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मुझमें बसी मेरी कविता है तू

"रचा न जिस वास्ते तुझे खुदा ने

उस रंग में कभी खुद को न रंग

दुनियादारी है रवायत दुनिया की

दुनियादार न बन दुनिया के संग

निश्चल ये दिल है ,चंचल जैसे

छलछल कलकल बहता पानी है

थम न जाना किसी मराहिल पे

दरिया की तो रविश ही रवानी है

खिलखिलाते देखता हूँ तुझे जब भी

याद आता है मुझको अपना बचपन

क्या बख्त होगा उस घर आँगन का

तेरे क़दमों से जो हो जायेगा गुलशन



खुदा न बशर ,न हूर न फ़रिश्ता है तू

अन्तर्मन में…

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Added by Kedia Chhirag on August 1, 2013 at 8:30am — 2 Comments

ग़ज़ल

मैं वाकिफ हूँ ,हकीकत से, ज़माने की 

इसे आदत, है चिढ़ने की,चिढ़ाने की ...

.

बहुत मुश्किल हुनर है ये , भला सब को 

कहाँ आती कला रिश्ते निभाने की ...

.

सज़ा क्या दूँ तुम्हें आखिर बताओ तो 

मेरी आँखों से नींदों को चुराने की ...

.

बयां इक शेर में, हो सकता है जब सब 

ज़रूरत क्या तुम्हें किस्सा सुनाने की ..

.

इसे महसूस करिएगा…

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Added by Ajay Agyat on August 1, 2013 at 6:00am — 7 Comments

इक दिन

न था मैं तो भी जीवन था
न होउंगा तो भी जीवन रहेगा |
जीवन तो पाल है नाव की
धारा नहीं हवा के साथ बहेगा |

मेरा अक्स बन जाएगा इक दिन
टंगी हुई तस्वीर की तरह |
जिनकी वजह से हर्फ़ होंगे खामोश
जीने की वजह मेरा नाम न रहेगा|

मैं करता रहा अनदेखी, लगता रहा
नूर पे हर रोज़ एक ग्रहण |
क्यों चाँद को लाये नूर और मेरे बीच,
आँख का मेरे हर सितारा कहेगा|

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on August 1, 2013 at 1:00am — 1 Comment

सॉनेट/ आँधी

एक सुनहरी आभा सी छायी थी मन पर

मैं भी निकला चाँद सितारे टांके तन पर

इतने में ही आँधी आयी, सब फूस उड़ा

सब पत्ते, फूल, कली, पेड़ों से झड़ा, उड़ा

धूल उड़ी, तन पर, मन पर गहरी वह छाई

मन अकुलाया, व्याकुल हो आँखें भर आई

सरपट भागें इधर उधर गुबार के घोड़े

जैसे चित के बेलगाम से अंधे घोड़े

कुछ न दिखता पार, यहाँ अब दृष्टि भहराई

कैसा अजब था खेल, थी कितनी गहराई

छप्पर, बाग, बगीचे, सब थे सहमे बिदके

मैं भी देखूँ इधर उधर सब ही थे…

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Added by बृजेश नीरज on July 31, 2013 at 10:00pm — 31 Comments

कुण्डलिया छंद [ तीज]

खुशियाँ लाया तीज है , गाएं गीत मल्हार
आंगन पींगों से सजे , झूलें कर श्रृंगार||
झूलें कर श्रृंगार ,ओढ के लाल चुनरिया
चूड़ियाँ हरी लाल , पहन झूमती गुजरिया||
आया श्रावण माह ,माँ ने पीहर बुलाया
मिले प्रेम उपहार, तीज है खुशियाँ लाया||

******************

मौलिक व अप्रकाशित 

Added by Sarita Bhatia on July 31, 2013 at 9:30pm — 9 Comments

आ जाओ

आकाश में काली घटा छाई,

आज फिर तुम्हारी याद आई।

लगा तुमने जैसे मुझे छू लिया,

जब चली झूमकर ये पुरवाई।

मन्द -मन्द चली शीतल पवन,

मन में जल उठी विरह-अगन।

मन को शीतल करने के लिए

वर्षा में भिगोया मैंने अपना तन।

नन्हीं-नन्हीं -सी बूँदें,ये जल की,

और मेरे विरह की ये जलन बड़ी।

अब तो आकर मुझे लगा लो अंग,

बस यही सोच रही  मैं खड़ी -खड़ी।

जाने कब साकार होगी ये कल्पना,

कब होगा पूरा मेरा सुन्दर सपना?  

