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"थकी हुयी सी जिन्दगी"

थकी हुयी सी जिन्दगी,

थका हुआ मुकाम है।

कौन सी जगह है ये,

हर कोई परेशान है।।

सुबह की धूप शाम है,

शाम रात सी घनी।

हवा मे क्या ये घुल रहा,

फिज़ा जहर सी बनी।

कहाँ आ गये है हम,

हर कोई हैरान है।।

अजनबी है हर कोई,

अजनबी है ये जहाँ।

मोबाईल वैब से जुडे,

दिलो के फासले यहाँ।

हर किसी का नाम है,

पर हर कोई बेनाम है।।

थकी हुयी सी जिन्दगी,

थका हुआ मुकाम है।

कौन सी जगह है ये,

हर कोई परेशान है।।



'विरेन्दर… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on June 28, 2015 at 9:22am — 13 Comments

माचिस की तीली की आत्मकथा ( लघुकथा )

सिरा है मेरा काला ,

तन है मेरा सफ़ेद |

मोल नहीं कुछ मेरा ,

करूँ अगर रंगों में मेरे भेद |

कोई ना जाने मोल मेरा,

गर रहूँ मैं डिब्बे में बंद |

बाहर निकल कर रगड़ जो खाऊं ,

तब बनु मैं ज्योत अखंड |

रहती हूँ अपनी सहेलियों के सांथ,

काम आती रहेंगी जो आपके ,

मेरे जाने के भी बाद |

लौ के रूप में उत्साह के सांथ हम बाँट लेती हैं एक दूजे का दर्द /``\ /``\

त्योहारों में दिया जलाकर खुशियां भी लाती हूँ |

बीड़ी-सिगरेट को जला कर धूम्रपान भी फैलाती…

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Added by Rohit Dubey "योद्धा " on June 27, 2015 at 7:59pm — 7 Comments

प्‍यार धरती की

बिछा मेरा जमीं पे दिल कदम अपने बढ़ाती है

मुझे ही प्‍यार करती है कसम भी रोज खाती है



न कोई प्‍यार अब लिखना, किताबो से मिटा देना

वफा कैसे करें पढ कर जला वो दिल दिखाती है



जुदाई चीज है ऐसी कही खुशियाँ कही दे गम

जुदा नभ से हो बूँदे प्यास धरती की मिटाती है



खिलो मत एे कमल अब तुम, तुझे देखे न अब दुनिया।

तुम्‍हारा नाम ले जिसको, पुकारू वो सताती है।।



छुपा लो चाँद को बादल, न है अब रौशनी प्यारी

उजाला देख कर मुझको, किसी की याद आती है



किसे…

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Added by Akhand Gahmari on June 27, 2015 at 5:05pm — 5 Comments

गजल-मेरा मन मेरे सामने आइना है

मेरा मन मेरे सामने आइना है
मेरा आज खुद से हुआ सामना है
तुम्हारे मिलन में मुझे फैलना है
मगर किसलिये आज मन अनमना है
तुम्हारी खुशी में हमारी खुशी है
खुशी से खुशी को हमें बाँटना है
महब्बत पनपती नहीं जकडनों में
ये रस्मों का जंगल हमें तोड़ना है
तुम्हारी महब्बत भी मंजिल थी लेकिन
अभी जिंदगी है अभी दौड़ना है

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सूबे सिंह सुजान on June 27, 2015 at 2:12pm — 6 Comments

एक प्रयास आस्तित्व के लिए ( लघुकथा ) कान्ता राॅय

एक प्रयास आस्तित्व के लिए (लघुकथा )





भूमि उर्वरक थी । महत्वाकांक्षी थी, स्वंय के सर्वोच्च उत्पादन हेतु । वो ...... जिसके मालिकाना हक में बंधी हुई थी .... उदासीन निकला था ....भूमि के प्रति । जिसके परिणाम स्वरूप बंजर के उपनाम से उद्घोषित होने लगी थी ।



वह सृजन के लिए बेताब हो खरपतवार का ही पोषण करती गई । क्यों ना करें ..? सार्थक बीजों से मोहताज जो थी !

