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ग़ज़ल बह्र 22/22/22/2 अब नारों से डरते हम

अब नारों से डरते हम,
ख़ामोशी से मरते हम।


ख़ौफ बढ़े जब उसका तो,
तब फिर कहाँ उभरते हम।


ये जीना कैसा जीना,

ग़र्बत में ही मरते हम।


सपने देखे तो कैसे,
जीने से ही डरते हम।


याद करे दुनिया 'आरिफ़',
काम सदा वो करते हम।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Mohammed Arif on February 26, 2017 at 10:30am — 2 Comments

श्रद्धा - लघुकथा –

श्रद्धा - लघुकथा –

शिव रात्रि के मौके पर गाँव में शिव जी की रथ यात्रा निकाली जा रही थी। गाँव के हर घर के आगे रथ यात्रा रुक जाती थी  । रथ यात्रा के साथ जो स्वंय सेवक लोग जुलूस के रूप में चल रहे होते थे वह घर के लोगों को आग्रह करते थे कि  भोले नाथ जी के दर्शन का लाभ लें। घर के सभी लोग, स्त्रियाँ और बच्चे  दर्शन करते और दान पात्र में कुछ दान पुन्य भी करते। बदले में उन्हें कुछ प्रसाद भी मिलता |

रथ यात्रा का जुलूस अभी गाँव के बीच हरिजन टोला में ही था कि दो दस बारह वर्ष के लड़के एक…

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Added by TEJ VEER SINGH on February 26, 2017 at 10:18am — 14 Comments

लोकतंत्र का ताजमहल (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

क्षितिज पर अद्भुत नज़ारा था। पर्यटक-स्थल पर राजनीति-शास्त्र के प्रोफेसर वर्मा जी स्टाफ के बाक़ी लोगों की गतिविधियाँ ध्यान से देख रहे थे। कोई ढलती शाम के आसमान की फोटो ले रहा था, कोई अपनी सेल्फ़ी। त्रिपाठी जी उनके पास आकर संबंधित कविता सुनाने लगे। जब उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया तो त्रिपाठी जी बोले- "वर्मा जी, कहाँ खो गये? फिर कोई गहन चिंतन?"



"हाँ भाई, यह दृश्य देखकर कुछ मशहूर नारे याद आ गये थे!"



"नारे! इस वक़्त! कौन से?" त्रिपाठी जी ने पूछा।



आसमान की ओर हाथ… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 26, 2017 at 8:16am — 3 Comments

दीपक सा उजियार करोगे-रामबली गुप्ता

ग़ज़ल

22 22 22 22



जब जलना स्वीकार करोगे

दीपक-सा उजियार करोगे



स्नेह-समर्पण शस्त्र अगर हों

हर दिल पर अधिकार करोगे



दुर्ग दिलों के जीत सके तो

जय सारा संसार करोगे



दिल में दर्प बढ़ा दानव-सा

उसका कब संहार करोगे



राष्ट्र-हितों पर मिट न सके तो

जीवन यह बेकार करोगे



दिल पर रखकर हाथ बता दो

"हमसे कितना प्यार करोगे"



दृष्टि रखोगे अर्जुन-सी तो

लक्ष्य पे ही हर वार करोगे



उर-अँधियार मिटा पाये… Continue

Added by रामबली गुप्ता on February 26, 2017 at 7:00am — 18 Comments

ग़ज़ल..गले में झूलते बाँहों के नर्म हार की बात।

गले में झूलते बाँहों के नर्म हार की बात।

ये बात है मेरे मौला हसीं हिसार की बात।

रखोगे आग पे माखन तो वो पिघल ही जायेगा।

भला टली है कभी , है ये होनहार की बात।

ये इंकलाब की बातें है जोश वालों की।

कहीं पढ़ी थी जो मैंने वो बुर्दबार की बात।

कहूँ किसी से भला क्यों , छुपा के रखे हैं।

उन्हीं की आँखों के किस्से उन्ही के प्यार की बात।

बड़ी कठिन है ये शेरो-सुखन नवाजी जनाब।

बेइख़्तियार से हालात , क़ि बारदार की बात।

ख़याल ही जब हिन्दोस्ताँ का हो न तो…

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Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on February 26, 2017 at 12:39am — 3 Comments

ताले-चाबी वाले (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

रेल यात्रियों में से एक ताले-चाबी वाला कारीगर भी था, सो चल पड़ी चर्चा 'तालों' और 'चाबियों' की, नाना-प्रकार की 'तिजोरियों, सूटकेसों और अलमारियों'' की और कारगर विभिन्न प्रकार की 'चाबियों' की!