है जो मुझसे अभी तक  पराया-सा,…

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Added by Savitri Rathore on July 31, 2013 at 7:30pm — 2 Comments

इक दिया तुमने जलाया होता

इक दिया तुमने जलाया होता 

तम जरा सा ही हटाया होता 

हिन्द में रहते सभी हिंदी हैं 

भेद मजहब का मिटाया होता

 

साथ जीने में मजा आता है 

पाठ सबको ये पढ़ाया होता 

गर खता हमसे हुई माफ़ करो 

वाकया गुजरा भुलाया होता 

कुछ खुदा की यूं इबादत करते 

रोते बच्चे को हसाया होता 

चीरते हो बस मही का सीना 

गुल से आँचल भी सजाया होता 

दूध जिस माँ का पिया है तुमने

कर्ज  कुछ उसका…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on July 31, 2013 at 6:30pm — 12 Comments

बेबसी (कहानी)

            श्याम खुद को बहुत खुशकिस्मत मान रहा था | बात थी भी ऐसी, वो भयानक रात और दो दिन तक मची तबाही का मंजर एक पल के लिए भी तो उसकी आँखों से नहीं हटा था | जहाँ-तहां लाशे बिछी हुई थी और हर तरफ चीख पुकार |

श्याम अपनी पत्नी सुनीता चार बच्चो का पेट पालने के लिए एक खच्चर के सहारे खच्चर में माल ढोने का काम करता है और हर साल यात्रा सीजन में केदारनाथ परिवार सहित केदार बाबा की शरण में पहुँच जाता था | जहाँ पत्नी फूल प्रसाद बेचा करती है, और बच्चे होटल में बर्तन धोने का का काम और वो खुद खच्चर…

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Added by दिव्या on July 31, 2013 at 4:29pm — 7 Comments

तुम मेरी कौन हो

अनंत मनोभाव जब,

शब्द से क्यों मौन हो ?

तुम मेरी कौन हो ?

 

किंचित मुझे भी ज्ञान है,

किंचित जो तुमसे ज्ञात हो,

अनुत्तरित सा प्रश्न ये,

उत्तरित हो जाय, कि

आभास से समीपता,

पर दृष्टि से क्यों गौण हो ?

 

लगता मुझे कि ब्रह्म-सी,

नेत्र-शक्ति से परे,

अनुभवीय मात्र हो !

आत्मदर्शनीय, किन्तु

बाह्य हींन गात्र हो !

 

सत्य क्या ? पता नही,

किन्तु, कुछ अनुमान है…

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Added by पीयूष द्विवेदी भारत on July 31, 2013 at 4:04pm — 4 Comments

गरीब की भूख

आज सुबह मेरे दोस्त ने मुझे फोन किया  और कहा की आज एक विषय पर कहानी लिखो -गरीब की भूख , मुझे थोड़ी हैरानी हुयी, "ये क्या ! आज ये क्या विषय दे दिया 'गरीब की भूख ', ये तो निबन्ध लिखने का विषय है, इस पर कहानी कैसे लिखी जा सकती है "...थोडा विरोध था मन में, मगर जाने क्या हुआ, मैंने सोचा "चलो रहने देते है, देखते है, आज अपनी प्रतिभा को भी आजमाते है .... 
.
उसके बाद मैं अपने कार्यालय के लिये चल पड़ा, मगर आज मन बेचैन था, आखिर गरीब की भूख पर कोई कहानी…
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Added by Sumit Naithani on July 31, 2013 at 4:00pm — 10 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ४० (ओ मेरी नायिका)

ओ मेरी नायिका

-------------------

मोहिनी अदाएं,

मारक निगाहें,

कामिनी काया...

