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आंखें करे शिकायत किनसे

आंखें करे शिकायत किनसे

वही व्‍यथा क्‍यों ढोते हैं

बीज वपन तो करता मन है

वे नाहक क्‍यों रोते हैं

 

पलकों की बंदिश में हरदम

क्‍यों वे रोके जाते हैं

और तड़पते देह यज्ञ…

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Added by राजेश 'मृदु' on October 5, 2012 at 3:55pm — 7 Comments

ग़ज़ल

इक ग़ज़ल पेशेखिदमत है दोस्तों आप सभी के जानिब

बहर है--> मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ महजूफ

वजन है--> २२१-२१२१-१२२१-२१२



हिंदी का रंग आज यूँ रंगीन हो गया

भारत बदल के जैसे अभी चीन हो गया



मुझसे बड़ा गुनाह ये संगीन हो गया

दिल टूटने…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on October 5, 2012 at 2:00pm — 12 Comments

सुनयना [लघु कथा ]

अपने नाम को सार्थक करती हुई कजरारे नयनों वाली सुनयना अपनी प्यारी बहन आरती से बहुत प्यार करती थी |किसी हादसे में आरती के नयनों की ज्योति चली गई थी लेकिन सुनयना ने जिंदगी में उसको कभी भी आँखों की कमी महसूस नही होने दी | हर वक्त वह साये की तरह उसके साथ रहती,उसकी हर जरूरत को वह अपनी समझ कर पूरा करने की कोशिश में लगी रहती |एक दिन सुनयना को बुखार आ गया जो उतरने का नाम ही नही ले रहा था ,उसके खून की जांच करवाने पर पता चला कि उसे कैंसर है ,उसके मम्मी पापा के पैरों तले तो जमीन ही खिसक गई ,लेकिन सुनयना…

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Added by Rekha Joshi on October 5, 2012 at 1:13pm — 10 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ३९ (हम हैं जंगल के फूल तख़लिएमें खिलते हैं )

कैद कब तक रहोगे अपनी ही तन्हाइयों में

ढूंढें मिलते नहीं ज़िंदा बशर परछाइयों में

 

हक़का रिश्ता ज़मींसे है, ये खंडहर कहते हैं

सब्ज़े होते नहीं अफ्लाक की बालाइयों में  

 

खुशबूएं जम गईं गुलनार के पैकर में ढलके

कल की बादे सबा क्यूँ खोजते पुरवाइयों में

 

हम हैं जंगल के फूल तख़लिएमें खिलते हैं

ज़र्द पड़ जाते हैं गुलदस्ते की रानाइयों में

 

फूल वा होते हैं, निकहत बिखर ही जाती है

फर्क कुछ भी नहीं है प्यार और…

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Added by राज़ नवादवी on October 5, 2012 at 11:46am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
स्वप्नों के महल

डाली हरसिंगार की झूम उठी

मनमोहक फूलों के बोझ से

बल खाती हुई छेड़ जो रही थी

उसे ईर्ष्यालु सुगन्धित पवन

झर रहे थे पुहुप आलौकिक

दिल ही दिल में मगन

हर कोई चुन रहा था

सुखद स्वप्न बुन रहा था

अलसाई उनींदी पलकों

के मंच पर

ये द्रश्य चल रहा था

मेरा भी मन ललचाया

एक पुष्प उठाया

अंजुरी में सजाया

तिलस्मी पुष्प आह !

ताजमहल रूप उभर आया

अद्वित्य ,अद्दभुत

मेरे स्वयं ने मुझे समझाया

ये तेरा नहीं हो सकता

तुमने गलत…

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Added by rajesh kumari on October 5, 2012 at 11:30am — 11 Comments

तीन मुक्तक ......//माँ

 

इस रक्त के संचार पे अधिकार तुम्हारा है 

श्वांसो के हरेक तार पे उपकार तुम्हारा  है
आँखों में चमकते हैं मुस्कान के जो मोती 
कुछ और नहीं माँ वो बस प्यार तुम्हारा है …
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Added by seema agrawal on October 5, 2012 at 3:00am — 15 Comments

न जाने कब छुआ था कागज़ का बदन स्याही से मैंने

न जाने कबसे,

जारी है ये वहशत/

ये खिलवाड़ लफ़्ज़ों से,

न जाने कब छुआ था,

कागज़ का बदन स्याही से मैंने?



उसके जाने के बाद तो नहीं!

उसके मिलने से पहले भी नहीं!

वहशत है तो,

आगाज़ खुशियों से हुआ होगा/

शायद तब...जब

उसने नज़रों से छुआ होगा/

लब्ज़ बस रास्ते ही होंगे,

मंजिल बस वो होगी,

अहसास बेताब होंगे/

हसरतें मचतली होंगी/

दिल बहकता होगा,

धडकनें संभलती होंगी/

बहुत वक़्त बीत गया है

बहुत सफ़र बीत गया है

याद भी नहीं मुझे

न…

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Added by Pushyamitra Upadhyay on October 4, 2012 at 10:32pm — 4 Comments

वो अधजली लौ.

