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August 2017 Blog Posts

डुगडुगी बजती रही.......

डुगडुगी बजती रही.......

1.

गरजे घन घनघोर

प्रलय चहुँ ओर

तृण बहे

तन बहे

करके

सब को अशांत

फिर 

वृष्टि का तांडव

हो गया

शांत



2

बुझ गयी

कुछ क्षण जल कर

माचिस की तीली सी

जंग लड़ती

साँसों से

असहाय काया

अस्थि कलश में

सिमट गयी

मुट्ठी भर राख में

साँसों की

माया

3

तालियों के शोर

चिलचिलाती धूप

करतब दिखाती बच्ची

रस्सी से गिर पड़ी

साँसों से संघर्ष…

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Added by Sushil Sarna on August 4, 2017 at 5:26pm — 4 Comments

ग़ज़ल....यार तुम भी कमाल करते हो-बृजेश कुमार 'ब्रज

2122 1212 22
रहबरों से सवाल करते हो
तौबा ये क्या मजाल करते हो

रस्मे उल्फत की बात कर बैठे
काम सब बेमिसाल करते हो

हीर समझा हुई ग़लतफ़हमी
खुद क्यों रांझे सा हाल करते हो

आइने में ये किसकी सूरत है
किसपे दिल ये निहाल करते हो

किसने साये को साथ रक्खा है
किस लिये 'ब्रज' मलाल करते हो
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 4, 2017 at 4:30pm — 14 Comments

तो क्या हुआ (लघुकथा)

घर के बाहर खुले आंगन में चेहरा लटका कर बैठे देख उसकी माँ ने उसके पास जाकर उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, "परेशान मत हो, अगली बार बेटा ही होगा।"

 

"नहीं माँ, अब बस। दो बच्चे हो गए हैं, तीसरा होने पर इन दोनों बच्चियों की परवरिश भी अच्छी तरह नहीं कर पाऊंगा।" वहीँ पालने में सो रही अपनी नवजात बेटी को देखते हुए उसने उत्तर दिया।

 

माँ के पीछे-पीछे तब तक आज ही हस्पताल से लौटी अंदर आराम कर रही उसकी पत्नी को तरह-तरह के निर्देश देकर कुछ और महिलायें भी बाहर आ गयीं थीं। उनमें से…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on August 4, 2017 at 12:27pm — 5 Comments

यूँ तो सावन जाने को है, फिर भी ...

यूँ तो सावन जाने को है, फिर भी ...

आया सावन मास सखी री

हरी हो गई घास सखी री

हरी चूड़ियाँ बिंदी साड़ी

हाथों में मेहँदी रंग गाढ़ी

झूले हो गए खास सखी री

गहराई है आस सखी री

श्वेत श्याम बादल उड़ आते

प्रियतम का संदेशा लाते

भरें कुलाँचे साँस सखी री

आया सावन मास सखी री

रंग गेरुआ घर घर डोले

जिसको देखो बम बम भोले

मन में है उल्लास सखी री

सुंदर वर की आस सखी री

ज्यों ज्यों सावन बीता जाए

मन उछाह से भर भर जाए

रक्षा…

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Added by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 4, 2017 at 12:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल (दिल सितमगर के नाम कर बैठे )

ग़ज़ल

(फ़ाइलातुन-मफ़ाइलुंन-फेलुंन)

ज़िन्दगी हम तमाम कर बैठे।

दिल सितमगर के नाम कर बैठे।



हो गई सिर्फ हम से यह गलती

राजे उल्फत को आम कर बैठे।



यक बयक क्या निगाह उनसे लड़ी

नींद अपनी हराम कर बैठे।



जो सियासत को लाया मज़हब में

उसका हम एहतराम कर बैठे।



जो न अब तक ज़बान कर पाई

वह निगाहों से काम कर बैठे।



वह किसी संग दिल का है कूचा

तुम जहां पर क़याम कर बैठे।



वह न तस्दीक़ आये फिर भी हम

बज़्म का इहतिमाम कर… Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on August 4, 2017 at 8:13am — 12 Comments