"तुम्हारी तो चाँदी है, हर ताला खोलने की असली जैसी नकली चाबी बना लेते होगे!" एक यात्री ने उस ताले-चाबी वाले से पूछा।



"हमारी रसोई का ही ताला खोलती हैं हमारी बनायी ये चाबियाँ जनाब, धंधे में अंधे होकर हम नाजायज़ काम नहीं करते!" उसने जवाब दिया ही था कि दूसरा यात्री बोल पड़ा- "सही कह रहा है… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 25, 2017 at 5:30pm — 7 Comments

कुछ फ़र्द

कुछ फ़र्द मंच की नज़्र :

न सही तेरी नज़रों को मुहब्बत की तमन्ना मगर !

तेरी नज़रें , नज़रों की हमराज़ तो बन सकती थीं !!1!!

माना करीबी दिल को ख़ुशगवार लगती है !

मगर दूरी में भी कम दिलकशी नहीं होती !!2!!



जाने क्यूँ आ गयी शर्म घटाओं को आज !

शायद किसी ने रुख़ पे ज़ुल्फें बिखेर दीं !!3!!



क्यूँ अँधेरे भी उजले से लगने लगे !

शायद, प्यार रूठा लौट आया है !!4!!



आये न थे तो चश्म तर-बतर थी !

गए पलट के तो कयामत ढा गए…

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Added by Sushil Sarna on February 25, 2017 at 2:00pm — 2 Comments

आसमा कब से पड़ा वीरान है

2122 2122 212

बेसबब लिखता कहाँ उन्वान है ।

वो नई फ़ितरत से कब अनजान है ।।



कुछ मुहब्बत का तजुर्बा है उसे ।

मत रहो धोखे में वो नादान है ।।



सिर्फ माँगा था अदा की इक नज़र।

कह गई वह जान तक कुर्बान है ।।



दायरों से दूर जाना मत कभी ।

ताक में बैठा कोई अरमान है ।।



है भरोसा ही नहीं खुद पर जिसे ।

ढूढ़ता फिरता वही परवान है ।।



कहकशां में ढूँढिये अब चाँद को।

आसमा कब से पड़ा वीरान है ।।



इश्क़ की गलती करेगा आदमी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on February 25, 2017 at 12:04am — 1 Comment

खुशियों की चाबी - लघुकथा –

खुशियों की चाबी - लघुकथा –

कालूराम फ़ुट्पाथ पर जूते मरम्मत करता था। उसके पास में ही रहमान तालों की चाबियाँ बनाता था।

"कालू भैया, कई दिन से देख रहा हूं कि आप कुछ दुखी हो। आजकल घर से खाना भी नहीं लाते। खाली चाय और डबल रोटी से काम चलाते हो"।

"हाँ रहमान भाई, तुमने सही कहा। मेरा घर बिखर रहा है।जब से बेटे की शादी हुई है, घर का माहौल बिगड़ गया है"।

"ऐसी क्या वज़ह हुई है"।

"बेटे की बहू अलग होना चाहती है"।

"तो हो जाने दो अलग"।

"वह चाहती है कि हम लोग इस घर…

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Added by TEJ VEER SINGH on February 24, 2017 at 10:30am — 6 Comments

स्वतंत्र, परतंत्र या परजीवी (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

चारों तरफ़ हाल बेहाल हैं। 'कुछ लोग' बहुत 'चौंक' रहे हैं। 'कुछ लोगों' के मन में बहुत सारे 'सवाल' हैं। बहुत से सवाल ज्वलंत हैं, कुछ सामयिक हैं और कुछ एक असामयिक या आकस्मिक, जबकि कुछ एक सवाल ऊट-पटांग भी हैं। लेकिन अधिकतर सवाल किसी भी रूप या विधा में अभिव्यक्त नहीं हो पा रहे हैं। डर है कि किसी 'सवाल' को अभिव्यक्त करने पर कोई 'बबाल' न मच जाये।



