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शिक्षा सबके लिए ( लघुकथा)

" तुम मुझे रोज़ लेने आ जाती हो , मेरे बाबा मुझे डाँटते है । उनको लगता है मैं आलसी हूँ , स्कूल नहीं जाना चाहती । " शीला ने अपनी सहेली मीना से कहा ।



" हाहा हाहा , सही तो कहते है तुम्हारे बाबा , पढ़ाई चोर तो तुम हो ही , जब देखो तुम्हारी कॉपियां अधूरी रहती है ...।" मीना ने हंसकर कहा



" धत्त , कोई नहीं झूठी मेरी कॉपियां तो पूरी होती है , वो तो ....... वो तो ........."अपनी माँ की तरफ़ देखकर शीला चुप हो गयी ।



मीना यह बात जानती थी कि शीला की माँ को शीला का स्कूल जाना पसंद… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 12, 2017 at 11:38am — 14 Comments

सार छंद ( 16 ,12 )

छन्न पकैया छन्न पकैया , ऐसे मेरे नाना
रोज़ सवेरे पानी देते , औ देते थे दाना

छन्न पकैया छन्न पकैया , खुश होते थे नाना
उड़ते हुए परिंदे आते , सब चुगने थे दाना

छन्न पकैया छन्न पकैया ,था उनका ये कहना
आपनी तरह परिंदों का भी, खयाल रखना बहना

छन्न पाकैया छन्न पकैया,सबको ये समझाना
पशु पक्षी पेडों पौधों से, प्यार सदा जतलाना

छन्न पकैया छन्न पकैया , जीना चाहें मरना
नाना सदा यही कहते थे ,प्रेम सभी से करना ।।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 11, 2017 at 1:30pm — 13 Comments

नूर की हिंदी ग़ज़ल-बन गया वह राष्ट्र का सरदार क्या?

२१२२, २१२२,२१२ 
.
बन गया वह राष्ट्र का सरदार क्या?
हो गए हैं स्वप्न सब साकार क्या?
.

सत्य से बढ़कर तो ईश्वर भी नहीं,
राष्ट्र क्या फिर मित्र क्या परिवार क्या?
.

राष्ट्र की सेवा सभी का धर्म है,
कर रहे हो तुम कोई उपकार क्या?
.

देख कर इक कोमलांगी के अधर,   
कल्पना लेने लगी आकार क्या? 
.

आचरण में धर्मग्रंथो को उतार,
बाद में दे ज्ञान उनका सार क्या.  

.
निलेश "नूर"
.
मौलिक/ अप्रकाशित 

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 11, 2017 at 9:24am — 25 Comments

ग्रीष्म के दोहे

सूरज शोले छोड़ता ,पशु भी ढूँढे छाँव ।
दर खिड़की सब बंद है ,सन्नाटे में गाँव ।।

भीषण गरमी पड़ रही,पशु -मानव हैरान ।
भू जल भी घटने लगा, साँसत में है जान ।।

पारा बढ़ता जा रहा, सूख रहे तालाब ।
देखो गाँव महानगर , हालत हुई खराब ।।

पत्ते झुलसे पेड़ पर ,नीम बबूल उदास ।
पशु किसान सबको लगी, पानी की अब आस ।।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on May 11, 2017 at 8:30am — 14 Comments

गजल( बेखुदी में यार मेरे....)

2122   2122  2122  212

बेखुदी में यार मेरे याद आना छोड़ दो

मुस्कुराने की अदा है कातिलाना, छोड़ दो।1

 

सूखती-सी जो नदी उम्मीद की, बहती रही

कान में पुरवाइयों-सी गुनगुनाना छोड़ दो।2

 

ख्वाहिशों के दौर में थमती नहीं है जिंदगी 

उँगलियों पर अब जरा मुझको नचाना छोड़ दो।3

 

चाँद ढलता जा रहा फिर है पड़ी सूनी गली

बेबसी में अब कभी मुझको बुलाना छोड़ दो।4

राह अपनी मैं चलूँ तुमको मुबारक रास्ते

अनकही बातें बता रिश्ते…

Continue

Added by Manan Kumar singh on May 10, 2017 at 9:11pm — 10 Comments

दोहे

जीवन हमको बुद्ध का , देता है सन्देश |

रक्षा करना जीव की , दूर रहेगा क्लेश ||1||

भोग विलास व नारियां, बदल न पाई चाल |

योग बना था संत का, छोड़ दिया जंजाल ||2||

मन वीणा के तार को, कसना तनिक सहेज |

ढीले से हो बेसुरा , अधिक कसे निस्तेज ||3||

बंधन माया मोह का , जकड़े रहता पाँव |

जिस जिसने छोड़ा इसे , बसे ईश के गाँव ||4||

धन्य भूमि है देश की, जन्मे संत महान |

ज्ञान दीप से जगत का,हरे सकल अज्ञान ||5||

.…

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Added by Chhaya Shukla on May 10, 2017 at 2:00pm — 9 Comments