द ब्लू व्हेल

मोबाईल पर खेला जाने वाला वह खेल युवाओं का पसंदीदा खेल बन गया था। युवाओं को दीवानगी की हद तक पहुंचाने वाले इस खेल में खिलाडी को हाथ पर मछली का चित्र गुदवाना और हर स्टेप जीतने पर गुदी हुई मछली पर एक कट मारकर किसी बहुमंजिला इमारत की पहली, दूसरी,तीसरी छत पर पहुंचनाऔर अंत में छटवीं मंज़िल से कूद कर आत्महत्या करना,सारे टास्क पूरे करके विजेता के लिये यह पुरस्कार था।दुनियाँ मेंअनेक स्थानों पर इस खेल के कारण हादसे हो रहे थे।आखिर पुलिस ने ऐसा खतरनाक खेल  बनानेवाले उसआदमी को धर दबोचा।

"तुमने ऐसा…

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Added by VASUDHA GADGIL on August 3, 2017 at 1:00pm — 4 Comments

एक गीत--

दिल जिन्हें ढूंढे, वो हालात कहाँ

खाली दिल में वो है जज्बात कहाँ

बस एक रस्म निभा देते हैं

अब वो पहले सी मुलाक़ात कहाँ

लॉन शहरों में खूबसूरत हैं

गांव की उसमें मगर बात कहाँ

वक़्त बस यूँ ही गुजर जाता है

अब वो दिन और अब वो रात कहाँ

कभी शामिल थे जिनकी हर शै में

उनके अब ऐसे, खयालात कहाँ !!

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on August 3, 2017 at 12:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल "दिखाना ख़्वाब यूँ अच्छा नहीं है"

1222 1222 122

दिखाना ख़्वाब यूँ अच्छा नहीं है।

फ़क़त बातों से कुछ होता नहीं है।।



***

बुरा अंजाम होता है बुरे का।

ख़ुदा से कुछ भी तो छुपता नहीं है।।



***

कई धोख़े मिले हैं जिंदगी में।

किसी पर अब यकीं होता नहीं है।।



***

मुहब्बत में मुझे इक बेवफा ने।

दिया वो जख़्म जो भरता नहीं है।।



***

यकीं कोई न अब उस पर करेगा।

वो अपनी बात पर टिकता नहीं है।।



***

उसे है याद बातें सब पुरानी।

मगर अब गाँव वो… Continue

Added by surender insan on August 3, 2017 at 9:54am — 21 Comments

मैंने देखी आज रंगोली

मैंने देखी आज रंगोली..

टी० वी० पर दूरदर्शन वाली

पहले भी देखा है कई बार

इसके अनेकों रूप कई प्रकार

कभी स्कूल के प्रांगण में सजी

कभी घर की देहली पर,

कभी दिवाली में तो कभी ब्याह–शादी में

रंग-बिरंगी, अनोखी-अलबेली

जब बनती तो अनोखा उत्साह होता

पहले धीरे-धीरे आकार लेती

उत्सुकता का कारण बनती

फिर अलग-अलग रंगों से

सजती-सँवरती, बनती-बिगड़ती

जब बन कर तैयार हो जाती

बच्चे खुश हो तालियाँ बजाते

युवा सेल्फी…

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Added by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 3, 2017 at 7:28am — 2 Comments

फिर भी :कविता :हरि प्रकाश दुबे

कितनी  सहज हो तुम

कोई रिश्ता नही

मेरा ओर तुम्हारा

फिर भी

अनगिनत पढ़ी जा रही हो,मुझे

बिन कुछ कहे

बस मुस्कुरा कर

अनवरत सुनी जा रही हो ,मुझे

बस यही अहसास काफी है

संपूर्ण होने का,मेरे लिए !!

"मौलिक व अप्रकाशित"

© हरि प्रकाश दुबे

Added by Hari Prakash Dubey on August 2, 2017 at 11:30pm — 2 Comments

लघुकथा-- बर्थ-डे गिफ्ट

राहुल और साक्षी के जीवन में तनाव उस समय उत्पन्न हो गया जब साक्षी ने अपने सात वर्षीय बेटे अंशुल की ज़िम्मेदारी उठाने की अर्ज़ी कोर्ट में लगा दी । दर असल राहुल काम के संबंध में लंदन जाना चाहता था । साक्षी को सतारा में ससुराल में रहने को कहा । मगर साक्षी को पुणे में रहकर ही जॉब करना था । विवाद यहीं से पैदा हुआ । एक दिन राहुल अंशुल को लेकर सतारा आ गया और उसकी पढ़ाई लिखाई की व्यवस्था करने लगा । साक्षी को बस यही नगवारा लगा ।

