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सदस्य कार्यकारिणी
“कमीने” (लघु कथा “राज”)

‘रिमझिम के तराने लेके आई बरसात.. याद आये किसी की वो पहली मुलाक़ात’ ---गाना बज रहा था  बिजनेसमैन आनंद सक्सेना साथ साथ गुनगुनाता जा रहा था रोमांटिक  होते हुए बगल में बैठी हुई पत्नी सुरभि के हाथ को धीरे से दबाकर  बोला- “सच में बरसात में लॉन्ग ड्राइव का अपना ही मजा होता है”.

“मिस्टर रोमांटिक, गाड़ी रोको रेड लाईट आ गई”  कहते हुए सुरभि ने मुस्कुराकर हाथ छुड़ा  लिया|

अचानक सड़क के बांयी और से बारिश से  तरबतर  दो बच्चे फटे पुराने कपड़ों में कीचड़ सने हुए नंगे पाँव से गाड़ी के पास आकर बोले…

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Added by rajesh kumari on January 23, 2017 at 10:56am — 31 Comments

जाड़ा

कुहरे की इक चादर ओढ़े, देखो जाड़ा आया है |

लगातार गिरते पारे ने, फिर कुहराम मचाया है||



इसके आगे आज सभी ने, अपना शीश नवाया है |

सूरज का तेज हुआ मद्धिम, चाँद खूब मुस्काया है ||



हर कोई यहाँ दिख रहा है, मख़मली दुशाला ओढ़े |

कपड़े सबके ऊनी फिर भी, साथ न यह जाड़ा छोड़े ||



कही ठिठुरते दादा दादी, कही काँपती नानी है |

कही रात भर गिरता पाला, कही बर्फ सा पानी है ||



सन-सन चलती हवा रात दिन, थर-थर हाड़ कपाती है |

जलता अलाव मिले जहाँ भी,… Continue

Added by नाथ सोनांचली on January 23, 2017 at 9:13am — 10 Comments

नवगीत- आया जाड़ा हाड़ कँपाने

अँगड़ाई ले रही प्रात है,

कुहरे की चादर को ताने।

ओढ़ रजाई पड़े रहो सब,

आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

तपन धरा की शान्त हो गयी,

धूप न जाने कहाँ खो गयी।

जिन रवि किरणों से डरते थे,

लपट देख आहें भरते थे।

भरी दुपहरी तन जलता था,

बड़ी मिन्नतों दिन ढलता था।

लेकिन देखो बदली ऋतु तो,

आज वही रवि लगा सुहाने।

आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

गमझा भूले मफ़लर लाये,

हाथों में दस्ताने आये।

स्वेटर टोपी जूता मोजा,

हर आँखों ने इनको…

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Added by डॉ पवन मिश्र on January 22, 2017 at 8:30pm — 11 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
परिवर्तन....(नवगीत) // डॉ० प्राची

नियति चक्र में 

परिवर्तन निश्चित अंकित है,

होना है, हो कर रहता है...

समय प्रबल है 

जोड़-तोड़ से कब बंधता है 

बहना है, प्रतिपल बहता है...

आँख मींचते 

आवरणों को क्यों पकड़ा है ?

छोड़ो इनको, हट जाने दो,

धुंध सींचते 

संबंधों के रिसते बादल

गर्जन करके छट जाने दो,

मकड़जाल में 

अपने मन के फँसे रहे तो

फिर क्या होगा? कुछ तो सोचो !

भीतर-बाहर

परिवर्तन तो करना होगा 

जमी सोच की परतें…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on January 22, 2017 at 8:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल - झोंका कोई हिज़ाब उठाता ज़रूर है

221 2121 1221 212*

जुर्मो सितम में उसके इज़ाफ़ा ज़रूर है ।

चेहरा जो आईनो से छुपाता ज़रूर है ।।



गोया वो मेरा साथ निभाया ज़रूर है ।

पर हुस्न का गुरूर जताता ज़रूर है ।।



महफ़ूज़ मुद्दतों से यहां दिल पड़ा रहा ।

तुमने मेरा गुनाह संभाला ज़रूर है ।।



बेख़ौफ़ जा रहा है वो बारिश में देखिये ।

शायद किसी से वक्त पे वादा ज़रूर है।।



आबाद हो गया है गुलिस्तां कोई मगर ।

निकला किसी के घर का दिवाला ज़रूर है।।



गुम हो सके न आज तलक भी ख़याल से… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on January 22, 2017 at 3:05pm — 14 Comments

रेत पर कोई हुनर होने को है (ग़ज़ल)

2122 2122 212

उसका हमला रात भर होने को है
कब तलक जागूँ? सहर होने को है

भीड़ सारी उस तरफ जुटने लगी
मोजिज़ा कोई जिधर होने को है

लौ चिराग़ों की हवा ने तेज़ की
ख़ाक लेकिन मेरा घर होने को है

मिल गया इक ख़ूबसूरत हमसफ़र
अब तो सहरा भी डगर होने को है

आधुनिकता के नशे में डूब कर
हर बशर अब जानवर होने को है

लहलहाने को है फ़स्ल अश्क़ों की "जय"
रेत पर कोई हुनर होने को है

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by जयनित कुमार मेहता on January 21, 2017 at 7:04pm — 13 Comments

किसका हक़ ? (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"नहीं, अनवर मियाँ, यह तो नहीं होने दूंगी!" जुबेदा ने पोटली अपनी ओर खींचते हुए कहा- "मेरे अब्बू के ख़ून- पसीने की कमाई का ज़ेवर है यह और मेरी जमा पूँजी!"