वह सृजन की अभिलाषी , अपना अभिलाषा चाहे कैसे भी पूरा करे ..!



राह चलते अब लोगों की नजर उस बड़ी बड़ी… Continue

Added by kanta roy on June 27, 2015 at 10:56am — 4 Comments

उड़ान : लघु कथा- हरि प्रकाश दुबे

“सुनंदा .सुनंदा, सुन तो सही, इतनी उदास क्यों है?”

“कुछ नहीं माँ बस सर में थोडा दर्द है !”

“अच्छा ठीक है तू नहा कर आ मैं तेरे सर की मालिश कर देती हूँ !”

“तुम भी न माँ हर बात के पीछे ही पड़ जाती हो .... सुनंदा ने चिल्लाते हुए कहा !”

“तेरी रगों में मेरा ही खून दौड़ रहा है सुनंदा, मैं सब समझ रहीं हूँ, तूने अपने पिता की म्रत्यु के बाद उनके दवाई बनाने के कारखाने को इतने अच्छे से संभाला, कभी भी तूने मुझे उनकी कमी महसूस नहीं होने दी, आज अगर वो जिन्दा होते तो भी क्या तू ऐसे…

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Added by Hari Prakash Dubey on June 27, 2015 at 9:07am — 6 Comments

पच्चईयाँ ( नाग पंचमी )

तीन दिन पहले से ही 

सच कहूँ तो एक हफ्ते पहले से ही 

पच्चईयाँ (नाग पंचमी) का 

इंतजार रहता था .... 

एक एक दिन किसी तरह 

से काटते हुये 

आखिर, पच्चईयाँ आ ही जाती थी 

पच्चईयाँ वाले दिन 

सुबह ही सुबह 

अम्मा पूरा घर 

धोती थी, हम सब को कपड़े 

पहनाती थी 

सुबह सुबह ही 

गली मे 

छोटे गुरु का बड़े गुरु का नाग लो भाई नाग लो 

कहते हुये बच्चे नाग बाबा 

की फोटो बेचते थे 

हम वो…

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Added by Amod Kumar Srivastava on June 27, 2015 at 7:00am — 6 Comments

अनुभव(लघु कथा, मनन कुमार सिंह)

अनुभव(लघुकथा)
-नहीं।
-क्यों?
-डरती हूँ,कुछ इधर-उधर न हो जाए।
-अब डर कैसा?बहुत सारी दवाएँ आ गयी हैं,वैसे भी हम शादी करनेवाले हैं न।
-कब तक?
-अगले छः माह में।
-लगता है जल्दी में हो।
-क्यों?
-क्योंकि बाकि सब तो साल-सालभर कहते रहे अबतक।
लड़के की पकड़ ढीली पड़ गयी।दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।फिर लड़की ने टोका
-क्यों,क्या हुआ?तेरे साथ ऐसा पहली बार हुआ है क्या?
'मौलिक व अप्रकाशित'@मनन

Added by Manan Kumar singh on June 27, 2015 at 12:01am — 4 Comments

बाँसुरी [दोहावली]

बन कान्हा की बाँसुरी, अधरों को लूँ चूम 

रस पी  कान्हा प्यार का ,नशे संग लूँ झूम ।।

 

ऐसा तेरी प्रीत का ,नशा चढ़ा चितचोर

अधर चूम के बाँसुरी ,करे ख़ुशी से शोर ।।

 

बन कान्हा की बाँसुरी, खुद पर कर लूँ नाज 

जन्म सफल होगा तभी ,छू लूँ उसकोआज ।।…

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Added by Sarita Bhatia on June 26, 2015 at 10:36pm — 1 Comment