गजगामिनी, ऐश्वर्या,

गर्विता, हंसिनी,

हिरणी, सुगंधिता,

रमणी, अलंकृता,

मंजरी, प्रगल्भा, ....

क्या क्या कहूं तुझे.

 

मेरे प्रेम भाव का अवलम्ब,

अपने सौन्दर्य और यौवन से

मुझमें रति भाव जगाने वाली,

और अपनी अनुपस्थिति में

नित प्रतिदिन के कामों से विमुख कर

अपनी ही स्मृतियों के कानन में

मुझे…

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Added by राज़ नवादवी on July 31, 2013 at 3:32pm — No Comments

महिमा पैसो की

महिमा पैसो की

******************************

पर पैसो के मैने तो देखे नही ।

फिर क्यू वो कही पे ठहरता नही ॥

पकडते है दोनो हाथो से सभी ।

पर पकड मे किसी के वो आता नही ॥......... फिर क्यू वो कही पे ठहरता नही ॥…

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Added by बसंत नेमा on July 31, 2013 at 3:30pm — 2 Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने-५३ (स्लौटर हाउस)

रात के ग्यारह बजे मैं और मेरे दोस्त रदीफ़ भाई भोपाल से दिल्ली एअरपोर्ट पहुंचे! रदीफ़ भाई को जो रोज़े पे थे कल सुबह ‘सहरी’ करनी थी सो लिहाज़ा हम पहाड़गंज के एक ऐसे होटल में रुके जहाँ सुबह के तीन बजे खाना मिल सके. होटल पहुंचते- पहुंचते रात के बारह से ज़्यादा बज गए. सामान कमरे में रख मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की और चल पड़ा जो पास ही था- अपने कॉलेज के दिनों की कुछ यादों से गर्द झाड़ता हुआ. कुछ भी क्या बदला था- वही ढाबों की लम्बी कतार, जगह-जगह उलटे लटके तंदूरी चिकन की झालरें, तो कहीं शुद्ध…

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Added by राज़ नवादवी on July 31, 2013 at 9:26am — 2 Comments

ग़ज़ल : अरुन शर्मा 'अनन्त'

उमर भर साथ तू शामिल रही परछाइयों में,

सहा जाता नहीं है दर्द-ए-दिल तन्हाइयों में,

जरा सी बात पे रिश्ता दिलों का तोड़ते हैं,

उतर पाते नहीं जो प्यार की गहराइयों में,

भला इन्सान कोई दूर तक दिखता नहीं है,

बुराई घुल रही तेजी से है अच्छाइयों में,

जमीं ही रोज जीवनदान देती है सभी को,

जमीं ही रार बोती है सगे दो भाइयों में,

निगाहों को दिखाकर ख्वाब ऊँचें आसमां का,

गिराते लोग हैं धोखे से गहरी खाइयों…

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Added by अरुन 'अनन्त' on July 30, 2013 at 8:30pm — 22 Comments

शब्दों के पंछी

शब्दों के घेरे

 घेर लेते है मुझे

किसी चिड़िया की

मानिंद आ बैठते हैं

हृदय रूपी वृक्ष द्वार पर  

कल्पनाओं की टहनी पर

फुदक फुदक कर

बनाते है नई रचनाये

गीत कवित्त कविताएं

कल्पनाओं की उड़ान

को देते हैं हर बार

नए पंख लगा बैठते  

हर बार टहनी टहनी

मेरे नए जीवन की

हर सुबह को देते

एक सूरज नया । ............ अन्न्पूर्णा बाजपेई

 

मौलिक एवं अप्रकाशित  

Added by annapurna bajpai on July 30, 2013 at 2:00pm — 11 Comments

हर तरफ जंग की तस्वीर नई होती है॥

जब कभी अम्न की तदबीर नई होती है॥

हर तरफ जंग की तस्वीर नई होती है॥

ख़त्म कर देती है सदियों की पुरानी रंजिश,

वक़्त के हाथ में शमशीर नई होती है॥

पहले होते हैं यहाँ क़त्ल धमाके…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on July 30, 2013 at 1:37am — 8 Comments

कभी यूँही......