"लेकिन मुझे मिले दहेज़ पर मेरा हक़ है! मैं जो चाहूं, करूँगा!" अनवर ने उसको आँखें दिखाते हुए पोटली फिर अपनी तरफ़ खींच ली।



"है, तुम्हारा हक़ है, और मेरा भी! लेकिन मेरी मर्ज़ी के बग़ैर तुम इसे अपनी अम्मीजान के इलाज़ में हरग़िज़ नहीं लगा सकते!"



"तो क्या तुम उन्हें अपनी अम्मी की तरह नहीं मानतीं!"



"मानती… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 21, 2017 at 5:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल...पत्ते चिनारों के

बहरे हज़ज़ सालिम मुसम्मन

1222 1222 1222 1222

सुनाऊँ किस तरह किस्से बता दे खाकसारों के

चली ऐसी हवा की झर गये पत्ते चिनारों के



हुईं क्या हैं खतायें आसमां से चाँद ने पूँछा

कि सारी रात क्यों बहते रहे आँसू सितारों के



तुम्हारे साथ लौटी है दरो दीवार पर रौनक

तड़फते रह गये हैं नीव के पत्थर मिनारों के



चमन के सुर्खरू मंज़र घुली खुशबू फिजाओं में

ये क्या दस्तूर है की देखना अब गम बहारों के



वहीँ खुशियाँ वहीँ पे गम अज़ब आलम विदाई का

शिकन… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 21, 2017 at 9:30am — 16 Comments

मधुमक्खी

फूलों को प्यार से सुनाती है प्रेम धुन

उन्हीं पर लुटाती अपना सर्वस्य जीवन

बदले में फूलों को देती है नया जीवन

निभाते हैं रिश्ता ये दोनों सारा जीवन ॥

जो फूल हमारे जीवन लाते हैं खुशियाँ

मिटा देते गम भर देते हैं सारी खुशियाँ

भौरें और तितलियाँ बजाती हैं तालियाँ

बदले में जीवन भर करते हैं रंगरेलियाँ ॥

हम इंसानों को नहीं है जरा भी शरम

हम इन फूलों के प्रति कितने बेरहम

फूल तो क्या !कलियों पर नहीं रहम

कहीं भगवान के नाम पर करते…

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Added by Ram Ashery on January 20, 2017 at 9:00pm — 6 Comments

जो तू आये तो मैं निखरूँ-पंकज द्वारा गज़ल

तेरी राहों में ठहरा हूँ
जो तू आये तो मैं निखरूँ

यहाँ चाहत हज़ारों हैं
इज़ाज़त हो तो सब कह दूँ

ज़माने को बता भी दो
ग़ज़ल तुम पर ही सब लिक्खूँ

अभी माटी का पुतला है
छुएँ जो राम तो बोलूँ

सुदामा है गरीबी में
किशन आये तो धन पाऊँ

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 20, 2017 at 8:37pm — 8 Comments

डिजिटल स्ट्रेन्थ़ (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

पार्क में योग करने के पश्चात जोशी जी मेहता बाबू के बगल में बैठते हुए बोले- "भैया, इस क़ुदरती माहौल में योग करके तो धन्य हो गया! बीमारियों से मुक्ति पा कर ख़ुद को जवां सा महसूस करता हूँ!"



"हाँ जोशी जी, सुबह-शाम यहाँ आ कर मैं भी एक अद्भुत शक्ति हासिल कर तनाव मुक्त हो जाता हूँ!"



फिर पास ही बैठे ,स्मार्ट फ़ोनों पर आँखें गढ़ाये दो युवकों की तरफ़ देख कर वे बोले- "तरस तो इन पर आता है कि इन पर अद्भुत बुढ़ापा आ रहा है!"



"बुढ़ापा!"



"हाँ बुढ़ापा ! कम उम्र में… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 20, 2017 at 7:32pm — 8 Comments

मन (कविता)

रे मन कह दे
अपनी बात आज
बंद है जो भीतर
बाहर आने दे आज
देख, पवन पुरावई
शीत लहर आई
कह दे अपनी बात
जिसे जड़ कर चुकी हो
देख बाहर प्रवासियों को
घर अपना जो छोड़ आये है
कुछ दिनों के लिये ही सही
नया बसेरा बसाने आये है
आज खोल दे द्वार अपने भी
उड़ जाने दे अपनी पीड़ा को
लग जाने दे पंख परिंदों की तरह
खुली साँसे ले लेने दे ।


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on January 20, 2017 at 5:30pm — 3 Comments

देर तक .....

देर तक .....

