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हो जाते हैं हाथ दूर- गीत

(आदरणीय सौरभ पाण्डेय के पितृ-शोक  पर एक हार्दिक  संवेदना )

पहले संदर्भ प्रसंग सहित इस जगती में परिभाषित कर 

फिर हो जाते हैं हाथ दूर जीवन का दीप प्रकाशित कर

.

देते  हैं  वे  सन्देश  हमें

हर दीपक को बुझ जाना है

पर ज्योति-शेष रहते-रहते

शत-शत नव दीप जलाना है

फैलायी जो रेशमी रश्मि उसको अब रंग-विलासित कर

पहले संदर्भ प्रसंग सहित......

.

है  सहज  रोप  देना पादप

तप है उसको जीवित रखना

करना…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 21, 2016 at 10:00pm — 4 Comments

किस लिए वो हसीं बेवफा हो गयी (एक ग़ज़ल एक प्रयास ).....

किस लिए वो हसीं बेवफा हो गयी (एक ग़ज़ल एक प्रयास )

२१२ x ४

रदीफ़=हो गयी

काफ़िया=आ

किस लिए वो हसीं बेवफा हो गयी

जान हम से हमारी जुदा हो गयी !!१!!

अब गिला आसमां से नहीं है हमें

बे-असर अब हमारी दुआ हो गयी !!२!!

हाल अपना सुनायें किसे हम भला

लो मुहब्बत हमारी खता हो गयी !!३!!

रात भर करवटों में वो लिपटी रही

याद उनकी हमारी क़ज़ा हो गयी !!४!!



दिल भला या बुरा समझता है कहाँ

ये मुहब्बत सुल्ह की रज़ा हो गयी…

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Added by Sushil Sarna on January 21, 2016 at 8:57pm — 6 Comments

एक फ़ौज़ी की मौत – ( लघुकथा ) –

एक फ़ौज़ी की मौत – ( लघुकथा ) –

 "क्या हुआ नत्थी राम, किस बात पर कर ली आत्म हत्या तुम्हारे लडके ने,कोई चिट्ठी छोडी क्या"!

"थानेदार साब,वह आत्म हत्या नहीं कर सकता,वह तो एक फ़ौज़ी था,उसे मारा गया है"!

"पर उसका शरीर तो गॉव के बाहर पेड पर लटका मिला था"!

"यह सब साज़िश है,उसे मार कर लटका दिया गया"!

" ऐसा कैसे कह रहे हो, क्या तुम्हारी  दुश्मनी थी किसी से "!

"दरोगा जी, मैं तो सीधा सादा आदमी हूं!  मेरा बेटा शादी के लिये तीस दिन की छुट्टी ले कर आया था!जिस दिन वह…

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Added by TEJ VEER SINGH on January 21, 2016 at 6:39pm — 10 Comments

विद्वान बढ़ते जा रहे हैं

168
विद्वान बढ़ते जा रहे हैं
=============
जनगोष्ठियों या जन सभाओं में,
वक्ता अगण्य होते हैं।
कुर्सियाॅं सब भरी होती हैं पर, श्रोता नगण्य होते हैं।
प्रायोजित की गई भीड़ में
स्वयं थपथपाते वक्ता अपनी पींठ,
होड़ रहती है अधिकाधिक बोलने की।
इसलिये,
सुनना अनसुना कर अन्य सभी सोते हैं।
पुराणकार ‘व्यासजी‘, जब ज्ञान बघारने पहुॅंचे भीड़ में,
तो उन्हें किसी ने…
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Added by Dr T R Sukul on January 21, 2016 at 5:36pm — 2 Comments

वफ़ादार झूठ - डॉo विजय शंकर

सच किस कदर लड़ता है ,
छटपटाता है सामने आने को ,
उठने नहीं देता झूठ उसे
अपना चेहरा भर दिखाने को।
झूठ कुछ नहीं होता
कोई असलियत नहीं होती उसकी ,
फिर भी हरेक झूठ दूसरे झूठ के प्रति
वफादार बड़ा होता है
एक झूठ की मदद के लिए देखिये
सौ झूठ खड़ा होता है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on January 21, 2016 at 9:51am — 8 Comments