रौशनी तो उतनी ही देती है

कि सारा जहाँ जगमगा दे

निरंतर जल हर चेहरे पर

खुशियों की नदियाँ बहा दे

फिर भी नकारी जाती है क्यों??

वो अधजली लौ



मूक बन हर विपत्ति सह

पराश्रयी बन जलती जाती

परिंदों को आकर्षित कर

जलाने का पाप भी सह जाती

फिर भी दुत्कारी जाती है क्यों??

वो अधजली लौ



जीवन पथ पर तिल तिल जलती

आघृणि नहीं बन कर शशि

हर घर को तेज से अपने

रौशन करते हुए है चलती

फिर भी धिक्कारी जाती है क्यों??

वो अधजली… Continue

Added by deepti sharma on October 4, 2012 at 9:37pm — 4 Comments

मैं शहर छोड़ आया उसका...

आज मैं शहर छोड़ आया उसका,

वो शहर जो हर पल मुझे,

बस याद उसकी दिलाता था,

वो शहर की जिसमें महकती थी,

बस उसी की खुशबू,

वो शहर जहां हर ओर उसके ही नगमे गूँजा करते थे,

वो वही शहर था जहां रहते थे,

बस चाहने वाले उसके,

आज भी बस शहर ही छूटा है उसका,

पर यादें अभी भी बाकी हैं किसी कोने में,

अपने इस नए शहर में भी बस,

उसकी ही परछाइयों कोई खोजता फिरता हूँ मैं,

बेशक शहर छोड़ दिया उसका मैंने,

पर इस नए शहर में भी मैं उसको ही खोजता हूँ,

बस शहर ही…

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Added by पियूष कुमार पंत on October 4, 2012 at 9:10pm — 4 Comments

पाप कर्म (दोहे)

पाप का ना भागी बन,मौन रहा क्यों साध,
मौन साध हामी भरे, वह भी है अपराध |

अपराध अगर यूँ करे, कौन करेगा माफ़,
वक्त लिखेगा एक दिन, दोषी तुझको साफ |

जान बूझ गलती करे, उसको दोषी मान
दोषी वह उतना नहीं,जिसे नहीं था भान |

मानव में न भेद करे, प्रभु सभी के साथ,
प्रभु सभी के साथ है,पकड़ कर्म का हाथ |

कर्म का फल देना ही, प्रभु के लेख माय,
प्रभु करेगा भला ही, गुरु भी यही बताय |

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला,जयपुर

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 4, 2012 at 8:00pm — 12 Comments

तेरे भी

तेरे भी ख्‍वाबों में कोई

अलबेली आई तो होगी

कनक कलश भर सुधा लुटाते

क्षितिज नए लाई तो होगी



उसकी कोरी एक छुअन से

पोर-पोर जागी तो होगी

पलक बंद कर तुमने भी तो

कोई दुआ मांगी तो होगी



सच कहना उसकी यादों में

कितनी रात गंवाई तुमने

कितनी तीली कितने दीपक

कितनी आस जलाई तुमने



खिला-खिला वो तेरा चेहरा

कितना बेबस बेजान…
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Added by राजेश 'मृदु' on October 4, 2012 at 7:31pm — 4 Comments

ये परेशानियाँ तो आनी-जानी है

ये परेशानियाँ तो आनी-जानी है

मधुमेह तो कभी दिल की बीमारी है

 

गम है तो खुशी की वजहें भी हैं

रोते गुज़रे तो क्या जिंदगानी है

 

दिल के ज़ख़्मों से यूँ न घबराओ

बीते वक़्त की ये हसीं निशानी है

 

वक़्त बे वक़्त कुछ नहीं होता

जो मिला सब खुदा की मेहरबानी है

 

हर काम कल पर न छोड़ा करो

बर्बादिये वक़्त भी एक बीमारी है

 

गम की वजहें समझ नहीं आती

यही तो हमारी तुम्हारी कहानी है 

Added by नादिर ख़ान on October 4, 2012 at 6:32pm — 4 Comments

शब्द

आज फिर बदली सी हवा है, 
उदास मन फिर आज अकेला है.


सावन की रिमझिम और ये तन्हाई,
आज रुसवाई को उनका जमाना हुआ है.

स्याह रातो में पसरा ये सन्नाटा ,
ये चाँद के रूठ जाने की सजा है.

राज शब्दों में ढूंढता है जिंदगी का मतलब.
ये खुद को बहलाने की इक दवा है .

