मत्तगयन्द सवैया // सात भगण + दो गुरू
बालक बुद्धि यही समझे, अखबार सुधार किया करते हैं।
जूठन खीर न दूध गिरे, इस हेतु बिछा भुइ को ढकते है।।
आखर-आखर कालिख ही, मन सोच-विचार भली कहते हैं।
मानव नित्य प्रलाप करे, अखबार प्रशासन ही छलते हैं।।
के0पी0सत्यम/ मौलिक व अप्रकाशित
Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 24, 2015 at 7:08pm — 4 Comments
पुष्प अधखिले : हरि प्रकाश दुबे
ओस की बूंदों में भीग कर
श्रृंगार नया मन रूप का कर
सूरज की रोशनी में चमकते हुए
खूब इठलाते हैं, पुष्प अधखिले !
मंदिर- मज़ार में चढाए जाते है
प्रभु चरणों मै अर्पित हो कर
मन में एक विश्वाश जगा
फूले नहीं समाते हैं, पुष्प अधखिले !
प्रिय को समर्पण की चाह में
किताबों में रख दिए जाते है
प्रेम के इज़हार और इंतज़ार में
सूख कर भी मुस्कराते हैं, पुष्प अधखिले…
ContinueAdded by Hari Prakash Dubey on June 24, 2015 at 4:50pm — 8 Comments
संशोधित दोहे :
कर्म बिना मेवा नहीं, बिन मान नहीं शान
विधवा सी लगती सदा,सुर बिन जैसे तान
पैसा काम न आयेगा, जब आएगा काल
रह जाएगा सब यहीं , काहे करे मलाल
काया माया का भला , काहे करे गुमान
नश्वर ये संसार है , क्षण भर का अभिमान
ममता को बिसरा दिया ,भूल गया हर फ़र्ज़
चुका न पाया दूध का , जीवन में वो क़र्ज़
मानव दानव बन गया, किया खूब संहार
पाप कर्म से कर लिया, पापी ने…
Added by Sushil Sarna on June 24, 2015 at 4:30pm — 18 Comments
दवा है दर्द की कह कर पिला देगा मुझे कोई
गिरा कर अश्क फिर अपने बहा देगा मुझे कोई
सिख़ाओ मत मुझे जीना न है अब जिन्दगी प्यारी
दिखा कर प्यार के सपने जला देगा मुझे कोई
गमो की राह अच्छी है न आता पास दुश्मन भी
डगर सुख की चले तो बददुआ देगा मुझे कोई
निराले खेल दुनिया के कभी खेला अगर मैने
न दोगे साथ मेरा तो हरा देगा मुझे कोई
न है हर फूल में काँटे हमेशा सोचता हूँ मै
न बदला सोच अपना तो मिटा देगा मुझे…
ContinueAdded by Akhand Gahmari on June 24, 2015 at 3:57pm — 10 Comments
तुम महान
अद्भुत स्वप्नद्रष्टा
स्वप्न कैसा
साकार किया है
व्यास प्रकाश
पुंज से अपने
जीवन का
महाकाव्य दिया है
तमस तम को
काट ज्ञान से
शुभ्र अमर
संदेश दिया है
तुम दूर दृष्टा हो
मै अज्ञानी
जन्म साकार
यह मूर्त दिया है
मस्तक पर तुम
चंदन हो स्वामी
यह हमने
स्वीकार किया है
तुम मेरे गुरू
गोविंद ब्रह्मज्ञानी
तुममें ईश्वर का
साक्षात्कार किया है
कान्ता राॅय…
Added by kanta roy on June 24, 2015 at 10:30am — 7 Comments
लघुकथा – तकनीक
बिना मांगे ही उस ने गुरु मन्त्र दिया, “ आप को किस ने कहा था, भारी-भारी दरवाजे लगाओं. तय मापदंड के हिसाब से सीमेंट-रेत मिला कर अच्छे माल में शौचालय बनावाओं. यदि मेरे अनुसार काम करते तो आप का भी फायदा होता ?” परेशान शिक्षक को और परेशान करते हुए पंचायत सचिव ने कहा , “ बिना दक्षिणा दिए तो आप का शौचालय पास नहीं होगा. चाहे आप को १०,००० का घाटा हुआ हो.”
