिता पर सारे बन्धन खत्म हो जाते हैं” - किसी और ने कहा.
सुनते ही राकेश पत्नी प्रिया और उसके बीच के सबसे बडे़ बन्धन एक साल के बेटे को अपने सीने से लगाये प्रिया के निर्जीव शरीर को चुपचाप देखता हुआ फिर से फ़फ़क पड़ा.
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(मौलिक व अप्रकाशित)
Added by Shubhranshu Pandey on July 1, 2015 at 12:00am — 22 Comments
बह्र : २१२२ २१२२ २१२२ २
जिस्म की रंगत भले ही दूध जैसी है
रूह भी इन पर्वतों की दूध जैसी है
पर्वतों से मिल यकीं होने लगा मुझको
हर नदी की नौजवानी दूध जैसी है
छाछ, मक्खन, घी, दही, रबड़ी छुपे इसमें
पर्वतों की ज़िंदगानी दूध जैसी है
सर्दियाँ जब दूध बरसातीं पहाड़ों में
यूँ लगे सारी ही धरती दूध जैसी है
तेज़ चलने की बिमारी हो तो मत आना
वक्त लेती है पहाड़ी, दूध जैसी…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 29, 2015 at 6:24pm — 26 Comments
हमारा प्यार आँखों से अयाँ हो जाएगा इक दिन
छुपाना लाख चाहोगे बयाँ हो जाएगा इक दिन
ये सब वहशत-ज़दा रातें इसी उम्मीद में गुज़रीं
कि तुम आओगे , रौशन ये समां हो जाएगा इक दिन
न टूटे दिल , न तन्हा रात , न भीगी हुई पलकें
मगर सब छीन कर बचपन,जवां हो जाएगा इक दिन
तुम्हारे सुर्ख होठों की महक में ऐसा जादू है
कि भवरों को भी फूलों का गुमाँ हो जाएगा इक दिन
लिखो बस गीत उल्फ़त के और नग्मे प्यार के…
ContinueAdded by saalim sheikh on June 29, 2015 at 11:30am — 19 Comments
“मेरे ग्रैंड फादर राय बहादुर थे” ..... उस व्यक्ति ने बुद्धिजीवियों की सभा में अकड़ के साथ यह बात कही । सभा के आयोजक ने भी गर्व से अपना सर ऊंचा कर लिया । वहाँ उपस्थित लोग जो उस व्यक्ति को मिल रहे विशेष सम्मान, तवज्जो , उसके समृद्ध पहनावे एवं उसकी मंहगी गाड़ी से पहले ही नतमस्तक हो रहे थे, यह सुनकर थोड़े और विनीत भाव दिखलाने लगे। उसे मंच पर सबसे ऊंची कुर्सी दी गयी । सब उसके साथ एक फोटो खिचवा लेना चाहते थे । महेश सभा में सबसे पीछे की कुर्सी पर उपेक्षित सा बैठा अपने मलिन कपड़ों को देख रहा था। वह…
ContinueAdded by Neeraj Neer on June 28, 2015 at 6:25pm — 22 Comments
लघुकथा- आग
बरसते पानी में काम को तलाशती हरिया की पत्नी गोरी को बंगले में कुत्ते को बिस्कुट खाते हुए देख कर कुछ आश जगी, ‘ यहाँ काम मिल सकता है या खाने को कुछ. इस से दो दिन से भूखे पति-पत्नी की पेट की आग बुझ सकती थी.’
“ क्या चाहिए ?”
“ मालिक , कोई काम हो बताइए ?”
“ अच्छा ! कुछ भी करेगी ?” संगमरमरी गठीले बदन पर फिसलती हुई चंचल निगाहें उस के शरीर के रोमरोम को चीर रही थी.
“ जी !! ” वह धम्म से बैठ गई. उसे आज महसूस हुआ कि बिना तन की आग बुझाए पेट की आग नहीं बुझ…
ContinueAdded by Omprakash Kshatriya on June 28, 2015 at 1:30pm — 18 Comments
पढाया गया था-
‘मैन इज ए सोशल एनिमल’
हमने भी रट लिया
औरों की तरह
पर मन नहीं माना
कहाँ पशु और कहाँ हम
पर एक दिन जाना
पक्षी और पशु
दोनों ही बेहतर है
हम जैसे मानव से
क्योंकि
भूख सबको लगती है
पर पक्षी
न घुटने टेकता है
और न हाथ फैलाता है
रोता भी नहीं
गिडगिडाता भी नहीं
हाथ तो मित्र
पशु भी नहीं फैलाते
बल्कि वे…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 28, 2015 at 1:13pm — 9 Comments
"सर, हमारे अमरूदों के बाग़ में कुछ लोग रोज़ शाम को शराब पीते हैं साथ में जुआ भी..."
"एफ.आई.आर. करवा दो|"
"कोई फायदा नहीं सर, उसमें कुछ पुलिस वाले भी हैं..."
"तो फिर ये मूर्ती ले जाओ, शराब की बदबू अगरबत्ती और फूलों की खुश्बू में बदल जायेगी|"
(मौलिक और अप्रकाशित)
Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on June 28, 2015 at 12:37pm — 9 Comments
२१२२/२१२२/२१२/
मंज़िलों का जो पता दे जाएगा
ज़िंदगी का फ़लसफ़ा दे जाएगा.
.
और थोड़ा फ़ासला दे जाएगा
ज़िंदगी की गर दुआ दे जाएगा.
.
दिल को सतरंगी छटा दे जाएगा
फिर धड़कने की अदा दे जाएगा.
.
ग़म हमें अब और क्या दे जाएगा
बस नया इक तज्रिबा दे जाएगा.
.
आएगा कोई पयम्बर फ़िर नया
फ़िर नया हम को ख़ुदा दे जाएगा.
.
जब वो सोचेगा हमारे वास्ते
फिर वो मीरा, राबिया दे जाएगा.
.
“नूर” बरसेगा ख़ुदा का एक दिन
मुश्किलों…
Added by Nilesh Shevgaonkar on June 28, 2015 at 10:54am — 31 Comments
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