Added by RAJESH BHARDWAJ on October 4, 2012 at 6:00pm — 3 Comments

कहानी अपनी अपनी सोच

 
मैं जैसे ही अपने एक पुराने मित्र के घर पहुंचा तो उसकी दयनीय हालत देखकर दंग रह गया.....ऐसा लग रहा था की बरसों का मरीज़ हो  अपने कालेज के समय में हमेशा हीरो जैसे टिप टॉप  रहनें वाला मेरा मित्र आज फटे हाल सी जिंदगी बसर कर रहा था I जगह जगह से कटे,फटे मैले कुचैले कपड़े.....और तो और बनियान में भी इतने छेद थे…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on October 4, 2012 at 2:30pm — 4 Comments

फूल शहरों के

गगनचुम्बी अट्टालिकाओं के

कटिंगदार झरोखों से लटक कर

धुंआयुक्त वातावरण में बीमार, खाँसते

अपने चेहरे की धूल को

कृत्रिम फुहारों से धोने की कोशिश में

बड़े दयनीय लगते हैं

छोटे से पात्र में कैद जड़ों के सहारे…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on October 4, 2012 at 10:57am — 6 Comments

वो कॉलेज की दुनिया

वो कॉलेज की दुनिया

दोस्तों का फ़साना

बड़ा याद आता है

कॉलेज का जमाना .........

सब दोस्तों का इंतजार करना

थोडा लेट होने पर भी

कितना झगड़ना

सुबह- सुबह पहली क्लास में

सबसे आगे पहली बेंच पर बैठना

कितना याद आता है

लास्ट लेक्चर में थ्योरी सुनते- सुनते

चुपके से सो जाना .........

वो कॉलेज की दुनिया

दोस्तों का फ़साना ..............



वो मोटी-मोटी सी किताबे

अकाउन्ट्स की भाषा

आँखों में पलते बड़े बड़े सपने

मगर फिर…

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Added by Sonam Saini on October 4, 2012 at 10:44am — 10 Comments

मुट्ठी भर रेत

ये जीवन मानों -
मुट्ठी भर रेत
झरती हैं खुशियाँ
झरते हैं सपने
इक पल
 हँसना तो
दूजे पल
क्लेश
ये....................

 रेतघड़ी समय की
चलती ही रहती
लम्हों की पूंजी
हाथ से फिसलती
बस स्मृतियों के
रह जाते अवशेष
ये....................

किसी से हो मिलना
किसी से बिछड़ना
जग के मेले में
बंजारे सा फिरना
दुनिया आनी जानी -
 सत्य यह अशेष
ये .......................




Added by Vinita Shukla on October 4, 2012 at 10:31am — 8 Comments

हाल अच्छा बताना पड़ेगा

हाल कैसा भी हो, पर जहाँ को,

हाल अच्छा बताना पड़ेगा |

अश्क पलकों पे ठहरे जो आकर,

हैं ख़ुशी के, बताना पड़ेगा ||



दिल है तोडा किसी बेवफा ने,

यह न कहना, ज़माना हसेगा |

है यही वक़्त का अब तकाज़ा,

दर्द, दिल में छुपाना पड़ेगा ||



साथ जी लेंगे, पर न मरेंगे,

बात सच्ची है, मत भूल जाना |

झूठ को झूठ कहना पड़ेगा,

सच को सच ही बताना पड़ेगा ||



फिर मिलेंगे ये वादा न करना,

ज़िन्दगी का भरोसा नहीं है |

वरना दोज़ख नुमाँ इस ज़मीं पर,…

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Added by Shashi Mehra on October 4, 2012 at 8:30am — 2 Comments

हम स्वछंद हैं कवि .....

हम स्वछंद हैं कवि .....

हमको नहीं छंद अलंकार का है ज्ञान ,

हम स्वछंद हैं कवि बस भाव हैं प्रधान .



आचार्य गिन मात्रा कहते लिखो निर्धन ,

लिखा अगर गरीब तो क्या हो जायेगा श्रीमान !



हालात जो देखे सीधे सीधे लिख दिए ,

पढ़कर ''वे'' बोले व्याकरण का कुछ तो रखते ध्यान .



कहते अलंकार से कविता का कर श्रृंगार ,

हम 'रबड़ के छल्ले ' देते न उनको कान .



है नहीं कविता में अपनी प्रतीक ,बिम्ब,गुण ,

जूनून है बस…

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Added by shikha kaushik on October 4, 2012 at 2:30am — 6 Comments

कुंडलिया छंद

1....

शीतल मीठे नर्म से ,शब्दों को दो पाँव 

सद्भावों की ईंट से ,रचो प्रीत के गाँव 

रचो प्रीत के गाँव, फसल खुशियों की बोना 

नेह सुधा से सिक्त, रहे हर मन का कोना 

कंचन शुचिता धार ,अहम् का तज कर पीतल 

हरो ताप-संताप ,सलिल बन निर्मल शीतल ..

2.........…

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Added by seema agrawal on October 4, 2012 at 2:30am — 4 Comments

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