अंशुल के बर्थ-डे वाले दिन ही दोनों ने अलग होने का निर्णय ले लिया… Continue

Added by Mohammed Arif on August 2, 2017 at 11:13pm — 10 Comments

कौन है ......... संतोष

कहाँ है,कौन है, कैसा नज़र आता है ,

वो ख़ुद में कम ,अब मुझ में ज़ियादा नज़र आता है

ये कैसी इबादत है ख़ुदा को मिरी,

माँगू ख़ुदा को भी ,तो वो ही नज़र आता है

वो धड़कन है,साँस है, ज़िंदगी भी है मिरी

करूँ आँखें बंद भी तो ,चेहरा उसी का नज़र आता है



अश्क़ ,ग़म,ख़ुशी ,मौसम,सभी तो है शामिल उसमें,

वो मुझे अब मिरी, ग़ज़ल नज़र आता है



चाहता तो वजूद ही मिटा देता उसका मगर,

वो ऐसा ज़ख़्म है दिल का ,जो फिर उभर आता…

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Added by santosh khirwadkar on August 2, 2017 at 9:30pm — No Comments

कुण्डलिया/सतविन्द्र राणा

सारे दादुर मोर खुश ,सावन जो घिर आय।
कारे बादल जलभरे ,नभ में जाते छाय।
नभ में जाते छाय, प्यास धरती की हरते।
नीर सुधा बरसाय,सुहागन इसको करते।
सतविन्दर कविराय, लगाओ पौधे प्यारे
मिट्टी उगले अन्न,सुखी हों प्राणी सारे।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 2, 2017 at 8:30pm — 8 Comments

चले आना...संतोष

चले आ बस एक बार फिर तू ,

अब ये इंतज़ार और नहीं होता



नज़रों के फ़ासलों में है तू दूर,

दिलों के फ़ासलों से तू दूर नहीं होता



चाहते हो आज़माना मुझको तो ,आज़माओ

मगर ये दिल है ,सबका एक सा नहीं होता



तू आ जा मेरे ख़्वाबों में ही सही ,

फिर देखना दुनियाँ में क्या नहीं होता



तलाश मेरी वही है जो वो समझे तो "संतोष"

लेकिन अब मेरी मिन्नतों का भी असर उस पर नहीं होता



#संतोष खिरवड़कर

9826052771

(मौलिक एवं… Continue

Added by santosh khirwadkar on August 2, 2017 at 8:24pm — 2 Comments

इश्क़ की ज़ुबाँ....संतोष

इश्क़ की ज़ुबाँ को तूने किस क़दर आसां कर दिया,

कह न सका कभी, वो निगाहों से बयाँ कर दिया.



दिल में मुरझाये से अरमां थे मिरे,

निगाहों ने तिरे उन्हें फिर जवाँ कर दिया.



अब तो हवाओं में भी आती है ख़ुशबू तिरी,

बंजर था ये दिल मेरा,तूने गुलिस्ताँ कर दिया.



पाना था तुझे जो रुका भी नहीं मंज़िल तलक मैं,

चाहतों ने तिरे इस दुश्वार सफ़र को और आसां कर दिया.



फ़ैसला जब था मेरा तुम्हारा, तो फिर ये ऐतराज़ कैसा,

दुनियाँ वालों ने फिर क्यूँ जीना मेरा… Continue

Added by santosh khirwadkar on August 2, 2017 at 8:02pm — 6 Comments

आज कुछ यूँ हुआ कि ...

आज कुछ यूँ हुआ कि ...

घोंसला टूटा गिरा था पेड़ के नीचे

एक नन्ही जान बैठी आँखें थी मींचे

उसकी माँ मुँह में दबाए थी कोई चारा

ढूँढती फिरती थीं नजरें आँख का तारा

हाथ मैंने जब बढाया मदद की खातिर

उसने समझा ये शिकारी है कोई शातिर

माँ हो चाहे जिसकी भी वो एक सी बनी

आज नन्हे पंछी की इंसान से ठनी

उसी टूटे नीड़ को रखा उठा फिर पेड़ पर

पंछी बनाते घोंसले इंसान तो बस घर..