बंद दरवाज़े (लघुकथा )

“आंटी जी, अगर उस दिन आप ने मेरे सर पर हाथ न रखा होता तो पता नहीं मैं कहाँ होती”

“कीमत तो वो मेरी पहले ही लगा चुके थे,उस रोज़ तो बस पैसे देने ही आए थे ”।

“मुझ को तो कुछ पता ही नहीं चलने दिया था”  ऋतू ये कहती जा रही थी।

“ये तो भला हो, मेरे साथ डांस पार्टी में काम करने वाली सुनीता का,

 "उस बता दिया मुझको  कि  मालिक तो मेरे पैसे ले रहा  हैं, कल तुम किसी और डांस पार्टी में काम करोगी "

  "तब मुझे आप के पास तो आना ही था, आंटी जी" 

 “घर से तो अमली ने  पहले ही…

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Added by मोहन बेगोवाल on May 10, 2017 at 12:30pm — 8 Comments

अक्सर मैं फूलों को बचाया करता हूँ,--ग़ज़ल

2212/2212/2212



अक्सर मैं फूलों को बचाया करता हूँ,



काँटो से मैं खुद को सजाया करता हूँ।







इन मन्दिरों में मस्जिदों में जाना क्या,



कुछ भूखे बच्चों को खिलाया करता हूँ।







रोता बहुत हूँ पर तुने जाना नही,



गम को मियाँ हँस कर छुपाया करता हूँ।







मुझसे भी मिलने गाँव तुम आया करो,



मै सब को आईना दिखाया करता हूँ।







मै प्यार मे जीता करूं ! चाहत नही,



मै प्यार मे… Continue

Added by Hemant kumar on May 10, 2017 at 11:47am — 8 Comments

उड़ती हुई पतंग

एक नवगीत

 

गायब हैं नकली रंगों में,

होली के हुडदंग.

नजर न आती आसमान में,

उड़ती हुई पतंग.

 

पड़ी ठण्ड जब रहे सिकुड़ते,

मिली न छत सबको,

मई जून में खूब तपाया,

सूरज ने…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on May 10, 2017 at 9:31am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - इब्न ए मरियम हैं, तो शिफ़ा करिये ( गिरिराज भंडारी )

( दूसरे शेर के ऐब ए तनाफुर को कृपया स्वीकार करें )

2122  1212   22/112

ज़ह’नियत यूँ न बरहना करिये

अपने जामे में ही रहा करिये

 

आब ठंडक ही दे हमें हरदम     

आग, गर्मी ही दे दुआ करिये

 

बेवफा हो गये हैं जो साबित    

उनसे क्या खा के अब वफ़ा करिये

 

जुगनुओं की चमक चुरायी है  

शम्स ख़ुद को न अब कहा करिये

 

सिर्फ बीमार कह के चुप न रहें

इब्न ए मरियम हैं, तो शिफ़ा…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on May 10, 2017 at 8:00am — 12 Comments

"तरही ग़ज़ल , जनाब रवि शुक्ल साहिब की नज़्र"

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फाइलुन



पहले अपनी रूह का ये मक़बरा रोशन करें

और इसके बाद हम सोचें कि क्या रोशन करें



गर मयस्सर घी नहीं है,तेल का रोशन करें

मन्दिर-ओ-मस्जिद में जाएँ इक दिया रोशन करें



ये हमारी ज़िम्मेदारी है, हमारा फ़र्ज़ भी

नाम अपने बाप दादा का सदा रोशन करें



नफरतों के इन अँधेरों को मिटाने के लिये

हम चराग़ उल्फ़त के यारो जा ब जा रोशन करें



याद कर के नज़्म 'हाली'की,ज़ईफ़ा की तरह

झुटपुटे के वक़्त मिट्टी का दिया रोशन… Continue

Added by Samar kabeer on May 9, 2017 at 11:30pm — 26 Comments

चाँद तारे बना टाँकती रह गई

212  212 
झाँकती रह गई |
ताकती रह गई |


चाँद तारे बना
टाँकती रह गई |


अंत है कब कहाँ
आँकती रह गई |


चाशनी हाथ ले 
बाँटती रह गई |


साँच को आँच थी
हाँकती रह गई |


रेत में जब फँसी
हाँफती रह गई |


प्यास कैसे बुझे
बाँचती रह गई |
(मौलिक अप्रकाशित)

 

 

Added by Chhaya Shukla on May 9, 2017 at 9:30pm — 12 Comments

हिन्दी ग़ज़ल...जब सूर्य चले अस्ताचल को

22 22 22 22
जब सूर्य चले अस्ताचल को
गहराय तिमिर घेरे तल को

इक दीप जलाओ अंतस में
जगमग कर दो भूमण्डल को

आवाज बनो तुम गूंगों की
तूफान बना दो हलचल को

जब चलना है, तो साथ चलें
पग से नापें नभ जल थल को

दुःख दुनिया का पी लेंगें 'ब्रज'
रक्खो तैयार हलाहल को
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 9, 2017 at 7:00pm — 17 Comments

स्मृति पृष्ठ ...