वास्ता बस यूँ कि

यादें आती रहें जाती रहें

इसी बहाने कभी यूँही कह

मुस्कुरा लिया करेंगे

गुज़रती बेहाल सी

रफ़्तार भरी ज़िन्दगी में भी

इसी बहाने कभी यूँही कह

दो घड़ी थम जाया करेंगे

दुखती आँखों पर भी

थोड़ा रहम हो जायेगा

इसी बहाने कभी यूँही कह

आंखे मूंद तुम्हें

देख लिया करेंगे

खोलती नहीं दुपट्टे की

वो गांठ चुभती है जो

ओढ़ने में….इसी बहाने

कभी यूँही कह तुम्हें

महसूस कर लिया…

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Added by Priyanka singh on July 29, 2013 at 10:50pm — 15 Comments

प्रेम के कवित्त - (रवि प्रकाश)

1.धार तू,मझधार तू,सफ़र तू ही,राह तू,

घाव तू,उपचार तू,तीर भी,शमशीर भी।

जाने कितने वेश है,दर्द कितने शेष हैं,

गा चुके दरवेश हैं,संत ,मुर्शिद,पीर भी।

ध्वंस किन्तु सृजन भी,भीड़ तू ही,विजन भी,

छंद है स्वच्छन्द किन्तु,गिरह भी,ज़ंजीर भी।

भाग्य से जिसको मिला,उसे भी रहता गिला,

पा तुझे बौरा गए,हाय,आलमगीर भी॥

 

 

2.डूब चले थे जिनमें,उनसे ही पार चले,

जिनमें थे हार चले,वो पल ही जीत बने।

कितने साँचों में ढले,सारे संकेत तुम्हारे,

कुछ ग़ज़लों…

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Added by Ravi Prakash on July 29, 2013 at 8:00am — 9 Comments

"स्पंदन "

बेजान कमरे में

टूटी खटिया पे लेटा

करवट लेते हुए

आँखों के पूरे सूनेपन के साथ

कभी कभी खिड़की के

बाहर देखता हूँ

कैसी है दुनियां

क्या वैसी ही है

जैसी पहले हुआ करती थी

दर्द के समंदर में

निस्पंद जड़ सा

सोचता रहा

अपने ही अपने नहीं रहे

ये गुमशुदी का जीवन कब तक

एक चिंता जाती

तो दूसरी उत्पन्न

देखता रहता हूँ

सजीव कंकाल सा

इधर उधर

बस जिंदा हूँ

औपचारिक

राम शिरोमणि…

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Added by ram shiromani pathak on July 28, 2013 at 8:00pm — 16 Comments

क्या पता सावन भी किसी के लिए रोता होगा

देख कर सावन को

आँखे भर आती हैं

क्या पता सावन भी

किसी की याद मे रोता होगा

मेरी ही तरह करता होगा

इंतज़ार किसी का ….

टूट जाने पर वादा

मेरी ही तरह रोता होगा

क्या पता सावन भी

सावन में किसी के लिए

तरसता होगा ………

करके वादा गया होगा कोई

लौट कर आऊंगा उस महीने में

जिसमे बरसात होगी ……

ऐ मेरे चाहने वाले

अब तो तुमसे

बरसात में ही मुलाक़ात होगी

टूटता होगा वादा तो

दिल भी टूट जाता होगा

दर्द के…

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Added by Sonam Saini on July 28, 2013 at 11:30am — 7 Comments

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