लेकिन 'कुछ लोग' हर हाल में हालात के मद्देनज़र ज़ोख़िम लेकर अपने-अपने तरीक़ों से 'सवाल' उठा रहे हैं। उन पर मीडिया, नेता और धर्म-गुरू अपनी-अपनी… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 24, 2017 at 3:40am — 4 Comments

ग़ज़ल- यह ज़माना हाल पर मुस्कुराना चाहता है

2122 2122 2122 2122

हाथ पर बस हाथ रखकर याद आना चाहता है ।

वो मुकद्दर इस तरह से आजमाना चाहता है ।।



गुफ्तगूं होने लगी है फिर किसी का क़त्ल होगा ।

है कोई मासूम आशिक़ सर उठाना चाहता है ।।



शह्र में दहशत का आलम है रकीबों का असर भी ।

तब भी वह अहले ज़िगर से इक फ़साना चाहता है ।।



बेसबब यूं ही नही वह पूछता घर का पता अब ।

रस्म है ख़त भेजना शायद निभाना चाहता है ।।



स्याह रातों का है मंजर चाँदनी मुमकिन न होगी ।

रोशनी के वास्ते वह घर जलाना… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on February 24, 2017 at 2:59am — 5 Comments

यथावत रखें संसार (नवगीत)

एक-दूजे के पूरक होकर

यथावत रखें संसार

पक्ष-विपक्ष राजनीति में

जनता के प्रतिनिधि

प्रतिवाद छोड़ सोचे जरा

एक राष्ट्र हो किस विधि

अपने पूँछ को शीश कहते

दिखाते क्यों चमत्कार

हरे रंग का तोता रहता

जिसका लाल रंग का चोंच

एक कहता बात सत्य है

दूजा लेता खरोच

सत्य को ओढ़ाते कफन

संसद के पहरेदार

सागर से भी चौड़े हो गये

सत्ता के गोताखोर

चारदीवारी के पहरेदार ही

निकले कुंदन…

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Added by रमेश कुमार चौहान on February 23, 2017 at 6:00pm — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -सुखवनर से वो पहले आदमी है - ( गिरिराज )

1222    1222     122 

सुखनवर से वो पहले आदमी है

गलत क्या है अगर नीयत बुरी है

 

किताबों से कमाई कम हुई तो   

सुना है, रूह उसने बेच दी है  

 

अचानक आइने के बर हुये हैं

इसी कारण बदन में झुरझुरी है

 

लगावट खून से, होती है अंधी

वो काला भी, हरा ही देखती है

 

चली तो है पहाड़ों से नदी पर

सियासी बांध रस्ता रोकती है

 

दिवारें लाख मज़हब की उठा लें

अगर बैठी, तो कोयल , कूकती है…

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Added by गिरिराज भंडारी on February 23, 2017 at 7:30am — 6 Comments

हाइकू

पहाड़ पर

चढ़ना भी पहाड़

सोचा ही नहीं

 

 

स्नेह आशीष

से भरा रहा सदा   

माँ का आंचल

 

xxxxx

 

 

महकी हवा

वासंती हैं नजारे

फागुन आया ।

 

 

मादक टेसू  

रंग गई चूनर

फागुन आया ।…

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Added by Neelam Upadhyaya on February 22, 2017 at 4:48pm — 2 Comments

गुलाब ऐसे ही थोड़ी गुलाब होता है (ग़ज़ल)

1212 1122 1212 22



क़दम-क़दम पे नुमाया सराब होता है

नज़र में दिखता है फिर चूर ख़्वाब होता है



नयी उमर में निगाहों में आब होता है

भड़क उठे जो यही इंक़िलाब होता है



दिलों की गुफ़्तगू भी क्या क़माल होती है

नज़र-नज़र में सवाल-ओ-जवाब होता है



अगर हो रब्त दिलों में तो दूरियां कैसी

ज़मीं से दूर बहुत आफ़ताब होता है



जो काटनी हों कभी हिज्र की सियाह शबें

हर इक ख़याल तेरा माहताब होता है



वो लोग चेहरों को पढ़ना सिखा रहे हम को

बजाय… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on February 22, 2017 at 3:38pm — 3 Comments

कुछ मुक्तक/सतविन्द्र कुमार राणा

(16 14 मात्रा भार)

.