“ नहीं दूं तो ?”
“ शौचालय पास नहीं होगा और आप का घाटा ३५,००० हजार हो जाएगा. इसलिए यह आप को…
ContinueAdded by Omprakash Kshatriya on June 24, 2015 at 8:30am — 13 Comments
" साहब , ई सब खाने वाला समान को जलवा देंगे आपलोग ", गोदाम में रखते हुए जोखन ने पूछा |
" हाँ , इनकी एक्सपायरी हो गयी है और ये नुक़्सान पहुँचा सकते हैं लोगों को , इसलिए इनको जलाना पड़ेगा "|
" हमको दे दो साहब , जब भूख प्यास हम लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ पाती है तो ये क्या नुक़्सान करेगा | बच्चे दुआ देंगे आपको "|
एक बार उसने जोखन की आँखों में देखा , फिर मन में सोचा " मैं चांस नहीं ले सकता | कुछ हो गया तो ?
थोड़ी देर में सारा सामान जल रहा था और जोखन की आँखों में कुछ देर पहले जले…
Added by विनय कुमार on June 23, 2015 at 9:00pm — 10 Comments
वो चार पहियां गाड़ी कहाँ मिलेगी कोई हमें बता दे,
एक हमसफ़र के साथ चलायें जिसे , ऐसी कोई खता दे
जिसमे न खिड़की हो,
जिसमे न दरवाज़ा ,
जो चले ज़रा धीरे-धीरे ,
बादलों को चीरे-चीरे |
वो चार पहियां गाड़ी कहाँ मिलेगी कोई हमें बता दे,
एक हमसफ़र के साथ चलायें जिसे , ऐसी कोई खता दे
पहियां बड़ा…
Added by Rohit Dubey "योद्धा " on June 23, 2015 at 7:30pm — 5 Comments
Added by VIRENDER VEER MEHTA on June 23, 2015 at 4:21pm — 9 Comments
भूख(लघु कथा)
आखिरी बस जा चुकी।सन्नाटा पसर चला।उसे चूल्हे की आग बुझती-सी लगी,पर यूँ ही बैठी रही।अचानक उसका ध्यान भंग हुआ,
--बस छूट गयी क्या?
दूकान बंद करते पानवाले ने पूछा।
-नहीं,बस यूँ ही---उसने मुड़कर पीछे देखा।पानवाला उसे अंदर तक घूरता-सा लगा।
--अब कोई नहीं आयेगा,चल न मेरे यहाँ आज।
--नहीं,घर में बच्चे भूखे होंगे,और फिर तेरी घरवाली.........?
-मैके चली गयी है।बगल के…
Added by Manan Kumar singh on June 23, 2015 at 3:52pm — 14 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on June 23, 2015 at 1:20pm — 8 Comments
बूँद बूँद बरसो
मत धार धार बरसो
करते हो
यूँ तो तुम
बारिश कितनी सारी
सागर से
मिल जुलकर
हो जाती सब खारी
जितना सोखे धरती
उतना ही बरसो पर
कभी कभी मत बरसो
बार बार बरसो
गागर है
जीवन की
बूँद बूँद से भरती
बरसें गर
धाराएँ
टूट फूट कर बहती
जब तक मन करता हो
तब तक बरसो लेकिन
ढेर ढेर मत बरसो
सार सार…
ContinueAdded by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 23, 2015 at 12:08pm — 8 Comments
1212 1122 1212 22 /112
फ़लक पे जो मुझे अक्सर दिखाई देता है
वो आम लोगों में तनकर दिखाई देता है
अभी हैं बदलियाँ चारों तरफ से घेरी हुईं
तभी तो चाँद भी बदतर दिखाई देता है
जो तोप ले के चले साथ अपनें , वो हमको
कहें हैं हाथ में ख़ंजर दिखाई देता है…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on June 23, 2015 at 9:00am — 22 Comments
विरह-हंसिनी हवा के झोंके
श्वेत पंख लहराए रे !