स्मृति पृष्ठ ...

रजनी के

श्यामल कपोलों पर

मेघों की बूंदों ने

व्यथित यादों के

पृष्ठों पर जैसे

सान्तवना का

आभासीय श्रृंगार कर डाला

दृग कलशों से

सजल वेदना

प्रीत की

पराकाष्ठा को

चेहरे की लकीरों में

शोभित करती रही

प्राण और देह में

जीवन संघर्ष चलता रहा

किसी को विस्मरण करने के

सभी उपचार

रेत की भित्ति से

ढह गए

थके नयन

आशा क्षणों की

गहन कंदराओं में…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 9, 2017 at 3:59pm — 13 Comments

तरही गजल : फूल जंगल में खिले किन के लिये

2122 2122 212

कार्ड काफी था न लॉगिन के लिए

वो हमे भी ले गए पिन के लिए



चाँद पर जाकर शहद वो खा रहे

आप अब भी रो रहे जिन के लिए



शेर को आता है बस करना शिकार

फूल जंगल में खिले किन के लिए



गुठलियों के दाम भी वो ले गया

उसने शीरीं आम जब गिन के लिये



आ गई अब ब्रेड में बीमारियाँ

जी रहे थे क्या इसी दिन के लिए



आये थे जापान से कल लौट कर

फिर उड़े वो रूस बर्लिन के लिए



पास पप्पू एक दिन हो…

Continue

Added by Ravi Shukla on May 9, 2017 at 11:46am — 27 Comments

कोई रिश्ता निभाया जा रहा है

मापनी -१२२२ १२२२ १२२

कोई रिश्ता निभाया जा रहा है

मुझे फिर से बुलाया जा रहा है

 

भले ही खिड़कियाँ हैं बंद घर की,

मगर परदा उठाया जा रहा है

 

पड़ीं हैं नींव में चुपचाप ईंटे,

भले बोझा बढाया जा रहा…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on May 9, 2017 at 10:00am — 19 Comments

नूर की हिंदी ग़ज़ल ..दर्पणों से कब हमारा मन लगा

२१२२/२१२२/२१२ 

.

दर्पणों से कब हमारा मन लगा

पत्थरों के मध्य अपनापन लगा. 

.

लिप्त है माया में अपना ही शरीर

ये समझ पाने में इक जीवन लगा.

.

तप्त मरुथल सी ह्रदय की धौंकनी

हाथ जब उस ने रखा चन्दन लगा.

.

मूर्खता पर करते हैं परिहास अब

जो था पीतल वो हमें कुन्दन लगा.

.

प्रेम में भी कसमसाहट सी रही

प्रेम मेरा आपको बन्धन लगा.

.

जल रहे हैं हम यहाँ प्रेमाग्नि में

और उस पर ये मुआ सावन लगा.…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 9, 2017 at 10:00am — 37 Comments

सही - गलत -- डॉo विजय शंकर

हम इसके गलत की बात करते हैं
उसके गलत की बात नहीं करते हैं ,
हम इसके उसके की बात करते हैं
सही गलत की बात नहीं करते हैं।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on May 8, 2017 at 8:00pm — 10 Comments

उल्फत न सही बैर निभाने के लिए आ.(समीक्षार्थ ग़ज़ल) :अलका ललित

221 1221 1221 122

***

उल्फत न सही बैर निभाने के लिए आ

चाहत के अधूरे से फ़साने के लिए आ

.

चाहत भरी दस्तक भी सुनी थी कभी दिल ने

वीरानियों को फिर से बसाने के लिए आ

.

शब्दों की कमी तो मुझे हरदम ही रही है

खामोश ग़ज़ल कोई सुनाने के लिए आ

.

सागर ये गमों का कहीं तट तोड़ न जाए

ऐ राहते जां बांध बनाने के लिए आ

.

रौशन दरो दीवार है झिलमिल है सितारे 

ऐ चाँद मेरे मुझको…

Continue

Added by अलका 'कृष्णांशी' on May 8, 2017 at 4:00pm — 10 Comments

साहस

कविता ने 

चूमा

उसके 

दिल को 

मायनों में

एक आदमी में 

कभी नहीँ

था

इतना 

साहस

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by narendrasinh chauhan on May 8, 2017 at 12:34pm — 5 Comments

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