(1)

हाथ जोड़ कर फिरते दिखते जब-जब सीजन आता है

दर-दर पर मिन्नत होती है हर इक जन तब भाता है

काम साध कुर्सी को पाकर याद नहीं फिर कुछ आता

झुककर जो वादे कर जाते उनको कौन निभाता है?



(2)

मौसम जैसा हाल सजन का समझ नहीं कुछ आता है

इस पल होता है तौला उस पल माशा बन जाता है

प्रीत हमारी लगती झूठी जाने क्या दिल में रखते?

वादे उनके ऐसे लगते ज्यों नेता कर जाता है।



(3)

आँखों को झूठा मत समझो आँखें सच ही कहती हैं…

Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on February 22, 2017 at 2:30pm — 4 Comments

रिश्तों में गर रार करोगे (तरही गजल)

22 22 22 22



रिश्तों में जब रार करोगे

कुनबा अपना ख्वार करोगे ||



पैर तुम्हारा बच पायेगा?

राहें गर पुर खार करोगे ||



जाति धर्म पर वोट दिया तो

मत अपना बेकार करोगे ||



हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई

सब इक, कब स्वीकार करोगे? ||



लोकतंत्र के तुम प्रहरी हो

भ्रष्ट तंत्र पर वार करोगे? ||



राजनीति बूढों से बोली

*हमसे कितना प्यार करोगे?* ||



धन के साथ बँटेगा दिल भी

जो ऊंची दीवार करोगे ||



चीर हरण… Continue

Added by नाथ सोनांचली on February 22, 2017 at 1:00pm — 13 Comments

कुछ मुक्तक

हमारे पीछे तुम आयीं, तुम्हारे पीछे हम भागे।

न बोलूं मैं तेरे आगे, न बोलो तुम मेरे आगे।

जुबां खामोश है लेकिन, निगाहें बोल देती हैं।

हम भी रात भर रोये, तुम भी रात भर जागे।



हम भी मुस्कुराते हैं, तुम भी मुस्कुराते हो।

सबसे हम बताते हैं, सबसे तुम बताते हो।

लगा ये रोग कैसा है, हमारे दिल को ऐ जाना।

तुमसे हम छुपाते हैं, हमसे तुम छुपाते हो।



तुम्हारी भावनाओं को, समझता हूं मगर चुप हूं।

सदा खामोश लब की मैं, सुनता हूं मगर चुप हूं।

इशारों ही… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on February 22, 2017 at 11:29am — 2 Comments

सखी

बदमाश सखी की चंचल बातें
करती मस्ती
कभी तो कर देती है दूर
खींच एक लकीर

क्या खोया पाया
मन की वेदना को
अब रास आती है
खामोशियाँ ....

हँसते रहना है
दूर हो जाये हर मुश्किल
सखी की ...

न दो अब कोई आवाज़
थके कदमो से चलना है
अभी बाक़ी है कोई राह
पुकारती हुई सी ...

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on February 22, 2017 at 7:13am — 2 Comments

दो इतनी बस भीख मुझे ......

मत्तगयंद सवैया :-

============

 

दो इतनी बस भीख मुझे मन, और न माँग रहा कुछ स्वामी|

नाम जपे दिन रात सदा मुख, गान करे रसना गुण स्वामी||

रूप मनोहर देख सदा दृग, शीतल हो मन पावन स्वामी |

याचक “सत्य” करे विनती नित , शीश नवा पद पंकज स्वामी|१|

 

याद बड़ी शुभदायक औ तव, रूप बड़ा मन मोहक स्वामी|

भक्त कृपालु उदार मना तुम, भक्त कृपा लहते तव स्वामी||

बन्धु सखा गुरु मात पिता तुम, हो भव सागर तारक स्वामी|

जीवन की तुम आस प्रभो! तुम,हो…

Continue

Added by Satyanarayan Singh on February 21, 2017 at 11:30pm — 2 Comments

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