देर तक

मैं मयंक को

देखती रही

वो वैसा ही था

जैसा तुम्हारे जाने से

पहले था

बस

झील की लहरों पे

वो उदास अकेला

तैर रहा था

देर तक

मैं उस शिला पर

बैठी रही

जहां हम दोनों के

स्पर्शों ने सांसें ली थीं

शिला अब भी वैसी ही थी

जैसी

तुम्हारे जाने से पहले थी

बस

मैं

और थे मेरी देह में

समाहित

तुम्हारे अबोले स्पर्श

देर तक …

Continue

Added by Sushil Sarna on January 20, 2017 at 1:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 212

चाँद को जब भी सवाँरा जाएगा ।

टूट कर कोई सितारा जाएगा ।।



है कोई साजिश रकीबों की यहाँ ।

जख़्म दिल का फिर उभारा जाएगा ।।



सिर्फ मतलब के लिए मिलते हैं लोग ।

वह नज़र से अब उतारा जाएगा ।।



कुछ अदाएं हैं तेरी कातिल बहुत ।

यह हुनर शायद निखारा जाएगा ।।



रिंद है मासूम उसको क्या खबर ।

जाम से बे मौत मारा जाएगा ।।



उम्र गुजरी है वफादारी में सब ।

बेवफा कहकर पुकारा जाएगा ।।



टूट जायेंगी वो दिल की… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on January 20, 2017 at 2:39am — 15 Comments

गजल /// बहरे मीर

 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2  

झिलमिल तारों सा सपनो के अम्बर में रहते हो क्यों ?

मलयानिल की मधु धारा सा मानस में बहते हो क्यों?

 

रेशम सी शर्मीली आँखे गाथा कहती है मन की

निर्ममता के अभिनय क्षण में अंतर्गत चहते हो क्यों?

 

अंतस में भावों की गंगा यदि पावन है पूजा सी

तो संकल्पों की वर्षा हो फिर पीड़ा सहते हो क्यों?

 

वृन्दावन की वीथी में तुमने ही झिटकी थी बाहें

फिर उन बाँहों को मंदिर की शाला में गहते हो…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 19, 2017 at 8:30pm — 21 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
वक्त मेरे हाथों से, यूँ फिसल गया चुपचाप

212 1222 212 1222

वक्त मेरे हाथों से, यूँ फिसल गया चुपचाप

मेरी हर तमन्ना को, वो कुचल गया चुपचाप

 

चाक दिल, शिकस्ता पा, बेचराग़ गलियों से

भूल अपने ख्वाबों को, मैं निकल गया चुपचाप

 

एक आइना था…

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Added by शिज्जु "शकूर" on January 19, 2017 at 6:16pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गीत लिखो कोई ऐसा --(गीत)-- मिथिलेश वामनकर

गीत लिखो कोई ऐसा जो निर्धन का दुख-दर्द हरे।

सत्य नहीं क्या कविता में,  

निर्धनता का व्यापार हुआ?

 

जलते खेत, तड़पते कृषकों को बिन देखे बिम्ब गढ़े।

आत्म-मुग्ध होकर बस निशदिन आप चने के पेड़ चढ़े।

जिन श्रमिकों की व्यथा देखकर क्रंदन के नवगीत लिखे।

हाथ बढ़ा कब बने सहायक, या कब उनके साथ दिखे?

इन बातों से श्रमजीवी का

बोलो कब उद्धार हुआ?

 

अपनी रचना के शब्दों को, पीड़ित की आवाज कहा।

स्वयं प्रचारित कर, अपने को धनिकों से…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on January 19, 2017 at 6:00pm — 26 Comments

कुछ हाइकू

व्यस्त है हवा
रुक जाए चिंगारी
दावानल से

बीमार पिता
बेटों का झगड़ना
इतना खर्च!

महानगर
भूल गये अपने
पुराने दिन

भूख ग़रीबी
क्या जाने, महलों में
पैदा हुआ जो.

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on January 19, 2017 at 4:57pm — 8 Comments

वीर अब्दुल हमीद

हम मजा लूटते कितने सुख चैन से

कुछ तो सोचो, मजा पे क्या अधिकार है ?

जो शहादत दिए हैं हमारे लिए

याद उनको करो, ना तो धिक्कार है



अपना कर्तव्य क्या है धरा के लिए

फ़र्ज़ कितना चुकाया है हमने यहाँ

मैं कहानी सुनाता हूँ उस वीर की

खो गया आज है जो न जाने कहाँ



वीरता हरदम ही दुनिया में पूजी जाती है

बन के ज्वाला दुष्टों के हौसले जलाती है

ऐसे ही वीरता की गाथा आज गाता हूँ

वीर अब्दुल हमीद की कथा…

Continue

Added by आशीष यादव on January 19, 2017 at 2:30pm — 4 Comments

हाँ तुम सपने में आई थी

हाँ तुम सपने में आई थी



होठों पर मुस्कान सजाये

बालों में बादल लहराए

गालों पर थी सुबह लालिमा

माथे पर बिंदिया चमकाए

जब तुमको मैंने देखा था

पास खड़ी तुम मुस्काई थी

हाँ तुम सपने में आई थी…

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Added by आशीष यादव on January 19, 2017 at 1:45pm — 10 Comments

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