गजल--मेरी किस्मत के पन्नों में कोई हरकत नहीं दिखती।

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

बहुत दिन हो गये अब भी कहीं राहत नहीं दिखती।

मे'री किस्मत के' पन्नों में को'ई हरकत नहीं दिखती।।

***

सभी मन्दिर में' मस्जिद,चर्च में दिल ले के' भटका हूँ।

किसी मजहब में' दुनिया के मुझे कुदरत नहीं दिखती।।

***

ते'री फुरकत के' तीरों ने किया हैं आश तक घायल।

मुझे अफसोस है तुझको मे'री हालत नहीं दिखती।।

***

सनम इक जख़्म रो रो कर बडी जिद करता' है मुझसे।

कहाँ से ला के' दूँ तुझको इसे गुरबत नहीं दिखती।।

***

हमारी जे़ब में… Continue

Added by Rahul Dangi Panchal on June 26, 2015 at 9:30pm — 18 Comments

ग़ज़ल : सवाल एक है लेकिन जवाब कितने हैं

बह्र : १२१२ ११२२ १२१२ २२

हर एक शक्ल पे देखो नकाब कितने हैं

सवाल एक है लेकिन जवाब कितने हैं

 

जले गर आग तो उसको सही दिशा भी मिले

गदर कई हैं मगर इंकिलाब कितने हैं

 

जो मेर्री रात को रोशन करे वही मेरा

जमीं पे यूँ तो रुचे माहताब कितने हैं

 

कुछ एक जुल्फ़ के पीछे कुछ एक आँखों के

तुम्हारे हुस्न से खाना ख़राब कितने हैं

 

किसी के प्यार की कीमत किसी की यारी की

न जाने आज भी बाकी हिसाब कितने…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 26, 2015 at 9:16pm — 22 Comments

अखंडित ( लघुकथा )

" आज कैसे याद किया , कोई काम था क्या ?

" नहीं यार , बस यूँ ही तुम्हारी याद आई और चला आया "|

कुछ देर बात चीत चलती रही और फिर वो उठ कर चल दिया | घर पहुँचते ही पत्नी ने पूछा " बात की उनसे , क्या कहा उन्होंने !

" हाँ , कहा तो हैं , देखो क्या होता हैं "|

" जब झूठ बोल नहीं सकते तो क्यों कोशिश करते हो | उनका फोन आया था , कह रहे थे जरूर कोई बात थी लेकिन मुझे बताया नहीं | अभी भी अपने उसूलों का पक्का हैं "|

" देखो तुम्हारे इतना कहने पर मैं चला तो गया था लेकिन कहते नहीं बना | खैर…

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Added by विनय कुमार on June 26, 2015 at 12:44am — 18 Comments

ग़ज़ल - ज़िन्दगी में तुम्हारी लहर मैं पिया

212 212 212 212

 

छोड़ दूँ अब कुंवारा नगर मैं पिया

काट लूँ सँग तुम्हारे सफर मैं पिया

 

मन न माने मगर क्या बताऊँ तुम्हें

साथ दोगे चलूंगी सहर मैं पिया

 

पंखुड़ी खिल गयी राग पाकर कहीं

बेज़ुबां अब न खोलूं अधर मैं पिया

 

मौत का गम नहीं साथ तुम हो मेरे   

मुस्करा के पियुंगी जहर मैं पिया

 

अब तुम्हारे सिवा कुछ न चाहूंगी मैं

दिल मिलाओ मिलाऊं नज़र मैं पिया

 

दूर से देखकर आज रुकना…

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Added by Nidhi Agrawal on June 25, 2015 at 12:01pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कुछ कहमुकरियाँ

(१ )

क्रोध बड़ा उसका जहरीला

 मुखड़ा होता नीला पीला

छेड़ूँ तो दिखलाता दर्प

क्या सखि  साजन

ना सखि सर्प    

(२ )

झूम झूम कर मुझे रिझाता  

अपनी ताकत सदा दिखाता  

प्यार करूँ तो बनता साथी

क्या सखि साजन

ना सखि हाथी  

(३ )

हाय मूढ़ की अजब  कहानी  

काटे तो माँगू ना पानी  

क्रोघ करे तो भागे पिच्छू 

क्या सखि साजन

ना सखि बिच्छू   

(४ )

हर दम पानी पीता रहता

एक जगह पर…

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Added by rajesh kumari on June 25, 2015 at 11:15am — 21 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- ये मेरा असर है ( गिरिराज भंडारी )

122    122 

ले, कदमों पे सर है

लो, अब भी कसर है

 

जो मर ही चुके हो

तो अब किसका डर है

 