ग़ज़ल -- ज़िन्दगी मैंने गुज़ारी ख़्वाब में। ( दिनेश कुमार )

2122--2122--212



हौसले जिनके बहे सैलाब में

उम्रभर फिर वे रहे गिर्दाब में



हो मुबारक चापलूसी आपको

अपनी दिलचस्पी नहीं अलक़ाब में



ढो रहें हैं बोझ हम तहज़ीब का

गर्मजोशी अब कहाँ आदाब में



कुछ अधूरे ख़्वाब, आहें और अश्क

बस यही है अब मेरे असबाब में



कौन करता रौशनी की कद्र अब

ढूँढ़ते हैं दाग़ सब महताब में



गीत ग़ज़लें छन्द मुक्तक हम्द नात

क्या नहीं है शायरी के बाब में



इसकी ख़ुशहाली का कारण ये भी… Continue

Added by दिनेश कुमार on January 21, 2016 at 7:27am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तेरा सिर्फ़ है आना बाक़ी--(ग़ज़ल)-- मिथिलेश वामनकर

2122—1122—1122—22

 

दिल तो है पास, तेरा सिर्फ़ है आना बाक़ी

और ये बात जमाने से छुपाना बाक़ी

 

ज़िंदगी इतनी-सी मुहलत की गुज़ारिश सुन लो…

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Added by मिथिलेश वामनकर on January 20, 2016 at 8:41pm — 30 Comments

कुएं में लोकतन्त्र

एक कुआं था

बहुत बड़ा कुआं

शीतल जल से पूर्ण

वहाँ रहते थे अनेकों मेढक

कुएं के मालिक ने कुएं में

डाल दिये कुछेक साँप

एवं फूंका मंत्र

जिससे उस कुएं में कायम हो गया लोकतन्त्र

एक मोटा मेढक बना उसका प्रधान

उसने कराया कुएं में सर्वे

और पाया कि साँपों की संख्या वहाँ है कम

मोटा मेढक और उसके चमचे हुए बहुत हैरान

उन्होने बनाया एक नियम

जिससे हो सके साँपो का उत्थान

सभी साँपो को मिले एक मेढक खाने को रोज

ऐसा हुआ प्रावधान

कहा गया बहुत…

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Added by Neeraj Neer on January 20, 2016 at 8:13pm — 10 Comments

ग़ज़ल

इश्क़ करता है कोन दुनिया में

दिल से मरता है कोन दुनिया में

मुफ़्त शेखी बगारने वाले

तुझसे डरता है कोन दुनिया में

महवे हैरत है आसमां मुझ पर

आहें भरता है कोन दुनिया में

आईना बन गए हैं हम लेकिन

अब संवरता है कौन दुनिया में

सबको करना है कूच दुनिया से

कब ठहरता है कौन दुनिया में

अब न मुंसिफ़ कोई उमर जैसा

अद्ल करता है कौन दुनिया में

दिल की गहराई से तुझे हसरत

याद करता है कौन…

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Added by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on January 20, 2016 at 5:00pm — 5 Comments

सीमा उल्लंघन (लघुकथा)

"दुश्मन के सैनिक जैसे ही आने वाले होंगे, मैं उस झाड़ी में पत्थर फैंक कर इशारा करूंगा, तीन मिनट में टुकड़ी नंबर एक तैनात हो जायेगी और उनके सामने आते ही गोलीबारी शुरू कर देनी है| किसी को कोई शक?" सरहद पर लेफ्टिनेंट साहब ने आदेश दिया|

 

"उनके इरादों की भनक पहले ही लग जाने से हमने सैनिकों की इतनी भर्ती कर दी है कि इस सख्त दीवार को तोड़कर दुश्मन हमारे मुल्क का एक पत्ता भी नहीं ले जा सकता है|"…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on January 20, 2016 at 1:00pm — 4 Comments

बरसात के पानी ने -ग़ज़ल (लक्ष्मण धामी मुसाफिर' )

2211     2222     2112            22

*************************************



हर हद को ही  तोड़ा है  बरसात के पानी ने

किस बात  को माना  है बरसात के पानी ने /1



उस वक्त तो सूखा था जीवन क्या हरा होता

अब  गाँव  डुबाया  है  बरसात  के पानी ने /2



ये  जश्न  की  बेला  है  सूखे  की  विदाई की

नदिया को भी  न्योता है बरसात के पानी ने /3



मत खेत की  बोलो तुम भाग्य ही ऐसा  था

घर  द्वार भी  रौंदा है  बरसात  के पानी ने /4



कल रात…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 20, 2016 at 7:00am — 14 Comments

बिचार (लघुकथा)

बिचार (छुआ-छूत विषयाधारित कथा)

मेज पर कहीं से परोसा आया रखा था..