सुबह आकर देखा तो हालात कल से थे

बारिश हुई थी और तिनके…

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Added by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 2, 2017 at 7:30pm — 6 Comments

तरही ग़ज़ल नम्बर 2

नोट :-"तरही मुशायरे में जितनी ग़ज़लें शामिल हुईं, इस ग़ज़ल के क़वाफ़ी उन सबसे अलग हैं"



मफ़ऊल फ़ाइलातु मुफ़ाईल फ़ाइलुन



लेकर गई है हमको जिहालत कहाँ कहाँ

मांगी है तेरे वास्ते मन्नत कहाँ कहाँ



ये आज तेरे पास जो दौलत के ढेर हैं

सच बोल तूने की है ख़ियानत कहाँ कहाँ



अब तक भरी हुई थी जो तेरे दिमाग़ में

फैलाई है वो तूने ग़िलाज़त कहाँ कहाँ



तूने वतन को बेचा है अपने मफ़ाद में

होती है देखें तेरी मज़म्मत कहाँ कहाँ



फ़हरिस्त इसकी अब तो बताना… Continue

Added by Samar kabeer on August 2, 2017 at 3:00pm — 27 Comments

लघुकथा दोहरा सुख

दोहरा सुख   

“सरकारी नौकरी में रखा क्या है”

“क्यों बहुत परेशान लग रहे हो| इस नौकरी ने तुम्हें क्या नहीं दिया है? अच्छी तन्खवाह ,सरकारी घर, काम करने के तय घंटे, और क्या चाहिये |”

“बंधीबंधाई तनखा से गुजारा कहाँ ?”

“और जो बंगले की ज़मीन, हर मौसम की सब्जी ,फल ----ताज़े का मज़ा ही और है|”

“अपने पोती पोतियों को इन्हीं साग-भाजी की फोटो दिखाना और तो कुछ कमाई तो की नहीं जीवन में|”

“दादा जी आम तोड़ दीजीये ना, मेरा हाथ नहीं पहुँच रहा है|”

“पेड़ पर चढ़ कर…

Continue

Added by Manisha Saxena on August 2, 2017 at 12:11pm — 8 Comments

ग़ज़ल नूर की - हैरान क्या करेगा कोई मोजज़ा मुझे

२२१/ २१२१/ १२२१/ २१२



हैरान क्या करेगा कोई मोजज़ा मुझे,

दुनिया का हर तमाशा लगे ख़्वाब सा मुझे.

.

हालाँकि ख़ुशबू इल्म-ओ-अदब की नहीं हूँ मैं,

लेकिन बिख़रने का है बहुत तज़रिबा मुझे.

.

इक रोज़ मैं ही तेरे किसी काम आऊँगा,

गरचे तू मानता ही नहीं काम का मुझे.

.

तेरे कहे पे चल पड़ा हूँ आँखें मूँदकर

ठोकर लगे तो मौला मेरे थामना मुझे.

.

ये कौन मेरे हिज्र को करता है और तवील,

जीने की फिर ये कौन दुआ दे गया…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on August 2, 2017 at 9:37am — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
छंद – विजया घनाक्षरी(मापनीमुक्त वर्णिक)

छंद – विजया घनाक्षरी(मापनीमुक्त वर्णिक) 

विधान 32 वर्णों के चार समतुकांत चरण, 16 16 वर्णों यति अनिवार्य

8,8,8,8 पर यति उत्तम अंत में ललल अर्थात लघु लघु लघु या नगण अनिवार्य ।

 

सूखे कूप हैं इधर ,गंदे स्रोत हैं उधर,प्यासे वक़्त के अधर,मीठा नीर है किधर|

मैली गंग है उधर,देखें नेत्र ये जिधर,रोयें धरा ये अधर,जाए शीघ्र ये सुधर|

कोई भाव है न रस,कैसे शुष्क हैं उरस,वाणी नहीं है सरस,शोले रहे हैं बरस|   

बातों बात ये…

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Added by rajesh kumari on August 1, 2017 at 10:44pm — 4 Comments

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