आज हंसिनी निठुर, सयानी
निधड़क उड़ती जाए रे !
अब तो हंसिनी, नाम बिकेगा
नाम जो सँग बल खाए रे !
होके बावरी चली अकेली
लाज-शरम ना आए रे !
धौराहर चढ़ राज-हंसनी,
किससे नेह लगाए रे !
कोटर आग जले धू-धूकर
क्यों न उसे बुझाए रे !
ओरे ! हंसिनी, रंगमहल से
कहाँ तू नयन उठाए रे !
जिस हंसा के फाँस-फँसी
कोई उसका सच ना पाए रे…
ContinueAdded by Santlal Karun on June 22, 2015 at 7:00pm — 11 Comments
विश्व पटल पर अगणित होकर
कोटि कोटि नव योगी बनकर
वसुधैव कुटुंबकम रूपम
स्वप्न हमारा योग दिवस की
शुभ प्राची में सच सा ही प्रतीत होता है ।
भारत स्वयं ही जनक योग का
करे निवारण रोग रोग का
निज संस्कृति घोतक स्वरुप
आरोग्य प्रदायक विश्व शांति के हित
अर्पण करने का श्रेय लेने को मनोनीत होता है
विश्व गुरु वाली वह संज्ञा
केवल संज्ञा भर न रह कर
ज्ञान ज्योति जवाजल्यमान हो
पुनः विश्व तम को हरने का दम भरकर
भारत अपना परचम…
Added by Aditya Kumar on June 22, 2015 at 12:50pm — 9 Comments
Added by kanta roy on June 22, 2015 at 10:00am — 24 Comments
२२१ २१२१ १२२१ २१२
ये हैं मरासिम उसकी मेरी ही निगाह के
तामीरे-कायनात है जिसका ग़वाह के
..
सजदा करूँ मैं दर पे तेरी गाह गाह के
पाया खुदा को मैंने तो तुमको ही चाह के
..
हाँ इस फ़कीरी में भी है रुतबा-ए-शाह के
यारब मै तो हूँ साए में तेरी निगाह के
..
जो वो फ़रिश्ता गुजरे तो पा खुद-ब-खुद लें चूम
बिखरे पडे हैं फूल से हम उसकी राह के
..
छूटा चुराके दिलको…
ContinueAdded by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 22, 2015 at 9:13am — 40 Comments
Added by गिरिराज भंडारी on June 22, 2015 at 6:30am — 12 Comments
कुछ कहा भी नहीं कुछ सुना भी नहीं
वास्ता बीच अब कुछ रहा भी नहीं
वक्त मेरा समझिये हुआ है फ़िजूल,
प्यार उनकी नज़र में दिखा भी नहीं
कौन कहता यहाँ लोग मासूम हैं,
बात करते नहीं कायदा भी नहीं
है पड़ोसी मगर हाल तो देखिये
,बोलता भी नहीं जानता भी नहीं
फ़लसफ़े जिन्दगी के अजीबो गरीब,
अब कहो क्या लिखें कुछ नया भी नहीं
मुफ़लिसी से हुआ बेअसर ये सबू ,
जाम पर जाम पीकर नशा भी…
ContinueAdded by rajesh kumari on June 21, 2015 at 10:00am — 12 Comments
समय छिपा जा सूर्य चक्र में ,जहां दुनिया सारी डोले
धरती से लेकर आसमान में ,नित नये रहस्य को खोले !
कली के अंदर छिपे फूल में, अपना नाना रूप छिपाये
घूम- घूम कर मधुकर उपवन में, सुंदर राग सुनाये !
फूल के अंदर छिपे सुगंध में , अमृत के कण घोले…
ContinueAdded by Ram Ashery on June 21, 2015 at 10:00am — 1 Comment
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