“ये कहाँ से आया अम्मा?” भोजन सूघतें हुए मयंक ने पूछा.

“अरे वो पड़ोस से आया है सेठ जी की बरसी थी ना..”माँ ने बताया.

“मैं खा लूँ?”मयंक ने पूछा.

माँ के उत्तर देने से पहले दादी बोल उठी,

“राम राम, ‘उन लोगों’ के घर का खायेगा जिनके यहाँ आज भी जूते गांठे जाते हैं.”

“दादी उनके यहाँ लघु-उद्योग कारखाना है जूते नहीं गांठे जाते.”

मंयक ने खाना परोसते हुए कहा.

“तो…

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Added by Seema Singh on January 19, 2016 at 6:00pm — 8 Comments

"निजात" लघुकथा

"निजात" लघुकथा :-

"मग़रिब की नमाज़ पढ़कर मैं जब मस्जिद से निकला तो मुझे हामिद मिल गया,वो मुझे बहुत परेशान दिखाई दिया,उसके चहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं ।

मैं उसका दिल बहलाने की ग़रज़ से उसे साथ लेकर बाज़ार आ गया, थोड़ी देर टहलने के बाद हम एक होटल में आ गए , वहाँ हमने नाश्ता किया और चाय पी , आज भी हामिद ने अपनी परेशानियों का ज़िक्र मुझसे किया , मैंने उसे समझाया कि , तुम्हे हिम्मत से काम लेना चाहिये ,और कोशिश नहीं छोड़नी चाहिये , उसने कहा , नौकरी तो जब मिलेगी तब मिलेगी , मुझ पर इतना क़र्ज़ हो गया है… Continue

Added by Samar kabeer on January 19, 2016 at 1:49pm — 18 Comments

शायद मैंने पी ली मधुशाला

 सुन्दर सुन्दर शब्दों का

संग्रह मैंने तो कर डाला

उपयोग नहीं, प्रयोग न जानू

मैंने पी ली मधुशाला

 

कविता लिखने के चक्कर में

मैंने क्या क्या कर डाला

लय नहीं तो क्या हुआ

मैंने प्रयास कर डाला

 

कवि बनने की चाह नहीं

पर कविता लिखना चाहूँ मैं

गीत नहीं संगीत नहीं

पर कविता सुनना चाहूँ…

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Added by PHOOL SINGH on January 19, 2016 at 9:56am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - हिरोइन को जान बनाये बैठे हैं ( गिरिराज भंडारी )

आदरनीय वीनस भाई जी की एक गज़ल की ज़मीन पर कहने की एक कोशिश

*****************************************************************************

22  22  22 22 22  2

दुश्मन को महमान बनाये बैठे हैं

गुलशन को वीरान बनाये बैठे हैं

 

सिर्फ जीतने की ख़्वाहिश है जिनकी , वो  

गद्दारों को जान बनाये बैठे हैं

 

इंसानी कौमें हैं खुद पे शर्मिन्दा

ऐसों को इंसान बनाये बैठे हैं

 

जिस्म काटने की चाहत में भारत का

दिल में पाकिस्तान…

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Added by गिरिराज भंडारी on January 19, 2016 at 8:00am — 21 Comments

चाय के बोलते कप (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

मोर्निंग-वॉक से लौटते वक़्त आज ख़ान साहब मुहल्ले के कुछ घरों की खिड़की पर रखे चाय के कपों की कुछ दिलचस्प फोटो लेकर घर लौटे ही थे कि अपने घर के मुख्य दरवाज़े के ऊपर छज्जे पर भी चाय के दो कपों को देख कर चौंक गये। ये वाले कप पिछले महीने ही तो मेले से ख़रीद कर लाये थे। बड़ी हैरानी से बेगम साहिबा से उन्होंने पूछा- "क्यों जी, ये क्या माज़रा है, दो कप वहां क्यों रखे हुए हैं?"