नहीं ख़त्म होगा

ये मेरा असर है

 

नहीं कोई मंज़िल

महज़ रह ग़ुज़र है

 

तो घर में ही बैठो

अगर तुमको डर है

 

लिखे शह्र जिसको

हमें वो शहर है

 

नहीं है जो कड़वा

वो मीठा ज़हर है

 

लो, अन्धों से  सुन लो 

कहाँ रह गुज़र है

****************

मौलिक एवँ…

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Added by गिरिराज भंडारी on June 25, 2015 at 8:58am — 29 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - फिल बदीह -- खार सीने से लगाता कौन है ( गिरिराज भंडारी )

2122      2122    212 

छोड़िये , हमको बुलाता कौन है

खार सीने से लगाता कौन है

आप हैं गमगीन , खुद रोते रहें

अब यहाँ कन्धा बढाता  कौन है

 

हाथ अंगारों में रख कहते हैं वो

हमसा खुद को आजमाता कौन है

 

सोई खोई बस्ती की तनहाई में

ग़ज़ले-ग़ालिब गुनगुनाता कौन है

  …

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on June 25, 2015 at 8:30am — 28 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - फिल बदीह -- हमारा यक़ीं चाँद से उठ गया ( गिरिराज भंडारी )

122   122   122  12

 

अँधेरों के मित्रो,  हवा दीजिये

मै जलता दिया हूँ बुझा दीजिये

 

लिये आइना सब से मिलता रहा

सभी अब मुझे बद्दुआ दीजिये

 

हमारा यक़ीं चाँद से उठ गया

हमे जुगनुओं का पता दीजिये

 …

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on June 25, 2015 at 8:00am — 25 Comments

गर्मी बहुत है

सुनो, 

गर्मी बहुत है 

अपने अहसासों की हवा 

को जरा और बहने दो 

यादों के पसीनों को 

और सूखने दो 

सुनो, 

गर्मी बहुत है 

गुलमोहर के फूलों 

से सड़कें पटी पड़ी हैं 

ये लाल रंग 

फूल का 

सूरज का 

अच्छा लगता है 

अपने प्यार की बरसात को 

बरसने दो 

बहुत प्यासी है धरती 

बहुत प्यासा है मन 

भीग जाने दो 

डूब जाने दो 

सुनो,

गर्मी बहुत है .... 

Added by Amod Kumar Srivastava on June 25, 2015 at 7:20am — 5 Comments

शक -- एक कश्मकश (लघुकथा )

तैयार होकर रीता आॅफिस के लिए निकलने ही वाली थी कि नील कह उठे कि आज वो ही उसे आॅफिस छोड़ आयेंगे ।

उसे समझते देर ना लगी कि , आज फिर नील पर शक का दौरा पड़ चुका है ।

थे तो वे आधुनिक व्यक्तित्व के धनी ही । पत्नी का कामकाजी होना , उनकी उदारता का परिचय है समाज में । इसी कारण वे स्त्री विमर्श के प्रति बेहद उदार मान पूजे जाते है समाज में ।

"मै चली जाऊँगी , आप नाहक क्यों परेशान होते हो ! आपके आॅफिस का भी तो यही वक्त है । " - उसके आँखों में दुख से आँसू छलछला आये ।

"क्यों , तुम मुझे…

Continue

Added by kanta roy on June 25, 2015 at 7:00am — 16 Comments

खार रचता आदमी.....

गज़ल....खार रचता आदमी....

बह्र... 2122   2122   212

खुद को खुद से कब समझता आदमी.

जीत  कर  जब  हार  कहता  आदमी

मौन  में  संजीवनी  तो  है  मगर

मैं हुआ कब चुप अकडता आदमी.

आस्मां के पार भी खुशियां  दुखी,

हर कदम पर शूल सहता आदमी.

फूल-कलियां मुस्कराती हर समय,

देवता  को    भेंट   करता   आदमी.

आदमी  ही  आदमी  को  पूजता,

आचरण पशुता अखरता आदमी.

प्यार  में   सम्वेदना  …

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on June 24, 2015 at 8:17pm — 14 Comments

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