"अरे, वो मालती बाई आती है न, अपने मुहल्ले की साफ.-सफ़ाई करने वाली, उसको चाय पिलाने के लिए! कभी-कभी उसके आदमी को भी!… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 19, 2016 at 7:45am — 13 Comments

खूब हुई है यार मुनादी-ग़ज़ल - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

2222    2222    2222    222

*******************************



सुख  की  बात  यही  है  केवल  म्यानों  में  तलवारें हैं

बरना  घर  के  ओने  कोने  दिखती   बस  तकरारें  हैं /1



खुद ही जानो खुद ही समझो उस तट क्या है हाल सनम

इस  तट   आँखों   देखी   इतनी   बस  टूटी  पतवारें  हैं /2



रोज वमन  विष का  होता  है  नफरत का दरिया बहता

यार अम्न को  लेकिन  बिछती  हर  सरहद  पर तारें हैं /3



रोज  निर्भया  हो  जाती  है रेपिष्टों  का  यार  शिकार

गाँव  नगर …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 19, 2016 at 5:55am — 11 Comments

प्रतिशोध - ( लघुकथा ) –

प्रतिशोध -  ( लघुकथा  ) –

 "प्रधान जी, यह क्या देख रहा हूं!आज तो आप पंडित होकर भी ,अपने जानी दुश्मन,  हरिज़न विधायक गंगा राम  के बेटे को शराब और क़बाब की दावत  दे रहे थे और बराबर में साथ बैठा कर तीन पत्ती भी खिला रहे थे"!

"बाबूलाल, यह राजनीति है,तुम्हारी समझ में नहीं आयेगी"!

"कोई काम करवाना है क्या विधायक जी से"!

"मैं उस कुत्ते  की शक्ल भी देखना पसंद नहीं करता, उसकी वज़ह से तो मेरी विधायकी की सीट छिन गयी"!

"तो फ़िर इस दावत का क्या राज़ है"!

"इस राज़ को…

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Added by TEJ VEER SINGH on January 18, 2016 at 10:26pm — 14 Comments

दिखने को बेताब(लघुकथा)

भर्राती हुई सी आवाज़।कहाँ से आ रही थी?वह अंदाज़ा नहीं लगा पा रहा था।दर्द से पीड़ित सी।

दुखी सी।



"क्यों मुझे परेशान कर रही हो?"

हिम्मत सी करके बोला।



"परेशान?तुम्हें?और मैं?"

आवाज़ फिर आई।



"एक तो तुम्हारी आवाज़ मुझे डरा रही है और दूसरा तुम दिखाई भी नहीं देती।"

उसने ज़वाब दिया।



"मैं दिखाई नहीं देती?तुमने मुझे कभी दिखने ही नहीं दिया,हमेशा दबाने की कोशिश की और तुम कहते हो मैं दिखाई नहीं देती।"

आवाज़ में पीड़ा थी।



"मैंने… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on January 18, 2016 at 9:55pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जख्म दिल का सदा हरा रखिये (एक फिलबदीह ग़ज़ल 'राज')

२१२२  १२१२  २२

भूख हड़ताल बारहा रखिये

हुक्मरानों पे दबदबा रखिये

 

बह रही है हवा सियासत की

किस तरफ बस यही पता रखिये

 

शह्र में चैन हो न हो ठंडक

गर्म मुद्दा कोई नया रखिये

 

सूखने पर कोई न पूछेगा

जख्म दिल का सदा हरा रखिये

 

लोग मरते रहें भले पीकर

हर गली एक मयकदा रखिये

 

क्या करेगा धुआँ धुआँ ही तो है

आप बेख़ौफ़ सिलसिला रखिये 

 

इश्क के साथ दिल्लगी करना

नाम फिर…

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Added by rajesh kumari on January 18, 2016 at 9:40pm — 14 Comments

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